श्रीरामका विलाप
॥ ३ · ६३ · १६–१७ ॥
गोदावरीतीरे नीलवर्णो जटाधारी वल्कलधरो रामः सीताविरहविधुरः सूर्यं प्रति मुखं बाहू च उन्नमय्य सूर्यमरुतौ प्रियायाः वार्तां पृच्छति; समीपे स्थिरो लक्ष्मणो भ्रातुर्बाहौ हस्तं निधाय धैर्यम् उपदिशति।
गोदावरी के तट पर नीले वर्ण के जटाधारी वल्कलधारी श्रीराम सीता के विरह से व्याकुल हो अपना मुख और दोनों भुजाएँ सूर्य की ओर उठाकर सूर्यदेव और वायुदेव से अपनी प्रिया का समाचार पूछ रहे हैं; पास ही धीर लक्ष्मण अपने भाई की बाँह पर हाथ रखकर उन्हें धैर्य धारण करने का संकेत कर रहे हैं।
On the bank of the Godavari the blue-hued, matted-haired Ram, broken by Sita's loss, lifts his face and both arms toward the blazing sun, imploring the Sun-god and the Wind for news of his beloved; steady beside him, Lakshman lays a firm hand on his brother's arm and urges him to take heart.
sa rājaputraḥ priyayā vihīnaḥ
śokena mohena ca pīḍyamānaḥ।
viṣādayan bhrātaramārtarūpo
bhūyo viṣādaṁ praviveśa tīvram॥
अपनी प्रिया सीता से रहित हो राजकुमार श्रीराम शोक और मोह से पीड़ित होने लगे। वे स्वयं तो पीड़ित थे ही, अपने भाई लक्ष्मण को भी विषाद में डालते हुए पुनः तीव्र शोक में मग्न हो गये
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sa lakṣmaṇaṁ śokavaśābhipannaṁ
śoke nimagno vipule tu rāmaḥ।
uvāca vākyaṁ vyasanānurūpa-
muṣṇaṁ viniḥśvasya rudan saśokam॥
लक्ष्मण शोक के अधीन हो रहे थे, उनसे महान् शोक में डूबे हुए श्रीराम दुःख के साथ रोते हुए गरम उच्छ्वास लेकर अपने ऊपर पड़े हुए संकट के अनुरूप वचन बोले—
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na madvidho duṣkṛtakarmakārī
manye dvitīyo'sti vasuṁdharāyām।
śokānuśoko hi paramparāyā
māmeti bhindan hṛdayaṁ manaśca॥
‘सुमित्रानन्दन! मालूम होता है, मेरे-जैसा पापकर्म करनेवाला मनुष्य इस पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि एक के बाद दूसरा शोक मेरे हृदय (प्राण) और मन को विदीर्ण करता हुआ लगातार मुझपर आता जा रहा है
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pūrvaṁ mayā nūnamabhīpsitāni
pāpāni karmāṇyasakṛtkṛtāni।
tatrāyamadyāpatito vipāko
duḥkhena duḥkhaṁ yadahaṁ viśāmi॥
‘निश्चय ही पूर्वजन्म में मैंने अपनी इच्छा के अनुसार बारंबार बहुत-से पापकर्म किये हैं; उन्हींमें से कुछ कर्मों का यह परिणाम आज प्राप्त हुआ है, जिससे मैं एक दुःख से दूसरे दुःख में पड़ता जा रहा हूँ
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rājyapraṇāśaḥ svajanairviyogaḥ
piturvināśo jananīviyogaḥ।
sarvāṇi me lakṣmaṇa śokavega-
māpūrayanti pravicintitāni॥
‘पहले तो मैं राज्य से वञ्चित हुआ; फिर मेरा स्वजनों से वियोग हुआ। तत्पश्चात् पिताजी का परलोकवास हुआ, फिर माता से भी मुझे बिछुड़ जाना पड़ा। लक्ष्मण! ये सारी बातें जब मुझे याद आती हैं, तब मेरे शोक के वेग को बढ़ा देती हैं
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sarvaṁ tu duḥkhaṁ mama lakṣmaṇedaṁ
śāntaṁ śarīre vanametya kleśam।
sītāviyogāt punarapyudīrṇaṁ
kāṣṭhairivāgniḥ sahasopadīptaḥ॥
‘लक्ष्मण! वन में आकर क्लेश का अनुभव करके भी यह सारा दुःख सीता के समीप रहने से मेरे शरीर में ही शान्त हो गया था, परंतु सीता के वियोग से वह फिर उद्दीप्त हो उठा है, जैसे सूखे काठ का संयोग पाकर आग सहसा प्रज्वलित हो उठती है
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sā nūnamāryā mama rākṣasena
hyabhyāhṛtā khaṁ samupetya bhīruḥ।
apasvaraṁ susvaravipralāpā
bhayena vikranditavatyabhīkṣṇam॥
‘हाय! मेरी श्रेष्ठ स्वभाववाली भीरु पत्नी को अवश्य ही राक्षस ने आकाशमार्ग से हर लिया। उस समय सुमधुर स्वर में विलाप करनेवाली सीता भय के मारे बारंबार विकृत स्वर में क्रन्दन करने लगी होगी
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tau lohitasya priyadarśanasya
sadocitāvuttamacandanasya।
vṛttau stanau śoṇitapaṅkadigdhau
nūnaṁ priyāyā mama nābhipātaḥ॥
‘मेरी प्रिया के वे दोनों गोल-गोल स्तन, जो सदा लाल चन्दन से चर्चित होनेयोग्य थे, निश्चय ही रक्त की कीच में सन गये होंगे। हाय! इतने पर भी मेरे शरीर का पतन नहीं होता
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tacchlakṣṇasuvyaktamṛdupralāpaṁ
tasyā mukhaṁ kuñcitakeśabhāram।
rakṣovaśaṁ nūnamupāgatāyā
na bhrājate rāhumukhe yathenduḥ॥
‘राक्षस के वश में पड़ी हुई मेरी प्रिया का वह मुख जो स्निग्ध एवं सुस्पष्ट मधुर वार्तालाप करनेवाला तथा काले-काले घुँघराले केशों के भार से सुशोभित था, वैसे ही श्रीहीन हो गया होगा, जैसे राहु के मुख में पड़ा हुआ चन्द्रमा शोभा नहीं पाता है
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tāṁ hārapāśasya sadocitāntāṁ
grīvāṁ priyāyā mama suvratāyāḥ।
rakṣāṁsi nūnaṁ paripītavanti
śūnye hi bhittvā rudhirāśanāni॥
‘हाय! उत्तम व्रत का पालन करनेवाली मेरी प्रियतमा का कण्ठ हर समय हार से सुशोभित होनेयोग्य था, किंतु रक्तभोजी राक्षसों ने सूने वन में अवश्य उसे फाड़कर उसका रक्त पिया होगा
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mayā vihīnā vijane vane sā
rakṣobhirāhatya vikṛṣyamāṇā।
nūnaṁ vinādaṁ kurarīva dīnā
sā muktavatyāyatakāntanetrā॥
‘मेरे न रहने के कारण निर्जन वन में राक्षसों ने उसे ले-लेकर घसीटा होगा और विशाल एवं मनोहर नेत्रोंवाली वह जानकी अत्यन्त दीनभाव से कुररी की भाँति विलाप करती रही होगी
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asmin mayā sārdhamudāraśīlā
śilātale pūrvamupopaviṣṭā।
kāntasmitā lakṣmaṇa jātahāsā
tvāmāha sītā bahuvākyajātam॥
‘लक्ष्मण! यह वही शिलातल है, जिसपर उदार स्वभाववाली सीता पहले एक दिन मेरे साथ बैठी हुई थी। उसकी मुसकान कितनी मनोहर थी, उस समय उसने हँस-हँसकर तुमसे भी बहुत-सी बातें कही थीं
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godāvarīyaṁ saritāṁ variṣṭhā
priyā priyāyā mama nityakālam।
apyatra gacchediti cintayāmi
naikākinī yāti hi sā kadācit॥
‘सरिताओं में श्रेष्ठ यह गोदावरी मेरी प्रियतमा को सदा ही प्रिय रही है। सोचता हूँ, शायद वह इसीके तट पर गयी हो, किंतु अकेली तो वह कभी वहाँ नहीं जाती थी
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padmānanā padmapalāśanetrā
padmāni vānetumabhiprayātā।
tadapyayuktaṁ nahi sā kadāci-
nmayā vinā gacchati paṅkajāni॥
‘उसका मुख और विशाल नेत्र प्रफुल्ल कमलों के समान सुन्दर हैं, सम्भव है, वह कमलपुष्प लाने के लिये ही गोदावरीतट पर गयी हो, परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि वह मुझे साथ लिये बिना कभी कमलों के पास नहीं जाती थी
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kāmaṁ tvidaṁ puṣpitavṛkṣaṣaṇḍaṁ
nānāvidhaiḥ pakṣigaṇairupetam।
vanaṁ prayātā nu tadapyayukta-
mekākinī sātibibheti bhīruḥ॥
‘हो सकता है कि वह इन पुष्पित वृक्षसमूहों से युक्त और नाना प्रकार के पक्षियों से सेवित वन में भ्रमण के लिये गयी हो; परंतु यह भी ठीक नहीं लगता; क्योंकि वह भीरु तो अकेली वन में जाने से बहुत डरती थी
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āditya bho lokakṛtākṛtajña
lokasya satyānṛtakarmasākṣin।
mama priyā sā kva gatā hṛtā vā
śaṁsasva me śokahatasya sarvam॥
‘सूर्यदेव! संसार में किसने क्या किया और क्या नहीं किया—इसे तुम जानते हो; लोगों के सत्य-असत्य (पुण्य और पाप) कर्मों के तुम्हीं साक्षी हो। मेरी प्रिया सीता कहाँ गयी अथवा उसे किसने हर लिया, यह सब मुझे बताओ; क्योंकि मैं उसके शोक से पीड़ित हूँ
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lokeṣu sarveṣu na nāsti kiṁcid
yat te na nityaṁ viditaṁ bhavet tat।
śaṁsasva vāyo kulapālinīṁ tāṁ
mṛtā hṛtā vā pathi vartate vā॥
‘वायुदेव! समस्त विश्व में ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें सदा ज्ञात न रहती हो। मेरी कुलपालिका सीता कहाँ है, यह बता दो। वह मर गयी, हर ली गयी अथवा मार्ग में ही है’
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itīva taṁ śokavidheyadehaṁ
rāmaṁ visaṁjñaṁ vilapantameva।
uvāca saumitriradīnasattvo
nyāyye sthitaḥ kālayutaṁ ca vākyam॥
इस प्रकार शोक के अधीन होकर जब श्रीरामचन्द्रजी संज्ञाशून्य हो विलाप करने लगे, तब उनकी ऐसी अवस्था देख न्यायोचित मार्ग पर स्थित रहनेवाले उदारचित्त सुमित्राकुमार लक्ष्मण ने उनसे यह समयोचित बात कही—
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śokaṁ visṛjyādya dhṛtiṁ bhajasva
sotsāhatā cāstu vimārgaṇe'syāḥ।
utsāhavanto hi narā na loke
sīdanti karmasvatiduṣkareṣu॥
‘आर्य! आप शोक छोड़कर धैर्य धारण करें; सीता की खोज के लिये मन में उत्साह रखें; क्योंकि उत्साही मनुष्य जगत् में अत्यन्त दुष्कर कार्य आ पड़ने पर भी कभी दुःखी नहीं होते हैं’
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itīva saumitrimudagrapauruṣaṁ
bruvantamārto raghuvaṁśavardhanaḥ।
na cintayāmāsa dhṛtiṁ vimuktavān
punaśca duḥkhaṁ mahadabhyupāgamat॥
बढ़े हुए पुरुषार्थवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मण जब इस प्रकार की बातें कह रहे थे, उस समय रघुकुल की वृद्धि करनेवाले श्रीराम ने आर्त होकर उनके कथन के औचित्य पर कोई ध्यान नहीं दिया; उन्होंने धैर्य छोड़ दिया और वे पुनः महान् दुःख में पड़ गये
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रिषष्टितमः सर्गः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६३ ॥