वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ७ · २४ श्लोकाःSarga 7 · 24 ślokas

सीता और भ्रातासहित श्रीरामका सुतीक्ष्णके आश्रमपर जाकर उनसे बातचीत करना तथा उनसे सत्कृत हो रातमें वहीं ठहरना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ७ — painting

॥ ३ · ७ · ७–८ ॥

आश्रमे जटाधरो यज्ञोपवीती तपोदीप्तः सुतीक्ष्णमुनिः प्रहृष्टवदनो नीलवर्णं रामं करेण गृह्णाति, रामश्च धनुरादाय प्राञ्जलिः प्रणमति, समीपे वल्कली लक्ष्मणो दूरे च वल्कलवसना सीता तिष्ठति।

आश्रम में जटाधारी, यज्ञोपवीतधारी, तपस्या से देदीप्यमान सुतीक्ष्ण मुनि प्रसन्न मुख से नील वर्ण के श्रीराम का हाथ थाम रहे हैं; धनुष लिये श्रीराम हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम कर रहे हैं, समीप ही वल्कलधारी लक्ष्मण और कुछ दूरी पर वनवसना सीता खड़ी हैं; कुटी में प्रज्वलित अग्नि, कुशासन और फल सजे हैं।

In his leaf-hut hermitage the ardent sage Sutikshna, matted-haired and radiant with the fire of austerity, rises with a joyful face and takes the blue Ram warmly by the hand; Ram, his bow set by, bows to him with folded hands, while the bark-clad Lakshman stands near and Sita waits at a reverent distance beside the blazing fire and fruit-laden hut.

॥ ३ · ७ · १ ॥
रामस्तु सहितो भ्रात्रा सीतया परंतपः। सुतीक्ष्णस्याश्रमपदं जगाम सह तैर्द्विजैः

rāmastu sahito bhrātrā sītayā ca paraṁtapaḥ।
sutīkṣṇasyāśramapadaṁ jagāma saha tairdvijaiḥ ॥

शत्रुओं को संताप देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण, सीता तथा उन ब्राह्मणों के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम की ओर चले

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॥ ३ · ७ · २ ॥
गत्वा दूरमध्वानं नदीस्तीर्त्वा बहूदकाः। ददर्श विमलं शैलं महामेरुमिवोन्नतम्

sa gatvā dūramadhvānaṁ nadīstīrtvā bahūdakāḥ।
dadarśa vimalaṁ śailaṁ mahāmerumivonnatam ॥

वे दूरतक का मार्ग तै करके अगाध जल से भरी हुई बहुत-सी नदियों को पार करते हुए जब आगे गये, तब उन्हें महान् मेरुगिरि के समान एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत दिखायी दिया, जो बड़ा ही निर्मल था

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॥ ३ · ७ · ३ ॥
ततस्तदिक्ष्वाकुवरौ सततं विविधैर्द्रुमैः। काननं तौ विविशतुः सीतया सह राघवौ

tatastadikṣvākuvarau satataṁ vividhairdrumaiḥ।
kānanaṁ tau viviśatuḥ sītayā saha rāghavau ॥

वहाँ से आगे बढ़कर वे दोनों इक्ष्वाकुकुल के श्रेष्ठ वीर रघुवंशी बन्धु सीता के साथ नाना प्रकार के वृक्षों से भरे हुए एक वन में पहुँचे

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॥ ३ · ७ · ४ ॥
प्रविष्टस्तु वनं घोरं बहुपुष्पफलद्रुमम्। ददर्शाश्रममेकान्ते चीरमालापरिष्कृतम्

praviṣṭastu vanaṁ ghoraṁ bahupuṣpaphaladrumam।
dadarśāśramamekānte cīramālāpariṣkṛtam ॥

उस घोर वन में प्रविष्ट हो श्रीरघुनाथजी ने एकान्त स्थान में एक आश्रम देखा, जहाँ के वृक्ष प्रचुर फल-फूलों से लदे हुए थे। इधर-उधर टँगे हुए चीर वस्त्रों के समुदाय उस आश्रम की शोभा बढ़ाते थे

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॥ ३ · ७ · ५ ॥
तत्र तापसमासीनं मलपङ्कजधारिणम्। रामः सुतीक्ष्णं विधिवत् तपोधनमभाषत

tatra tāpasamāsīnaṁ malapaṅkajadhāriṇam।
rāmaḥ sutīkṣṇaṁ vidhivat tapodhanamabhāṣata ॥

वहाँ आन्तरिक मल की शुद्धि के लिये पद्मासन धारण किये सुतीक्ष्ण मुनि ध्यानमग्न होकर बैठे थे। श्रीराम ने उन तपोधन मुनि के पास विधिवत् जाकर उनसे इस प्रकार कहा—

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॥ ३ · ७ · ६ ॥
रामोऽहमस्मि भगवन् भवन्तं द्रष्टुमागतः। तन्माभिवद धर्मज्ञ महर्षे सत्यविक्रम

rāmo'hamasmi bhagavan bhavantaṁ draṣṭumāgataḥ।
tanmābhivada dharmajña maharṣe satyavikrama ॥

‘सत्यपराक्रमी धर्मज्ञ महर्षे! भगवन्! मैं राम हूँ और यहाँ आपका दर्शन करने के लिये आया हूँ, अतः आप मुझसे बात कीजिये’

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॥ ३ · ७ · ७ ॥
निरीक्ष्य ततो धीरो रामं धर्मभृतां वरम्। समाश्लिष्य बाहुभ्यामिदं वचनमब्रवीत्

sa nirīkṣya tato dhīro rāmaṁ dharmabhṛtāṁ varam।
samāśliṣya ca bāhubhyāmidaṁ vacanamabravīt ॥

धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भगवान् श्रीराम का दर्शन करके धीर महर्षि सुतीक्ष्ण ने अपनी दोनों भुजाओं से उनका आलिङ्गन किया और इस प्रकार कहा—

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॥ ३ · ७ · ८ ॥
स्वागतं ते रघुश्रेष्ठ राम सत्यभृतां वर। आश्रमोऽयं त्वयाऽऽक्रान्तः सनाथ इव साम्प्रतम्

svāgataṁ te raghuśreṣṭha rāma satyabhṛtāṁ vara।
āśramo'yaṁ tvayā''krāntaḥ sanātha iva sāmpratam ॥

‘सत्यवादियों में श्रेष्ठ रघुकुलभूषण श्रीराम! आपका स्वागत है। इस समय आपके पदार्पण करने से यह आश्रम सनाथ हो गया

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॥ ३ · ७ · ९ ॥
प्रतीक्षमाणस्त्वामेव नारोहेऽहं महायशः। देवलोकमितो वीर देहं त्यक्त्वा महीतले

pratīkṣamāṇastvāmeva nārohe'haṁ mahāyaśaḥ।
devalokamito vīra dehaṁ tyaktvā mahītale ॥

‘महायशस्वी वीर! मैं आपकी ही प्रतीक्षा में था, इसीलिये अबतक इस पृथ्वी पर अपने शरीर को त्यागकर मैं यहाँ से देवलोक (ब्रह्मधाम) में नहीं गया

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॥ ३ · ७ · १० ॥
चित्रकूटमुपादाय राज्यभ्रष्टोऽसि मे श्रुतः। इहोपयातः काकुत्स्थ देवराजः शतक्रतुः

citrakūṭamupādāya rājyabhraṣṭo'si me śrutaḥ।
ihopayātaḥ kākutstha devarājaḥ śatakratuḥ ॥

‘मैंने सुना था कि आप राज्य से भ्रष्ट हो चित्रकूट पर्वत पर आकर रहते हैं। काकुत्स्थ! यहाँ सौ यज्ञों का अनुष्ठान करनेवाले देवराज इन्द्र आये थे

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॥ ३ · ७ · ११ ॥
उपागम्य मे देवो महादेवः सुरेश्वरः। सर्वाँल्लोकाञ्जितानाह मम पुण्येन कर्मणा

upāgamya ca me devo mahādevaḥ sureśvaraḥ।
sarvām̐llokāñjitānāha mama puṇyena karmaṇā ॥

‘वे महान् देवता देवेश्वर इन्द्रदेव मेरे पास आकर कह रहे थे कि ‘तुमने अपने पुण्यकर्म के द्वारा समस्त शुभ लोकों पर विजय पायी है’

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॥ ३ · ७ · १२ ॥
तेषु देवर्षिजुष्टेषु जितेषु तपसा मया। मत्प्रसादात् सभार्यस्त्वं विहरस्व सलक्ष्मणः

teṣu devarṣijuṣṭeṣu jiteṣu tapasā mayā।
matprasādāt sabhāryastvaṁ viharasva salakṣmaṇaḥ ॥

‘उनके कथनानुसार मैंने तपस्या से जिन देवर्षिसेवित लोकों पर अधिकार प्राप्त किया है, उन लोकों में आप सीता और लक्ष्मण के साथ विहार करें। मैं बड़ी प्रसन्नता के साथ वे सारे लोक आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ’

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॥ ३ · ७ · १३ ॥
तमुग्रतपसं दीप्तं महर्षिं सत्यवादिनम्। प्रत्युवाचात्मवान् रामो ब्रह्माणमिव वासवः

tamugratapasaṁ dīptaṁ maharṣiṁ satyavādinam।
pratyuvācātmavān rāmo brahmāṇamiva vāsavaḥ ॥

जैसे इन्द्र ब्रह्माजी से बात करते हैं, उसी प्रकार मनस्वी श्रीराम ने उन उग्र तपस्यावाले तेजस्वी एवं सत्यवादी महर्षि को इस प्रकार उत्तर दिया—

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॥ ३ · ७ · १४ ॥
अहमेवाहरिष्यामि स्वयं लोकान् महामुने। आवासं त्वहमिच्छामि प्रदिष्टमिह कानने

ahamevāhariṣyāmi svayaṁ lokān mahāmune।
āvāsaṁ tvahamicchāmi pradiṣṭamiha kānane ॥

‘महामुने! वे लोक तो मैं स्वयं ही आपको प्राप्त कराऊँगा, इस समय तो मेरी यह इच्छा है कि आप बतावें कि मैं इस वन में अपने ठहरने के लिये कहाँ कुटिया बनाऊँ?

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॥ ३ · ७ · १५ ॥
भवान् सर्वत्र कुशलः सर्वभूतहिते रतः। आख्यातं शरभङ्गेन गौतमेन महात्मना

bhavān sarvatra kuśalaḥ sarvabhūtahite rataḥ।
ākhyātaṁ śarabhaṅgena gautamena mahātmanā ॥

‘आप समस्त प्राणियों के हित में तत्पर तथा इहलोक और परलोक की सभी बातों के ज्ञान में निपुण हैं, यह बात मुझसे गौतमगोत्रीय महात्मा शरभङ्ग ने कही थी’

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॥ ३ · ७ · १६ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण महर्षिर्लोकविश्रुतः। अब्रवीन्मधुरं वाक्यं हर्षेण महता युतः

evamuktastu rāmeṇa maharṣirlokaviśrutaḥ।
abravīnmadhuraṁ vākyaṁ harṣeṇa mahatā yutaḥ ॥

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर उन लोकविख्यात महर्षि ने बड़े हर्ष के साथ मधुर वाणी में कहा—

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॥ ३ · ७ · १७ ॥
अयमेवाश्रमो राम गुणवान् रम्यतामिति। ऋषिसंघानुचरितः सदा मूलफलैर्युतः

ayamevāśramo rāma guṇavān ramyatāmiti।
ṛṣisaṁghānucaritaḥ sadā mūlaphalairyutaḥ ॥

‘श्रीराम! यही आश्रम सब प्रकार से गुणवान् (सुविधाजनक) है, अतः आप यहीं सुखपूर्वक निवास कीजिये। यहाँ ऋषियों का समुदाय सदा आता-जाता रहता है और फल-मूल भी सर्वदा सुलभ होते हैं

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॥ ३ · ७ · १८ ॥
इममाश्रममागम्य मृगसंघा महीयसः। अहत्वा प्रतिगच्छन्ति लोभयित्वाकुतोभयाः

imamāśramamāgamya mṛgasaṁghā mahīyasaḥ।
ahatvā pratigacchanti lobhayitvākutobhayāḥ ॥

‘इस आश्रम पर बड़े-बड़े मृगों के झुंड आते और अपने रूप, कान्ति एवं गति से मन को लुभाकर किसीको कष्ट दिये बिना ही यहाँ से लौट जाते हैं। उन्हें यहाँ किसीसे कोई भय नहीं प्राप्त होता है

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॥ ३ · ७ · १९ ॥
नान्यो दोषो भवेदत्र मृगेभ्योऽन्यत्र विद्धि वै। तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य महर्षेर्लक्ष्मणाग्रजः उवाच वचनं धीरो विगृह्य सशरं धनुः।

nānyo doṣo bhavedatra mṛgebhyo'nyatra viddhi vai।
tacchrutvā vacanaṁ tasya maharṣerlakṣmaṇāgrajaḥ ॥
uvāca vacanaṁ dhīro vigṛhya saśaraṁ dhanuḥ।

‘इस आश्रम में मृगों के उपद्रव के सिवा और कोई दोष नहीं है, यह आप निश्चितरूप से जान लें।’ महर्षि का यह वचन सुनकर लक्ष्मण के बड़े भाई धीर-वीर भगवान् श्रीराम ने हाथ में धनुष-बाण लेकर कहा—

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॥ ३ · ७ · २० ॥
तानहं सुमहाभाग मृगसंघान् समागतान्

tānahaṁ sumahābhāga mṛgasaṁghān samāgatān ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ७ · २१ ॥
हन्यां निशितधारेण शरेणानतपर्वणा। भवांस्तत्राभिषज्येत किं स्यात् कृच्छ्रतरं ततः

hanyāṁ niśitadhāreṇa śareṇānataparvaṇā।
bhavāṁstatrābhiṣajyeta kiṁ syāt kṛcchrataraṁ tataḥ ॥

॥ २०–२१ ॥

‘महाभाग! यहाँ आये हुए उन उपद्रवकारी मृगसमूहों को यदि मैं झुकी हुई गाँठ और तीखी धारवाले बाण से मार डालूँ तो इसमें आपका अपमान होगा। यदि ऐसा हुआ तो इससे बढ़कर कष्ट की बात मेरे लिये और क्या हो सकती है?

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॥ ३ · ७ · २२ ॥
एतस्मिन्नाश्रमे वासं चिरं तु समर्थये। तमेवमुक्त्वोपरमं रामः संध्यामुपागमत्

etasminnāśrame vāsaṁ ciraṁ tu na samarthaye।
tamevamuktvoparamaṁ rāmaḥ saṁdhyāmupāgamat ॥

‘इसलिये मैं इस आश्रम में अधिक समय नहीं निवास करना चाहता।’ मुनि से ऐसा कहकर मौन हो श्रीरामचन्द्रजी संध्योपासना करने चले गये

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॥ ३ · ७ · २३ ॥
अन्वास्य पश्चिमां संध्यां तत्र वासमकल्पयत्। सुतीक्ष्णस्याश्रमे रम्ये सीतया लक्ष्मणेन

anvāsya paścimāṁ saṁdhyāṁ tatra vāsamakalpayat।
sutīkṣṇasyāśrame ramye sītayā lakṣmaṇena ca ॥

सायंकाल की संध्योपासना करके श्रीराम ने सीता और लक्ष्मण के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के उस रमणीय आश्रम में निवास किया

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॥ ३ · ७ · २४ ॥
ततः शुभं तापसयोग्यमन्नं स्वयं सुतीक्ष्णः पुरुषर्षभाभ्याम्। ताभ्यां सुसत्कृत्य ददौ महात्मा संध्यानिवृत्तौ रजनीं समीक्ष्य

tataḥ śubhaṁ tāpasayogyamannaṁ svayaṁ sutīkṣṇaḥ puruṣarṣabhābhyām।
tābhyāṁ susatkṛtya dadau mahātmā saṁdhyānivṛttau rajanīṁ samīkṣya ॥

संध्या का समय बीतने पर रात हुई देख महात्मा सुतीक्ष्ण ने स्वयं ही तपस्वी-जनों के सेवन करने योग्य शुभ अन्न ले आकर उन दोनों पुरुषशिरोमणि बन्धुओं को बड़े सत्कार के साथ अर्पित किया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सातवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७ ॥