वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ७० · १९ श्लोकाःSarga 70 · 19 ślokas

श्रीराम और लक्ष्मणका परस्पर विचार करके कबन्धकी दोनों भुजाओंको काट डालना तथा कबन्धके द्वारा उनका स्वागत

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ७० — painting

॥ ३ · ७० · ९–१० ॥

गिरिप्रमाणस्य कबन्धस्य दक्षिणे नीलवर्णो रामः वामे च लक्ष्मणः खड्गाभ्यां युगपत् प्रहृत्य तस्य योजनदीर्घौ बाहू स्कन्धयोः छिन्दतः; भुजाहीनः स रक्षोमहान् मेघगम्भीरं गर्जन् पृथिव्यां निपतति।

पर्वत-से विशाल कबन्ध के दाहिनी ओर नीले वर्ण के श्रीराम और बायीं ओर लक्ष्मण—दोनों एक साथ तलवारों से प्रहार कर उसकी योजनभर लंबी दोनों भुजाएँ कंधों से काट गिरा रहे हैं; भुजाओं से रहित होकर वह विशाल राक्षस मेघ-सी गम्भीर गर्जना करता हुआ धरती पर गिर रहा है।

At the mountainous Kabandha's right stands the blue-hued Ram and at his left Lakshman, and in matched strokes their swords shear away the giant's two yojana-long arms at the shoulders; robbed of his arms, the great demon topples to the earth with a thunderous, cloud-deep roar.

॥ ३ · ७० · १ ॥
तौ तु तत्र स्थितौ दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ। बाहुपाशपरिक्षिप्तौ कबन्धो वाक्यमब्रवीत्॥

tau tu tatra sthitau dṛṣṭvā bhrātarau rāmalakṣmaṇau।
bāhupāśaparikṣiptau kabandho vākyamabravīt॥

अपने बाहुपाश से घिरकर वहाँ खड़े हुए उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण की ओर देखकर कबन्ध ने कहा—

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॥ ३ · ७० · २ ॥
तिष्ठतः किं नु मां दृष्ट्वा क्षुधार्तं क्षत्रियर्षभौ। आहारार्थं तु संदिष्टौ दैवेन हतचेतनौ॥

tiṣṭhataḥ kiṁ nu māṁ dṛṣṭvā kṣudhārtaṁ kṣatriyarṣabhau।
āhārārthaṁ tu saṁdiṣṭau daivena hatacetanau॥

‘क्षत्रियशिरोमणि राजकुमारो! मुझे भूख से पीड़ित देखकर भी खड़े क्यों हो? (मेरे मुँह में चले आओ) क्योंकि दैव ने मेरे भोजन के लिये ही तुम्हें यहाँ भेजा है। इसीलिये तुम दोनों की बुद्धि मारी गयी है'

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॥ ३ · ७० · ३ ॥
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणो वाक्यं प्राप्तकालं हितं तदा। उवाचार्तिसमापन्नो विक्रमे कृतनिश्चयः॥

tacchrutvā lakṣmaṇo vākyaṁ prāptakālaṁ hitaṁ tadā।
uvācārtisamāpanno vikrame kṛtaniścayaḥ॥

यह सुनकर पीड़ित हुए लक्ष्मण ने उस समय पराक्रम का ही निश्चय करके यह समयोचित एवं हितकर बात कही—

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॥ ३ · ७० · ४ ॥
त्वां मां पुरा तूर्णमादत्ते राक्षसाधमः। तस्मादसिभ्यामस्याशु बाहू छिन्दावहे गुरू॥

tvāṁ ca māṁ ca purā tūrṇamādatte rākṣasādhamaḥ।
tasmādasibhyāmasyāśu bāhū chindāvahe gurū॥

‘भैया! यह नीच राक्षस मुझको और आपको तुरंत मुँह में ले ले, इसके पहले ही हमलोग अपनी तलवारों से इसकी बड़ी-बड़ी बाँहें शीघ्र ही काट डालें

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॥ ३ · ७० · ५ ॥
भीषणोऽयं महाकायो राक्षसा भुजविक्रमः। लोकं ह्यतिजितं कृत्वा ह्यावां हन्तुमिहेच्छति॥

bhīṣaṇo'yaṁ mahākāyo rākṣasā bhujavikramaḥ।
lokaṁ hyatijitaṁ kṛtvā hyāvāṁ hantumihecchati॥

‘यह महाकाय राक्षस बड़ा भीषण है। इसकी भुजाओं में ही इसका सारा बल और पराक्रम निहित है। यह समस्त संसार को सर्वथा पराजित-सा करके अब हमलोगों को भी यहाँ मार डालना चाहता है

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॥ ३ · ७० · ६ ॥
निश्चेष्टानां वधो राजन् कुत्सितो जगतीपतेः। क्रतुमध्योपनीतानां पशूनामिव राघव॥

niśceṣṭānāṁ vadho rājan kutsito jagatīpateḥ।
kratumadhyopanītānāṁ paśūnāmiva rāghava॥

‘राजन्! रघुनन्दन! यज्ञ में लाये गये पशुओं के समान निश्चेष्ट प्राणियों का वध राजा के लिये निन्दित बताया गया है (इसलिये हमें इसके प्राण नहीं लेने चाहिये, केवल भुजाओं का ही उच्छेद कर देना चाहिये)'

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॥ ३ · ७० · ७ ॥
एतत् संजल्पितं श्रुत्वा तयोः क्रुद्धस्तु राक्षसः। विदार्यास्यं ततो रौद्रं तौ भक्षयितुमारभत्॥

etat saṁjalpitaṁ śrutvā tayoḥ kruddhastu rākṣasaḥ।
vidāryāsyaṁ tato raudraṁ tau bhakṣayitumārabhat॥

उन दोनों की यह बातचीत सुनकर उस राक्षस को बड़ा क्रोध हुआ और वह अपना भयंकर मुख फैलाकर उन्हें खा जाने को उद्यत हो गया

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॥ ३ · ७० · ८ ॥
ततस्तौ देशकालज्ञौ खड्गाभ्यामेव राघवौ। अच्छिन्दन्तां सुसंहृष्टौ बाहू तस्यांसदेशतः॥

tatastau deśakālajñau khaḍgābhyāmeva rāghavau।
acchindantāṁ susaṁhṛṣṭau bāhū tasyāṁsadeśataḥ॥

इतने में ही देश-काल (अवसर) का ज्ञान रखनेवाले उन दोनों रघुवंशी राजकुमारों ने अत्यन्त हर्ष में भरकर तलवारों से ही उसकी दोनों भुजाएँ कंधों से काट गिरायीं

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॥ ३ · ७० · ९ ॥
दक्षिणो दक्षिणं बाहुमसक्तमसिना ततः। चिच्छेद रामो वेगेन सव्यं वीरस्तु लक्ष्मणः॥

dakṣiṇo dakṣiṇaṁ bāhumasaktamasinā tataḥ।
ciccheda rāmo vegena savyaṁ vīrastu lakṣmaṇaḥ॥

भगवान् श्रीराम उसके दाहिने भाग में खड़े थे। उन्होंने अपनी तलवार से उसकी दाहिनी बाँह बिना किसी रुकावट के वेगपूर्वक काट डाली तथा वाम भाग में खड़े वीर लक्ष्मण ने उसकी बायीं भुजा को तलवार से उड़ा दिया

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॥ ३ · ७० · १० ॥
पपात महाबाहुश्छिन्नबाहुर्महास्वनः। खं गां दिशश्चैव नादयञ्जलदो यथा॥

sa papāta mahābāhuśchinnabāhurmahāsvanaḥ।
khaṁ ca gāṁ ca diśaścaiva nādayañjalado yathā॥

भुजाएँ कट जाने पर वह महाबाहु राक्षस मेघ के समान गम्भीर गर्जना करके पृथ्वी, आकाश तथा दिशाओं को गुँजाता हुआ धरती पर गिर पड़ा

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॥ ३ · ७० · ११ ॥
निकृत्तौ भुजौ दृष्ट्वा शोणितौघपरिप्लुतः। दीनः पप्रच्छ तौ वीरौ कौ युवामिति दानवः॥

sa nikṛttau bhujau dṛṣṭvā śoṇitaughapariplutaḥ।
dīnaḥ papraccha tau vīrau kau yuvāmiti dānavaḥ॥

अपनी भुजाओं को कटी हुई देख खून से लथपथ हुए उस दानव ने दीन वाणी में पूछा—‘वीरो! तुम दोनों कौन हो?’

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॥ ३ · ७० · १२ ॥
इति तस्य ब्रुवाणस्य लक्ष्मणः शुभलक्षणः। शशंस तस्य काकुत्स्थं कबन्धस्य महाबलः॥

iti tasya bruvāṇasya lakṣmaṇaḥ śubhalakṣaṇaḥ।
śaśaṁsa tasya kākutsthaṁ kabandhasya mahābalaḥ॥

कबन्ध के इस प्रकार पूछने पर शुभ लक्षणोंवाले महाबली लक्ष्मण ने उसे श्रीरामचन्द्रजी का परिचय देना आरम्भ किया—

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॥ ३ · ७० · १३ ॥
अयमिक्ष्वाकुदायादो रामो नाम जनैः श्रुतः। तस्यैवावरजं विद्धि भ्रातरं मां लक्ष्मणम्॥

ayamikṣvākudāyādo rāmo nāma janaiḥ śrutaḥ।
tasyaivāvarajaṁ viddhi bhrātaraṁ māṁ ca lakṣmaṇam॥

‘ये इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के पुत्र हैं और लोगों में श्रीराम नाम से विख्यात हैं। मुझे इन्हींका छोटा भाई समझो। मेरा नाम लक्ष्मण है

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॥ ३ · ७० · १४ ॥
मात्रा प्रतिहते राज्ये रामः प्रव्राजितो वनम्। मया सह चरत्येष भार्यया महद् वनम्॥

mātrā pratihate rājye rāmaḥ pravrājito vanam।
mayā saha caratyeṣa bhāryayā ca mahad vanam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ७० · १५ ॥
अस्य देवप्रभावस्य वसतो विजने वने। रक्षसापहृता भार्या यामिच्छन्ताविहागतौ॥

asya devaprabhāvasya vasato vijane vane।
rakṣasāpahṛtā bhāryā yāmicchantāvihāgatau॥

॥ १४–१५ ॥

‘माता कैकेयी के द्वारा जब इनका राज्याभिषेक रोक दिया गया, तब ये पिता की आज्ञा से वन में चले आये और मेरे तथा अपनी पत्नी के साथ इस विशाल वन में विचरण करने लगे। इस निर्जन वन में रहते हुए इन देवतुल्य प्रभावशाली श्रीरघुनाथजी की पत्नी को किसी राक्षस ने हर लिया है। उन्हींका पता लगाने की इच्छा से हमलोग यहाँ आये हैं

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॥ ३ · ७० · १६ ॥
त्वं तु को वा किमर्थं वा कबन्धसदृशो वने। आस्येनोरसि दीप्तेन भग्नजङ्घे विचेष्टसे॥

tvaṁ tu ko vā kimarthaṁ vā kabandhasadṛśo vane।
āsyenorasi dīptena bhagnajaṅghe viceṣṭase॥

‘तुम कौन हो? और कबन्ध के समान रूप धारण करके क्यों इस वन में पड़े हो? छाती के नीचे चमकता हुआ मुँह और टूटी हुई जंघा (पिण्डली) लिये तुम किस कारण इधर-उधर लुढ़कते फिरते हो?’

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॥ ३ · ७० · १७ ॥
एवमुक्तः कबन्धस्तु लक्ष्मणेनोत्तरं वचः। उवाच वचनं प्रीतस्तदिन्द्रवचनं स्मरन्॥

evamuktaḥ kabandhastu lakṣmaṇenottaraṁ vacaḥ।
uvāca vacanaṁ prītastadindravacanaṁ smaran॥

लक्ष्मण के ऐसा कहने पर कबन्ध को इन्द्र की कही हुई बात का स्मरण हो आया। अतः उसने बड़ी प्रसन्नता के साथ लक्ष्मण को उनकी बात का उत्तर दिया—

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॥ ३ · ७० · १८ ॥
स्वागतं वां नरव्याघ्रौ दिष्ट्या पश्यामि वामहम्। दिष्ट्या चेमौ निकृत्तौ मे युवाभ्यां बाहुबन्धनौ॥

svāgataṁ vāṁ naravyāghrau diṣṭyā paśyāmi vāmaham।
diṣṭyā cemau nikṛttau me yuvābhyāṁ bāhubandhanau॥

‘पुरुषसिंह वीरो! आप दोनों का स्वागत है। बड़े भाग्य से मुझे आपलोगों का दर्शन मिला है। ये मेरी दोनों भुजाएँ मेरे लिये भारी बन्धन थीं। सौभाग्य की बात है कि आपलोगों ने इन्हें काट डाला

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॥ ३ · ७० · १९ ॥
विरूपं यच्च मे रूपं प्राप्तं ह्यविनयाद् यथा। तन्मे शृणु नरव्याघ्र तत्त्वतः शंसतस्तव॥

virūpaṁ yacca me rūpaṁ prāptaṁ hyavinayād yathā।
tanme śṛṇu naravyāghra tattvataḥ śaṁsatastava॥

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! मुझे जो ऐसा कुरूप रूप प्राप्त हुआ है, यह मेरी ही उद्दण्डता का फल है। यह सब कैसे हुआ, वह प्रसङ्ग आपको मैं ठीक-ठीक बता रहा हूँ। आप मुझसे सुनें'

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्ततितमः सर्गः॥ ७० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७० ॥