वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ६५ · १६ श्लोकाःSarga 65 · 16 ślokas

लक्ष्मणका श्रीरामको समझा-बुझाकर शान्त करना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ६५ — painting

॥ ३ · ६५ · ४–६ ॥

प्रलयाग्निवद् उग्रो नीलवर्णो रामः आकृष्टधनुः शरं संधाय दीप्तः तिष्ठति; तस्याग्रे वल्कलधरो लक्ष्मणः कृताञ्जलिः प्रणम्य 'एकस्यापराधेन लोकान् मा नाशय' इति सदैन्यं याचते; समीपे भग्नो रथः क्षतमृत्तिका च दृश्यते।

प्रलयकाल की अग्नि के समान उग्र, नीले वर्ण के श्रीराम धनुष की डोरी चढ़ाकर, बाण संधानकर तेज से दीप्त खड़े हैं; उनके सामने वल्कलधारी लक्ष्मण हाथ जोड़कर, दीन मुख से प्रार्थना कर रहे हैं कि एक के अपराध से समस्त लोकों का नाश न करें; पास ही टूटा रथ और खुरों-पहियों से खुदी, रक्त से सिंची हुई भूमि दिखायी देती है।

Blazing like the fire of world-dissolution, the blue-hued Ram stands with bow strung and arrow half-drawn; before him the bark-clad Lakshman, palms pressed together, pleads with an anguished face that he not destroy all the worlds for the fault of one, while a broken chariot and blood-flecked, churned earth lie nearby.

॥ ३ · ६५ · १ ॥
तप्यमानं तदा रामं सीताहरणकर्शितम्। लोकानामभवे युक्तं सांवर्तकमिवानलम्॥

tapyamānaṁ tadā rāmaṁ sītāharaṇakarśitam।
lokānāmabhave yuktaṁ sāṁvartakamivānalam॥

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॥ ३ · ६५ · २ ॥
वीक्षमाणं धनुः सज्यं निःश्वसन्तं पुनः पुनः। दग्धुकामं जगत् सर्वं युगान्ते यथा हरम्॥

vīkṣamāṇaṁ dhanuḥ sajyaṁ niḥśvasantaṁ punaḥ punaḥ।
dagdhukāmaṁ jagat sarvaṁ yugānte ca yathā haram॥

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॥ ३ · ६५ · ३ ॥
अदृष्टपूर्वं संक्रुद्धं दृष्ट्वा रामं लक्ष्मणः। अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं मुखेन परिशुष्यता॥

adṛṣṭapūrvaṁ saṁkruddhaṁ dṛṣṭvā rāmaṁ sa lakṣmaṇaḥ।
abravīt prāñjalirvākyaṁ mukhena pariśuṣyatā॥

॥ १–३ ॥

सीताहरण के शोक से पीड़ित हुए श्रीराम जब उस समय संतप्त हो प्रलयकालिक अग्नि के समान समस्त लोकों का संहार करने को उद्यत हो गये और धनुष की डोरी चढ़ाकर बारंबार उसकी ओर देखने लगे तथा लंबी साँस खींचने लगे, साथ ही कल्पान्तकाल में रुद्रदेव की भाँति समस्त संसार को दग्ध कर देने की इच्छा करने लगे, तब जिन्हें इस रूप में पहले कभी देखा नहीं गया था, उन अत्यन्त कुपित हुए श्रीराम की ओर देखकर लक्ष्मण हाथ जोड़ सूखे हुए मुँह से इस प्रकार बोले—

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॥ ३ · ६५ · ४ ॥
पुरा भूत्वा मृदुर्दान्तः सर्वभूतहिते रतः। क्रोधवशमापन्नः प्रकृतिं हातुमर्हसि॥

purā bhūtvā mṛdurdāntaḥ sarvabhūtahite rataḥ।
na krodhavaśamāpannaḥ prakṛtiṁ hātumarhasi॥

‘आर्य! आप पहले कोमल स्वभाव से युक्त, जितेन्द्रिय और समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहे हैं। अब क्रोध के वशीभूत होकर अपनी प्रकृति (स्वभाव) का परित्याग न करें॥

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॥ ३ · ६५ · ५ ॥
चन्द्रे लक्ष्मीः प्रभा सूर्ये गतिर्वायौ भुवि क्षमा। एतच्च नियतं नित्यं त्वयि चानुत्तमं यशः॥

candre lakṣmīḥ prabhā sūrye gatirvāyau bhuvi kṣamā।
etacca niyataṁ nityaṁ tvayi cānuttamaṁ yaśaḥ॥

‘चन्द्रमा में शोभा, सूर्य में प्रभा, वायु में गति और पृथ्वी में क्षमा जैसे नित्य विराजमान रहती है, उसी प्रकार आपमें सर्वोत्तम यश सदा प्रकाशित होता है॥

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॥ ३ · ६५ · ६ ॥
एकस्य नापराधेन लोकान् हन्तुं त्वमर्हसि। ननु जानामि कस्यायं भग्नः सांग्रामिको रथः॥

ekasya nāparādhena lokān hantuṁ tvamarhasi।
nanu jānāmi kasyāyaṁ bhagnaḥ sāṁgrāmiko rathaḥ॥

‘आप किसी एक के अपराध से समस्त लोकों का संहार न करें। मैं यह जानने की चेष्टा करता हूँ कि यह टूटा हुआ युद्धोपयोगी रथ किसका है॥

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॥ ३ · ६५ · ७ ॥
केन वा कस्य वा हेतोः सयुगः सपरिच्छदः। खुरनेमिक्षतश्चायं सिक्तो रुधिरबिन्दुभिः॥

kena vā kasya vā hetoḥ sayugaḥ saparicchadaḥ।
khuranemikṣataścāyaṁ sikto rudhirabindubhiḥ॥

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॥ ३ · ६५ · ८ ॥
देशो निर्वृत्तसंग्रामः सुघोरः पार्थिवात्मज। एकस्य तु विमर्दोऽयं द्वयोर्वदतां वर॥

deśo nirvṛttasaṁgrāmaḥ sughoraḥ pārthivātmaja।
ekasya tu vimardo'yaṁ na dvayorvadatāṁ vara॥

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॥ ३ · ६५ · ९ ॥
नहि वृत्तं हि पश्यामि बलस्य महतः पदम्। नैकस्य तु कृते लोकान् विनाशयितुमर्हसि॥

nahi vṛttaṁ hi paśyāmi balasya mahataḥ padam।
naikasya tu kṛte lokān vināśayitumarhasi॥

॥ ७–९ ॥

‘अथवा किसने किस उद्देश्य से जूए तथा अन्य उपकरणोंसहित इस रथ को तोड़ा है? इसका भी पता लगाना है। राजकुमार! यह स्थान घोड़ों की खुरों और थके पहियों से खुदा हुआ है; साथ ही खून की बूँदों से सिंच उठा है। इससे सिद्ध होता है कि यहाँ बड़ा भयंकर संग्राम हुआ था, परंतु यह संग्राम-चिह्न किसी एक ही रथी का है, दो का नहीं। वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीराम! मैं यहाँ किसी विशाल सेना का पदचिह्न नहीं देख रहा हूँ; अतः किसी एक ही के अपराध के कारण आपको समस्त लोकों का विनाश नहीं करना चाहिये॥

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॥ ३ · ६५ · १० ॥
युक्तदण्डा हि मृदवः प्रशान्ता वसुधाधिपाः। सदा त्वं सर्वभूतानां शरण्यः परमा गतिः॥

yuktadaṇḍā hi mṛdavaḥ praśāntā vasudhādhipāḥ।
sadā tvaṁ sarvabhūtānāṁ śaraṇyaḥ paramā gatiḥ॥

‘क्योंकि राजालोग अपराध के अनुसार ही उचित दण्ड देनेवाले, कोमल स्वभाववाले और शान्त होते हैं। आप तो सदा ही समस्त प्राणियों को शरण देनेवाले तथा उनकी परम गति हैं॥

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॥ ३ · ६५ · ११ ॥
को नु दारप्रणाशं ते साधु मन्येत राघव। सरितः सागराः शैला देवगन्धर्वदानवाः॥ नालं ते विप्रियं कर्तुं दीक्षितस्येव साधवः।

ko nu dārapraṇāśaṁ te sādhu manyeta rāghava।
saritaḥ sāgarāḥ śailā devagandharvadānavāḥ॥
nālaṁ te vipriyaṁ kartuṁ dīkṣitasyeva sādhavaḥ।

‘रघुनन्दन! आपकी स्त्री का विनाश या अपहरण कौन अच्छा समझेगा? जैसे यज्ञ में दीक्षित हुए पुरुष का साधुस्वभाववाले ऋत्विज् कभी अप्रिय नहीं कर सकते, उसी प्रकार सरिताएँ, समुद्र, पर्वत, देवता, गन्धर्व और दानव—ये कोई भी आपके प्रतिकूल आचरण नहीं कर सकते॥

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॥ ३ · ६५ · १२ ॥
येन राजन् हृता सीता तमन्वेषितुमर्हसि॥ मद्द्वितीयो धनुष्पाणिः सहायैः परमर्षिभिः।

yena rājan hṛtā sītā tamanveṣitumarhasi॥
maddvitīyo dhanuṣpāṇiḥ sahāyaiḥ paramarṣibhiḥ।

‘राजन्! जिसने सीता का अपहरण किया है, उसीका अन्वेषण करना चाहिये। आप मेरे साथ धनुष हाथ में लेकर बड़े-बड़े ऋषियों की सहायता से उसका पता लगावें॥

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॥ ३ · ६५ · १३ ॥
समुद्रं वा विचेष्यामः पर्वतांश्च वनानि च॥

samudraṁ vā viceṣyāmaḥ parvatāṁśca vanāni ca॥

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॥ ३ · ६५ · १४ ॥
गुहाश्च विविधा घोराः पद्मिन्यो विविधास्तथा। देवगन्धर्वलोकांश्च विचेष्यामः समाहिताः॥

guhāśca vividhā ghorāḥ padminyo vividhāstathā।
devagandharvalokāṁśca viceṣyāmaḥ samāhitāḥ॥

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॥ ३ · ६५ · १५ ॥
यावन्नाधिगमिष्यामस्तव भार्यापहारिणम्। चेत् साम्ना प्रदास्यन्ति पत्नीं ते त्रिदशेश्वराः। कोसलेन्द्र ततः पश्चात् प्राप्तकालं करिष्यसि॥

yāvannādhigamiṣyāmastava bhāryāpahāriṇam।
na cet sāmnā pradāsyanti patnīṁ te tridaśeśvarāḥ।
kosalendra tataḥ paścāt prāptakālaṁ kariṣyasi॥

॥ १३–१५ ॥

‘हम सब लोग एकाग्रचित्त हो समुद्र में खोजेंगे, पर्वतों और वनों में ढूँढेंगे, नाना प्रकार की भयंकर गुफाओं और भाँति-भाँति के सरोवरों को छान डालेंगे तथा देवताओं और गन्धर्वों के लोकों में भी तलाश करेंगे। जबतक आपकी पत्नी का अपहरण करनेवाले दुरात्मा का पता नहीं लगा लेंगे, तबतक हम अपना यह प्रयत्न जारी रखेंगे। कोसलनरेश! यदि हमारे शान्तिपूर्ण बर्ताव से देवेश्वरगण आपकी पत्नी का पता नहीं देंगे तो उस अवसर के अनुरूप कार्य आप कीजियेगा॥

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॥ ३ · ६५ · १६ ॥
शीलेन साम्ना विनयेन सीतां नयेन प्राप्स्यसि चेन्नरेन्द्र। ततः समुत्सादय हेमपुङ्खै- र्महेन्द्रवज्रप्रतिमैः शरौघैः॥

śīlena sāmnā vinayena sītāṁ
nayena na prāpsyasi cennarendra।
tataḥ samutsādaya hemapuṅkhai-
rmahendravajrapratimaiḥ śaraughaiḥ॥

‘नरेन्द्र! यदि अच्छे शील-स्वभाव, सामनीति, विनय और न्याय के अनुसार प्रयत्न करने पर भी आपको सीता का पता न मिले, तब आप सुवर्णमय पंखवाले महेन्द्र के वज्रतुल्य बाणसमूहों से समस्त लोकों का संहार कर डालें’॥

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चषष्टितमः सर्गः ॥ ६५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६५ ॥