वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ५६ · ३६ श्लोकाःSarga 56 · 36 ślokas

सीताका श्रीरामके प्रति अपना अनन्य अनुराग दिखाकर रावणको फटकारना तथा रावणकी आज्ञासे राक्षसियोंका उन्हें अशोकवाटिकामें ले जाकर डराना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ५६ — painting

॥ ३ · ५६ · १–२ ॥

लङ्कायाः स्वर्णसभायां भूमौ निषण्णा शोककर्शिता जीर्णाम्बरा सीता आत्मनो रावणस्य च मध्ये एकं तृणमन्तर्धाय पराङ्मुखी निर्भया तिरस्कारेण पतिमाहात्म्यं तद्विनाशं च वदति; उपरि किरीटी वैदूर्यहेमभूषितो भस्मत्रिपुण्ड्राङ्को रावणः कामात् क्रोधं गच्छन्मुखेन तां प्रत्युपतिष्ठते, पार्श्वेषु दंष्ट्रालाः राक्षस्यः।

लंका की स्वर्णमयी सभा में शोक से क्षीण, जीर्ण वस्त्रवाली सीता भूमि पर बैठकर अपने और रावण के बीच एक तिनका रखकर, मुँह फेरे, निर्भय होकर तिरस्कारपूर्वक अपने पति की महिमा और रावण के विनाश की बात कहती हैं; ऊपर मुकुटधारी, वैदूर्य-स्वर्ण से विभूषित, भस्म-त्रिपुण्ड्रधारी रावण काम से क्रोध की ओर बदलते हुए मुख से उनकी ओर खड़ा है, और पास ही दाढ़ोंवाली राक्षसियाँ हैं।

In Lanka's golden hall the grief-worn Sita, in her plain worn garment, sits upon the bare earth and lays a single blade of grass between herself and Ravana; turning her face aside, fearless and full of contempt, she proclaims her husband's greatness and the demon's doom, while the crowned Ravana — beryl- and gold-adorned, ash tripundra on his brow, his face darkening from lust to wrath — looms over her, fanged rakshasi guards at the edges.

॥ ३ · ५६ · १ ॥
सा तथोक्ता तु वैदेही निर्भया शोककर्शिता। तृणमन्तरतः कृत्वा रावणं प्रत्यभाषत॥

sā tathoktā tu vaidehī nirbhayā śokakarśitā।
tṛṇamantarataḥ kṛtvā rāvaṇaṁ pratyabhāṣata॥

रावण के ऐसा कहने पर शोक से कष्ट पाती हुई विदेह-राजकुमारी सीता बीच में तिनके की ओट करके उस निशाचर से निर्भय होकर बोलीं—

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॥ ३ · ५६ · २ ॥
राजा दशरथो नाम धर्मसेतुरिवाचलः। सत्यसंधः परिज्ञातो यस्य पुत्रः राघवः॥

rājā daśaratho nāma dharmaseturivācalaḥ।
satyasaṁdhaḥ parijñāto yasya putraḥ sa rāghavaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५६ · ३ ॥
रामो नाम धर्मात्मा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः। दीर्घबाहुर्विशालाक्षो दैवतं पतिर्मम॥

rāmo nāma sa dharmātmā triṣu lokeṣu viśrutaḥ।
dīrghabāhurviśālākṣo daivataṁ sa patirmama॥

॥ २–३ ॥

‘महाराज दशरथ धर्म के अचल सेतु के समान थे। वे अपनी सत्यप्रतिज्ञता के लिये सर्वत्र विख्यात थे। उनके पुत्र जो रघुकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे भी अपने धर्मात्मापन के लिये तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं, उनकी भुजाएँ लंबी और आँखें बड़ी-बड़ी हैं। वे ही मेरे आराध्य देवता और पति हैं

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॥ ३ · ५६ · ४ ॥
इक्ष्वाकूणां कुले जातः सिंहस्कन्धो महाद्युतिः। लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा यस्ते प्राणान् वधिष्यति॥

ikṣvākūṇāṁ kule jātaḥ siṁhaskandho mahādyutiḥ।
lakṣmaṇena saha bhrātrā yaste prāṇān vadhiṣyati॥

‘उनका जन्म इक्ष्वाकुकुल में हुआ है। उनके कंधे सिंह के समान और तेज महान् है। वे अपने भाई लक्ष्मण के साथ आकर तेरे प्राणों का विनाश कर डालेंगे

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॥ ३ · ५६ · ५ ॥
प्रत्यक्षं यद्यहं तस्य त्वया वै धर्षिता बलात्। शयिता त्वं हतः संख्ये जनस्थाने यथा खरः॥

pratyakṣaṁ yadyahaṁ tasya tvayā vai dharṣitā balāt।
śayitā tvaṁ hataḥ saṁkhye janasthāne yathā kharaḥ॥

‘यदि तू उनके सामने बलपूर्वक मेरा अपहरण करता तो अपने भाई खर की तरह जनस्थान के युद्धस्थल में ही मारा जाकर सदा के लिये सो जाता

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॥ ३ · ५६ · ६ ॥
एते राक्षसाः प्रोक्ता घोररूपा महाबलाः। राघवे निर्विषाः सर्वे सुपर्णे पन्नगा यथा॥

ya ete rākṣasāḥ proktā ghorarūpā mahābalāḥ।
rāghave nirviṣāḥ sarve suparṇe pannagā yathā॥

‘तूने जो इन घोर रूपधारी महाबली राक्षसों की चर्चा की है, श्रीराम के पास जाते ही इन सबका विष उतर जायगा; ठीक उसी तरह जैसे गरुड़ के पास सारे सर्प विष के प्रभाव से रहित हो जाते हैं

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॥ ३ · ५६ · ७ ॥
तस्य ज्याविप्रमुक्तास्ते शराः काञ्चनभूषणाः। शरीरं विधमिष्यन्ति गङ्गाकूलमिवोर्मयः॥

tasya jyāvipramuktāste śarāḥ kāñcanabhūṣaṇāḥ।
śarīraṁ vidhamiṣyanti gaṅgākūlamivormayaḥ॥

‘जैसे बढ़ी हुई गङ्गा की लहरें अपने कगारों को काट गिराती हैं, उसी प्रकार श्रीराम के धनुष की डोरी से छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण तेरे शरीर को छिन्न-भिन्न कर डालेंगे

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॥ ३ · ५६ · ८ ॥
असुरैर्वा सुरैर्वा त्वं यद्यवध्योऽसि रावण। उत्पाद्य सुमहद् वैरं जीवंस्तस्य मोक्ष्यसे॥

asurairvā surairvā tvaṁ yadyavadhyo'si rāvaṇa।
utpādya sumahad vairaṁ jīvaṁstasya na mokṣyase॥

‘रावण! तू असुरों अथवा देवताओं से यदि अवध्य है तो सम्भव है वे तुझे न मार सकें; किंतु भगवान् श्रीराम के साथ यह महान् वैर ठानकर तू किसी तरह जीवित नहीं छूट सकेगा

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॥ ३ · ५६ · ९ ॥
ते जीवितशेषस्य राघवोऽन्तकरो बली। पशोर्यूपगतस्येव जीवितं तव दुर्लभम्॥

sa te jīvitaśeṣasya rāghavo'ntakaro balī।
paśoryūpagatasyeva jīvitaṁ tava durlabham॥

‘श्रीरघुनाथजी बड़े बलवान् हैं। वे तेरे शेष जीवन का अन्त कर डालेंगे। यूप में बँधे हुए पशु की भाँति तेरा जीवन दुर्लभ हो जायगा

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॥ ३ · ५६ · १० ॥
यदि पश्येत् रामस्त्वां रोषदीप्तेन चक्षुषा। रक्षस्त्वमद्य निर्दग्धो यथा रुद्रेण मन्मथः॥

yadi paśyet sa rāmastvāṁ roṣadīptena cakṣuṣā।
rakṣastvamadya nirdagdho yathā rudreṇa manmathaḥ॥

‘राक्षस! यदि श्रीरामचन्द्रजी अपनी रोषभरी दृष्टि से तुझे देख लें तो तू अभी उसी तरह जलकर खाक हो जायगा जैसे भगवान् शङ्कर ने कामदेव को भस्म किया था

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॥ ३ · ५६ · ११ ॥
यश्चन्द्रं नभसो भूमौ पातयेन्नाशयेत वा। सागरं शोषयेद् वापि सीतां मोचयेदिह॥

yaścandraṁ nabhaso bhūmau pātayennāśayeta vā।
sāgaraṁ śoṣayed vāpi sa sītāṁ mocayediha॥

‘जो चन्द्रमा को आकाश से पृथ्वी पर गिराने या नष्ट करने की शक्ति रखते हैं अथवा जो समुद्र को भी सुखा सकते हैं, वे भगवान् श्रीराम यहाँ पहुँचकर सीता को भी छुड़ा सकते हैं

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॥ ३ · ५६ · १२ ॥
गतासुस्त्वं गतश्रीको गतसत्त्वो गतेन्द्रियः। लङ्का वैधव्यसंयुक्ता त्वत्कृतेन भविष्यति॥

gatāsustvaṁ gataśrīko gatasattvo gatendriyaḥ।
laṅkā vaidhavyasaṁyuktā tvatkṛtena bhaviṣyati॥

‘तू समझ ले कि तेरे प्राण अब चले गये। तेरी राज्यलक्ष्मी नष्ट हो गयी। तेरे बल और इन्द्रियों का भी नाश हो गया तथा तेरे ही पाप के कारण तेरी यह लङ्का भी अब विधवा हो जायगी

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॥ ३ · ५६ · १३ ॥
ते पापमिदं कर्म सुखोदर्कं भविष्यति। याहं नीता विनाभावं पतिपार्श्वात् त्वया बलात्॥

na te pāpamidaṁ karma sukhodarkaṁ bhaviṣyati।
yāhaṁ nītā vinābhāvaṁ patipārśvāt tvayā balāt॥

‘तेरा यह पापकर्म तुझे भविष्य में सुख नहीं भोगने देगा; क्योंकि तूने मुझे बलपूर्वक पति के पास से दूर हटाया है

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॥ ३ · ५६ · १४ ॥
हि देवरसंयुक्तो मम भर्ता महाद्युतिः। निर्भयो वीर्यमाश्रित्य शून्ये वसति दण्डके॥

sa hi devarasaṁyukto mama bhartā mahādyutiḥ।
nirbhayo vīryamāśritya śūnye vasati daṇḍake॥

‘मेरे स्वामी महान् तेजस्वी हैं और मेरे देवर के साथ अपने ही पराक्रम का भरोसा करके सूने दण्डकारण्य में निर्भयतापूर्वक निवास करते हैं

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॥ ३ · ५६ · १५ ॥
ते वीर्यं बलं दर्पमुत्सेकं तथाविधम्। अपनेष्यति गात्रेभ्यः शरवर्षेण संयुगे॥

sa te vīryaṁ balaṁ darpamutsekaṁ ca tathāvidham।
apaneṣyati gātrebhyaḥ śaravarṣeṇa saṁyuge॥

‘वे युद्ध में बाणों की वर्षा करके तेरे शरीर से बल, पराक्रम, घमंड तथा ऐसे उच्छृङ्खल आचरण को भी निकाल बाहर करेंगे

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॥ ३ · ५६ · १६ ॥
यदा विनाशो भूतानां दृश्यते कालचोदितः। तदा कार्ये प्रमाद्यन्ति नराः कालवशं गताः॥

yadā vināśo bhūtānāṁ dṛśyate kālacoditaḥ।
tadā kārye pramādyanti narāḥ kālavaśaṁ gatāḥ॥

‘जब काल की प्रेरणा से प्राणियों का विनाश निकट आता है, उस समय मृत्यु के अधीन हुए जीव प्रत्येक कार्य में प्रमाद करने लगते हैं

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॥ ३ · ५६ · १७ ॥
मां प्रधृष्य ते कालः प्राप्तोऽयं राक्षसाधम। आत्मनो राक्षसानां वधायान्तःपुरस्य च॥

māṁ pradhṛṣya sa te kālaḥ prāpto'yaṁ rākṣasādhama।
ātmano rākṣasānāṁ ca vadhāyāntaḥpurasya ca॥

‘अधम निशाचर! मेरा अपहरण करने के कारण तेरे लिये भी वही काल आ पहुँचा है। तेरे अपने लिये, सारे राक्षसों के लिये तथा इस अन्तःपुर के लिये भी विनाश की घड़ी निकट आ गयी है

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॥ ३ · ५६ · १८ ॥
शक्या यज्ञमध्यस्था वेदिः स्रुग्भाण्डमण्डिता। द्विजातिमन्त्रसम्पूता चण्डालेनावमर्दितुम्॥

na śakyā yajñamadhyasthā vediḥ srugbhāṇḍamaṇḍitā।
dvijātimantrasampūtā caṇḍālenāvamarditum॥

‘यज्ञशाला के बीच की वेदी पर, जो द्विजातियों के मन्त्रद्वारा पवित्र की गयी होती है तथा जिसे स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञपात्र सुशोभित करते हैं, चाण्डाल अपना पैर नहीं रख सकता

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॥ ३ · ५६ · १९ ॥
तथाहं धर्मनित्यस्य धर्मपत्नी दृढव्रता। त्वया स्प्रष्टुं शक्याहं राक्षसाधम पापिना॥

tathāhaṁ dharmanityasya dharmapatnī dṛḍhavratā।
tvayā spraṣṭuṁ na śakyāhaṁ rākṣasādhama pāpinā॥

‘उसी प्रकार मैं नित्य धर्मपरायण भगवान् श्रीराम की धर्मपत्नी हूँ तथा दृढतापूर्वक पातिव्रत्य-धर्म का पालन करती हूँ (अतः यज्ञवेदी के समान हूँ) और राक्षसाधम! तू महापापी है (अतः चाण्डाल के तुल्य है); इसलिये मेरा स्पर्श नहीं कर सकता

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॥ ३ · ५६ · २० ॥
क्रीडन्ती राजहंसेन पद्मषण्डेषु नित्यशः। हंसी सा तृणमध्यस्थं कथं द्रक्ष्येत मद्गुकम्॥

krīḍantī rājahaṁsena padmaṣaṇḍeṣu nityaśaḥ।
haṁsī sā tṛṇamadhyasthaṁ kathaṁ drakṣyeta madgukam॥

‘जो सदा कमल के समूहों में राजहंस के साथ क्रीड़ा करती है, वह हंसी तृणों में रहनेवाले जलकाक की ओर कैसे दृष्टिपात करेगी

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॥ ३ · ५६ · २१ ॥
इदं शरीरं निःसंज्ञं बन्ध वा घातयस्व वा। नेदं शरीरं रक्ष्यं मे जीवितं वापि राक्षस॥

idaṁ śarīraṁ niḥsaṁjñaṁ bandha vā ghātayasva vā।
nedaṁ śarīraṁ rakṣyaṁ me jīvitaṁ vāpi rākṣasa॥

‘राक्षस! तू इस संज्ञाशून्य जड शरीर को बाँधकर रख ले या काट डाल। मैं स्वयं ही इस शरीर और जीवन को नहीं रखना चाहती

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॥ ३ · ५६ · २२ ॥
तु शक्यमपक्रोशं पृथिव्यां दातुमात्मनः। एवमुक्त्वा तु वैदेही क्रोधात् सुपरुषं वचः॥ रावणं जानकी तत्र पुनर्नोवाच किंचन।

na tu śakyamapakrośaṁ pṛthivyāṁ dātumātmanaḥ।
evamuktvā tu vaidehī krodhāt suparuṣaṁ vacaḥ॥
rāvaṇaṁ jānakī tatra punarnovāca kiṁcana।

‘मैं इस भूतल पर अपने लिये निन्दा या कलङ्क देनेवाला कोई कार्य नहीं कर सकती।’ रावण से क्रोधपूर्वक यह अत्यन्त कठोर वचन कहकर विदेहकुमारी जानकी चुप हो गयीं; वे वहाँ फिर कुछ नहीं बोलीं

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॥ ३ · ५६ · २३ ॥
सीताया वचनं श्रुत्वा परुषं रोमहर्षणम्॥ प्रत्युवाच ततः सीतां भयसंदर्शनं वचः।

sītāyā vacanaṁ śrutvā paruṣaṁ romaharṣaṇam॥
pratyuvāca tataḥ sītāṁ bhayasaṁdarśanaṁ vacaḥ।

सीता का वह कठोर वचन रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उसे सुनकर रावण ने उनसे भय दिखानेवाली बात कही—

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॥ ३ · ५६ · २४ ॥
शृणु मैथिलि मद्वाक्यं मासान् द्वादश भामिनि॥

śṛṇu maithili madvākyaṁ māsān dvādaśa bhāmini॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५६ · २५ ॥
कालेनानेन नाभ्येषि यदि मां चारुहासिनि। ततस्त्वां प्रातराशार्थं सूदाश्छेत्स्यन्ति लेशशः॥

kālenānena nābhyeṣi yadi māṁ cāruhāsini।
tatastvāṁ prātarāśārthaṁ sūdāśchetsyanti leśaśaḥ॥

॥ २४–२५ ॥

‘मनोहर हास्यवाली भामिनि! मिथिलेशकुमारी! मेरी बात सुन लो। मैं तुम्हें बारह महीने का समय देता हूँ। इतने समय में यदि तुम स्वेच्छापूर्वक मेरे पास नहीं आओगी तो मेरे रसोइये सबेरे का कलेवा तैयार करने के लिये तुम्हारे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे’

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॥ ३ · ५६ · २६ ॥
इत्युक्त्वा परुषं वाक्यं रावणः शत्रुरावणः। राक्षसीश्च ततः क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत्॥

ityuktvā paruṣaṁ vākyaṁ rāvaṇaḥ śatrurāvaṇaḥ।
rākṣasīśca tataḥ kruddha idaṁ vacanamabravīt॥

सीता से ऐसी कठोर बात कहकर शत्रुओं को रुलानेवाला रावण कुपित हो राक्षसियों से इस प्रकार बोला—

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॥ ३ · ५६ · २७ ॥
शीघ्रमेव हि राक्षस्यो विरूपा घोरदर्शनाः। दर्पमस्यापनेष्यन्तु मांसशोणितभोजनाः॥

śīghrameva hi rākṣasyo virūpā ghoradarśanāḥ।
darpamasyāpaneṣyantu māṁsaśoṇitabhojanāḥ॥

‘अपने विकराल रूप के कारण भयङ्कर दिखायी देनेवाली तथा रक्त-मांस का आहार करनेवाली राक्षसियो! तुमलोग शीघ्र ही इस सीता का अहंकार दूर करो’

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॥ ३ · ५६ · २८ ॥
वचनादेव तास्तस्य सुघोरा घोरदर्शनाः। कृतप्राञ्जलयो भूत्वा मैथिलीं पर्यवारयन्॥

vacanādeva tāstasya sughorā ghoradarśanāḥ।
kṛtaprāñjalayo bhūtvā maithilīṁ paryavārayan॥

रावण के इतना कहते ही वे भयंकर दिखायी देनेवाली अत्यन्त घोर राक्षसियाँ हाथ जोड़े मैथिली को चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गयीं

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॥ ३ · ५६ · २९ ॥
ताः प्रोवाच राजासौ रावणो घोरदर्शनाः। प्रचल्य चरणोत्कर्षैर्दारयन्निव मेदिनीम्॥

sa tāḥ provāca rājāsau rāvaṇo ghoradarśanāḥ।
pracalya caraṇotkarṣairdārayanniva medinīm॥

तब राजा रावण अपने पैरों के धमाके से पृथ्वी को विदीर्ण करता हुआ-सा दो-चार पग चलकर उन भयानक राक्षसियों से बोला—

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॥ ३ · ५६ · ३० ॥
अशोकवनिकामध्ये मैथिली नीयतामिति। तत्रेयं रक्ष्यतां गूढं युष्माभिः परिवारिता॥

aśokavanikāmadhye maithilī nīyatāmiti।
tatreyaṁ rakṣyatāṁ gūḍhaṁ yuṣmābhiḥ parivāritā॥

‘निशाचरियो! तुमलोग मिथिलेशकुमारी सीता को अशोकवाटिका में ले जाओ और चारों ओर से घेरकर वहाँ गूढ़ भाव से इसकी रक्षा करती रहो

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॥ ३ · ५६ · ३१ ॥
तत्रैनां तर्जनैर्घोरैः पुनः सान्त्वैश्च मैथिलीम्। आनयध्वं वशं सर्वा वन्यां गजवधूमिव॥

tatraināṁ tarjanairghoraiḥ punaḥ sāntvaiśca maithilīm।
ānayadhvaṁ vaśaṁ sarvā vanyāṁ gajavadhūmiva॥

‘वहाँ पहले तो भयंकर गर्जन-तर्जन करके इसे डराना; फिर मीठे-मीठे वचनों से समझा-बुझाकर जंगल की हथिनी की भाँति इस मिथिलेशकुमारी को तुम सब लोग वश में लाने की चेष्टा करना’

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॥ ३ · ५६ · ३२ ॥
इति प्रतिसमादिष्टा राक्षस्यो रावणेन ताः। अशोकवनिकां जग्मुर्मैथिलीं परिगृह्य तु॥

iti pratisamādiṣṭā rākṣasyo rāvaṇena tāḥ।
aśokavanikāṁ jagmurmaithilīṁ parigṛhya tu॥

रावण के इस प्रकार आदेश देने पर वे राक्षसियाँ मैथिली को साथ लेकर अशोकवाटिका में चली गयीं

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॥ ३ · ५६ · ३३ ॥
सर्वकामफलैर्वृक्षैर्नानापुष्पफलैर्वृताम्। सर्वकालमदैश्चापि द्विजैः समुपसेविताम्॥

sarvakāmaphalairvṛkṣairnānāpuṣpaphalairvṛtām।
sarvakālamadaiścāpi dvijaiḥ samupasevitām॥

वह वाटिका समस्त कामनाओं को फलरूप में प्रदान करनेवाले कल्पवृक्षों तथा भाँति-भाँति के फल-फूलवाले दूसरे-दूसरे वृक्षों से भी भरी थी तथा हर समय मदमत्त रहनेवाले पक्षी उसमें निवास करते थे

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॥ ३ · ५६ · ३४ ॥
सा तु शोकपरीताङ्गी मैथिली जनकात्मजा। राक्षसीवशमापन्ना व्याघ्रीणां हरिणी यथा॥

sā tu śokaparītāṅgī maithilī janakātmajā।
rākṣasīvaśamāpannā vyāghrīṇāṁ hariṇī yathā॥

परंतु वहाँ जाने पर मिथिलेशकुमारी जानकी के अङ्ग-अङ्ग में शोक व्याप्त हो गया। राक्षसियों के वश में पड़कर उनकी दशा बाघिनों के बीच में घिरी हुई हरिणी के समान हो गयी थी

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॥ ३ · ५६ · ३५ ॥
शोकेन महता ग्रस्ता मैथिली जनकात्मजा। शर्म लभते भीरुः पाशबद्धा मृगी यथा॥

śokena mahatā grastā maithilī janakātmajā।
na śarma labhate bhīruḥ pāśabaddhā mṛgī yathā॥

महान् शोक से ग्रस्त हुई मिथिलेशनन्दिनी जानकी जाल में फँसी हुई मृगी के समान भयभीत हो क्षणभर के लिये भी चैन नहीं पाती थीं

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॥ ३ · ५६ · ३६ ॥
विन्दते तत्र तु शर्म मैथिली विरूपनेत्राभिरतीव तर्जिता। पतिं स्मरन्ती दयितं देवरं विचेतनाभूद् भयशोकपीडिता॥

na vindate tatra tu śarma maithilī
virūpanetrābhiratīva tarjitā।
patiṁ smarantī dayitaṁ ca devaraṁ
vicetanābhūd bhayaśokapīḍitā॥

विकराल रूप और नेत्रोंवाली राक्षसियों की अत्यन्त डाँट-फटकार सुनने के कारण मिथिलेशकुमारी सीता को वहाँ शान्ति नहीं मिली। वे भय और शोक से पीड़ित हो प्रियतम पति और देवर का स्मरण करती हुई अचेत-सी हो गयीं

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः॥ ५६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५६॥