वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ६४ · ७७ श्लोकाःSarga 64 · 77 ślokas

श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सीताकी खोज, श्रीरामका शोकोद्गार, मृगोंद्वारा संकेत पाकर दोनों भाइयोंका दक्षिण दिशाकी ओर जाना, पर्वतपर क्रोध, सीताके बिखरे हुए फूल, आभूषणोंके कण और युद्धके चिह्न देखकर श्रीरामका देवता आदि सहित समस्त त्रिलोकीपर रोष प्रकट करना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ६४ — painting

॥ ३ · ६४ · ७२–७४ ॥

रुद्रवद् उग्रो नीलवर्णो रामः वल्कलाजिनं संयम्य जटाभारं च बद्ध्वा ताम्रलोचनो युद्धभूमौ भग्नरथच्छत्ररक्षोवधशेषे स्थित्वा महद् धनुः आदाय विषोल्बणं दीप्तं शरं संधत्ते; पार्श्वे च सशङ्को लक्ष्मणस्तिष्ठति।

रुद्र के समान उग्र, नीले वर्ण के श्रीराम वल्कल और मृगचर्म कसकर तथा जटाभार बाँधकर, क्रोध से ताम्र-लाल नेत्र लिये टूटे रथ, खण्डित छत्र और मरे हुए राक्षसों से भरी रणभूमि पर खड़े होकर अपना महान् धनुष लेकर विषधर सर्प-सा प्रज्वलित बाण चढ़ा रहे हैं; पास ही शंकित मुख लिये लक्ष्मण खड़े हैं।

Terrible as Rudra, the blue-hued Ram — his bark and deer-skin cinched tight and his matted hair bound up, his eyes gone copper-red — stands over a battlefield strewn with a shattered chariot, a broken parasol and slain rakshasas, and sets to his great bow a blazing arrow like a venomous serpent; a little apart, Lakshman looks on in alarm.

॥ ३ · ६४ · १ ॥
दीनो दीनया वाचा लक्ष्मणं वाक्यमब्रवीत्। शीघ्रं लक्ष्मण जानीहि गत्वा गोदावरीं नदीम्॥ अपि गोदावरीं सीता पद्मान्यानयितुं गता।

sa dīno dīnayā vācā lakṣmaṇaṁ vākyamabravīt।
śīghraṁ lakṣmaṇa jānīhi gatvā godāvarīṁ nadīm॥
api godāvarīṁ sītā padmānyānayituṁ gatā।

तदनन्तर दीन हुए श्रीरामचन्द्रजी ने दीन वाणी में लक्ष्मण से कहा—‘लक्ष्मण! तुम शीघ्र ही गोदावरी नदी के तट पर जाकर पता लगाओ। सीता कमल लाने के लिये तो नहीं चली गयीं’

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॥ ३ · ६४ · २ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मणः पुनरेव हि॥ नदीं गोदावरीं रम्यां जगाम लघुविक्रमः।

evamuktastu rāmeṇa lakṣmaṇaḥ punareva hi॥
nadīṁ godāvarīṁ ramyāṁ jagāma laghuvikramaḥ।

श्रीराम की ऐसी आज्ञा पाकर लक्ष्मण शीघ्र गति से पुनः रमणीय गोदावरी नदी के तट पर गये

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॥ ३ · ६४ · ३ ॥
तां लक्ष्मणस्तीर्थवतीं विचित्वा राममब्रवीत्॥ नैनां पश्यामि तीर्थेषु क्रोशतो शृणोति मे।

tāṁ lakṣmaṇastīrthavatīṁ vicitvā rāmamabravīt॥
naināṁ paśyāmi tīrtheṣu krośato na śṛṇoti me।

अनेक तीर्थों (घाटों) से युक्त गोदावरी के तट पर खोजकर लक्ष्मण पुनः लौट आये और श्रीराम से बोले—‘भैया! मैं गोदावरी के घाटों पर सीता को नहीं देख पाता हूँ; जोर-जोर से पुकारने पर भी वे मेरी बात नहीं सुनती हैं

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॥ ३ · ६४ · ४ ॥
कं नु सा देशमापन्ना वैदेही क्लेशनाशिनी॥ नहि तं वेद्मि वै राम यत्र सा तनुमध्यमा।

kaṁ nu sā deśamāpannā vaidehī kleśanāśinī॥
nahi taṁ vedmi vai rāma yatra sā tanumadhyamā।

‘श्रीराम! क्लेशों का नाश करनेवाली विदेहराजकुमारी न जाने किस देश में चली गयीं। भैया श्रीराम! जहाँ कृशकटि-प्रदेशवाली सीता गयी हैं, उस स्थान को मैं नहीं जानता’

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॥ ३ · ६४ · ५ ॥
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा दीनः संतापमोहितः॥ रामः समभिचक्राम स्वयं गोदावरीं नदीम्।

lakṣmaṇasya vacaḥ śrutvā dīnaḥ saṁtāpamohitaḥ॥
rāmaḥ samabhicakrāma svayaṁ godāvarīṁ nadīm।

लक्ष्मण की यह बात सुनकर दीन एवं संताप से मोहित हुए श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ही गोदावरी नदी के तट पर गये

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॥ ३ · ६४ · ६ ॥
तामुपस्थितो रामः क्व सीतेत्येवमब्रवीत्॥

sa tāmupasthito rāmaḥ kva sītetyevamabravīt॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ६४ · ७ ॥
भूतानि राक्षसेन्द्रेण वधार्हेण हृतामपि। तां शशंसू रामाय तथा गोदावरी नदी॥

bhūtāni rākṣasendreṇa vadhārheṇa hṛtāmapi।
na tāṁ śaśaṁsū rāmāya tathā godāvarī nadī॥

॥ ६–७ ॥

वहाँ पहुँचकर श्रीराम ने पूछा—‘सीता कहाँ है?’ परंतु वध के योग्य राक्षसराज रावणद्वारा हरी गयी सीता के विषय में समस्त भूतों में से किसी ने कुछ नहीं कहा। गोदावरी नदी ने भी श्रीराम को कोई उत्तर नहीं दिया

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॥ ३ · ६४ · ८ ॥
ततः प्रचोदिता भूतैः शंस चास्मै प्रियामिति। सा ह्यवदत् सीतां पृष्टा रामेण शोचता॥

tataḥ pracoditā bhūtaiḥ śaṁsa cāsmai priyāmiti।
na ca sā hyavadat sītāṁ pṛṣṭā rāmeṇa śocatā॥

तदनन्तर वन के समस्त प्राणियों ने उन्हें प्रेरित किया कि “तुम श्रीराम को उनकी प्रिया का पता बता दो!” किंतु शोकमग्न श्रीराम के पूछने पर भी गोदावरी ने सीता का पता नहीं बताया

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॥ ३ · ६४ · ९ ॥
रावणस्य तद्रूपं कर्मापि दुरात्मनः। ध्यात्वा भयात् तु वैदेहीं सा नदी शशंस ह॥

rāvaṇasya ca tadrūpaṁ karmāpi ca durātmanaḥ।
dhyātvā bhayāt tu vaidehīṁ sā nadī na śaśaṁsa ha॥

दुरात्मा रावण के उस रूप और कर्म को याद करके भय के मारे गोदावरी नदी ने वैदेही के विषय में श्रीराम से कुछ नहीं कहा

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॥ ३ · ६४ · १० ॥
निराशस्तु तया नद्या सीताया दर्शने कृतः। उवाच रामः सौमित्रिं सीतादर्शनकर्शितः॥

nirāśastu tayā nadyā sītāyā darśane kṛtaḥ।
uvāca rāmaḥ saumitriṁ sītādarśanakarśitaḥ॥

सीता के दर्शन के विषय में जब नदी ने उन्हें पूर्ण निराश कर दिया, तब सीता को न देखने से कष्ट में पड़े हुए श्रीराम सुमित्राकुमार से इस प्रकार बोले—

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॥ ३ · ६४ · ११ ॥
एषा गोदावरी सौम्य किंचिन्न प्रतिभाषते। किं नु लक्ष्मण वक्ष्यामि समेत्य जनकं वचः॥ मातरं चैव वैदेह्या विना तामहमप्रियम्।

eṣā godāvarī saumya kiṁcinna pratibhāṣate।
kiṁ nu lakṣmaṇa vakṣyāmi sametya janakaṁ vacaḥ॥
mātaraṁ caiva vaidehyā vinā tāmahamapriyam।

‘सौम्य लक्ष्मण! यह गोदावरी नदी तो मुझे कोई उत्तर ही नहीं देती है। अब मैं राजा जनक से मिलने पर उन्हें क्या जवाब दूँगा? जानकी के बिना उसकी माता से मिलकर भी मैं उनसे यह अप्रिय बात कैसे सुनाऊँगा?

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॥ ३ · ६४ · १२ ॥
या मे राज्यविहीनस्य वने वन्येन जीवतः॥ सर्वं व्यपानयच्छोकं वैदेही क्व नु सा गता।

yā me rājyavihīnasya vane vanyena jīvataḥ॥
sarvaṁ vyapānayacchokaṁ vaidehī kva nu sā gatā।

‘राज्यहीन होकर वन में जंगली फल-मूलों से निर्वाह करते समय भी जो मेरे साथ रहकर मेरे सभी दुःखों को दूर किया करती थी, वह विदेहराजकुमारी कहाँ चली गयी?

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॥ ३ · ६४ · १३ ॥
ज्ञातिवर्गविहीनस्य वैदेहीमप्यपश्यतः॥ मन्ये दीर्घा भविष्यन्ति रात्रयो मम जाग्रतः।

jñātivargavihīnasya vaidehīmapyapaśyataḥ॥
manye dīrghā bhaviṣyanti rātrayo mama jāgrataḥ।

‘बन्धु-बान्धवों से तो मेरा बिछोह हो ही गया था, अब सीता के दर्शन से भी मुझे वञ्चित होना पड़ा; उसकी चिन्ता में निरन्तर जागते रहने के कारण अब मेरी सभी रातें बहुत बड़ी हो जायँगी

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॥ ३ · ६४ · १४ ॥
मन्दाकिनीं जनस्थानमिमं प्रस्रवणं गिरिम्॥ सर्वाण्यनुचरिष्यामि यदि सीता हि लभ्यते।

mandākinīṁ janasthānamimaṁ prasravaṇaṁ girim॥
sarvāṇyanucariṣyāmi yadi sītā hi labhyate।

‘मन्दाकिनी नदी, जनस्थान तथा प्रस्रवण पर्वत—इन सभी स्थानों पर मैं बारंबार भ्रमण करूँगा। शायद वहाँ सीता का पता चल जाय

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॥ ३ · ६४ · १५ ॥
एते महामृगा वीर मामीक्षन्ते पुनः पुनः॥ वक्तुकामा इह हि मे इङ्गितान्युपलक्षये।

ete mahāmṛgā vīra māmīkṣante punaḥ punaḥ॥
vaktukāmā iha hi me iṅgitānyupalakṣaye।

‘वीर लक्ष्मण! ये विशाल मृग मेरी ओर बारंबार देख रहे हैं, मानो यहाँ ये मुझसे कुछ कहना चाहते हैं। मैं इनकी चेष्टाओं को समझ रहा हूँ’

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॥ ३ · ६४ · १६ ॥
तांस्तु दृष्ट्वा नरव्याघ्रो राघवः प्रत्युवाच ह॥

tāṁstu dṛṣṭvā naravyāghro rāghavaḥ pratyuvāca ha॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ६४ · १७ ॥
क्व सीतेति निरीक्षन् वै बाष्पसंरुद्धया गिरा। एवमुक्ता नरेन्द्रेण ते मृगाः सहसोत्थिताः॥ दक्षिणाभिमुखाः सर्वे दर्शयन्तो नभःस्थलम्।

kva sīteti nirīkṣan vai bāṣpasaṁruddhayā girā।
evamuktā narendreṇa te mṛgāḥ sahasotthitāḥ॥
dakṣiṇābhimukhāḥ sarve darśayanto nabhaḥsthalam।

॥ १६–१७ ॥

तदनन्तर उन सबकी ओर देखकर पुरुषसिंह श्रीरामचन्द्रजी ने उनसे कहा—‘बताओ, सीता कहाँ हैं?’ उन मृगों की ओर देखते हुए राजा श्रीराम ने जब अश्रुगद्गद वाणी से इस प्रकार पूछा, तब वे मृग सहसा उठकर खड़े हो गये और ऊपर की ओर देखकर आकाशमार्ग की ओर लक्ष्य कराते हुए सब-के-सब दक्षिण दिशा की ओर मुँह किये दौड़े

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॥ ३ · ६४ · १८ ॥
मैथिली ह्रियमाणा सा दिशं यामभ्यपद्यत॥ तेन मार्गेण गच्छन्तो निरीक्षन्ते नराधिपम्।

maithilī hriyamāṇā sā diśaṁ yāmabhyapadyata॥
tena mārgeṇa gacchanto nirīkṣante narādhipam।

मिथिलेशकुमारी सीता हरी जाकर जिस दिशा की ओर गयी थीं, उसी ओर के मार्ग से जाते हुए वे मृग राजा श्रीरामचन्द्रजी की ओर मुड़-मुड़कर देखते रहते थे

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॥ ३ · ६४ · १९ ॥
येन मार्गं भूमिं निरीक्षन्ते स्म ते मृगाः॥

yena mārgaṁ ca bhūmiṁ ca nirīkṣante sma te mṛgāḥ॥

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॥ ३ · ६४ · २० ॥
पुनर्नदन्तो गच्छन्ति लक्ष्मणेनोपलक्षिताः। तेषां वचनसर्वस्वं लक्षयामास चेङ्गितम्॥

punarnadanto gacchanti lakṣmaṇenopalakṣitāḥ।
teṣāṁ vacanasarvasvaṁ lakṣayāmāsa ceṅgitam॥

॥ १९–२० ॥

वे मृग आकाशमार्ग और भूमि दोनों की ओर देखते और गर्जना करते हुए पुनः आगे बढ़ते थे। लक्ष्मण ने उनकी इस चेष्टा को लक्ष्य किया। वे जो कुछ कहना चाहते थे, उसका सारसर्वस्वरूप जो उनकी चेष्टा थी, उसे उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया

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॥ ३ · ६४ · २१ ॥
उवाच लक्ष्मणो धीमान् ज्येष्ठं भ्रातरमार्तवत्। क्व सीतेति त्वया पृष्टा यथेमे सहसोत्थिताः॥

uvāca lakṣmaṇo dhīmān jyeṣṭhaṁ bhrātaramārtavat।
kva sīteti tvayā pṛṣṭā yatheme sahasotthitāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ६४ · २२ ॥
दर्शयन्ति क्षितिं चैव दक्षिणां दिशं मृगाः। साधु गच्छावहे देव दिशमेतां नैर्ऋतीम्॥ यदि तस्यागमः कश्चिदार्या वा साथ लक्ष्यते।

darśayanti kṣitiṁ caiva dakṣiṇāṁ ca diśaṁ mṛgāḥ।
sādhu gacchāvahe deva diśametāṁ ca nairṛtīm॥
yadi tasyāgamaḥ kaścidāryā vā sātha lakṣyate।

॥ २१–२२ ॥

तदनन्तर बुद्धिमान् लक्ष्मण ने आर्त-से होकर अपने बड़े भाई से इस प्रकार कहा—‘आर्य! जब आपने पूछा कि सीता कहाँ हैं, तब ये मृग सहसा उठकर खड़े हो गये और पृथ्वी तथा दक्षिण की ओर हमारा लक्ष्य कराने लगे हैं; अतः देव! यही अच्छा होगा कि हमलोग इस नैर्ऋत्य दिशा की ओर चलें। सम्भव है, इधर जाने से सीता का कोई समाचार मिल जाय अथवा आर्या सीता स्वयं ही दृष्टिगोचर हो जायँ’

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॥ ३ · ६४ · २३ ॥
बाढमित्येव काकुत्स्थः प्रस्थितो दक्षिणां दिशम्॥ लक्ष्मणानुगतः श्रीमान् वीक्षमाणो वसुंधराम्।

bāḍhamityeva kākutsthaḥ prasthito dakṣiṇāṁ diśam॥
lakṣmaṇānugataḥ śrīmān vīkṣamāṇo vasuṁdharām।

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर श्रीमान् रामचन्द्रजी लक्ष्मण को साथ ले पृथ्वी की ओर ध्यान से देखते हुए दक्षिण दिशा की ओर चल दिये

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॥ ३ · ६४ · २४ ॥
एवं सम्भाषमाणौ तावन्योन्यं भ्रातरावुभौ॥ वसुंधरायां पतितपुष्पमार्गमपश्यताम्।

evaṁ sambhāṣamāṇau tāvanyonyaṁ bhrātarāvubhau॥
vasuṁdharāyāṁ patitapuṣpamārgamapaśyatām।

वे दोनों भाई आपस में इसी प्रकार की बातें करते हुए ऐसे मार्ग पर जा पहुँचे, जहाँ भूमि पर कुछ फूल गिरे दिखायी देते थे

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॥ ३ · ६४ · २५ ॥
पुष्पवृष्टिं निपतितां दृष्ट्वा रामो महीतले॥ उवाच लक्ष्मणं वीरो दुःखितो दुःखितं वचः।

puṣpavṛṣṭiṁ nipatitāṁ dṛṣṭvā rāmo mahītale॥
uvāca lakṣmaṇaṁ vīro duḥkhito duḥkhitaṁ vacaḥ।

पृथ्वी पर फूलों की उस वर्षा को देखकर वीर श्रीराम ने दुःखी हो लक्ष्मण से यह दुःखभरा वचन कहा—

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॥ ३ · ६४ · २६ ॥
अभिजानामि पुष्पाणि तानीमानीह लक्ष्मण॥ अपिनद्धानि वैदेह्या मया दत्तानि कानने।

abhijānāmi puṣpāṇi tānīmānīha lakṣmaṇa॥
apinaddhāni vaidehyā mayā dattāni kānane।

‘लक्ष्मण! मैं इन फूलों को पहचानता हूँ। ये वे ही फूल यहाँ गिरे हैं, जिन्हें वन में मैंने विदेहनन्दिनी को दिया था और उन्होंने अपने केशों में लगा लिया था

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॥ ३ · ६४ · २७ ॥
मन्ये सूर्यश्च वायुश्च मेदिनी यशस्विनी॥ अभिरक्षन्ति पुष्पाणि प्रकुर्वन्तो मम प्रियम्।

manye sūryaśca vāyuśca medinī ca yaśasvinī॥
abhirakṣanti puṣpāṇi prakurvanto mama priyam।

‘मैं समझता हूँ, सूर्य, वायु और यशस्विनी पृथ्वी ने मेरा प्रिय करने के लिये ही इन फूलों को सुरक्षित रखा है’

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॥ ३ · ६४ · २८ ॥
एवमुक्त्वा महाबाहुर्लक्ष्मणं पुरुषर्षभम्॥ उवाच रामो धर्मात्मा गिरिं प्रस्रवणाकुलम्।

evamuktvā mahābāhurlakṣmaṇaṁ puruṣarṣabham॥
uvāca rāmo dharmātmā giriṁ prasravaṇākulam।

पुरुषप्रवर लक्ष्मण से ऐसा कहकर धर्मात्मा महाबाहु श्रीराम ने झरनों से भरे हुए प्रस्रवण गिरि से कहा—

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॥ ३ · ६४ · २९ ॥
कच्चित् क्षितिभृतां नाथ दृष्टा सर्वाङ्गसुन्दरी॥ रामा रम्ये वनोद्देशे मया विरहिता त्वया।

kaccit kṣitibhṛtāṁ nātha dṛṣṭā sarvāṅgasundarī॥
rāmā ramye vanoddeśe mayā virahitā tvayā।

‘पर्वतराज! क्या तुमने इस वन के रमणीय प्रदेश में मुझसे बिछुड़ी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी रमणी सीता को देखा है?’

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॥ ३ · ६४ · ३० ॥
क्रुद्धोऽब्रवीद् गिरिं तत्र सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥

kruddho'bravīd giriṁ tatra siṁhaḥ kṣudramṛgaṁ yathā॥

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॥ ३ · ६४ · ३१ ॥
तां हेमवर्णां हेमाङ्गीं सीतां दर्शय पर्वत। यावत् सानूनि सर्वाणि ते विध्वंसयाम्यहम्॥

tāṁ hemavarṇāṁ hemāṅgīṁ sītāṁ darśaya parvata।
yāvat sānūni sarvāṇi na te vidhvaṁsayāmyaham॥

॥ ३०–३१ ॥

तदनन्तर जैसे सिंह छोटे मृग को देखकर दहाड़ता है, उसी प्रकार वे कुपित हो वहाँ उस पर्वत से बोले—‘पर्वत! जबतक मैं तुम्हारे सारे शिखरों का विध्वंस नहीं कर डालता हूँ, इसके पहले ही तुम उस काञ्चन की-सी काया-कान्तिवाली सीता का मुझे दर्शन करा दो’

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॥ ३ · ६४ · ३२ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण पर्वतो मैथिलीं प्रति। दर्शयन्निव तां सीतां नादर्शयत राघवे॥

evamuktastu rāmeṇa parvato maithilīṁ prati।
darśayanniva tāṁ sītāṁ nādarśayata rāghave॥

श्रीराम के द्वारा मैथिली के लिये ऐसा कहे जाने पर उस पर्वत ने सीता को दिखाता हुआ-सा कुछ चिह्न प्रकट कर दिया। श्रीरघुनाथजी के समीप वह सीता को साक्षात् उपस्थित न कर सका

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॥ ३ · ६४ · ३३ ॥
ततो दाशरथी राम उवाच शिलोच्चयम्। मम बाणाग्निनिर्दग्धो भस्मीभूतो भविष्यसि॥ असेव्यः सर्वतश्चैव निस्तृणद्रुमपल्लवः।

tato dāśarathī rāma uvāca ca śiloccayam।
mama bāṇāgninirdagdho bhasmībhūto bhaviṣyasi॥
asevyaḥ sarvataścaiva nistṛṇadrumapallavaḥ।

तब दशरथनन्दन श्रीराम ने उस पर्वत से कहा—‘अरे! तू मेरे बाणों की आग से जलकर भस्मीभूत हो जायगा। किसी भी ओर से तू सेवन के योग्य नहीं रह जायगा। तेरे तृण, वृक्ष और पल्लव नष्ट हो जायँगे’

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॥ ३ · ६४ · ३४ ॥
इमां वा सरितं चाद्य शोषयिष्यामि लक्ष्मण॥ यदि नाख्याति मे सीतामद्य चन्द्रनिभाननाम्।

imāṁ vā saritaṁ cādya śoṣayiṣyāmi lakṣmaṇa॥
yadi nākhyāti me sītāmadya candranibhānanām।

(इसके बाद वे सुमित्राकुमार से बोले—) ‘लक्ष्मण! यदि यह नदी आज मुझे चन्द्रमुखी सीता का पता नहीं बताती है तो मैं अब इसे भी सुखा डालूँगा’

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॥ ३ · ६४ · ३५ ॥
एवं प्ररुषितो रामो दिधक्षन्निव चक्षुषा॥ ददर्श भूमौ निष्क्रान्तं राक्षसस्य पदं महत्।

evaṁ praruṣito rāmo didhakṣanniva cakṣuṣā॥
dadarśa bhūmau niṣkrāntaṁ rākṣasasya padaṁ mahat।

ऐसा कहकर रोष में भरे हुए श्रीरामचन्द्रजी उसकी ओर इस तरह देखने लगे, मानो अपनी दृष्टिद्वारा उसे जलाकर भस्म कर देना चाहते हैं। इतने ही में उस पर्वत और गोदावरी के समीप की भूमि पर राक्षस का विशाल पदचिह्न उभरा हुआ दिखायी दिया

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॥ ३ · ६४ · ३६ ॥
त्रस्ताया रामकांक्षिण्याः प्रधावन्त्या इतस्ततः॥ राक्षसेनानुसृप्ताया वैदेह्याश्च पदानि तु।

trastāyā rāmakāṁkṣiṇyāḥ pradhāvantyā itastataḥ॥
rākṣasenānusṛptāyā vaidehyāśca padāni tu।

साथ ही राक्षस ने जिनका पीछा किया था और जो श्रीराम की अभिलाषा रखकर रावण के भय से संत्रस्त हो इधर-उधर भागती फिरी थीं, उन विदेहराजकुमारी सीता के चरणचिह्न भी वहाँ दिखायी दिये

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॥ ३ · ६४ · ३७ ॥
समीक्ष्य परिक्रान्तं सीताया राक्षसस्य च॥

sa samīkṣya parikrāntaṁ sītāyā rākṣasasya ca॥

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॥ ३ · ६४ · ३८ ॥
भग्नं धनुश्च तूणी विकीर्णं बहुधा रथम्। सम्भ्रान्तहृदयो रामः शशंस भ्रातरं प्रियम्॥

bhagnaṁ dhanuśca tūṇī ca vikīrṇaṁ bahudhā ratham।
sambhrāntahṛdayo rāmaḥ śaśaṁsa bhrātaraṁ priyam॥

॥ ३७–३८ ॥

सीता और राक्षस के पैरों के निशान, टूटे धनुष, तरकस और छिन्न-भिन्न होकर अनेक टुकड़ों में बिखरे हुए रथ को देखकर श्रीरामचन्द्रजी का हृदय घबरा उठा। वे अपने प्रिय भ्राता सुमित्राकुमार से बोले—

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॥ ३ · ६४ · ३९ ॥
पश्य लक्ष्मण वैदेह्या कीर्णाः कनकबिन्दवः। भूषणानां हि सौमित्रे माल्यानि विविधानि च॥

paśya lakṣmaṇa vaidehyā kīrṇāḥ kanakabindavaḥ।
bhūṣaṇānāṁ hi saumitre mālyāni vividhāni ca॥

‘लक्ष्मण! देखो, ये सीता के आभूषणों में लगे हुए सोने के घुँघुरू बिखरे पड़े हैं। सुमित्रानन्दन! उसके नाना प्रकार के हार भी टूटे पड़े हैं

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॥ ३ · ६४ · ४० ॥
तप्तबिन्दुनिकाशैश्च चित्रैः क्षतजबिन्दुभिः। आवृतं पश्य सौमित्रे सर्वतो धरणीतलम्॥

taptabindunikāśaiśca citraiḥ kṣatajabindubhiḥ।
āvṛtaṁ paśya saumitre sarvato dharaṇītalam॥

‘सुमित्राकुमार! देखो, यहाँ की भूमि सब ओर से सुवर्ण की बूँदों के समान ही विचित्र रक्तबिन्दुओं से रँगी दिखायी देती है

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॥ ३ · ६४ · ४१ ॥
मन्ये लक्ष्मण वैदेही राक्षसैः कामरूपिभिः। भित्त्वा भित्त्वा विभक्ता वा भक्षिता वा भविष्यति॥

manye lakṣmaṇa vaidehī rākṣasaiḥ kāmarūpibhiḥ।
bhittvā bhittvā vibhaktā vā bhakṣitā vā bhaviṣyati॥

‘लक्ष्मण! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षसों ने यहाँ सीता के टुकड़े-टुकड़े करके उसे आपस में बाँटा और खाया होगा

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॥ ३ · ६४ · ४२ ॥
तस्या निमित्तं सीताया द्वयोर्विवदमानयोः। बभूव युद्धं सौमित्रे घोरं राक्षसयोरिह॥

tasyā nimittaṁ sītāyā dvayorvivadamānayoḥ।
babhūva yuddhaṁ saumitre ghoraṁ rākṣasayoriha॥

‘सुमित्रानन्दन! सीता के लिये परस्पर विवाद करनेवाले दो राक्षसों में यहाँ घोर युद्ध भी हुआ है

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॥ ३ · ६४ · ४३ ॥
मुक्तामणिचितं चेदं रमणीयं विभूषितम्। धरण्यां पतितं सौम्य कस्य भग्नं महद् धनुः॥

muktāmaṇicitaṁ cedaṁ ramaṇīyaṁ vibhūṣitam।
dharaṇyāṁ patitaṁ saumya kasya bhagnaṁ mahad dhanuḥ॥

‘सौम्य! तभी तो यहाँ यह मोती और मणियों से जटित एवं विभूषित किसी का अत्यन्त सुन्दर और विशाल धनुष खण्डित होकर पृथ्वी पर पड़ा है। यह किसका धनुष हो सकता है?

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॥ ३ · ६४ · ४४ ॥
राक्षसानामिदं वत्स सुराणामथवापि वा। तरुणादित्यसंकाशं वैदूर्यगुलिकाचितम्॥

rākṣasānāmidaṁ vatsa surāṇāmathavāpi vā।
taruṇādityasaṁkāśaṁ vaidūryagulikācitam॥

‘वत्स! पता नहीं, यह राक्षसों का है या देवताओं का; यह प्रातःकाल के सूर्य की भाँति प्रकाशित हो रहा है तथा इसमें वैदूर्यमणि (नीलम) के टुकड़े जड़े हुए हैं

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॥ ३ · ६४ · ४५ ॥
विशीर्णं पतितं भूमौ कवचं कस्य काञ्चनम्। छत्रं शतशलाकं दिव्यमाल्योपशोभितम्॥ भग्नदण्डमिदं सौम्य भूमौ कस्य निपातितम्।

viśīrṇaṁ patitaṁ bhūmau kavacaṁ kasya kāñcanam।
chatraṁ śataśalākaṁ ca divyamālyopaśobhitam॥
bhagnadaṇḍamidaṁ saumya bhūmau kasya nipātitam।

‘सौम्य! उधर पृथ्वी पर टूटा हुआ एक सोने का कवच पड़ा है, न जाने वह किसका है? दिव्य मालाओं से सुशोभित यह सौ कमानियोंवाला छत्र किसका है? इसका डंडा टूट गया है और यह धरती पर गिरा दिया गया है

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॥ ३ · ६४ · ४६ ॥
काञ्चनोरश्छदाश्चेमे पिशाचवदनाः खराः॥ भीमरूपा महाकायाः कस्य वा निहता रणे।

kāñcanoraśchadāśceme piśācavadanāḥ kharāḥ॥
bhīmarūpā mahākāyāḥ kasya vā nihatā raṇe।

‘इधर ये पिशाचों के समान मुखवाले भयंकर रूपधारी गधे मरे पड़े हैं। इनका शरीर बहुत ही विशाल रहा है; इन सबकी छाती में सोने के कवच बँधे हैं। ये युद्ध में मारे गये जान पड़ते हैं। पता नहीं ये किसके थे

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॥ ३ · ६४ · ४७ ॥
दीप्तपावकसंकाशो द्युतिमान् समरध्वजः॥ अपविद्धश्च भग्नश्च कस्य साङ्ग्रामिको रथः।

dīptapāvakasaṁkāśo dyutimān samaradhvajaḥ॥
apaviddhaśca bhagnaśca kasya sāṅgrāmiko rathaḥ।

‘तथा संग्राम में काम देनेवाला यह किसका रथ पड़ा है? इसे किसी ने उलटा गिराकर तोड़ डाला है। समराङ्गण में स्वामी को सूचित करनेवाली ध्वजा भी इसमें लगी थी। यह तेजस्वी रथ प्रज्वलित अग्नि के समान दमक रहा है

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॥ ३ · ६४ · ४८ ॥
रथाक्षमात्रा विशिखास्तपनीयविभूषणाः॥ कस्येमे निहता बाणाः प्रकीर्णा घोरदर्शनाः।

rathākṣamātrā viśikhāstapanīyavibhūṣaṇāḥ॥
kasyeme nihatā bāṇāḥ prakīrṇā ghoradarśanāḥ।

‘ये भयंकर बाण, जो यहाँ टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरे पड़े हैं, किसके हैं? इनकी लंबाई और मोटाई रथ के धुरे के समान प्रतीत होती है। इनके फल-भाग टूट गये हैं तथा ये सुवर्ण से विभूषित हैं

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॥ ३ · ६४ · ४९ ॥
शरावरौ शरैः पूर्णौ विध्वस्तौ पश्य लक्ष्मण॥ प्रतोदाभीषुहस्तोऽयं कस्य वा सारथिर्हतः।

śarāvarau śaraiḥ pūrṇau vidhvastau paśya lakṣmaṇa॥
pratodābhīṣuhasto'yaṁ kasya vā sārathirhataḥ।

‘लक्ष्मण! उधर देखो, ये बाणों से भरे हुए दो तरकस पड़े हैं, जो नष्ट कर दिये गये हैं। यह किसका सारथि मरा पड़ा है, जिसके हाथ में चाबुक और लगाम अभीतक मौजूद हैं

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॥ ३ · ६४ · ५० ॥
पदवी पुरुषस्यैषा व्यक्तं कस्यापि रक्षसः॥

padavī puruṣasyaiṣā vyaktaṁ kasyāpi rakṣasaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ६४ · ५१ ॥
वैरं शतगुणं पश्य मम तैर्जीवितान्तकम्। सुघोरहृदयैः सौम्य राक्षसैः कामरूपिभिः॥

vairaṁ śataguṇaṁ paśya mama tairjīvitāntakam।
sughorahṛdayaiḥ saumya rākṣasaiḥ kāmarūpibhiḥ॥

॥ ५०–५१ ॥

‘सौम्य! यह अवश्य ही किसी राक्षस का पदचिह्न दिखायी देता है। इन अत्यन्त क्रूर हृदयवाले कामरूपी राक्षसों के साथ मेरा वैर सौगुना बढ़ गया है। देखो, यह वैर उनके प्राण लेकर ही शान्त होगा

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॥ ३ · ६४ · ५२ ॥
हता मृता वा वैदेही भक्षिता वा तपस्विनी। धर्मस्त्रायते सीतां ह्रियमाणां महावने॥

hatā mṛtā vā vaidehī bhakṣitā vā tapasvinī।
na dharmastrāyate sītāṁ hriyamāṇāṁ mahāvane॥

‘अवश्य ही तपस्विनी विदेहराजकुमारी हर ली गयी, मृत्यु को प्राप्त हो गयी अथवा राक्षसों ने उसे खा लिया। इस विशाल वन में हरी जाती हुई सीता की रक्षा धर्म भी नहीं कर रहा है

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॥ ३ · ६४ · ५३ ॥
भक्षितायां हि वैदेह्यां हृतायामपि लक्ष्मण। के हि लोके प्रियं कर्तुं शक्ताः सौम्य ममेश्वराः॥

bhakṣitāyāṁ hi vaidehyāṁ hṛtāyāmapi lakṣmaṇa।
ke hi loke priyaṁ kartuṁ śaktāḥ saumya mameśvarāḥ॥

‘सौम्य लक्ष्मण! जब विदेहनन्दिनी राक्षसों का ग्रास बन गयी अथवा उनके द्वारा हर ली गयी और कोई सहायक नहीं हुआ, तब इस जगत् में कौन ऐसे पुरुष हैं, जो मेरा प्रिय करने में समर्थ हों

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॥ ३ · ६४ · ५४ ॥
कर्तारमपि लोकानां शूरं करुणवेदिनम्। अज्ञानादवमन्येरन् सर्वभूतानि लक्ष्मण॥

kartāramapi lokānāṁ śūraṁ karuṇavedinam।
ajñānādavamanyeran sarvabhūtāni lakṣmaṇa॥

‘लक्ष्मण! जो समस्त लोकों की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले ‘त्रिपुर-विजय’ आदि शौर्य से सम्पन्न महेश्वर हैं, वे भी जब अपने करुणामय स्वभाव के कारण चुप बैठे रहते हैं, तब सारे प्राणी उनके ऐश्वर्य को न जानने से उनका तिरस्कार करने लग जाते हैं

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॥ ३ · ६४ · ५५ ॥
मृदुं लोकहिते युक्तं दान्तं करुणवेदिनम्। निर्वीर्य इति मन्यन्ते नूनं मां त्रिदशेश्वराः॥

mṛduṁ lokahite yuktaṁ dāntaṁ karuṇavedinam।
nirvīrya iti manyante nūnaṁ māṁ tridaśeśvarāḥ॥

‘मैं लोकहित में तत्पर, युक्तचित्त, जितेन्द्रिय तथा जीवों पर करुणा करनेवाला हूँ, इसीलिये ये इन्द्र आदि देवेश्वर निश्चय ही मुझे निर्बल मान रहे हैं (तभी तो इन्होंने सीता की रक्षा नहीं की है)

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॥ ३ · ६४ · ५६ ॥
मां प्राप्य हि गुणो दोषः संवृत्तः पश्य लक्ष्मण। अद्यैव सर्वभूतानां रक्षसामभवाय च॥

māṁ prāpya hi guṇo doṣaḥ saṁvṛttaḥ paśya lakṣmaṇa।
adyaiva sarvabhūtānāṁ rakṣasāmabhavāya ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ६४ · ५७ ॥
संहृत्यैव शशिज्योत्स्नां महान् सूर्य इवोदितः। संहृत्यैव गुणान् सर्वान् मम तेजः प्रकाशते॥

saṁhṛtyaiva śaśijyotsnāṁ mahān sūrya ivoditaḥ।
saṁhṛtyaiva guṇān sarvān mama tejaḥ prakāśate॥

॥ ५६–५७ ॥

‘लक्ष्मण! देखो तो सही, यह दयालुता आदि गुण मेरे पास आकर दोष बन गया (तभी तो मुझे निर्बल जानकर मेरी स्त्री का अपहरण किया गया है। अतः अब मुझे पुरुषार्थ ही प्रकट करना होगा)। जैसे प्रलयकाल में उदित हुआ महान् सूर्य चन्द्रमा की ज्योत्स्ना (चाँदनी) का संहार करके प्रचण्ड तेज से प्रकाशित हो उठता है, उसी प्रकार अब मेरा तेज आज ही समस्त प्राणियों तथा राक्षसों का अन्त करने के लिये मेरे उन कोमल स्वभाव आदि गुणों को समेटकर प्रचण्डरूप में प्रकाशित होगा, यह भी तुम देखो

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॥ ३ · ६४ · ५८ ॥
नैव यक्षा गन्धर्वा पिशाचा राक्षसाः। किंनरा वा मनुष्या वा सुखं प्राप्स्यन्ति लक्ष्मण॥

naiva yakṣā na gandharvā na piśācā na rākṣasāḥ।
kiṁnarā vā manuṣyā vā sukhaṁ prāpsyanti lakṣmaṇa॥

‘लक्ष्मण! अब न तो यक्ष, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस, न किन्नर और न मनुष्य ही चैन से रहने पायेंगे

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॥ ३ · ६४ · ५९ ॥
ममास्त्रबाणसम्पूर्णमाकाशं पश्य लक्ष्मण। असम्पातं करिष्यामि ह्यद्य त्रैलोक्यचारिणाम्॥

mamāstrabāṇasampūrṇamākāśaṁ paśya lakṣmaṇa।
asampātaṁ kariṣyāmi hyadya trailokyacāriṇām॥

‘सुमित्रानन्दन! देखना, थोड़ी ही देर में आकाश को मैं अपने चलाये हुए बाणों से भर दूँगा और तीन लोकों में विचरनेवाले प्राणियों को हिलने-डुलने भी न दूँगा

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॥ ३ · ६४ · ६० ॥
संनिरुद्धग्रहगणमावारितनिशाकरम्। विप्रणष्टानलमरुद्भास्करद्युतिसंवृतम्॥

saṁniruddhagrahagaṇamāvāritaniśākaram।
vipraṇaṣṭānalamarudbhāskaradyutisaṁvṛtam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ६४ · ६१ ॥
विनिर्मथितशैलाग्रं शुष्यमाणजलाशयम्। ध्वस्तद्रुमलतागुल्मं विप्रणाशितसागरम्॥ त्रैलोक्यं तु करिष्यामि संयुक्तं कालकर्मणा।

vinirmathitaśailāgraṁ śuṣyamāṇajalāśayam।
dhvastadrumalatāgulmaṁ vipraṇāśitasāgaram॥
trailokyaṁ tu kariṣyāmi saṁyuktaṁ kālakarmaṇā।

॥ ६०–६१ ॥

‘ग्रहों की गति रुक जायगी, चन्द्रमा छिप जायगा, अग्नि, मरुद्गण तथा सूर्य का तेज नष्ट हो जायगा, सब कुछ अन्धकार से आच्छन्न हो जायगा, पर्वतों के शिखर मथ डाले जायँगे, सारे जलाशय (नदी-सरोवर आदि) सूख जायँगे, वृक्ष, लता और गुल्म नष्ट हो जायँगे और समुद्रों का भी नाश कर दिया जायगा। इस तरह मैं सारी त्रिलोकी में ही काल की विनाशलीला आरम्भ कर दूँगा

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॥ ३ · ६४ · ६२ ॥
ते कुशलिनीं सीतां प्रदास्यन्ति ममेश्वराः॥ अस्मिन् मुहूर्ते सौमित्रे मम द्रक्ष्यन्ति विक्रमम्।

na te kuśalinīṁ sītāṁ pradāsyanti mameśvarāḥ॥
asmin muhūrte saumitre mama drakṣyanti vikramam।

‘सुमित्रानन्दन! यदि देवेश्वरगण इसी मुहूर्त में मुझे सीता देवी को सकुशल नहीं लौटा देंगे तो वे मेरा पराक्रम देखेंगे

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॥ ३ · ६४ · ६३ ॥
नाकाशमुत्पतिष्यन्ति सर्वभूतानि लक्ष्मण॥ मम चापगुणोन्मुक्तैर्बाणजालैर्निरन्तरम्।

nākāśamutpatiṣyanti sarvabhūtāni lakṣmaṇa॥
mama cāpaguṇonmuktairbāṇajālairnirantaram।

‘लक्ष्मण! मेरे धनुष की प्रत्यञ्चा से छूटे हुए बाणसमूहोंद्वारा आकाश के ठसाठस भर जाने के कारण उसमें कोई प्राणी उड़ नहीं सकेंगे

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॥ ३ · ६४ · ६४ ॥
मर्दितं मम नाराचैर्ध्वस्तभ्रान्तमृगद्विजम्॥ समाकुलममर्यादं जगत् पश्याद्य लक्ष्मण।

marditaṁ mama nārācairdhvastabhrāntamṛgadvijam॥
samākulamamaryādaṁ jagat paśyādya lakṣmaṇa।

‘सुमित्रानन्दन! देखो, आज मेरे नाराचों से रौंदा जाकर यह सारा जगत् व्याकुल और मर्यादारहित हो जायगा। यहाँ के मृग और पक्षी आदि प्राणी नष्ट एवं उद्भ्रान्त हो जायेंगे

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॥ ३ · ६४ · ६५ ॥
आकर्णपूर्णैरिषुभिर्जीवलोकदुरावरैः॥ करिष्ये मैथिलीहेतोरपिशाचमराक्षसम्।

ākarṇapūrṇairiṣubhirjīvalokadurāvaraiḥ॥
kariṣye maithilīhetorapiśācamarākṣasam।

‘धनुष को कानतक खींचकर छोड़े गये मेरे बाणों को रोकना जीवजगत् के लिये बहुत कठिन होगा। मैं सीता के लिये उन बाणोंद्वारा इस जगत् के समस्त पिशाचों और राक्षसों का संहार कर डालूँगा

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॥ ३ · ६४ · ६६ ॥
मम रोषप्रयुक्तानां विशिखानां बलं सुराः॥ द्रक्ष्यन्त्यद्य विमुक्तानाममर्षाद् दूरगामिनाम्।

mama roṣaprayuktānāṁ viśikhānāṁ balaṁ surāḥ॥
drakṣyantyadya vimuktānāmamarṣād dūragāminām।

‘रोष और अमर्षपूर्वक छोड़े गये मेरे फलरहित दूरगामी बाणों का बल आज देवतालोग देखेंगे

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॥ ३ · ६४ · ६७ ॥
नैव देवा दैतेया पिशाचा राक्षसाः॥ भविष्यन्ति मम क्रोधात् त्रैलोक्ये विप्रणाशिते।

naiva devā na daiteyā na piśācā na rākṣasāḥ॥
bhaviṣyanti mama krodhāt trailokye vipraṇāśite।

‘मेरे क्रोध से त्रिलोकी का विनाश हो जाने पर न देवता रह जायेंगे न दैत्य, न पिशाच रहने पायेंगे न राक्षस

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॥ ३ · ६४ · ६८ ॥
देवदानवयक्षाणां लोका ये रक्षसामपि॥ बहुधा निपतिष्यन्ति बाणौघैः शकलीकृताः।

devadānavayakṣāṇāṁ lokā ye rakṣasāmapi॥
bahudhā nipatiṣyanti bāṇaughaiḥ śakalīkṛtāḥ।

‘देवताओं, दानवों, यक्षों और राक्षसों के जो लोक हैं, वे मेरे बाणसमूहों से टुकड़े-टुकड़े होकर बारंबार नीचे गिरेंगे

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॥ ३ · ६४ · ६९ ॥
निर्मर्यादानिमाँल्लोकान् करिष्याम्यद्य सायकैः॥ हतां मृतां वा सौमित्रे दास्यन्ति ममेश्वराः।

nirmaryādānimām̐llokān kariṣyāmyadya sāyakaiḥ॥
hatāṁ mṛtāṁ vā saumitre na dāsyanti mameśvarāḥ।

‘सुमित्रानन्दन! यदि देवेश्वरगण मेरी हरी या मरी हुई सीता को लाकर मुझे नहीं देंगे तो आज मैं अपने सायकों की मार से इन तीनों लोकों को मर्यादा से भ्रष्ट कर दूँगा

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॥ ३ · ६४ · ७० ॥
तथारूपां हि वैदेहीं दास्यन्ति यदि प्रियाम्॥

tathārūpāṁ hi vaidehīṁ na dāsyanti yadi priyām॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ६४ · ७१ ॥
नाशयामि जगत् सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्। यावद् दर्शनमस्या वै तापयामि सायकैः॥

nāśayāmi jagat sarvaṁ trailokyaṁ sacarācaram।
yāvad darśanamasyā vai tāpayāmi ca sāyakaiḥ॥

॥ ७०–७१ ॥

‘यदि वे मेरी प्रिया विदेहराजकुमारी को मुझे उसी रूप में वापस नहीं लौटायेंगे तो मैं चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी का नाश कर डालूँगा। जबतक सीता का दर्शन न होगा, तबतक मैं अपने सायकों से समस्त संसार को संतप्त करता रहूँगा’

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॥ ३ · ६४ · ७२ ॥
इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षः स्फुरमाणोष्ठसम्पुटः। वल्कलाजिनमाबद्ध्य जटाभारमबन्धयत्॥

ityuktvā krodhatāmrākṣaḥ sphuramāṇoṣṭhasampuṭaḥ।
valkalājinamābaddhya jaṭābhāramabandhayat॥

ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी के नेत्र क्रोध से लाल हो गये, होठ फड़कने लगे। उन्होंने वल्कल और मृगचर्म को अच्छी तरह कसकर अपने जटाभार को भी बाँध लिया

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॥ ३ · ६४ · ७३ ॥
तस्य क्रुद्धस्य रामस्य तथाभूतस्य धीमतः। त्रिपुरं जघ्नुषः पूर्वं रुद्रस्येव बभौ तनुः॥

tasya kruddhasya rāmasya tathābhūtasya dhīmataḥ।
tripuraṁ jaghnuṣaḥ pūrvaṁ rudrasyeva babhau tanuḥ॥

उस समय क्रोध में भरकर उस तरह संहार के लिये उद्यत हुए भगवान् श्रीराम का शरीर पूर्वकाल में त्रिपुर का संहार करनेवाले रुद्र के समान प्रतीत होता था

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॥ ३ · ६४ · ७४ ॥
लक्ष्मणादथ चादाय रामो निष्पीड्य कार्मुकम्। शरमादाय संदीप्तं घोरमाशीविषोपमम्॥

lakṣmaṇādatha cādāya rāmo niṣpīḍya kārmukam।
śaramādāya saṁdīptaṁ ghoramāśīviṣopamam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ६४ · ७५ ॥
संदधे धनुषि श्रीमान् रामः परपुरञ्जयः। युगान्ताग्निरिव क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत्॥

saṁdadhe dhanuṣi śrīmān rāmaḥ parapurañjayaḥ।
yugāntāgniriva kruddha idaṁ vacanamabravīt॥

॥ ७४–७५ ॥

उस समय लक्ष्मण के हाथ से धनुष लेकर श्रीरामचन्द्रजी ने उसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और एक विषधर सर्प के समान भयंकर और प्रज्वलित बाण लेकर उसे उस धनुष पर रखा। तत्पश्चात् शत्रुनगरी पर विजय पानेवाले श्रीराम प्रलयाग्नि के समान कुपित हो इस प्रकार बोले—

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॥ ३ · ६४ · ७६ ॥
यथा जरा यथा मृत्युर्यथा कालो यथा विधिः। नित्यं प्रतिहन्यन्ते सर्वभूतेषु लक्ष्मण। तथाहं क्रोधसंयुक्तो निवार्योऽस्म्यसंशयम्॥

yathā jarā yathā mṛtyuryathā kālo yathā vidhiḥ।
nityaṁ na pratihanyante sarvabhūteṣu lakṣmaṇa।
tathāhaṁ krodhasaṁyukto na nivāryo'smyasaṁśayam॥

‘लक्ष्मण! जैसे बुढ़ापा, जैसे मृत्यु, जैसे काल और जैसे विधाता सदा समस्त प्राणियों पर प्रहार करते हैं, किंतु उन्हें कोई रोक नहीं पाता है, उसी प्रकार निस्संदेह क्रोध में भर जाने पर मेरा भी कोई निवारण नहीं कर सकता

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॥ ३ · ६४ · ७७ ॥
पुरेव मे चारुदतीमनिन्दितां दिशन्ति सीतां यदि नाद्य मैथिलीम्। सदेवगन्धर्वमनुष्यपन्नगं जगत् सशैलं परिवर्तयाम्यहम्॥

pureva me cārudatīmaninditāṁ
diśanti sītāṁ yadi nādya maithilīm।
sadevagandharvamanuṣyapannagaṁ
jagat saśailaṁ parivartayāmyaham॥

‘यदि देवता आदि आज पहले की ही भाँति मनोहर दाँतोंवाली अनिन्द्यसुन्दरी मिथिलेशकुमारी सीता को मुझे लौटा नहीं देंगे तो मैं देवता, गन्धर्व, मनुष्य, नाग और पर्वतोंसहित सारे संसार को उलट दूँगा’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुःषष्टितमः सर्गः ॥ ६४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६४ ॥