वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ५८ · २० श्लोकाःSarga 58 · 20 ślokas

मार्गमें अनेक प्रकारकी आशङ्का करते हुए लक्ष्मणसहित श्रीरामका आश्रममें आना और वहाँ सीताको न पाकर व्यथित होना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ५८ — painting

॥ ३ · ५८ · १९–२० ॥

जनस्थाने नीलवर्णो रामो जटाधरः कृष्णाजिनवल्कलधरः करे धनुर्धारयन् शुष्कमुखो दीर्घनिःश्वसन् पर्णशालाद्वारमुपेत्य हृदि पाणिं निधाय शून्यां कुटीं विलोक्य शोकभयाभ्यां विह्वलस्तिष्ठति; द्वारे रिक्तमासनं पतितः कलशश्च दृश्यते, सीता तु न क्वापि; पृष्ठतो नतशिरा दीनो लक्ष्मणस्तिष्ठति।

जनस्थान में नील वर्णवाले, जटाधारी, कृष्णमृगचर्म और वल्कल पहने, हाथ में धनुष लिये श्रीराम सूखे मुख से लंबी साँसें भरते हुए पर्णशाला के द्वार पर आकर, हृदय पर हाथ रखकर सूनी कुटिया देखकर शोक और भय से विह्वल हो ठहर जाते हैं; द्वार पर खाली आसन और गिरा हुआ कलश दिखायी देता है, पर सीता कहीं नहीं; पीछे सिर झुकाये दीन लक्ष्मण खड़े हैं।

At Janasthana the blue-hued Ram — matted hair coiled high, in bark-cloth and deer-skin, his great bow in hand — halts dry-mouthed and deep-sighing at the door of the leaf-hut; a hand pressed to his chest, he is struck with grief and dread at the sight of the empty hermitage, where an empty seat and a fallen water-pot lie by the doorway but no Sita anywhere, while behind him the dejected Lakshman stands with bowed head.

॥ ३ · ५८ · १ ॥
दृष्ट्वा लक्ष्मणं दीनं शून्यं दशरथात्मजः। पर्यपृच्छत धर्मात्मा वैदेहीमागतं विना॥

sa dṛṣṭvā lakṣmaṇaṁ dīnaṁ śūnyaṁ daśarathātmajaḥ।
paryapṛcchata dharmātmā vaidehīmāgataṁ vinā॥

लक्ष्मण को दीन, संतोषशून्य तथा सीता को साथ लिये बिना आया देख धर्मात्मा दशरथनन्दन श्रीराम ने पूछा—

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · २ ॥
प्रस्थितं दण्डकारण्यं या मामनुजगाम ह। क्व सा लक्ष्मण वैदेही यां हित्वा त्वमिहागतः॥

prasthitaṁ daṇḍakāraṇyaṁ yā māmanujagāma ha।
kva sā lakṣmaṇa vaidehī yāṁ hitvā tvamihāgataḥ॥

‘लक्ष्मण! जो दण्डकारण्य की ओर प्रस्थित होने पर अयोध्या से मेरे पीछे-पीछे चली आयी तथा जिसे तुम अकेली छोड़कर यहाँ आ गये, वह विदेहराजकुमारी सीता इस समय कहाँ है?

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · ३ ॥
राज्यभ्रष्टस्य दीनस्य दण्डकान् परिधावतः। क्व सा दुःखसहाया मे वैदेही तनुमध्यमा॥

rājyabhraṣṭasya dīnasya daṇḍakān paridhāvataḥ।
kva sā duḥkhasahāyā me vaidehī tanumadhyamā॥

‘मैं राज्य से भ्रष्ट और दीन होकर दण्डकारण्य में चक्कर लगा रहा हूँ। इस दुःख में जो मेरी सहायिका हुई, वह तनुमध्यमा (सूक्ष्मकटिप्रदेशवाली) विदेहराजकुमारी कहाँ है?

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · ४ ॥
यां विना नोत्सहे वीर मुहूर्तमपि जीवितुम्। क्व सा प्राणसहाया मे सीता सुरसुतोपमा॥

yāṁ vinā notsahe vīra muhūrtamapi jīvitum।
kva sā prāṇasahāyā me sītā surasutopamā॥

‘वीर! जिसके बिना मैं दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता तथा जो मेरे प्राणों की सहचरी है, वह देवकन्या के समान सुन्दरी सीता इस समय कहाँ है?

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · ५ ॥
पतित्वममराणां हि पृथिव्याश्चापि लक्ष्मण। विना तां तपनीयाभां नेच्छेयं जनकात्मजाम्॥

patitvamamarāṇāṁ hi pṛthivyāścāpi lakṣmaṇa।
vinā tāṁ tapanīyābhāṁ neccheyaṁ janakātmajām॥

‘लक्ष्मण! तपाये हुए सोने के समान कान्तिवाली जनकनन्दिनी सीता के बिना मैं पृथ्वी का राज्य और देवताओं का आधिपत्य भी नहीं चाहता

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · ६ ॥
कच्चिज्जीवति वैदेही प्राणैः प्रियतरा मम। कच्चित् प्रव्राजनं वीर मे मिथ्या भविष्यति॥

kaccijjīvati vaidehī prāṇaiḥ priyatarā mama।
kaccit pravrājanaṁ vīra na me mithyā bhaviṣyati॥

‘वीर! जो मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय है, वह विदेहराजकुमारी सीता क्या अब जीवित होगी? मेरा वन में आना सीता को खो देने के कारण व्यर्थ तो नहीं हो जायगा?

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · ७ ॥
सीतानिमित्तं सौमित्रे मृते मयि गते त्वयि। कच्चित् सकामा कैकेयी सुखिता सा भविष्यति॥

sītānimittaṁ saumitre mṛte mayi gate tvayi।
kaccit sakāmā kaikeyī sukhitā sā bhaviṣyati॥

‘सुमित्रानन्दन! सीता के नष्ट हो जाने के कारण जब मैं मर जाऊँगा और तुम अकेले ही अयोध्या को लौटोगे, उस समय क्या माता कैकेयी सफलमनोरथ एवं सुखी होगी?

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · ८ ॥
सपुत्रराज्यां सिद्धार्था मृतपुत्रा तपस्विनी। उपस्थास्यति कौसल्या कच्चित् सौम्येन कैकयीम्॥

saputrarājyāṁ siddhārthā mṛtaputrā tapasvinī।
upasthāsyati kausalyā kaccit saumyena kaikayīm॥

‘जिसका इकलौता पुत्र मैं मर जाऊँगा, वह तपस्विनी माता कौसल्या क्या पुत्र और राज्य से सम्पन्न तथा कृतकृत्य हुई कैकेयी की सेवा में विनीतभाव से उपस्थित होगी?

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · ९ ॥
यदि जीवति वैदेही गमिष्याम्याश्रमं पुनः। संवृत्ता यदि वृत्ता सा प्राणांस्त्यक्ष्यामि लक्ष्मण॥

yadi jīvati vaidehī gamiṣyāmyāśramaṁ punaḥ।
saṁvṛttā yadi vṛttā sā prāṇāṁstyakṣyāmi lakṣmaṇa॥

‘लक्ष्मण! यदि विदेहनन्दिनी सीता जीवित होगी, तभी मैं फिर आश्रम में पैर रखूँगा। यदि सदाचार-परायणा मैथिली मर गयी होगी तो मैं भी प्राणों का परित्याग कर दूँगा

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · १० ॥
यदि मामाश्रमगतं वैदेही नाभिभाषते। पुरः प्रहसिता सीता विनशिष्यामि लक्ष्मण॥

yadi māmāśramagataṁ vaidehī nābhibhāṣate।
puraḥ prahasitā sītā vinaśiṣyāmi lakṣmaṇa॥

‘लक्ष्मण! यदि आश्रम में जाने पर विदेहराजकुमारी सीता हँसते हुए मुख से सामने आकर मुझसे बात नहीं करेगी तो मैं जीवित नहीं रहूँगा

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · ११ ॥
ब्रूहि लक्ष्मण वैदेही यदि जीवति वा वा। त्वयि प्रमत्ते रक्षोभिर्भक्षिता वा तपस्विनी॥

brūhi lakṣmaṇa vaidehī yadi jīvati vā na vā।
tvayi pramatte rakṣobhirbhakṣitā vā tapasvinī॥

‘लक्ष्मण! बोलो तो सही! वैदेही जीवित है या नहीं? तुम्हारे असावधान होने के कारण राक्षस उस तपस्विनी को खा तो नहीं गये?

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · १२ ॥
सुकुमारी बाला नित्यं चादुःखभागिनी। मद्वियोगेन वैदेही व्यक्तं शोचति दुर्मनाः॥

sukumārī ca bālā ca nityaṁ cāduḥkhabhāginī।
madviyogena vaidehī vyaktaṁ śocati durmanāḥ॥

‘जो सुकुमारी है, बाला (भोली-भाली) है तथा जिसने वनवास के पहले दुःख का अनुभव नहीं किया था, वह वैदेही आज मेरे वियोग से व्यथित-चित्त होकर अवश्य ही शोक कर रही होगी

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · १३ ॥
सर्वथा रक्षसा तेन जिह्मेन सुदुरात्मना। वदता लक्ष्मणेत्युच्चैस्तवापि जनितं भयम्॥

sarvathā rakṣasā tena jihmena sudurātmanā।
vadatā lakṣmaṇetyuccaistavāpi janitaṁ bhayam॥

‘उस कुटिल एवं दुरात्मा राक्षस ने उच्च स्वर से ‘हा लक्ष्मण!’ ऐसा पुकारकर तुम्हारे मन में भी सर्वथा भय उत्पन्न कर दिया

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · १४ ॥
श्रुतश्च मन्ये वैदेह्या स्वरः सदृशो मम। त्रस्तया प्रेषितस्त्वं द्रष्टुं मां शीघ्रमागतः॥

śrutaśca manye vaidehyā sa svaraḥ sadṛśo mama।
trastayā preṣitastvaṁ ca draṣṭuṁ māṁ śīghramāgataḥ॥

‘जान पड़ता है, वैदेही ने भी मेरे स्वर से मिलता-जुलता उस राक्षस का स्वर सुन लिया और भयभीत होकर तुम्हें भेज दिया और तुम भी शीघ्र ही मुझे देखने के लिये चले आये

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · १५ ॥
सर्वथा तु कृतं कष्टं सीतामुत्सृजता वने। प्रतिकर्तुं नृशंसानां रक्षसां दत्तमन्तरम्॥

sarvathā tu kṛtaṁ kaṣṭaṁ sītāmutsṛjatā vane।
pratikartuṁ nṛśaṁsānāṁ rakṣasāṁ dattamantaram॥

‘जो भी हो—तुमने वन में सीता को अकेली छोड़कर सर्वथा दुःखद कार्य कर डाला। क्रूर कर्म करनेवाले राक्षसों को बदला लेने का अवसर दे दिया

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · १६ ॥
दुःखिताः खरघातेन राक्षसाः पिशिताशनाः। तैः सीता निहता घोरैर्भविष्यति संशयः॥

duḥkhitāḥ kharaghātena rākṣasāḥ piśitāśanāḥ।
taiḥ sītā nihatā ghorairbhaviṣyati na saṁśayaḥ॥

‘मांसभक्षी निशाचर मेरे हाथों खर के मारे जाने से बहुत दुःखी थे। उन घोर राक्षसों ने सीता को मार डाला होगा, इसमें संशय नहीं है

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · १७ ॥
अहोऽस्मि व्यसने मग्नः सर्वथा रिपुनाशन। किं त्विदानीं करिष्यामि शङ्के प्राप्तव्यमीदृशम्॥

aho'smi vyasane magnaḥ sarvathā ripunāśana।
kiṁ tvidānīṁ kariṣyāmi śaṅke prāptavyamīdṛśam॥

‘शत्रुनाशन! मैं सर्वथा संकट के समुद्र में डूब गया हूँ। ऐसे दुःख का अवश्य ही अनुभव करना पड़ेगा—ऐसी शङ्का हो रही है। अतः अब मैं क्या करूँ?’

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · १८ ॥
इति सीतां वरारोहां चिन्तयन्नेव राघवः। आजगाम जनस्थानं त्वरया सहलक्ष्मणः॥

iti sītāṁ varārohāṁ cintayanneva rāghavaḥ।
ājagāma janasthānaṁ tvarayā sahalakṣmaṇaḥ॥

इस प्रकार सुन्दरी सीता के विषय में चिन्ता करते हुए ही लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजी तुरंत जनस्थान में आये

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · १९ ॥
विगर्हमाणोऽनुजमार्तरूपं क्षुधाश्रमेणैव पिपासया च। विनिःश्वसन् शुष्कमुखो विषण्णः प्रतिश्रयं प्राप्य समीक्ष्य शून्यम्॥

vigarhamāṇo'nujamārtarūpaṁ
kṣudhāśrameṇaiva pipāsayā ca।
viniḥśvasan śuṣkamukho viṣaṇṇaḥ
pratiśrayaṁ prāpya samīkṣya śūnyam॥

अपने दुःखी अनुज लक्ष्मण को कोसते एवं भूख-प्यास तथा परिश्रम से लंबी साँस खींचते हुए सूखे मुँहवाले श्रीरामचन्द्रजी आश्रम के निकटवर्ती स्थान पर आकर उसे सूना देख विषाद में डूब गये

English translation coming soon.

॥ ३ · ५८ · २० ॥
स्वमाश्रमं प्रविगाह्य वीरो विहारदेशाननुसृत्य कांश्चित्। एतत्तदित्येव निवासभूमौ प्रहृष्टरोमा व्यथितो बभूव॥

svamāśramaṁ sa pravigāhya vīro
vihāradeśānanusṛtya kāṁścit।
etattadityeva nivāsabhūmau
prahṛṣṭaromā vyathito babhūva॥

वीर श्रीराम ने आश्रम में प्रवेश करके उसे भी सूना देख कुछ ऐसे स्थलों में अनुसंधान किया, जो सीता के विहारस्थान थे। उन्हें भी सूना पाकर उस क्रीड़ाभूमि में यही वह स्थान है, जहाँ मैंने अमुक प्रकार की क्रीड़ा की थी, ऐसा स्मरण करके उनके शरीर में रोमाञ्च हो आया और वे व्यथा से पीड़ित हो गये

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टपञ्चाशः सर्गः ॥ ५८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५८ ॥