वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ७१ · ३४ श्लोकाःSarga 71 · 34 ślokas

कबन्धकी आत्मकथा, अपने शरीरका दाह हो जानेपर उसका श्रीरामको सीताके अन्वेषणमें सहायता देनेका आश्वासन

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ७१ — painting

॥ ३ · ७१ · १–२ ॥

भुजारहितः कबन्धो वनभूमौ निषण्णः वक्षःस्थेन नेत्रेण उदरस्थेन मुखेन च रामलक्ष्मणौ प्रति आत्मनः पूर्ववृत्तान्तं कथयति; अग्रे धनुर्धरो नीलवर्णो रामः सकरुणं शृण्वन् तिष्ठति, समीपे च खड्गपाणिर्लक्ष्मणः सावधानो निरीक्षते।

अब भुजाओं से रहित कबन्ध वन की भूमि पर असहाय पड़ा हुआ है—उसके कंधे खाली हैं और चारों ओर की भूमि खुदी और उजड़ी हुई है; अपनी छाती की आँख और पेट के मुख को श्रीराम और लक्ष्मण की ओर करके वह अपनी पूर्वकथा सुना रहा है; आगे धनुष लिये नीले वर्ण के श्रीराम करुणापूर्वक सुनते हुए खड़े हैं और पास ही तलवार लिये लक्ष्मण सावधानी से देख रहे हैं।

The now-armless Kabandha lies helpless on the forest floor, his shoulders bare and the ground around him gouged and torn; turning the single eye in his chest and the mouth in his belly toward the brothers, he recounts his tale, while the blue-hued Ram, bow in hand, stands listening with grave compassion and Lakshman waits close by, sword ready, watching warily.

॥ ३ · ७१ · १ ॥
पुरा राम महाबाहो महाबलपराक्रमम्। रूपमासीन्ममाचिन्त्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥

purā rāma mahābāho mahābalaparākramam।
rūpamāsīnmamācintyaṁ triṣu lokeṣu viśrutam॥

‘महाबाहु श्रीराम! पूर्वकाल में मेरा रूप महान् बलपराक्रम से सम्पन्न, अचिन्त्य तथा तीनों लोकों में विख्यात था

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॥ ३ · ७१ · २ ॥
यथा सूर्यस्य सोमस्य शक्रस्य यथा वपुः। सोऽहं रूपमिदं कृत्वा लोकवित्रासनं महत्॥ ऋषीन् वनगतान् राम त्रासयामि ततस्ततः।

yathā sūryasya somasya śakrasya ca yathā vapuḥ।
so'haṁ rūpamidaṁ kṛtvā lokavitrāsanaṁ mahat॥
ṛṣīn vanagatān rāma trāsayāmi tatastataḥ।

‘सूर्य, चन्द्रमा और इन्द्र का शरीर जैसा तेजस्वी है, वैसा ही मेरा भी था। ऐसा होने पर भी मैं लोगों को भयभीत करनेवाले इस अत्यन्त भयंकर राक्षसरूप को धारण करके इधर-उधर घूमता और वन में रहनेवाले ऋषियों को डराया करता था

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॥ ३ · ७१ · ३ ॥
ततः स्थूलशिरा नाम महर्षिः कोपितो मया॥

tataḥ sthūlaśirā nāma maharṣiḥ kopito mayā॥

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॥ ३ · ७१ · ४ ॥
चिन्वन् विविधं वन्यं रूपेणानेन धर्षितः। तेनाहमुक्तः प्रेक्ष्यैवं घोरशापाभिधायिना॥

sa cinvan vividhaṁ vanyaṁ rūpeṇānena dharṣitaḥ।
tenāhamuktaḥ prekṣyaivaṁ ghoraśāpābhidhāyinā॥

॥ ३–४ ॥

अपने इस बर्ताव से एक दिन मैंने स्थूलशिरा नामक महर्षि को कुपित कर दिया। वे नाना प्रकार के जंगली फल-मूल आदि का संचय कर रहे थे, उसी समय मैंने उन्हें इस राक्षसरूप से डरा दिया। मुझे ऐसे विकट रूप में देखकर उन्होंने घोर शाप देते हुए कहा—

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॥ ३ · ७१ · ५ ॥
एतदेवं नृशंसं ते रूपमस्तु विगर्हितम्। मया याचितः क्रुद्धः शापस्यान्तो भवेदिति॥ अभिशापकृतस्येति तेनेदं भाषितं वचः।

etadevaṁ nṛśaṁsaṁ te rūpamastu vigarhitam।
sa mayā yācitaḥ kruddhaḥ śāpasyānto bhavediti॥
abhiśāpakṛtasyeti tenedaṁ bhāṣitaṁ vacaḥ।

‘दुरात्मन्! आज से सदा के लिये तुम्हारा यही क्रूर और निन्दित रूप रह जाय।’ यह सुनकर मैंने उन कुपित महर्षि से प्रार्थना की—‘भगवन्! इस अभिशाप (तिरस्कार) जनित शाप का अन्त होना चाहिये।’ तब उन्होंने इस प्रकार कहा—

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॥ ३ · ७१ · ६ ॥
यदा छित्त्वा भुजौ रामस्त्वां दहेद् विजने वने॥

yadā chittvā bhujau rāmastvāṁ dahed vijane vane॥

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॥ ३ · ७१ · ७ ॥
तदा त्वं प्राप्स्यसे रूपं स्वमेव विपुलं शुभम्। श्रिया विराजितं पुत्रं दनोस्त्वं विद्धि लक्ष्मण॥

tadā tvaṁ prāpsyase rūpaṁ svameva vipulaṁ śubham।
śriyā virājitaṁ putraṁ danostvaṁ viddhi lakṣmaṇa॥

॥ ६–७ ॥

‘जब श्रीराम (और लक्ष्मण) तुम्हारी दोनों भुजाएँ काटकर तुम्हें निर्जन वन में जलायेंगे, तब तुम पुनः अपने उसी परम उत्तम, सुन्दर और शोभासम्पन्न रूप को प्राप्त कर लोगे।’ लक्ष्मण! इस प्रकार तुम मुझे एक दुराचारी दानव समझो

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॥ ३ · ७१ · ८ ॥
इन्द्रकोपादिदं रूपं प्राप्तमेवं रणाजिरे। अहं हि तपसोग्रेण पितामहमतोषयम्॥

indrakopādidaṁ rūpaṁ prāptamevaṁ raṇājire।
ahaṁ hi tapasogreṇa pitāmahamatoṣayam॥

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॥ ३ · ७१ · ९ ॥
दीर्घमायुः मे प्रादात् ततो मां विभ्रमोऽस्पृशत्। दीर्घमायुर्मया प्राप्तं किं मां शक्रः करिष्यति॥

dīrghamāyuḥ sa me prādāt tato māṁ vibhramo'spṛśat।
dīrghamāyurmayā prāptaṁ kiṁ māṁ śakraḥ kariṣyati॥

॥ ८–९ ॥

‘मेरा जो यह ऐसा रूप है, यह समराङ्गण में इन्द्र के क्रोध से प्राप्त हुआ है। मैंने पूर्वकाल में राक्षस होने के पश्चात् घोर तपस्या करके पितामह ब्रह्माजी को संतुष्ट किया और उन्होंने मुझे दीर्घजीवी होने का वर दिया। इससे मेरी बुद्धि में यह भ्रम या अहंकार उत्पन्न हो गया कि मुझे तो दीर्घकालतक बनी रहनेवाली आयु प्राप्त हुई है; फिर इन्द्र मेरा क्या कर लेंगे?

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॥ ३ · ७१ · १० ॥
इत्येवं बुद्धिमास्थाय रणे शक्रमधर्षयम्। तस्य बाहुप्रमुक्तेन वज्रेण शतपर्वणा॥ सक्थिनी शिरश्चैव शरीरे सम्प्रवेशितम्।

ityevaṁ buddhimāsthāya raṇe śakramadharṣayam।
tasya bāhupramuktena vajreṇa śataparvaṇā॥
sakthinī ca śiraścaiva śarīre sampraveśitam।

‘ऐसे विचार का आश्रय लेकर एक दिन मैंने युद्ध में देवराज पर आक्रमण किया। उस समय इन्द्र ने मुझपर सौ धारोंवाले वज्र का प्रहार किया। उनके छोड़े हुए उस वज्र से मेरी जाँघें और मस्तक मेरे ही शरीर में घुस गये

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॥ ३ · ७१ · ११ ॥
मया याच्यमानः सन् नानयद् यमसादनम्॥ पितामहवचः सत्यं तदस्त्विति ममाब्रवीत्।

sa mayā yācyamānaḥ san nānayad yamasādanam॥
pitāmahavacaḥ satyaṁ tadastviti mamābravīt।

‘मैंने बहुत प्रार्थना की, इसलिये उन्होंने मुझे यमलोक नहीं पठाया और कहा—‘पितामह ब्रह्माजी ने जो तुम्हें दीर्घजीवी होने के लिये वरदान दिया है, वह सत्य हो’

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॥ ३ · ७१ · १२ ॥
अनाहारः कथं शक्तो भग्नसक्थिशिरोमुखः॥ वज्रेणाभिहतः कालं सुदीर्घमपि जीवितुम्।

anāhāraḥ kathaṁ śakto bhagnasakthiśiromukhaḥ॥
vajreṇābhihataḥ kālaṁ sudīrghamapi jīvitum।

‘तब मैंने कहा—देवराज! आपने अपने वज्र की मार से मेरी जाँघें, मस्तक और मुँह सभी तोड़ डाले। अब मैं कैसे आहार ग्रहण करूँगा और निराहार रहकर किस प्रकार सुदीर्घकालतक जीवित रह सकूँगा?

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॥ ३ · ७१ · १३ ॥
एवमुक्तः शक्रो मे बाहू योजनमायतौ॥ तदा चास्यं मे कुक्षौ तीक्ष्णदंष्ट्रमकल्पयत्।

sa evamuktaḥ śakro me bāhū yojanamāyatau॥
tadā cāsyaṁ ca me kukṣau tīkṣṇadaṁṣṭramakalpayat।

‘मेरे ऐसा कहने पर इन्द्र ने मेरी भुजाएँ एक-एक योजन लंबी कर दीं एवं तत्काल ही मेरे पेट में तीखे दाढ़ोंवाला एक मुख बना दिया

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॥ ३ · ७१ · १४ ॥
सोऽहं भुजाभ्यां दीर्घाभ्यां संक्षिप्यास्मिन् वनेचरान्॥ सिंहद्वीपिमृगव्याघ्रान् भक्षयामि समन्ततः।

so'haṁ bhujābhyāṁ dīrghābhyāṁ saṁkṣipyāsmin vanecarān॥
siṁhadvīpimṛgavyāghrān bhakṣayāmi samantataḥ।

‘इस प्रकार मैं विशाल भुजाओंद्वारा वन में रहनेवाले सिंह, चीते, हरिन और बाघ आदि जन्तुओं को सब ओर से समेटकर खाया करता था

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॥ ३ · ७१ · १५ ॥
तु मामब्रवीदिन्द्रो यदा रामः सलक्ष्मणः॥ छेत्स्यते समरे बाहू तदा स्वर्गं गमिष्यसि।

sa tu māmabravīdindro yadā rāmaḥ salakṣmaṇaḥ॥
chetsyate samare bāhū tadā svargaṁ gamiṣyasi।

‘इन्द्र ने मुझे यह भी बतला दिया था कि जब लक्ष्मणसहित श्रीराम तुम्हारी भुजाएँ काट देंगे, उस समय तुम स्वर्ग में जाओगे

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॥ ३ · ७१ · १६ ॥
अनेन वपुषा तात वनेऽस्मिन् राजसत्तम॥ यद् यत् पश्यामि सर्वस्य ग्रहणं साधु रोचये।

anena vapuṣā tāta vane'smin rājasattama॥
yad yat paśyāmi sarvasya grahaṇaṁ sādhu rocaye।

‘तात! राजशिरोमणे! इस शरीर से इस वन के भीतर मैं जो-जो वस्तु देखता हूँ, वह सब ग्रहण कर लेना मुझे ठीक लगता है

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॥ ३ · ७१ · १७ ॥
अवश्यं ग्रहणं रामो मन्येऽहं समुपैष्यति॥ इमां बुद्धिं पुरस्कृत्य देहन्यासकृतश्रमः।

avaśyaṁ grahaṇaṁ rāmo manye'haṁ samupaiṣyati॥
imāṁ buddhiṁ puraskṛtya dehanyāsakṛtaśramaḥ।

‘इन्द्र तथा मुनि के कथनानुसार मुझे यह विश्वास था कि एक दिन श्रीराम अवश्य मेरी पकड़ में आ जायँगे। इसी विचार को सामने रखकर मैं इस शरीर को त्याग देने के लिये प्रयत्नशील था

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॥ ३ · ७१ · १८ ॥
त्वं रामोऽसि भद्रं ते नाहमन्येन राघव॥ शक्यो हन्तुं यथा तत्त्वमेवमुक्तं महर्षिणा।

sa tvaṁ rāmo'si bhadraṁ te nāhamanyena rāghava॥
śakyo hantuṁ yathā tattvamevamuktaṁ maharṣiṇā।

‘रघुनन्दन! अवश्य ही आप श्रीराम हैं। आपका कल्याण हो। मैं आपके सिवा दूसरे किसी से नहीं मारा जा सकता था। यह बात महर्षि ने ठीक ही कही थी

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॥ ३ · ७१ · १९ ॥
अहं हि मतिसाचिव्यं करिष्यामि नरर्षभ॥ मित्रं चैवोपदेक्ष्यामि युवाभ्यां संस्कृतोऽग्निना।

ahaṁ hi matisācivyaṁ kariṣyāmi nararṣabha॥
mitraṁ caivopadekṣyāmi yuvābhyāṁ saṁskṛto'gninā।

‘नरश्रेष्ठ! आप दोनों जब अग्नि के द्वारा मेरा दाह-संस्कार कर देंगे, उस समय मैं आपकी बौद्धिक सहायता करूँगा। आप दोनों के लिये एक अच्छे मित्र का पता बताऊँगा’

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॥ ३ · ७१ · २० ॥
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा दनुना तेन राघवः॥ इदं जगाद वचनं लक्ष्मणस्य पश्यतः।

evamuktastu dharmātmā danunā tena rāghavaḥ॥
idaṁ jagāda vacanaṁ lakṣmaṇasya ca paśyataḥ।

उस दानव के ऐसा कहने पर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मण के सामने उससे यह बात कही—

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॥ ३ · ७१ · २१ ॥
रावणेन हृता भार्या सीता मम यशस्विनी॥

rāvaṇena hṛtā bhāryā sītā mama yaśasvinī॥

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॥ ३ · ७१ · २२ ॥
निष्क्रान्तस्य जनस्थानात् सह भ्रात्रा यथासुखम्। नाममात्रं तु जानामि रूपं तस्य रक्षसः॥

niṣkrāntasya janasthānāt saha bhrātrā yathāsukham।
nāmamātraṁ tu jānāmi na rūpaṁ tasya rakṣasaḥ॥

॥ २१–२२ ॥

‘कबन्ध! मेरी यशस्विनी भार्या सीता को रावण हर ले गया है। उस समय मैं अपने भाई लक्ष्मण के साथ सुखपूर्वक जनस्थान के बाहर चला गया था। मैं उस राक्षस का नाममात्र जानता हूँ। उसकी शकल-सूरत से परिचित नहीं हूँ

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॥ ३ · ७१ · २३ ॥
निवासं वा प्रभावं वा वयं तस्य विद्महे। शोकार्तानामनाथानामेवं विपरिधावताम्॥ कारुण्यं सदृशं कर्तुमुपकारेण वर्तताम्।

nivāsaṁ vā prabhāvaṁ vā vayaṁ tasya na vidmahe।
śokārtānāmanāthānāmevaṁ viparidhāvatām॥
kāruṇyaṁ sadṛśaṁ kartumupakāreṇa vartatām।

‘वह कहाँ रहता है और कैसा उसका प्रभाव है, इस बात से हमलोग सर्वथा अनभिज्ञ हैं। इस समय सीता का शोक हमें बड़ी पीड़ा दे रहा है। हम असहाय होकर इसी तरह सब ओर दौड़ रहे हैं। तुम हमारे ऊपर समुचित करुणा करने के लिये इस विषय में हमारा कुछ उपकार करो

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॥ ३ · ७१ · २४ ॥
काष्ठान्यानीय भग्नानि काले शुष्काणि कुञ्जरैः॥ धक्ष्यामस्त्वां वयं वीर श्वभ्रे महति कल्पिते।

kāṣṭhānyānīya bhagnāni kāle śuṣkāṇi kuñjaraiḥ॥
dhakṣyāmastvāṁ vayaṁ vīra śvabhre mahati kalpite।

‘वीर! फिर हमलोग हाथियोंद्वारा तोड़े गये सूखे काठ लाकर स्वयं खोदे हुए एक बहुत बड़े गड्ढे में तुम्हारे शरीर को रखकर जला देंगे

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॥ ३ · ७१ · २५ ॥
त्वं सीतां समाचक्ष्व येन वा यत्र वा हता॥ कुरु कल्याणमत्यर्थं यदि जानासि तत्त्वतः।

sa tvaṁ sītāṁ samācakṣva yena vā yatra vā hatā॥
kuru kalyāṇamatyarthaṁ yadi jānāsi tattvataḥ।

‘अतः अब तुम हमें सीता का पता बताओ। इस समय वह कहाँ है? तथा उसे कौन कहाँ ले गया है? यदि ठीक-ठीक जानते हो तो सीता का समाचार बताकर हमारा अत्यन्त कल्याण करो’

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॥ ३ · ७१ · २६ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण वाक्यं दनुरनुत्तमम्॥ प्रोवाच कुशलो वक्ता वक्तारमपि राघवम्।

evamuktastu rāmeṇa vākyaṁ danuranuttamam॥
provāca kuśalo vaktā vaktāramapi rāghavam।

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर बातचीत में कुशल उस दानव ने उन प्रवचनपटु रघुनाथजी से यह परम उत्तम बात कही—

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॥ ३ · ७१ · २७ ॥
दिव्यमस्ति मे ज्ञानं नाभिजानामि मैथिलीम्॥

divyamasti na me jñānaṁ nābhijānāmi maithilīm॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ७१ · २८ ॥
यस्तां वक्ष्यति तं वक्ष्ये दग्धः स्वं रूपमास्थितः। योऽभिजानाति तद्रक्षस्तद् वक्ष्ये राम तत्परम्॥

yastāṁ vakṣyati taṁ vakṣye dagdhaḥ svaṁ rūpamāsthitaḥ।
yo'bhijānāti tadrakṣastad vakṣye rāma tatparam॥

॥ २७–२८ ॥

‘श्रीराम! इस समय मुझे दिव्य ज्ञान नहीं है, इसलिये मैं मिथिलेशकुमारी के विषय में कुछ भी नहीं जानता। जब मेरे इस शरीर का दाह हो जायगा, तब मैं अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त होकर किसी ऐसे व्यक्ति का पता बता सकूँगा, जो सीता के विषय में आपको कुछ बतायेगा तथा जो उस उत्कृष्ट राक्षस को भी जानता होगा, ऐसे पुरुष का आपको परिचय दूँगा

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॥ ३ · ७१ · २९ ॥
अदग्धस्य हि विज्ञातुं शक्तिरस्ति मे प्रभो। राक्षसं तु महावीर्यं सीता येन हृता तव॥

adagdhasya hi vijñātuṁ śaktirasti na me prabho।
rākṣasaṁ tu mahāvīryaṁ sītā yena hṛtā tava॥

‘प्रभो! जबतक मेरे इस शरीर का दाह नहीं होगा तबतक मुझमें यह जानने की शक्ति नहीं आ सकती कि वह महापराक्रमी राक्षस कौन है, जिसने आपकी सीता का अपहरण किया है

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॥ ३ · ७१ · ३० ॥
विज्ञानं हि महद् भ्रष्टं शापदोषेण राघव। स्वकृतेन मया प्राप्तं रूपं लोकविगर्हितम्॥

vijñānaṁ hi mahad bhraṣṭaṁ śāpadoṣeṇa rāghava।
svakṛtena mayā prāptaṁ rūpaṁ lokavigarhitam॥

‘रघुनन्दन! शाप-दोष के कारण मेरा महान् विज्ञान नष्ट हो गया है। अपनी ही करतूत से मुझे यह लोकनिन्दित रूप प्राप्त हुआ है

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॥ ३ · ७१ · ३१ ॥
किं तु यावन्न यात्यस्तं सविता श्रान्तवाहनः। तावन्मामवटे क्षिप्त्वा दह राम यथाविधि॥

kiṁ tu yāvanna yātyastaṁ savitā śrāntavāhanaḥ।
tāvanmāmavaṭe kṣiptvā daha rāma yathāvidhi॥

‘किंतु श्रीराम! जबतक सूर्यदेव अपने वाहनों के थक जाने पर अस्त नहीं हो जाते, तभीतक मुझे गड्ढे में डालकर शास्त्रीय विधि के अनुसार मेरा दाह-संस्कार कर दीजिये

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॥ ३ · ७१ · ३२ ॥
दग्धस्त्वयाहमवटे न्यायेन रघुनन्दन। वक्ष्यामि तं महावीर यस्तं वेत्स्यति राक्षसम्॥

dagdhastvayāhamavaṭe nyāyena raghunandana।
vakṣyāmi taṁ mahāvīra yastaṁ vetsyati rākṣasam॥

‘महावीर रघुनन्दन! आपके द्वारा विधिपूर्वक गड्ढे में मेरे शरीर का दाह हो जाने पर मैं ऐसे महापुरुष का परिचय दूँगा, जो उस राक्षस को जानते होंगे

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॥ ३ · ७१ · ३३ ॥
तेन सख्यं कर्तव्यं न्याय्यवृत्तेन राघव। कल्पयिष्यति ते वीर साहाय्यं लघुविक्रम॥

tena sakhyaṁ ca kartavyaṁ nyāyyavṛttena rāghava।
kalpayiṣyati te vīra sāhāyyaṁ laghuvikrama॥

‘शीघ्र पराक्रम प्रकट करनेवाले वीर रघुनाथजी! न्यायोचित आचारवाले उन महापुरुष के साथ आपको मित्रता कर लेनी चाहिये। वे आपकी सहायता करेंगे

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॥ ३ · ७१ · ३४ ॥
नहि तस्यास्त्यविज्ञातं त्रिषु लोकेषु राघव। सर्वान् परिवृतो लोकान् पुरा वै कारणान्तरे॥

nahi tasyāstyavijñātaṁ triṣu lokeṣu rāghava।
sarvān parivṛto lokān purā vai kāraṇāntare॥

‘रघुनन्दन! उनके लिये तीनों लोकों में कुछ भी अज्ञात नहीं है; क्योंकि किसी कारणवश वे पहले समस्त लोकों में चक्कर लगा चुके हैं’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकसप्ततितमः सर्गः ॥ ७१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ७१ ॥