सीताका श्रीरामके प्रति अपना अनन्य अनुराग दिखाकर रावणको फटकारना तथा रावणकी आज्ञासे राक्षसियोंका उन्हें अशोकवाटिकामें ले जाकर डराना
॥ ३ · ५६ · १–२ ॥
लङ्कायाः स्वर्णसभायां भूमौ निषण्णा शोककर्शिता जीर्णाम्बरा सीता आत्मनो रावणस्य च मध्ये एकं तृणमन्तर्धाय पराङ्मुखी निर्भया तिरस्कारेण पतिमाहात्म्यं तद्विनाशं च वदति; उपरि किरीटी वैदूर्यहेमभूषितो भस्मत्रिपुण्ड्राङ्को रावणः कामात् क्रोधं गच्छन्मुखेन तां प्रत्युपतिष्ठते, पार्श्वेषु दंष्ट्रालाः राक्षस्यः।
लंका की स्वर्णमयी सभा में शोक से क्षीण, जीर्ण वस्त्रवाली सीता भूमि पर बैठकर अपने और रावण के बीच एक तिनका रखकर, मुँह फेरे, निर्भय होकर तिरस्कारपूर्वक अपने पति की महिमा और रावण के विनाश की बात कहती हैं; ऊपर मुकुटधारी, वैदूर्य-स्वर्ण से विभूषित, भस्म-त्रिपुण्ड्रधारी रावण काम से क्रोध की ओर बदलते हुए मुख से उनकी ओर खड़ा है, और पास ही दाढ़ोंवाली राक्षसियाँ हैं।
In Lanka's golden hall the grief-worn Sita, in her plain worn garment, sits upon the bare earth and lays a single blade of grass between herself and Ravana; turning her face aside, fearless and full of contempt, she proclaims her husband's greatness and the demon's doom, while the crowned Ravana — beryl- and gold-adorned, ash tripundra on his brow, his face darkening from lust to wrath — looms over her, fanged rakshasi guards at the edges.
sā tathoktā tu vaidehī nirbhayā śokakarśitā।
tṛṇamantarataḥ kṛtvā rāvaṇaṁ pratyabhāṣata॥
रावण के ऐसा कहने पर शोक से कष्ट पाती हुई विदेह-राजकुमारी सीता बीच में तिनके की ओट करके उस निशाचर से निर्भय होकर बोलीं—
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rājā daśaratho nāma dharmaseturivācalaḥ।
satyasaṁdhaḥ parijñāto yasya putraḥ sa rāghavaḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
rāmo nāma sa dharmātmā triṣu lokeṣu viśrutaḥ।
dīrghabāhurviśālākṣo daivataṁ sa patirmama॥
‘महाराज दशरथ धर्म के अचल सेतु के समान थे। वे अपनी सत्यप्रतिज्ञता के लिये सर्वत्र विख्यात थे। उनके पुत्र जो रघुकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी हैं, वे भी अपने धर्मात्मापन के लिये तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं, उनकी भुजाएँ लंबी और आँखें बड़ी-बड़ी हैं। वे ही मेरे आराध्य देवता और पति हैं
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ikṣvākūṇāṁ kule jātaḥ siṁhaskandho mahādyutiḥ।
lakṣmaṇena saha bhrātrā yaste prāṇān vadhiṣyati॥
‘उनका जन्म इक्ष्वाकुकुल में हुआ है। उनके कंधे सिंह के समान और तेज महान् है। वे अपने भाई लक्ष्मण के साथ आकर तेरे प्राणों का विनाश कर डालेंगे
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pratyakṣaṁ yadyahaṁ tasya tvayā vai dharṣitā balāt।
śayitā tvaṁ hataḥ saṁkhye janasthāne yathā kharaḥ॥
‘यदि तू उनके सामने बलपूर्वक मेरा अपहरण करता तो अपने भाई खर की तरह जनस्थान के युद्धस्थल में ही मारा जाकर सदा के लिये सो जाता
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ya ete rākṣasāḥ proktā ghorarūpā mahābalāḥ।
rāghave nirviṣāḥ sarve suparṇe pannagā yathā॥
‘तूने जो इन घोर रूपधारी महाबली राक्षसों की चर्चा की है, श्रीराम के पास जाते ही इन सबका विष उतर जायगा; ठीक उसी तरह जैसे गरुड़ के पास सारे सर्प विष के प्रभाव से रहित हो जाते हैं
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tasya jyāvipramuktāste śarāḥ kāñcanabhūṣaṇāḥ।
śarīraṁ vidhamiṣyanti gaṅgākūlamivormayaḥ॥
‘जैसे बढ़ी हुई गङ्गा की लहरें अपने कगारों को काट गिराती हैं, उसी प्रकार श्रीराम के धनुष की डोरी से छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण तेरे शरीर को छिन्न-भिन्न कर डालेंगे
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asurairvā surairvā tvaṁ yadyavadhyo'si rāvaṇa।
utpādya sumahad vairaṁ jīvaṁstasya na mokṣyase॥
‘रावण! तू असुरों अथवा देवताओं से यदि अवध्य है तो सम्भव है वे तुझे न मार सकें; किंतु भगवान् श्रीराम के साथ यह महान् वैर ठानकर तू किसी तरह जीवित नहीं छूट सकेगा
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sa te jīvitaśeṣasya rāghavo'ntakaro balī।
paśoryūpagatasyeva jīvitaṁ tava durlabham॥
‘श्रीरघुनाथजी बड़े बलवान् हैं। वे तेरे शेष जीवन का अन्त कर डालेंगे। यूप में बँधे हुए पशु की भाँति तेरा जीवन दुर्लभ हो जायगा
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yadi paśyet sa rāmastvāṁ roṣadīptena cakṣuṣā।
rakṣastvamadya nirdagdho yathā rudreṇa manmathaḥ॥
‘राक्षस! यदि श्रीरामचन्द्रजी अपनी रोषभरी दृष्टि से तुझे देख लें तो तू अभी उसी तरह जलकर खाक हो जायगा जैसे भगवान् शङ्कर ने कामदेव को भस्म किया था
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yaścandraṁ nabhaso bhūmau pātayennāśayeta vā।
sāgaraṁ śoṣayed vāpi sa sītāṁ mocayediha॥
‘जो चन्द्रमा को आकाश से पृथ्वी पर गिराने या नष्ट करने की शक्ति रखते हैं अथवा जो समुद्र को भी सुखा सकते हैं, वे भगवान् श्रीराम यहाँ पहुँचकर सीता को भी छुड़ा सकते हैं
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gatāsustvaṁ gataśrīko gatasattvo gatendriyaḥ।
laṅkā vaidhavyasaṁyuktā tvatkṛtena bhaviṣyati॥
‘तू समझ ले कि तेरे प्राण अब चले गये। तेरी राज्यलक्ष्मी नष्ट हो गयी। तेरे बल और इन्द्रियों का भी नाश हो गया तथा तेरे ही पाप के कारण तेरी यह लङ्का भी अब विधवा हो जायगी
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na te pāpamidaṁ karma sukhodarkaṁ bhaviṣyati।
yāhaṁ nītā vinābhāvaṁ patipārśvāt tvayā balāt॥
‘तेरा यह पापकर्म तुझे भविष्य में सुख नहीं भोगने देगा; क्योंकि तूने मुझे बलपूर्वक पति के पास से दूर हटाया है
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sa hi devarasaṁyukto mama bhartā mahādyutiḥ।
nirbhayo vīryamāśritya śūnye vasati daṇḍake॥
‘मेरे स्वामी महान् तेजस्वी हैं और मेरे देवर के साथ अपने ही पराक्रम का भरोसा करके सूने दण्डकारण्य में निर्भयतापूर्वक निवास करते हैं
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sa te vīryaṁ balaṁ darpamutsekaṁ ca tathāvidham।
apaneṣyati gātrebhyaḥ śaravarṣeṇa saṁyuge॥
‘वे युद्ध में बाणों की वर्षा करके तेरे शरीर से बल, पराक्रम, घमंड तथा ऐसे उच्छृङ्खल आचरण को भी निकाल बाहर करेंगे
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yadā vināśo bhūtānāṁ dṛśyate kālacoditaḥ।
tadā kārye pramādyanti narāḥ kālavaśaṁ gatāḥ॥
‘जब काल की प्रेरणा से प्राणियों का विनाश निकट आता है, उस समय मृत्यु के अधीन हुए जीव प्रत्येक कार्य में प्रमाद करने लगते हैं
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māṁ pradhṛṣya sa te kālaḥ prāpto'yaṁ rākṣasādhama।
ātmano rākṣasānāṁ ca vadhāyāntaḥpurasya ca॥
‘अधम निशाचर! मेरा अपहरण करने के कारण तेरे लिये भी वही काल आ पहुँचा है। तेरे अपने लिये, सारे राक्षसों के लिये तथा इस अन्तःपुर के लिये भी विनाश की घड़ी निकट आ गयी है
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na śakyā yajñamadhyasthā vediḥ srugbhāṇḍamaṇḍitā।
dvijātimantrasampūtā caṇḍālenāvamarditum॥
‘यज्ञशाला के बीच की वेदी पर, जो द्विजातियों के मन्त्रद्वारा पवित्र की गयी होती है तथा जिसे स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञपात्र सुशोभित करते हैं, चाण्डाल अपना पैर नहीं रख सकता
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tathāhaṁ dharmanityasya dharmapatnī dṛḍhavratā।
tvayā spraṣṭuṁ na śakyāhaṁ rākṣasādhama pāpinā॥
‘उसी प्रकार मैं नित्य धर्मपरायण भगवान् श्रीराम की धर्मपत्नी हूँ तथा दृढतापूर्वक पातिव्रत्य-धर्म का पालन करती हूँ (अतः यज्ञवेदी के समान हूँ) और राक्षसाधम! तू महापापी है (अतः चाण्डाल के तुल्य है); इसलिये मेरा स्पर्श नहीं कर सकता
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krīḍantī rājahaṁsena padmaṣaṇḍeṣu nityaśaḥ।
haṁsī sā tṛṇamadhyasthaṁ kathaṁ drakṣyeta madgukam॥
‘जो सदा कमल के समूहों में राजहंस के साथ क्रीड़ा करती है, वह हंसी तृणों में रहनेवाले जलकाक की ओर कैसे दृष्टिपात करेगी
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idaṁ śarīraṁ niḥsaṁjñaṁ bandha vā ghātayasva vā।
nedaṁ śarīraṁ rakṣyaṁ me jīvitaṁ vāpi rākṣasa॥
‘राक्षस! तू इस संज्ञाशून्य जड शरीर को बाँधकर रख ले या काट डाल। मैं स्वयं ही इस शरीर और जीवन को नहीं रखना चाहती
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na tu śakyamapakrośaṁ pṛthivyāṁ dātumātmanaḥ।
evamuktvā tu vaidehī krodhāt suparuṣaṁ vacaḥ॥
rāvaṇaṁ jānakī tatra punarnovāca kiṁcana।
‘मैं इस भूतल पर अपने लिये निन्दा या कलङ्क देनेवाला कोई कार्य नहीं कर सकती।’ रावण से क्रोधपूर्वक यह अत्यन्त कठोर वचन कहकर विदेहकुमारी जानकी चुप हो गयीं; वे वहाँ फिर कुछ नहीं बोलीं
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sītāyā vacanaṁ śrutvā paruṣaṁ romaharṣaṇam॥
pratyuvāca tataḥ sītāṁ bhayasaṁdarśanaṁ vacaḥ।
सीता का वह कठोर वचन रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उसे सुनकर रावण ने उनसे भय दिखानेवाली बात कही—
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śṛṇu maithili madvākyaṁ māsān dvādaśa bhāmini॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
kālenānena nābhyeṣi yadi māṁ cāruhāsini।
tatastvāṁ prātarāśārthaṁ sūdāśchetsyanti leśaśaḥ॥
‘मनोहर हास्यवाली भामिनि! मिथिलेशकुमारी! मेरी बात सुन लो। मैं तुम्हें बारह महीने का समय देता हूँ। इतने समय में यदि तुम स्वेच्छापूर्वक मेरे पास नहीं आओगी तो मेरे रसोइये सबेरे का कलेवा तैयार करने के लिये तुम्हारे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे’
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ityuktvā paruṣaṁ vākyaṁ rāvaṇaḥ śatrurāvaṇaḥ।
rākṣasīśca tataḥ kruddha idaṁ vacanamabravīt॥
सीता से ऐसी कठोर बात कहकर शत्रुओं को रुलानेवाला रावण कुपित हो राक्षसियों से इस प्रकार बोला—
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śīghrameva hi rākṣasyo virūpā ghoradarśanāḥ।
darpamasyāpaneṣyantu māṁsaśoṇitabhojanāḥ॥
‘अपने विकराल रूप के कारण भयङ्कर दिखायी देनेवाली तथा रक्त-मांस का आहार करनेवाली राक्षसियो! तुमलोग शीघ्र ही इस सीता का अहंकार दूर करो’
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vacanādeva tāstasya sughorā ghoradarśanāḥ।
kṛtaprāñjalayo bhūtvā maithilīṁ paryavārayan॥
रावण के इतना कहते ही वे भयंकर दिखायी देनेवाली अत्यन्त घोर राक्षसियाँ हाथ जोड़े मैथिली को चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गयीं
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sa tāḥ provāca rājāsau rāvaṇo ghoradarśanāḥ।
pracalya caraṇotkarṣairdārayanniva medinīm॥
तब राजा रावण अपने पैरों के धमाके से पृथ्वी को विदीर्ण करता हुआ-सा दो-चार पग चलकर उन भयानक राक्षसियों से बोला—
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aśokavanikāmadhye maithilī nīyatāmiti।
tatreyaṁ rakṣyatāṁ gūḍhaṁ yuṣmābhiḥ parivāritā॥
‘निशाचरियो! तुमलोग मिथिलेशकुमारी सीता को अशोकवाटिका में ले जाओ और चारों ओर से घेरकर वहाँ गूढ़ भाव से इसकी रक्षा करती रहो
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tatraināṁ tarjanairghoraiḥ punaḥ sāntvaiśca maithilīm।
ānayadhvaṁ vaśaṁ sarvā vanyāṁ gajavadhūmiva॥
‘वहाँ पहले तो भयंकर गर्जन-तर्जन करके इसे डराना; फिर मीठे-मीठे वचनों से समझा-बुझाकर जंगल की हथिनी की भाँति इस मिथिलेशकुमारी को तुम सब लोग वश में लाने की चेष्टा करना’
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iti pratisamādiṣṭā rākṣasyo rāvaṇena tāḥ।
aśokavanikāṁ jagmurmaithilīṁ parigṛhya tu॥
रावण के इस प्रकार आदेश देने पर वे राक्षसियाँ मैथिली को साथ लेकर अशोकवाटिका में चली गयीं
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sarvakāmaphalairvṛkṣairnānāpuṣpaphalairvṛtām।
sarvakālamadaiścāpi dvijaiḥ samupasevitām॥
वह वाटिका समस्त कामनाओं को फलरूप में प्रदान करनेवाले कल्पवृक्षों तथा भाँति-भाँति के फल-फूलवाले दूसरे-दूसरे वृक्षों से भी भरी थी तथा हर समय मदमत्त रहनेवाले पक्षी उसमें निवास करते थे
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sā tu śokaparītāṅgī maithilī janakātmajā।
rākṣasīvaśamāpannā vyāghrīṇāṁ hariṇī yathā॥
परंतु वहाँ जाने पर मिथिलेशकुमारी जानकी के अङ्ग-अङ्ग में शोक व्याप्त हो गया। राक्षसियों के वश में पड़कर उनकी दशा बाघिनों के बीच में घिरी हुई हरिणी के समान हो गयी थी
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śokena mahatā grastā maithilī janakātmajā।
na śarma labhate bhīruḥ pāśabaddhā mṛgī yathā॥
महान् शोक से ग्रस्त हुई मिथिलेशनन्दिनी जानकी जाल में फँसी हुई मृगी के समान भयभीत हो क्षणभर के लिये भी चैन नहीं पाती थीं
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na vindate tatra tu śarma maithilī
virūpanetrābhiratīva tarjitā।
patiṁ smarantī dayitaṁ ca devaraṁ
vicetanābhūd bhayaśokapīḍitā॥
विकराल रूप और नेत्रोंवाली राक्षसियों की अत्यन्त डाँट-फटकार सुनने के कारण मिथिलेशकुमारी सीता को वहाँ शान्ति नहीं मिली। वे भय और शोक से पीड़ित हो प्रियतम पति और देवर का स्मरण करती हुई अचेत-सी हो गयीं
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्पञ्चाशः सर्गः॥ ५६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छप्पनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५६॥