वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ५७ · २३ श्लोकाःSarga 57 · 23 ślokas

श्रीरामका लौटना, मार्गमें अपशकुन देखकर चिन्तित होना तथा लक्ष्मणसे मिलनेपर उन्हें उलाहना दे सीतापर सङ्कट आनेकी आशङ्का करना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ५७ — painting

॥ ३ · ५७ · १६–१७ ॥

दण्डकारण्यपथे नीलवर्णो रामो जटाधरो वल्कलचीरधरः करे धनुर्धारयन् सीतारहितमागतं वल्कलधरं म्लानकान्तिं नतशिरसं लक्ष्मणं मिलित्वा तस्य वामहस्तं गृहीत्वा आर्तमुखः प्रत्युपालभते; परितो वनं शिवाध्वनिना अपशकुनैश्च व्याप्तं, दिगन्ते च गगनं ज्वालारुणम्।

दण्डकारण्य के मार्ग पर नील वर्णवाले, जटाधारी, वल्कल पहने, हाथ में महान् धनुष लिये श्रीराम बिना सीता के आते हुए, फीकी कान्तिवाले, सिर झुकाये वल्कलधारी लक्ष्मण से मिलकर उनका बायाँ हाथ पकड़ लेते हैं और आर्त मुख से उन्हें उपालम्भ देते हैं; चारों ओर वन गीदड़ के स्वर और अपशकुनों से भरा है, और क्षितिज पर आकाश ज्वाला-सा लाल हो रहा है।

On the Dandaka forest path the blue-hued Ram — matted-haired, in bark-cloth, his great bow in hand — meets the bark-clad Lakshman coming without Sita, his radiance dimmed and his head bowed; Ram grasps his brother's left hand and, with an anguished face, reproaches him, while all around the wood is thick with a jackal's cry and ill omens and the far sky glows fiery orange.

॥ ३ · ५७ · १ ॥
राक्षसं मृगरूपेण चरन्तं कामरूपिणम्। निहत्य रामो मारीचं तूर्णं पथि न्यवर्तत॥

rākṣasaṁ mṛgarūpeṇa carantaṁ kāmarūpiṇam।
nihatya rāmo mārīcaṁ tūrṇaṁ pathi nyavartata॥

इधर मृगरूप से विचरते हुए उस इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षस मारीच का वध करके श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही आश्रम के मार्ग पर लौटे

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॥ ३ · ५७ · २ ॥
तस्य संत्वरमाणस्य द्रष्टुकामस्य मैथिलीम्। क्रूरस्वनोऽथ गोमायुर्विननादास्य पृष्ठतः॥

tasya saṁtvaramāṇasya draṣṭukāmasya maithilīm।
krūrasvano'tha gomāyurvinanādāsya pṛṣṭhataḥ॥

वे सीता को देखने के लिये जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए आ रहे थे। इतने ही में पीछे की ओर से एक सियारिन बड़े कठोर स्वर में चीत्कार करने लगी

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॥ ३ · ५७ · ३ ॥
तस्य स्वरमाज्ञाय दारुणं रोमहर्षणम्। चिन्तयामास गोमायोः स्वरेण परिशङ्कितः॥

sa tasya svaramājñāya dāruṇaṁ romaharṣaṇam।
cintayāmāsa gomāyoḥ svareṇa pariśaṅkitaḥ॥

गीदड़ी के उस स्वर से श्रीरामचन्द्रजी के मन में कुछ शङ्का हुई। उसका स्वर बड़ा ही भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उसका अनुभव करके वे बड़ी चिन्ता में पड़ गये

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॥ ३ · ५७ · ४ ॥
अशुभं बत मन्येऽहं गोमायुर्वाश्यते यथा। स्वस्ति स्यादपि वैदेह्या राक्षसैर्भक्षणं विना॥

aśubhaṁ bata manye'haṁ gomāyurvāśyate yathā।
svasti syādapi vaidehyā rākṣasairbhakṣaṇaṁ vinā॥

वे मन-ही-मन कहने लगे—‘यह सियारिन जैसी बोली बोल रही है, इससे तो मुझे मालूम हो रहा है कि कोई अशुभ घटना घटित हो गयी। क्या विदेहनन्दिनी सीता कुशल से होंगी? उन्हें राक्षस तो नहीं खा गये?

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॥ ३ · ५७ · ५ ॥
मारीचेन तु विज्ञाय स्वरमालक्ष्य मामकम्। विक्रुष्टं मृगरूपेण लक्ष्मणः शृणुयाद् यदि॥

mārīcena tu vijñāya svaramālakṣya māmakam।
vikruṣṭaṁ mṛgarūpeṇa lakṣmaṇaḥ śṛṇuyād yadi॥

‘मृगरूपधारी मारीच ने जान-बूझकर मेरे स्वर का अनुसरण करते हुए जो आर्त-पुकार की थी, वह इसलिये कि शायद इसे लक्ष्मण सुन सकें

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॥ ३ · ५७ · ६ ॥
सौमित्रिः स्वरं श्रुत्वा तां हित्वाथ मैथिलीम्। तयैव प्रहितः क्षिप्रं मत्सकाशमिहैष्यति॥

sa saumitriḥ svaraṁ śrutvā tāṁ ca hitvātha maithilīm।
tayaiva prahitaḥ kṣipraṁ matsakāśamihaiṣyati॥

‘सुमित्रानन्दन लक्ष्मण वह स्वर सुनते ही सीता के ही भेजने पर उसे अकेली छोड़कर तुरंत मेरे पास यहाँ पहुँचने के लिये चल देंगे

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॥ ३ · ५७ · ७ ॥
राक्षसैः सहितैर्नूनं सीताया ईप्सितो वधः। काञ्चनश्च मृगो भूत्वा व्यपनीयाश्रमात्तु माम्॥

rākṣasaiḥ sahitairnūnaṁ sītāyā īpsito vadhaḥ।
kāñcanaśca mṛgo bhūtvā vyapanīyāśramāttu mām॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५७ · ८ ॥
दूरं नीत्वाथ मारीचो राक्षसोऽभूच्छराहतः। हा लक्ष्मण हतोऽस्मीति यद्वाक्यं व्याजहार ह॥

dūraṁ nītvātha mārīco rākṣaso'bhūccharāhataḥ।
hā lakṣmaṇa hato'smīti yadvākyaṁ vyājahāra ha॥

॥ ७–८ ॥

‘राक्षसलोग तो सब-के-सब मिलकर सीता का वध अवश्य कर देना चाहते हैं। इसी उद्देश्य से यह मारीच राक्षस सोने का मृग बनकर मुझे आश्रम से दूर हटा ले आया था और मेरे बाणों से आहत होने पर जो उसने आर्तनाद करते हुए कहा था कि ‘हा लक्ष्मण! मैं मारा गया’ इसमें भी उसका वही उद्देश्य छिपा था

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॥ ३ · ५७ · ९ ॥
अपि स्वस्ति भवेद् द्वाभ्यां रहिताभ्यां मया वने। जनस्थाननिमित्तं हि कृतवैरोऽस्मि राक्षसैः॥

api svasti bhaved dvābhyāṁ rahitābhyāṁ mayā vane।
janasthānanimittaṁ hi kṛtavairo'smi rākṣasaiḥ॥

‘वन में हम दोनों भाइयों के आश्रम से अलग हो जाने पर क्या सीता सकुशल वहाँ रह सकेंगी? जनस्थान में जो राक्षसों का संहार हुआ है, उसके कारण सारे राक्षस मुझसे वैर बाँधे ही हुए हैं

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॥ ३ · ५७ · १० ॥
निमित्तानि घोराणि दृश्यन्तेऽद्य बहूनि च। इत्येवं चिन्तयन् रामः श्रुत्वा गोमायुनिःस्वनम्॥ निवर्तमानस्त्वरितो जगामाश्रममात्मवान्।

nimittāni ca ghorāṇi dṛśyante'dya bahūni ca।
ityevaṁ cintayan rāmaḥ śrutvā gomāyuniḥsvanam॥
nivartamānastvarito jagāmāśramamātmavān।

‘आज बहुत-से भयङ्कर अपशकुन भी दिखायी देते हैं।’ सियारिन की बोली सुनकर इस प्रकार चिन्ता करते हुए मन को वश में रखनेवाले श्रीराम तुरंत लौटकर आश्रम की ओर चले

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॥ ३ · ५७ · ११ ॥
आत्मनश्चापनयनं मृगरूपेण रक्षसा॥ आजगाम जनस्थानं राघवः परिशङ्कितः।

ātmanaścāpanayanaṁ mṛgarūpeṇa rakṣasā॥
ājagāma janasthānaṁ rāghavaḥ pariśaṅkitaḥ।

मृगरूपधारी राक्षस के द्वारा अपनेको आश्रम से दूर हटाने की घटना पर विचार करके श्रीरघुनाथजी शङ्कितहृदय से जनस्थान को आये

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॥ ३ · ५७ · १२ ॥
तं दीनमानसं दीनमासेदुर्मृगपक्षिणः॥ सव्यं कृत्वा महात्मानं घोरांश्च ससृजुः स्वरान्।

taṁ dīnamānasaṁ dīnamāsedurmṛgapakṣiṇaḥ॥
savyaṁ kṛtvā mahātmānaṁ ghorāṁśca sasṛjuḥ svarān।

उनका मन बहुत दुःखी था। वे दीन हो रहे थे। उसी अवस्था में वन के मृग और पक्षी उन्हें बाँयें रखते हुए वहाँ आये और भयङ्कर स्वर में अपनी बोली बोलने लगे

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॥ ३ · ५७ · १३ ॥
तानि दृष्ट्वा निमित्तानि महाघोराणि राघवः। न्यवर्तताथ त्वरितो जवेनाश्रममात्मनः॥

tāni dṛṣṭvā nimittāni mahāghorāṇi rāghavaḥ।
nyavartatātha tvarito javenāśramamātmanaḥ॥

उन महाभयङ्कर अपशकुनों को देखकर श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही बड़े वेग से अपने आश्रम की ओर लौटे

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॥ ३ · ५७ · १४ ॥
ततो लक्ष्मणमायान्तं ददर्श विगतप्रभम्। ततोऽविदूरे रामेण समीयाय लक्ष्मणः॥

tato lakṣmaṇamāyāntaṁ dadarśa vigataprabham।
tato'vidūre rāmeṇa samīyāya sa lakṣmaṇaḥ॥

इतने ही में उन्हें लक्ष्मण आते दिखायी दिये। उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। थोड़ी ही देर में निकट आकर लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजी से मिले

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॥ ३ · ५७ · १५ ॥
विषण्णः सन् विषण्णेन दुःखितो दुःखभागिना। जगर्हेऽथ तं भ्राता दृष्ट्वा लक्ष्मणमागतम्॥ विहाय सीतां विजने वने राक्षससेविते।

viṣaṇṇaḥ san viṣaṇṇena duḥkhito duḥkhabhāginā।
sa jagarhe'tha taṁ bhrātā dṛṣṭvā lakṣmaṇamāgatam॥
vihāya sītāṁ vijane vane rākṣasasevite।

दुःख और विषाद में डूबे हुए लक्ष्मण ने दुःखी और विषादग्रस्त श्रीरामचन्द्रजी से भेंट की। उस समय राक्षसों से सेवित निर्जन वन में सीता को अकेली छोड़कर आये हुए लक्ष्मण को देख भाई श्रीराम ने उनकी निन्दा की

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॥ ३ · ५७ · १६ ॥
गृहीत्वा करं सव्यं लक्ष्मणं रघुनन्दनः॥ उवाच मधुरोदर्कमिदं परुषमार्तवत्।

gṛhītvā ca karaṁ savyaṁ lakṣmaṇaṁ raghunandanaḥ॥
uvāca madhurodarkamidaṁ paruṣamārtavat।

लक्ष्मण का बायाँ हाथ पकड़कर रघुनन्दन आर्त-से हो गये और पहले कठोर तथा अन्त में मधुर वाणीद्वारा इस प्रकार बोले—

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॥ ३ · ५७ · १७ ॥
अहो लक्ष्मण गर्हा ते कृतं यत् त्वं विहाय ताम्॥ सीतामिहागतः सौम्य कच्चित् स्वस्ति भवेदिति।

aho lakṣmaṇa garhā te kṛtaṁ yat tvaṁ vihāya tām॥
sītāmihāgataḥ saumya kaccit svasti bhavediti।

‘अहो सौम्य लक्ष्मण! यह तुमने बहुत बुरा किया, जो सीता को अकेली छोड़कर यहाँ चले आये। क्या वहाँ सीता सकुशल होगी?

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॥ ३ · ५७ · १८ ॥
मेऽस्ति संशयो वीर सर्वथा जनकात्मजा॥ विनष्टा भक्षिता वापि राक्षसैर्वनचारिभिः।

na me'sti saṁśayo vīra sarvathā janakātmajā॥
vinaṣṭā bhakṣitā vāpi rākṣasairvanacāribhiḥ।

‘वीर! मुझे इस बात में संदेह नहीं है कि वन में विचरनेवाले राक्षसों ने जनककुमारी सीता को या तो सर्वथा नष्ट कर दिया होगा या वे उन्हें खा गये होंगे

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॥ ३ · ५७ · १९ ॥
अशुभान्येव भूयिष्ठं यथा प्रादुर्भवन्ति मे॥

aśubhānyeva bhūyiṣṭhaṁ yathā prādurbhavanti me॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५७ · २० ॥
अपि लक्ष्मण सीतायाः सामग्र्यं प्राप्नुयामहे। जीवन्त्याः पुरुषव्याघ्र सुताया जनकस्य वै॥

api lakṣmaṇa sītāyāḥ sāmagryaṁ prāpnuyāmahe।
jīvantyāḥ puruṣavyāghra sutāyā janakasya vai॥

॥ १९–२० ॥

‘क्योंकि मेरे आस-पास बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं। पुरुषसिंह लक्ष्मण! क्या हमलोग जीती-जागती हुई जनकदुलारी सीता को पूर्णतः स्वस्थ एवं सकुशल पा सकेंगे?

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॥ ३ · ५७ · २१ ॥
यथा वै मृगसंघाश्च गोमायुश्चैव भैरवम्। वाश्यन्ते शकुनाश्चापि प्रदीप्तामभितो दिशम्। अपि स्वस्ति भवेत् तस्या राजपुत्र्या महाबल॥

yathā vai mṛgasaṁghāśca gomāyuścaiva bhairavam।
vāśyante śakunāścāpi pradīptāmabhito diśam।
api svasti bhavet tasyā rājaputryā mahābala॥

‘महाबली लक्ष्मण! ये मृगों के झुंड (दाहिनी ओर से आकर) जैसा अमङ्गल सूचित कर रहे हैं, ये गीदड़ जिस तरह भैरवनाद कर रहे हैं तथा जलती-सी प्रतीत होनेवाली सम्पूर्ण दिशाओं में पक्षी जिस तरह की बोली बोल रहे हैं—इन सबसे यही अनुमान होता है कि राजकुमारी सीता शायद ही कुशल से हों

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॥ ३ · ५७ · २२ ॥
इदं हि रक्षो मृगसंनिकाशं प्रलोभ्य मां दूरमनुप्रयातम्। हतं कथंचिन्महता श्रमेण राक्षसोऽभून्म्रियमाण एव॥

idaṁ hi rakṣo mṛgasaṁnikāśaṁ
pralobhya māṁ dūramanuprayātam।
hataṁ kathaṁcinmahatā śrameṇa
sa rākṣaso'bhūnmriyamāṇa eva॥

‘यह राक्षस मृग के समान रूप धारण करके मुझे लुभाकर दूर चला आया था। महान् परिश्रम करके जब मैंने इसे किसी तरह मारा, तब यह मरते ही राक्षस हो गया

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॥ ३ · ५७ · २३ ॥
मनश्च मे दीनमिहाप्रहृष्टं चक्षुश्च सव्यं कुरुते विकारम्। असंशयं लक्ष्मण नास्ति सीता हृता मृता वा पथि वर्तते वा॥

manaśca me dīnamihāprahṛṣṭaṁ
cakṣuśca savyaṁ kurute vikāram।
asaṁśayaṁ lakṣmaṇa nāsti sītā
hṛtā mṛtā vā pathi vartate vā॥

‘लक्ष्मण! अतः मेरा मन अत्यन्त दीन और अप्रसन्न हो रहा है। मेरी बायीं आँख फड़क रही है, इससे जान पड़ता है, निःसंदेह आश्रम पर सीता नहीं है। उसे कोई हर ले गया, वह मारी गयी अथवा (किसी राक्षस के साथ) मार्ग में होगी’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तपञ्चाशः सर्गः॥ ५७॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७॥