वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ६७ · २९ श्लोकाःSarga 67 · 29 ślokas

श्रीराम और लक्ष्मणकी पक्षिराज जटायुसे भेंट तथा श्रीरामका उन्हें गलेसे लगाकर रोना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ६७ — painting

॥ ३ · ६७ · २१–२२ ॥

नीलवर्णो जटाधारी रामः महद् धनुः भूमौ निक्षिप्य निकृत्तपक्षं म्रियमाणं गिरिशिखरोपमं गृध्रराजं जटायुषम् उरसा परिष्वज्य सबाष्पं रोदिति; समीपे च नतमुखो लक्ष्मणो जानुभ्यां स्थित्वा पक्षिणि करं निदधाति।

नीले वर्ण के जटाधारी श्रीराम अपना महान् धनुष भूमि पर फेंककर, टूटे पंखोंवाले, पर्वतशिखर-से विशाल, मरणासन्न गृध्रराज जटायु को छाती से लगाकर आँसू बहाते हुए रो रहे हैं; पास ही नतमुख लक्ष्मण घुटनों के बल बैठकर उस पक्षी पर हाथ रखे हुए हैं।

The blue-hued, matted-haired Ram flings his great bow to the ground and gathers the dying, broken-winged vulture-king Jatayu — vast as a mountain peak — against his chest in a weeping, reverent embrace; close by, Lakshman kneels with bowed head and lays a hand on the dying bird.

॥ ३ · ६७ · १ ॥
पूर्वजोऽप्युक्तमात्रस्तु लक्ष्मणेन सुभाषितम्। सारग्राही महासारं प्रतिजग्राह राघवः॥

pūrvajo'pyuktamātrastu lakṣmaṇena subhāṣitam।
sāragrāhī mahāsāraṁ pratijagrāha rāghavaḥ॥

भगवान् श्रीरामचन्द्रजी सब वस्तुओं का सार ग्रहण करनेवाले हैं। अवस्था में बड़े होने पर भी उन्होंने लक्ष्मण के कहे हुए अत्यन्त सारगर्भित उत्तम वचनों को सुनकर उन्हें स्वीकार किया

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॥ ३ · ६७ · २ ॥
निगृह्य महाबाहुः प्रवृद्धं रोषमात्मनः। अवष्टभ्य धनुश्चित्रं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥

sa nigṛhya mahābāhuḥ pravṛddhaṁ roṣamātmanaḥ।
avaṣṭabhya dhanuścitraṁ rāmo lakṣmaṇamabravīt॥

तदनन्तर महाबाहु श्रीराम ने अपने बढ़े हुए रोष को रोका और उस विचित्र धनुष को उतारकर लक्ष्मण से कहा—

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॥ ३ · ६७ · ३ ॥
किं करिष्यावहे वत्स क्व वा गच्छाव लक्ष्मण। केनोपायेन पश्यावः सीतामिह विचिन्तय॥

kiṁ kariṣyāvahe vatsa kva vā gacchāva lakṣmaṇa।
kenopāyena paśyāvaḥ sītāmiha vicintaya॥

‘वत्स! अब हमलोग क्या करें? कहाँ जायँ? लक्ष्मण! किस उपाय से हमें सीता का पता लगे? यहाँ इसका विचार करो’

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॥ ३ · ६७ · ४ ॥
तं तथा परितापार्तं लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत्। इदमेव जनस्थानं त्वमन्वेषितुमर्हसि॥

taṁ tathā paritāpārtaṁ lakṣmaṇo vākyamabravīt।
idameva janasthānaṁ tvamanveṣitumarhasi॥

तब लक्ष्मण ने इस प्रकार संतापपीड़ित हुए श्रीराम से कहा—‘भैया! आपको इस जनस्थान में ही सीता की खोज करनी चाहिये

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॥ ३ · ६७ · ५ ॥
राक्षसैर्बहुभिः कीर्णं नानाद्रुमलतायुतम्। सन्तीह गिरिदुर्गाणि निर्दराः कन्दराणि च॥

rākṣasairbahubhiḥ kīrṇaṁ nānādrumalatāyutam।
santīha giridurgāṇi nirdarāḥ kandarāṇi ca॥

‘नाना प्रकार के वृक्ष और लताओं से युक्त यह सघन वन अनेक राक्षसों से भरा हुआ है। इसमें पर्वत के ऊपर बहुत-से दुर्गम स्थान, फटे हुए पत्थर और कन्दराएँ हैं

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॥ ३ · ६७ · ६ ॥
गुहाश्च विविधा घोरा नानामृगगणाकुलाः। आवासाः किंनराणां गन्धर्वभवनानि च॥

guhāśca vividhā ghorā nānāmṛgagaṇākulāḥ।
āvāsāḥ kiṁnarāṇāṁ ca gandharvabhavanāni ca॥

‘वहाँ भाँति-भाँति की भयंकर गुफाएँ हैं, जो नाना प्रकार के मृगगणों से भरी रहती हैं। यहाँ के पर्वत पर किन्नरों के आवासस्थान और गन्धर्वों के भवन भी हैं

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॥ ३ · ६७ · ७ ॥
तानि युक्तो मया सार्धं समन्वेषितुमर्हसि। त्वद्विधा बुद्धिसम्पन्ना महात्मानो नरर्षभाः॥ आपत्सु प्रकम्पन्ते वायुवेगैरिवाचलाः।

tāni yukto mayā sārdhaṁ samanveṣitumarhasi।
tvadvidhā buddhisampannā mahātmāno nararṣabhāḥ॥
āpatsu na prakampante vāyuvegairivācalāḥ।

‘मेरे साथ चलकर आप उन सभी स्थानों में एकाग्रचित्त हो सीता की खोज करें। जैसे पर्वत वायु के वेग से कम्पित नहीं होते हैं, उसी प्रकार आप-जैसे बुद्धिमान् महात्मा नरश्रेष्ठ आपत्तियों में विचलित नहीं होते हैं’

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॥ ३ · ६७ · ८ ॥
इत्युक्तस्तद् वनं सर्वं विचचार सलक्ष्मणः॥ क्रुद्धो रामः शरं घोरं संधाय धनुषि क्षुरम्।

ityuktastad vanaṁ sarvaṁ vicacāra salakṣmaṇaḥ॥
kruddho rāmaḥ śaraṁ ghoraṁ saṁdhāya dhanuṣi kṣuram।

उनके ऐसा कहने पर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी रोषपूर्वक अपने धनुष पर क्षुर नामक भयंकर बाण चढ़ाये वहाँ सारे वन में विचरण करने लगे

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॥ ३ · ६७ · ९ ॥
ततः पर्वतकूटाभं महाभागं द्विजोत्तमम्॥

tataḥ parvatakūṭābhaṁ mahābhāgaṁ dvijottamam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ६७ · १० ॥
ददर्श पतितं भूमौ क्षतजार्द्रं जटायुषम्। तं दृष्ट्वा गिरिशृङ्गाभं रामो लक्ष्मणमब्रवीत्॥

dadarśa patitaṁ bhūmau kṣatajārdraṁ jaṭāyuṣam।
taṁ dṛṣṭvā giriśṛṅgābhaṁ rāmo lakṣmaṇamabravīt॥

॥ ९–१० ॥

थोड़ी ही दूर आगे जाने पर उन्हें पर्वतशिखर के समान विशाल शरीरवाले पक्षिराज महाभाग जटायु दिखायी पड़े जो खून से लथपथ हो पृथ्वी पर पड़े थे। पर्वत-शिखर के समान प्रतीत होनेवाले उन गृध्रराज को देखकर श्रीराम लक्ष्मण से बोले—

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॥ ३ · ६७ · ११ ॥
अनेन सीता वैदेही भक्षिता नात्र संशयः। गृध्ररूपमिदं व्यक्तं रक्षो भ्रमति काननम्॥

anena sītā vaidehī bhakṣitā nātra saṁśayaḥ।
gṛdhrarūpamidaṁ vyaktaṁ rakṣo bhramati kānanam॥

‘लक्ष्मण! यह गृध्र के रूप में अवश्य ही कोई राक्षस जान पड़ता है, जो इस वन में घूमता रहता है। निःसंदेह इसीने विदेहराजकुमारी सीता को खा लिया होगा

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॥ ३ · ६७ · १२ ॥
भक्षयित्वा विशालाक्षीमास्ते सीतां यथासुखम्। एनं वधिष्ये दीप्ताग्रैः शरैर्घोरैरजिह्मगैः॥

bhakṣayitvā viśālākṣīmāste sītāṁ yathāsukham।
enaṁ vadhiṣye dīptāgraiḥ śarairghorairajihmagaiḥ॥

‘विशाललोचना सीता को खाकर यह यहाँ सुखपूर्वक बैठा हुआ है। मैं प्रज्वलित अग्रभागवाले तथा सीधे जानेवाले अपने भयंकर बाणों से इसका वध करूँगा’

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॥ ३ · ६७ · १३ ॥
इत्युक्त्वाभ्यपतद् द्रष्टुं संधाय धनुषि क्षुरम्। क्रुद्धो रामः समुद्रान्तां चालयन्निव मेदिनीम्॥

ityuktvābhyapatad draṣṭuṁ saṁdhāya dhanuṣi kṣuram।
kruddho rāmaḥ samudrāntāṁ cālayanniva medinīm॥

ऐसा कहकर क्रोध में भरे हुए श्रीराम धनुष पर बाण चढ़ाये समुद्रपर्यन्त पृथ्वी को कम्पित करते हुए उसे देखने के लिये आगे बढ़े

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॥ ३ · ६७ · १४ ॥
तं दीनदीनया वाचा सफेनं रुधिरं वमन्। अभ्यभाषत पक्षी रामं दशरथात्मजम्॥

taṁ dīnadīnayā vācā saphenaṁ rudhiraṁ vaman।
abhyabhāṣata pakṣī sa rāmaṁ daśarathātmajam॥

इसी समय पक्षी जटायु अपने मुँह से फेनयुक्त रक्त वमन करते हुए अत्यन्त दीन-वाणी में दशरथनन्दन श्रीराम से बोले—

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॥ ३ · ६७ · १५ ॥
यामोषधीमिवायुष्मन्नन्वेषसि महावने। सा देवी मम प्राणा रावणेनोभयं हृतम्॥

yāmoṣadhīmivāyuṣmannanveṣasi mahāvane।
sā devī mama ca prāṇā rāvaṇenobhayaṁ hṛtam॥

‘आयुष्मन्! इस महान् वन में तुम जिसे ओषधि के समान ढूँढ़ रहे हो, उस देवी सीता को तथा मेरे इन प्राणों को भी रावण ने हर लिया

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॥ ३ · ६७ · १६ ॥
त्वया विरहिता देवी लक्ष्मणेन राघव। ह्रियमाणा मया दृष्टा रावणेन बलीयसा॥

tvayā virahitā devī lakṣmaṇena ca rāghava।
hriyamāṇā mayā dṛṣṭā rāvaṇena balīyasā॥

‘रघुनन्दन! तुम्हारे और लक्ष्मण के न रहने पर महाबली रावण आया और देवी सीता को हरकर ले जाने लगा। उस समय मेरी दृष्टि सीता पर पड़ी

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॥ ३ · ६७ · १७ ॥
सीतामभ्यवपन्नोऽहं रावणश्च रणे प्रभो। विध्वंसितरथच्छत्रः पतितो धरणीतले॥

sītāmabhyavapanno'haṁ rāvaṇaśca raṇe prabho।
vidhvaṁsitarathacchatraḥ patito dharaṇītale॥

‘प्रभो! ज्यों ही मेरी दृष्टि पड़ी, मैं सीता की सहायता के लिये दौड़ पड़ा। रावण के साथ मेरा युद्ध हुआ। मैंने उस युद्ध में रावण के रथ और छत्र आदि सभी साधन नष्ट कर दिये और वह भी घायल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा

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॥ ३ · ६७ · १८ ॥
एतदस्य धनुर्भग्नमेते चास्य शरास्तथा। अयमस्य रणे राम भग्नः सांग्रामिको रथः॥

etadasya dhanurbhagnamete cāsya śarāstathā।
ayamasya raṇe rāma bhagnaḥ sāṁgrāmiko rathaḥ॥

‘श्रीराम! यह रहा उसका टूटा हुआ धनुष, ये हैं उसके खण्डित हुए बाण और यह है उसका युद्धोपयोगी रथ, जो युद्ध में मेरे द्वारा तोड़ डाला गया है

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॥ ३ · ६७ · १९ ॥
अयं तु सारथिस्तस्य मत्पक्षनिहतो भुवि। परिश्रान्तस्य मे पक्षौ छित्त्वा खड्गेन रावणः॥

ayaṁ tu sārathistasya matpakṣanihato bhuvi।
pariśrāntasya me pakṣau chittvā khaḍgena rāvaṇaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ६७ · २० ॥
सीतामादाय वैदेहीमुत्पपात विहायसम्। रक्षसा निहतं पूर्वं मां हन्तुं त्वमर्हसि॥

sītāmādāya vaidehīmutpapāta vihāyasam।
rakṣasā nihataṁ pūrvaṁ māṁ na hantuṁ tvamarhasi॥

॥ १९–२० ॥

‘यह रावण का सारथि है, जिसे मैंने अपने पंखों से मार डाला था। जब मैं युद्ध करते-करते थक गया, तब रावण ने तलवार से मेरे दोनों पंख काट डाले और वह विदेहकुमारी सीता को लेकर आकाश में उड़ गया। मैं उस राक्षस के हाथ से पहले ही मार डाला गया हूँ, अब तुम मुझे न मारो’

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॥ ३ · ६७ · २१ ॥
रामस्तस्य तु विज्ञाय सीतासक्तां प्रियां कथाम्। गृध्रराजं परिष्वज्य परित्यज्य महद् धनुः॥

rāmastasya tu vijñāya sītāsaktāṁ priyāṁ kathām।
gṛdhrarājaṁ pariṣvajya parityajya mahad dhanuḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ६७ · २२ ॥
निपपातावशो भूमौ रुरोद सहलक्ष्मणः। द्विगुणीकृततापार्तो रामो धीरतरोऽपि सन्॥

nipapātāvaśo bhūmau ruroda sahalakṣmaṇaḥ।
dviguṇīkṛtatāpārto rāmo dhīrataro'pi san॥

॥ २१–२२ ॥

सीता से सम्बन्ध रखनेवाली यह प्रिय वार्ता सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने अपना महान् धनुष फेंक दिया और गृध्रराज जटायु को गले से लगाकर वे शोक से विवश हो पृथ्वी पर गिर पड़े और लक्ष्मण के साथ ही रोने लगे। अत्यन्त धीर होने पर भी श्रीराम ने उस समय दूने दुःख का अनुभव किया

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॥ ३ · ६७ · २३ ॥
एकमेकायने कृच्छ्रे निःश्वसन्तं मुहुर्मुहुः। समीक्ष्य दुःखितो रामः सौमित्रिमिदमब्रवीत्॥

ekamekāyane kṛcchre niḥśvasantaṁ muhurmuhuḥ।
samīkṣya duḥkhito rāmaḥ saumitrimidamabravīt॥

असहाय हो एकमात्र ऊर्ध्वश्वास की संकटपूर्ण अवस्था में पड़कर बारंबार लंबी साँस खींचते हुए जटायु की ओर देखकर श्रीराम को बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने सुमित्राकुमार से कहा—

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॥ ३ · ६७ · २४ ॥
राज्यं भ्रष्टं वने वासः सीता नष्टा मृतो द्विजः। ईदृशीयं ममालक्ष्मीर्दहेदपि हि पावकम्॥

rājyaṁ bhraṣṭaṁ vane vāsaḥ sītā naṣṭā mṛto dvijaḥ।
īdṛśīyaṁ mamālakṣmīrdahedapi hi pāvakam॥

‘लक्ष्मण! मेरा राज्य छिन गया, मुझे वनवास मिला (पिताजी की मृत्यु हुई), सीता का अपहरण हुआ और ये मेरे परम सहायक पक्षिराज भी मर गये। ऐसा जो मेरा यह दुर्भाग्य है, यह तो अग्नि को भी जलाकर भस्म कर सकता है

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॥ ३ · ६७ · २५ ॥
सम्पूर्णमपि चेदद्य प्रतरेयं महोदधिम्। सोऽपि नूनं ममालक्ष्म्या विशुष्येत् सरितां पतिः॥

sampūrṇamapi cedadya pratareyaṁ mahodadhim।
so'pi nūnaṁ mamālakṣmyā viśuṣyet saritāṁ patiḥ॥

‘यदि आज मैं भरे हुए महासागर को तैरने लगूँ तो मेरे दुर्भाग्य की आँच से वह सरिताओं का स्वामी समुद्र भी निश्चय ही सूख जायगा

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॥ ३ · ६७ · २६ ॥
नास्त्यभाग्यतरो लोके मत्तोऽस्मिन् चराचरे। येनेयं महती प्राप्ता मया व्यसनवागुरा॥

nāstyabhāgyataro loke matto'smin sa carācare।
yeneyaṁ mahatī prāptā mayā vyasanavāgurā॥

‘इस चराचर जगत् में मुझसे बढ़कर भाग्यहीन दूसरा कोई नहीं है, जिस अभाग्य के कारण मुझे इस विपत्ति के बड़े भारी जाल में फँसना पड़ा है

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॥ ३ · ६७ · २७ ॥
अयं पितुर्वयस्यो मे गृध्रराजो महाबलः। शेते विनिहतो भूमौ मम भाग्यविपर्ययात्॥

ayaṁ piturvayasyo me gṛdhrarājo mahābalaḥ।
śete vinihato bhūmau mama bhāgyaviparyayāt॥

‘ये महाबली गृध्रराज जटायु मेरे पिताजी के मित्र थे, किंतु आज मेरे दुर्भाग्यवश मारे जाकर इस समय पृथ्वी पर पड़े हैं’

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॥ ३ · ६७ · २८ ॥
इत्येवमुक्त्वा बहुशो राघवः सहलक्ष्मणः। जटायुषं पस्पर्श पितृस्नेहं निदर्शयन्॥

ityevamuktvā bahuśo rāghavaḥ sahalakṣmaṇaḥ।
jaṭāyuṣaṁ ca pasparśa pitṛsnehaṁ nidarśayan॥

इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी ने जटायु के शरीर पर हाथ फेरा और पिता के प्रति जैसा स्नेह होना चाहिये, वैसा ही उनके प्रति प्रदर्शित किया

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॥ ३ · ६७ · २९ ॥
निकृत्तपक्षं रुधिरावसिक्तं तं गृध्रराजं परिगृह्य राघवः। क्व मैथिली प्राणसमा गतेति विमुच्य वाचं निपपात भूमौ॥

nikṛttapakṣaṁ rudhirāvasiktaṁ
taṁ gṛdhrarājaṁ parigṛhya rāghavaḥ।
kva maithilī prāṇasamā gateti
vimucya vācaṁ nipapāta bhūmau॥

पङ्ख कट जाने के कारण गृध्रराज जटायु लहू-लुहान हो रहे थे। उसी अवस्था में उन्हें गले से लगाकर श्रीरघुनाथजी ने पूछा—‘तात! मेरी प्राणों के समान प्रिया मिथिलेशकुमारी सीता कहाँ चली गयी?’ इतनी ही बात मुँह से निकालकर वे पृथ्वी पर गिर पड़े

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तषष्टितमः सर्गः॥ ६७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६७॥