वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ७५ · ३० श्लोकाःSarga 75 · 30 ślokas

श्रीराम और लक्ष्मणकी बातचीत तथा उन दोनों भाइयोंका पम्पासरोवरके तटपर जाना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ७५ — painting

॥ ३ · ७५ · २१–२२ ॥

रक्तश्वेतनीलकमलाकीर्णस्य पम्पासरोवरस्य पुष्पिततटे नीलवर्णो धनुर्धरो रामः हृदि हस्तं निधाय सीताविरहशोकाकुलो जलं प्रति दृष्टिं क्षिपति; समीपे वल्कलधरो लक्ष्मणः सचिन्तं तमवलम्बते, दूरे पुष्पित ऋष्यमूकपर्वतो दृश्यते।

लाल, श्वेत और नीले कमलों से भरे पम्पासरोवर के पुष्पित तट पर नील वर्ण के धनुर्धर श्रीराम हृदय पर हाथ रखे, सीता के वियोग-शोक से व्याकुल, जल की ओर टकटकी लगाये देख रहे हैं; पास ही वल्कलधारी लक्ष्मण चिन्तित भाव से उन्हें सँभालते-से खड़े हैं और दूर पुष्पित ऋष्यमूक पर्वत दिखायी दे रहा है।

On the flowering shore of Pampa lake, its waters carpeted with red, white and blue lotuses, the blue, bow-bearing Ram stands with a hand pressed to his heart, overcome with grief at his separation from Sita as he gazes across the water; close beside him the bark-clad Lakshman stands in anxious support, and the flowering Rishyamuka mountain rises in the distance.

॥ ३ · ७५ · १ ॥
दिवं तु तस्यां यातायां शबर्या स्वेन तेजसा। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा चिन्तयामास राघवः॥

divaṁ tu tasyāṁ yātāyāṁ śabaryā svena tejasā।
lakṣmaṇena saha bhrātrā cintayāmāsa rāghavaḥ॥

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॥ ३ · ७५ · २ ॥
चिन्तयित्वा तु धर्मात्मा प्रभावं तं महात्मनाम्। हितकारिणमेकाग्रं लक्ष्मणं राघवोऽब्रवीत्॥

cintayitvā tu dharmātmā prabhāvaṁ taṁ mahātmanām।
hitakāriṇamekāgraṁ lakṣmaṇaṁ rāghavo'bravīt॥

॥ १–२ ॥

अपने तेज से प्रकाशित होनेवाली शबरी के दिव्यलोक में चले जाने पर भाई लक्ष्मणसहित धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी ने उन महात्मा महर्षियों के प्रभाव का चिन्तन किया। चिन्तन करके अपने हित में संलग्न रहनेवाले एकाग्रचित्त लक्ष्मण से श्रीराम ने इस प्रकार कहा—

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॥ ३ · ७५ · ३ ॥
दृष्टो मयाऽऽश्रमः सौम्य बह्वाश्चर्यः कृतात्मनाम्। विश्वस्तमृगशार्दूलो नानाविहगसेवितः॥

dṛṣṭo mayā''śramaḥ saumya bahvāścaryaḥ kṛtātmanām।
viśvastamṛgaśārdūlo nānāvihagasevitaḥ॥

‘सौम्य! मैंने उन पुण्यात्मा महर्षियों का यह पवित्र आश्रम देखा। यहाँ बहुत-सी आश्चर्यजनक बातें हैं। हरिण और बाघ एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं। नाना प्रकार के पक्षी इस आश्रम का सेवन करते हैं।

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॥ ३ · ७५ · ४ ॥
सप्तानां समुद्राणां तेषां तीर्थेषु लक्ष्मण। उपस्पृष्टं विधिवत् पितरश्चापि तर्पिताः॥

saptānāṁ ca samudrāṇāṁ teṣāṁ tīrtheṣu lakṣmaṇa।
upaspṛṣṭaṁ ca vidhivat pitaraścāpi tarpitāḥ॥

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॥ ३ · ७५ · ५ ॥
प्रणष्टमशुभं यन्नः कल्याणं समुपस्थितम्। तेन त्वेतत् प्रहृष्टं मे मनो लक्ष्मण सम्प्रति॥

praṇaṣṭamaśubhaṁ yannaḥ kalyāṇaṁ samupasthitam।
tena tvetat prahṛṣṭaṁ me mano lakṣmaṇa samprati॥

॥ ४–५ ॥

‘लक्ष्मण! यहाँ जो सातों समुद्रों के जल से भरे हुए तीर्थ हैं, उनमें हमने विधिपूर्वक स्नान तथा पितरों का तर्पण किये हैं। इससे हमारा सारा अशुभ नष्ट हो गया और अब हमारे कल्याण का समय उपस्थित हुआ है। सुमित्राकुमार! इससे इस समय मेरे मन में अधिक प्रसन्नता हो रही है।

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॥ ३ · ७५ · ६ ॥
हृदये मे नरव्याघ्र शुभमाविर्भविष्यति। तदागच्छ गमिष्यावः पम्पां तां प्रियदर्शनाम्॥

hṛdaye me naravyāghra śubhamāvirbhaviṣyati।
tadāgaccha gamiṣyāvaḥ pampāṁ tāṁ priyadarśanām॥

‘नरश्रेष्ठ! अब मेरे हृदय में कोई शुभ संकल्प उठनेवाला है। इसलिये आओ, अब हम दोनों परम सुन्दर पम्पासरोवर के तट पर चलें।

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॥ ३ · ७५ · ७ ॥
ऋष्यमूको गिरिर्यत्र नातिदूरे प्रकाशते। यस्मिन् वसति धर्मात्मा सुग्रीवोंऽशुमतः सुतः॥

ṛṣyamūko giriryatra nātidūre prakāśate।
yasmin vasati dharmātmā sugrīvoṁ'śumataḥ sutaḥ॥

‘वहाँ से थोड़ी ही दूर पर वह ऋष्यमूक पर्वत शोभा पाता है, जिसपर सूर्यपुत्र धर्मात्मा सुग्रीव निवास करते हैं।

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॥ ३ · ७५ · ८ ॥
नित्यं वालिभयात् त्रस्तश्चतुर्भिः सह वानरैः। अहं त्वरे तं द्रष्टुं सुग्रीवं वानरर्षभम्॥ तदधीनं हि मे कार्यं सीतायाः परिमार्गणम्।

nityaṁ vālibhayāt trastaścaturbhiḥ saha vānaraiḥ।
ahaṁ tvare ca taṁ draṣṭuṁ sugrīvaṁ vānararṣabham॥
tadadhīnaṁ hi me kāryaṁ sītāyāḥ parimārgaṇam।

‘वाली के भय से सदा डरे रहने के कारण वे चार वानरों के साथ उस पर्वत पर रहते हैं। मैं वानरश्रेष्ठ सुग्रीव से मिलने के लिये उतावला हो रहा हूँ; क्योंकि सीता के अन्वेषण का कार्य उन्हींके अधीन है’

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॥ ३ · ७५ · ९ ॥
इति ब्रुवाणं तं वीरं सौमित्रिरिदमब्रवीत्॥ गच्छावस्त्वरितं तत्र ममापि त्वरते मनः।

iti bruvāṇaṁ taṁ vīraṁ saumitriridamabravīt॥
gacchāvastvaritaṁ tatra mamāpi tvarate manaḥ।

इस प्रकार की बात कहते हुए वीर श्रीराम से सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने यों कहा—‘भैया! हम दोनों को शीघ्र ही वहाँ चलना चाहिये। मेरा मन भी चलने के लिये उतावला हो रहा है’

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॥ ३ · ७५ · १० ॥
आश्रमात्तु ततस्तस्मान्निष्क्रम्य विशाम्पतिः॥

āśramāttu tatastasmānniṣkramya sa viśāmpatiḥ॥

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॥ ३ · ७५ · ११ ॥
आजगाम ततः पम्पां लक्ष्मणेन सह प्रभुः। समीक्षमाणः पुष्पाढ्यं सर्वतो विपुलद्रुमम्॥

ājagāma tataḥ pampāṁ lakṣmaṇena saha prabhuḥ।
samīkṣamāṇaḥ puṣpāḍhyaṁ sarvato vipuladrumam॥

॥ १०–११ ॥

तदनन्तर प्रजापालक भगवान् श्रीराम लक्ष्मण के साथ उस आश्रम से निकलकर सब ओर फूलों से लदे हुए नाना प्रकार के वृक्षों की शोभा निहारते हुए पम्पासरोवर के तट पर आये।

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॥ ३ · ७५ · १२ ॥
कोयष्टिभिश्चार्जुनकैः शतपत्रैश्च कीरकैः। एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्नादितं तद् वनं महत्॥

koyaṣṭibhiścārjunakaiḥ śatapatraiśca kīrakaiḥ।
etaiścānyaiśca bahubhirnāditaṁ tad vanaṁ mahat॥

वह विशाल वन टिट्टिभों, मोरों, कठफोड़वों, तोतों तथा अन्य बहुत-से पक्षियों के कलरवों से गूँज रहा था।

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॥ ३ · ७५ · १३ ॥
रामो विविधान् वृक्षान् सरांसि विविधानि च। पश्यन् कामाभिसंतप्तो जगाम परमं हृदम्॥

sa rāmo vividhān vṛkṣān sarāṁsi vividhāni ca।
paśyan kāmābhisaṁtapto jagāma paramaṁ hṛdam॥

श्रीराम के मन में सीताजी से मिलने की तीव्र लालसा जाग उठी थी, इससे संतप्त हो वे नाना प्रकार के वृक्षों और भाँति-भाँति के सरोवरों की शोभा देखते हुए उस उत्तम जलाशय के पास गये।

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॥ ३ · ७५ · १४ ॥
तामासाद्य वै रामो दूरात् पानीयवाहिनीम्। मतङ्गसरसं नाम हृदं समवगाहत॥

sa tāmāsādya vai rāmo dūrāt pānīyavāhinīm।
mataṅgasarasaṁ nāma hṛdaṁ samavagāhata॥

पम्पानाम से प्रसिद्ध वह सरोवर पीनेयोग्य स्वच्छ जल बहानेवाला था। श्रीराम दूर देश से चलकर उसके तट पर आये। आकर उन्होंने मतंगसरस नामक कुण्ड में स्नान किया।

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॥ ३ · ७५ · १५ ॥
तत्र जग्मतुरव्यग्रौ राघवौ हि समाहितौ। तु शोकसमाविष्टो रामो दशरथात्मजः॥ विवेश नलिनीं रम्यां पंकजैश्च समावृताम्।

tatra jagmaturavyagrau rāghavau hi samāhitau।
sa tu śokasamāviṣṭo rāmo daśarathātmajaḥ॥
viveśa nalinīṁ ramyāṁ paṁkajaiśca samāvṛtām।

वे दोनों रघुवंशी वीर वहाँ शान्त और एकाग्रचित्त होकर पहुँचे थे। सीता के शोक से व्याकुल हुए दशरथनन्दन श्रीराम ने उस रमणीय पुष्करिणी पम्पा में प्रवेश किया, जो कमलों से व्याप्त थी।

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॥ ३ · ७५ · १६ ॥
तिलकाशोकपुंनागबकुलोद्दालकाशिनीम्॥

tilakāśokapuṁnāgabakuloddālakāśinīm॥

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॥ ३ · ७५ · १७ ॥
रम्योपवनसम्बाधां पद्मसम्पीडितोदकाम्। स्फटिकोपमतोयां तां श्लक्ष्णवालुकसंतताम्॥

ramyopavanasambādhāṁ padmasampīḍitodakām।
sphaṭikopamatoyāṁ tāṁ ślakṣṇavālukasaṁtatām॥

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॥ ३ · ७५ · १८ ॥
मत्स्यकच्छपसम्बाधां तीरस्थद्रुमशोभिताम्। सखीभिरिव संयुक्तां लताभिरनुवेष्टिताम्॥

matsyakacchapasambādhāṁ tīrasthadrumaśobhitām।
sakhībhiriva saṁyuktāṁ latābhiranuveṣṭitām॥

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॥ ३ · ७५ · १९ ॥
किंनरोरगगन्धर्वयक्षराक्षससेविताम्। नानाद्रुमलताकीर्णां शीतवारिनिधिं शुभाम्॥

kiṁnaroragagandharvayakṣarākṣasasevitām।
nānādrumalatākīrṇāṁ śītavārinidhiṁ śubhām॥

॥ १६–१९ ॥

उसके तट पर तिलक, अशोक, नागकेसर, वकुल तथा लिसोड़े के वृक्ष उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। भाँति-भाँति के रमणीय उपवनों से वह घिरी हुई थी। उसका जल कमलपुष्पों से आच्छादित था और स्फटिक मणि के समान स्वच्छ दिखायी देता था। जल के नीचे स्वच्छ वालुका फैली हुई थी। मत्स्य और कच्छप उसमें भरे हुए थे। तटवर्ती वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते थे। सब ओर लताओंद्वारा आवेष्टित होने के कारण वह सखियों से संयुक्त-सी प्रतीत होती थी। किन्नर, नाग, गन्धर्व, यक्ष और राक्षस उसका सेवन करते थे। भाँति-भाँति के वृक्ष और लताओं से व्याप्त हुई पम्पा शीतल जल की सुन्दर निधि प्रतीत होती थी।

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॥ ३ · ७५ · २० ॥
पद्मसौगन्धिकैस्ताम्रां शुक्लां कुमुदमण्डलैः। नीलां कुवलयोद्घाटैर्बहुवर्णां कुथामिव॥

padmasaugandhikaistāmrāṁ śuklāṁ kumudamaṇḍalaiḥ।
nīlāṁ kuvalayodghāṭairbahuvarṇāṁ kuthāmiva॥

अरुण कमलों से वह ताम्रवर्ण की, कुमुद-कुसुमों के समूह से शुक्लवर्ण की तथा नील कमलों के समुदाय से नीलवर्ण की दिखायी देने के कारण बहुरंगे कालीन के समान शोभा पाती थी।

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॥ ३ · ७५ · २१ ॥
अरविन्दोत्पलवतीं पद्मसौगन्धिकायुताम्। पुष्पिताम्रवणोपेतां बर्हिणोद्घुष्टनादिताम्॥

aravindotpalavatīṁ padmasaugandhikāyutām।
puṣpitāmravaṇopetāṁ barhiṇodghuṣṭanāditām॥

उस पुष्करिणी में अरविन्द और उत्पल खिले थे। पद्म और सौगन्धिक जाति के पुष्प शोभा पाते थे। मौर लगी हुई अमराइयों से वह घिरी हुई थी तथा मयूरों के केकानाद वहाँ गूँज रहे थे।

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॥ ३ · ७५ · २२ ॥
तां दृष्ट्वा ततः पम्पां रामः सौमित्रिणा सह। विललाप तेजस्वी रामो दशरथात्मजः॥

sa tāṁ dṛṣṭvā tataḥ pampāṁ rāmaḥ saumitriṇā saha।
vilalāpa ca tejasvī rāmo daśarathātmajaḥ॥

सुमित्राकुमार लक्ष्मणसहित श्रीराम ने जब उस मनोहर पम्पा को देखा, तब उनके हृदय में सीता की वियोग-व्यथा उद्दीप्त हो उठी; अतः वे तेजस्वी दशरथनन्दन श्रीराम वहाँ विलाप करने लगे।

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॥ ३ · ७५ · २३ ॥
तिलकैर्बीजपूरैश्च वटैः शुक्लद्रुमैस्तथा। पुष्पितैः करवीरैश्च पुंनागैश्च सुपुष्पितैः॥

tilakairbījapūraiśca vaṭaiḥ śukladrumaistathā।
puṣpitaiḥ karavīraiśca puṁnāgaiśca supuṣpitaiḥ॥

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॥ ३ · ७५ · २४ ॥
मालतीकुन्दगुल्मैश्च भण्डीरैर्निचुलैस्तथा। अशोकैः सप्तपर्णैश्च कतकैरतिमुक्तकैः॥

mālatīkundagulmaiśca bhaṇḍīrairniculaistathā।
aśokaiḥ saptaparṇaiśca katakairatimuktakaiḥ॥

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॥ ३ · ७५ · २५ ॥
अन्यैश्च विविधैर्वृक्षैः प्रमदामिव शोभिताम्। अस्यास्तीरे तु पूर्वोक्तः पर्वतो धातुमण्डितः॥ ऋष्यमूक इति ख्यातश्चित्रपुष्पितपादपः।

anyaiśca vividhairvṛkṣaiḥ pramadāmiva śobhitām।
asyāstīre tu pūrvoktaḥ parvato dhātumaṇḍitaḥ॥
ṛṣyamūka iti khyātaścitrapuṣpitapādapaḥ।

॥ २३–२५ ॥

तिलक, बिजौरा, वट, लोध, खिले हुए करवीर, पुष्पित नागकेसर, मालती, कुन्द, झाड़ी, भंडीर (बरगद), वञ्जुल, अशोक, छितवन, कतक, माधवी लता तथा अन्य नाना प्रकार के वृक्षों से सुशोभित हुई पम्पा भाँति-भाँति की वस्त्रभूषाओं से सजी हुई युवती के समान जान पड़ती थी। उसीके तट पर विविध धातुओं से मण्डित पूर्वोक्त ऋष्यमूक नाम से विख्यात पर्वत सुशोभित था। उसके ऊपर फूलों से भरे हुए विचित्र वृक्ष शोभा दे रहे थे।

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॥ ३ · ७५ · २६ ॥
हरिर्ऋक्षरजोनाम्नः पुत्रस्तस्य महात्मनः॥ अध्यास्ते तु महावीर्यः सुग्रीव इति विश्रुतः।

harirṛkṣarajonāmnaḥ putrastasya mahātmanaḥ॥
adhyāste tu mahāvīryaḥ sugrīva iti viśrutaḥ।

ऋक्षरजा नामक महात्मा वानर के पुत्र कपिश्रेष्ठ महापराक्रमी सुग्रीव वहीं निवास करते थे।

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॥ ३ · ७५ · २७ ॥
सुग्रीवमभिगच्छ त्वं वानरेन्द्रं नरर्षभ॥

sugrīvamabhigaccha tvaṁ vānarendraṁ nararṣabha॥

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॥ ३ · ७५ · २८ ॥
इत्युवाच पुनर्वाक्यं लक्ष्मणं सत्यविक्रमः। कथं मया विना सीतां शक्यं लक्ष्मण जीवितुम्॥

ityuvāca punarvākyaṁ lakṣmaṇaṁ satyavikramaḥ।
kathaṁ mayā vinā sītāṁ śakyaṁ lakṣmaṇa jīvitum॥

॥ २७–२८ ॥

उस समय सत्यपराक्रमी श्रीराम ने पुनः लक्ष्मण से कहा—‘नरश्रेष्ठ लक्ष्मण! तुम वानरराज सुग्रीव के पास चलो, मैं सीता के बिना कैसे जीवित रह सकता हूँ’

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॥ ३ · ७५ · २९ ॥
इत्येवमुक्त्वा मदनाभिपीडितः लक्ष्मणं वाक्यमनन्यचेतनः। विवेश पम्पां नलिनीमनोरमां तमुत्तमं शोकमुदीरयाणः॥

ityevamuktvā madanābhipīḍitaḥ
sa lakṣmaṇaṁ vākyamananyacetanaḥ।
viveśa pampāṁ nalinīmanoramāṁ
tamuttamaṁ śokamudīrayāṇaḥ॥

ऐसा कहकर सीता के दर्शन की कामना से पीड़ित तथा उनके प्रति अनन्य अनुराग रखनेवाले श्रीराम उस महान् शोक को प्रकट करते हुए उस मनोरम पुष्करिणी पम्पा में उतरे।

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॥ ३ · ७५ · ३० ॥
क्रमेण गत्वा प्रविलोकयन् वनं ददर्श पम्पां शुभदर्शकाननाम्। अनेकनानाविधपक्षिसंकुलां विवेश रामः सह लक्ष्मणेन॥

krameṇa gatvā pravilokayan vanaṁ
dadarśa pampāṁ śubhadarśakānanām।
anekanānāvidhapakṣisaṁkulāṁ
viveśa rāmaḥ saha lakṣmaṇena॥

वन की शोभा देखते हुए क्रमशः वहाँ जाकर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने पम्पा को देखा। उसके समीपवर्ती कानन बड़े सुन्दर और दर्शनीय थे। अनेक प्रकार के झुंड-के-झुंड पक्षी वहाँ सब ओर भरे हुए थे। भाईसहित श्रीरघुनाथजी ने पम्पा के जल में प्रवेश किया।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः ॥ ७५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पचहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७५ ॥