वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ५५ · ३७ श्लोकाःSarga 55 · 37 ślokas

रावणका सीताको अपने अन्तःपुरका दर्शन कराना और अपनी भार्या बन जानेके लिये समझाना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ५५ — painting

॥ ३ · ५५ · ३१–३२ ॥

लङ्कायाः स्वर्णमये अन्तःपुरे — गजदन्तस्फटिकवैदूर्यस्तम्भशोभिते — एकशिरा द्विभुजो रावणः किरीटी भस्मत्रिपुण्ड्रधारी बाहुं प्रसार्य स्वैश्वर्यं दर्शयन् तां महिषीत्वाय प्रार्थयते; सीता तु जीर्णकौशेयवसना वाससा मुखमाच्छाद्य पराङ्मुखी शनैरश्रूणि मुञ्चन्ती रामं ध्यायति, परितश्च ताम्रवर्णा राक्षस्यः पश्यन्ति।

लंका के स्वर्णमय अन्तःपुर में — हाथीदाँत, स्फटिक और वैदूर्य के खंभों से सुशोभित — एकमुख-द्विभुज मुकुटधारी, भस्म-त्रिपुण्ड्रधारी रावण भुजा फैलाकर अपना सारा ऐश्वर्य दिखाता हुआ सीता से महारानी बनने की याचना करता है; परन्तु मैली-सी वनवासिनी रेशमी साड़ीवाली सीता आँचल से मुख ढककर, मुँह फेरे, धीरे-धीरे आँसू बहाती हुई श्रीराम का ध्यान करती हैं, और चारों ओर ताम्रवर्ण राक्षसियाँ उन्हें देख रही हैं।

In the golden inner palace of Lanka, amid pillars of ivory, crystal and beryl, the single-headed Ravana sweeps out an arm to display all his splendour and begs Sita to become his queen; but the princess, in her worn forest sari, veils her moon-like face with her garment-end, turns away shedding slow tears and dwells on Ram, while coppery rakshasi women watch on every side.

॥ ३ · ५५ · १ ॥
संदिश्य राक्षसान् घोरान् रावणोऽष्टौ महाबलान्। आत्मानं बुद्धिवैक्लव्यात् कृतकृत्यममन्यत॥

saṁdiśya rākṣasān ghorān rāvaṇo'ṣṭau mahābalān।
ātmānaṁ buddhivaiklavyāt kṛtakṛtyamamanyata॥

इस प्रकार आठ महाबली भयंकर राक्षसों को जनस्थान में जाने की आज्ञा दे रावण ने विपरीत बुद्धि के कारण अपनेको कृतकृत्य माना

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॥ ३ · ५५ · २ ॥
चिन्तयानो वैदेहीं कामबाणैः प्रपीडितः। प्रविवेश गृहं रम्यं सीतां द्रष्टुमभित्वरन्॥

sa cintayāno vaidehīṁ kāmabāṇaiḥ prapīḍitaḥ।
praviveśa gṛhaṁ ramyaṁ sītāṁ draṣṭumabhitvaran॥

वह विदेहकुमारी सीता का स्मरण करके कामबाणों से अत्यन्त पीड़ित हो रहा था; अतः उन्हें देखने के लिये उसने बड़ी उतावली के साथ अपने रमणीय अन्तःपुर में प्रवेश किया

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॥ ३ · ५५ · ३ ॥
प्रविश्य तु तद्वेश्म रावणो राक्षसाधिपः। अपश्यद् राक्षसीमध्ये सीतां दुःखपरायणाम्॥

sa praviśya tu tadveśma rāvaṇo rākṣasādhipaḥ।
apaśyad rākṣasīmadhye sītāṁ duḥkhaparāyaṇām॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५५ · ४ ॥
अश्रुपूर्णमुखीं दीनां शोकभारावपीडिताम्। वायुवेगैरिवाक्रान्तां मज्जन्तीं नावमर्णवे॥ मृगयूथपरिभ्रष्टां मृगीं श्वभिरिवावृताम्।

aśrupūrṇamukhīṁ dīnāṁ śokabhārāvapīḍitām।
vāyuvegairivākrāntāṁ majjantīṁ nāvamarṇave॥
mṛgayūthaparibhraṣṭāṁ mṛgīṁ śvabhirivāvṛtām।

॥ ३–४ ॥

उस भवन में प्रवेश करके राक्षसों के राजा रावण ने देखा कि सीता राक्षसियों के बीच में बैठकर दुःख में डूबी हुई हैं। उनके मुख पर आँसुओं की धारा बह रही है और वे शोक के दुस्सह भार से अत्यन्त पीड़ित एवं दीन हो वायु के वेग से आक्रान्त हो समुद्र में डूबती हुई नौका के समान जान पड़ती हैं। मृगों के यूथ से बिछुड़कर कुत्तों से घिरी हुई अकेली हरिणी के समान दिखायी देती हैं

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॥ ३ · ५५ · ५ ॥
अधोगतमुखीं सीतां तामभ्येत्य निशाचरः॥

adhogatamukhīṁ sītāṁ tāmabhyetya niśācaraḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५५ · ६ ॥
तां तु शोकवशाद् दीनामवशां राक्षसाधिपः। सबलाद् दर्शयामास गृहं देवगृहोपमम्॥

tāṁ tu śokavaśād dīnāmavaśāṁ rākṣasādhipaḥ।
sabalād darśayāmāsa gṛhaṁ devagṛhopamam॥

॥ ५–६ ॥

शोकवश दीन और विवश हो नीचे मुँह किये बैठी हुई सीता के पास पहुँचकर राक्षसों के राजा निशाचर रावण ने उन्हें जबर्दस्ती अपने देवगृह के समान सुन्दर भवन का दर्शन कराया

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॥ ३ · ५५ · ७ ॥
हर्म्यप्रासादसम्बाधं स्त्रीसहस्रनिषेवितम्। नानापक्षिगणैर्जुष्टं नानारत्नसमन्वितम्॥

harmyaprāsādasambādhaṁ strīsahasraniṣevitam।
nānāpakṣigaṇairjuṣṭaṁ nānāratnasamanvitam॥

वह ऊँचे-ऊँचे महलों और सातमंजिले मकानों से भरा हुआ था। उसमें सहस्रों स्त्रियाँ निवास करती थीं। झुंड-के-झुंड नाना जाति के पक्षी वहाँ कलरव करते थे। नाना प्रकार के रत्न उस अन्तःपुर की शोभा बढ़ाते थे

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॥ ३ · ५५ · ८ ॥
दान्तकैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैस्तथा। वज्रवैदूर्यचित्रैश्च स्तम्भैर्दृष्टिमनोरमैः॥

dāntakaistāpanīyaiśca sphāṭikai rājataistathā।
vajravaidūryacitraiśca stambhairdṛṣṭimanoramaiḥ॥

उसमें बहुत-से मनोहर खंभे लगे थे, जो हाथीदाँत, पक्के सोने, स्फटिकमणि, चाँदी, हीरा और वैदूर्यमणि (नीलम) से जटित होने के कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे

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॥ ३ · ५५ · ९ ॥
दिव्यदुन्दुभिनिर्घोषं तप्तकाञ्चनभूषणम्। सोपानं काञ्चनं चित्रमारुरोह तया सह॥

divyadundubhinirghoṣaṁ taptakāñcanabhūṣaṇam।
sopānaṁ kāñcanaṁ citramāruroha tayā saha॥

उस महल में दिव्य दुन्दुभियों का मधुर घोष होता रहता था। उस अन्तःपुर को तपाये हुए सुवर्ण के आभूषणों से सजाया गया था। रावण सीता को साथ लेकर सोने की बनी हुई विचित्र सीढ़ी पर चढ़ा

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॥ ३ · ५५ · १० ॥
दान्तका राजताश्चैव गवाक्षाः प्रियदर्शनाः। हेमजालावृताश्चासंस्तत्र प्रासादपङ्क्तयः॥

dāntakā rājatāścaiva gavākṣāḥ priyadarśanāḥ।
hemajālāvṛtāścāsaṁstatra prāsādapaṅktayaḥ॥

वहाँ हाथीदाँत और चाँदी की बनी हुई खिड़कियाँ थीं, जो बड़ी सुहावनी दिखायी देती थीं। सोने की जालियों से ढकी हुई प्रासादमालाएँ भी दृष्टिगोचर होती थीं

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॥ ३ · ५५ · ११ ॥
सुधामणिविचित्राणि भूमिभागानि सर्वशः। दशग्रीवः स्वभवने प्रादर्शयत मैथिलीम्॥

sudhāmaṇivicitrāṇi bhūmibhāgāni sarvaśaḥ।
daśagrīvaḥ svabhavane prādarśayata maithilīm॥

उस महल में जो भूभाग (फर्श) थे, वे सुर्खी-चूना के पक्के बनाये गये थे और उनमें मणियाँ जड़ी गयी थीं, जिनसे वे सब-के-सब विचित्र दिखायी देते थे। दशग्रीव ने अपने महल की वे सारी वस्तुएँ मैथिली को दिखायीं

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॥ ३ · ५५ · १२ ॥
दीर्घिकाः पुष्करिण्यश्च नानापुष्पसमावृताः। रावणो दर्शयामास सीतां शोकपरायणाम्॥

dīrghikāḥ puṣkariṇyaśca nānāpuṣpasamāvṛtāḥ।
rāvaṇo darśayāmāsa sītāṁ śokaparāyaṇām॥

रावण ने बहुत-सी बावड़ियाँ और भाँति-भाँति के फूलों से आच्छादित बहुत-सी पोखरियाँ भी सीता को दिखायीं। सीता वह सब देखकर शोक में डूब गयीं

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॥ ३ · ५५ · १३ ॥
दर्शयित्वा तु वैदेहीं कृत्स्नं तद्भवनोत्तमम्। उवाच वाक्यं पापात्मा सीतां लोभितुमिच्छया॥

darśayitvā tu vaidehīṁ kṛtsnaṁ tadbhavanottamam।
uvāca vākyaṁ pāpātmā sītāṁ lobhitumicchayā॥

वह पापात्मा निशाचर विदेहनन्दिनी सीता को अपना सारा सुन्दर भवन दिखाकर उन्हें लुभाने की इच्छा से इस प्रकार बोला—

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॥ ३ · ५५ · १४ ॥
दश राक्षसकोट्यश्च द्वाविंशतिरथापराः। वर्जयित्वा जरावृद्धान् बालांश्च रजनीचरान्॥

daśa rākṣasakoṭyaśca dvāviṁśatirathāparāḥ।
varjayitvā jarāvṛddhān bālāṁśca rajanīcarān॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५५ · १५ ॥
तेषां प्रभुरहं सीते सर्वेषां भीमकर्मणाम्। सहस्रमेकमेकस्य मम कार्यपुरःसरम्॥

teṣāṁ prabhurahaṁ sīte sarveṣāṁ bhīmakarmaṇām।
sahasramekamekasya mama kāryapuraḥsaram॥

॥ १४–१५ ॥

‘सीते! मेरे अधीन बत्तीस करोड़ राक्षस हैं। यह संख्या बूढ़े और बालक निशाचरों को छोड़कर बतायी गयी है। भयंकर कर्म करनेवाले इन सभी राक्षसों का मैं ही स्वामी हूँ। अकेले मेरी सेवा में एक हजार राक्षस रहते हैं

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॥ ३ · ५५ · १६ ॥
यदिदं राज्यतन्त्रं मे त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्। जीवितं विशालाक्षि त्वं मे प्राणैर्गरीयसी॥

yadidaṁ rājyatantraṁ me tvayi sarvaṁ pratiṣṭhitam।
jīvitaṁ ca viśālākṣi tvaṁ me prāṇairgarīyasī॥

‘विशाललोचने! मेरा यह सारा राज्य और जीवन तुमपर ही अवलम्बित है (अथवा यह सब कुछ तुम्हारे चरणों में समर्पित है)। तुम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हो

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॥ ३ · ५५ · १७ ॥
बह्वीनामुत्तमस्त्रीणां मम योऽसौ परिग्रहः। तासां त्वमीश्वरी सीते मम भार्या भव प्रिये॥

bahvīnāmuttamastrīṇāṁ mama yo'sau parigrahaḥ।
tāsāṁ tvamīśvarī sīte mama bhāryā bhava priye॥

‘सीते! मेरा अन्तःपुर मेरी बहुत-सी सुन्दरी भार्याओं से भरा हुआ है, तुम उन सबकी स्वामिनी बनो—प्रिये! मेरी भार्या बन जाओ

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॥ ३ · ५५ · १८ ॥
साधु किं तेऽन्यथाबुद्ध्या रोचयस्व वचो मम। भजस्व माभितप्तस्य प्रसादं कर्तुमर्हसि॥

sādhu kiṁ te'nyathābuddhyā rocayasva vaco mama।
bhajasva mābhitaptasya prasādaṁ kartumarhasi॥

‘मेरे इस हितकर वचन को मान लो—इसे पसंद करो; इससे विपरीत विचार को मन में लाने से तुम्हें क्या लाभ होगा? मुझे अङ्गीकार करो। मैं पीड़ित हूँ, मुझपर कृपा करो

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॥ ३ · ५५ · १९ ॥
परिक्षिप्ता समुद्रेण लङ्केयं शतयोजना। नेयं धर्षयितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरैः॥

parikṣiptā samudreṇa laṅkeyaṁ śatayojanā।
neyaṁ dharṣayituṁ śakyā sendrairapi surāsuraiḥ॥

‘समुद्र से घिरी हुई इस लङ्का के राज्य का विस्तार सौ योजन है। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी इसे ध्वस्त नहीं कर सकते

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॥ ३ · ५५ · २० ॥
देवेषु यक्षेषु गन्धर्वेषु नर्षिषु। अहं पश्यामि लोकेषु यो मे वीर्यसमो भवेत्॥

na deveṣu na yakṣeṣu na gandharveṣu narṣiṣu।
ahaṁ paśyāmi lokeṣu yo me vīryasamo bhavet॥

‘देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों तथा ऋषियों में भी मैं किसीको ऐसा नहीं देखता, जो पराक्रम में मेरी समानता कर सके

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॥ ३ · ५५ · २१ ॥
राज्यभ्रष्टेन दीनेन तापसेन पदातिना। किं करिष्यसि रामेण मानुषेणाल्पतेजसा॥

rājyabhraṣṭena dīnena tāpasena padātinā।
kiṁ kariṣyasi rāmeṇa mānuṣeṇālpatejasā॥

‘राम तो राज्य से भ्रष्ट, दीन, तपस्वी, पैदल चलनेवाले और मनुष्य होने के कारण अल्प तेजवाले हैं, उन्हें लेकर क्या करोगी?

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॥ ३ · ५५ · २२ ॥
भजस्व सीते मामेव भर्ताहं सदृशस्तव। यौवनं त्वध्रुवं भीरु रमस्वेह मया सह॥

bhajasva sīte māmeva bhartāhaṁ sadṛśastava।
yauvanaṁ tvadhruvaṁ bhīru ramasveha mayā saha॥

‘सीते! मुझको ही अपनाओ! मैं तुम्हारे योग्य पति हूँ। भीरु! जवानी सदा रहनेवाली नहीं है, अतः यहाँ रहकर मेरे साथ रमण करो

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॥ ३ · ५५ · २३ ॥
दर्शने मा कृथा बुद्धिं राघवस्य वरानने। कास्य शक्तिरिहागन्तुमपि सीते मनोरथैः॥

darśane mā kṛthā buddhiṁ rāghavasya varānane।
kāsya śaktirihāgantumapi sīte manorathaiḥ॥

‘वरानने! सीते! अब तुम राम के दर्शन का विचार छोड़ दो। इस राम में इतनी शक्ति कहाँ है कि यहाँतक आने का मनोरथ भी कर सके

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॥ ३ · ५५ · २४ ॥
शक्यो वायुराकाशे पाशैर्बद्धुं महाजवः। दीप्यमानस्य वाप्यग्नेर्ग्रहीतुं विमलाः शिखाः॥

na śakyo vāyurākāśe pāśairbaddhuṁ mahājavaḥ।
dīpyamānasya vāpyagnergrahītuṁ vimalāḥ śikhāḥ॥

‘आकाश में महान् वेग से बहनेवाली वायु को रस्सियों में नहीं बाँधा जा सकता अथवा प्रज्वलित अग्नि की निर्मल ज्वालाओं को हाथों से नहीं पकड़ा जा सकता

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॥ ३ · ५५ · २५ ॥
त्रयाणामपि लोकानां तं पश्यामि शोभने। विक्रमेण नयेद् यस्त्वां मद्बाहुपरिपालिताम्॥

trayāṇāmapi lokānāṁ na taṁ paśyāmi śobhane।
vikrameṇa nayed yastvāṁ madbāhuparipālitām॥

‘शोभने! मैं तीनों लोकों में किसी ऐसे वीर को नहीं देखता, जो मेरी भुजाओं से सुरक्षित तुमको पराक्रम करके यहाँ से ले जा सके

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॥ ३ · ५५ · २६ ॥
लङ्कायाः सुमहद्राज्यमिदं त्वमनुपालय। त्वत्प्रेष्या मद्विधाश्चैव देवाश्चापि चराचरम्॥

laṅkāyāḥ sumahadrājyamidaṁ tvamanupālaya।
tvatpreṣyā madvidhāścaiva devāścāpi carācaram॥

‘लङ्का के इस विशाल राज्य का तुम्हीं पालन करो। मुझ-जैसे राक्षस, देवता तथा सम्पूर्ण चराचर जगत् तुम्हारे सेवक बनकर रहेंगे

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॥ ३ · ५५ · २७ ॥
अभिषेकजलक्लिन्ना तुष्टा रमयस्व च। दुष्कृतं यत्पुरा कर्म वनवासेन तद्गतम्॥ यच्च ते सुकृतं कर्म तस्येह फलमाप्नुहि।

abhiṣekajalaklinnā tuṣṭā ca ramayasva ca।
duṣkṛtaṁ yatpurā karma vanavāsena tadgatam॥
yacca te sukṛtaṁ karma tasyeha phalamāpnuhi।

‘स्नान के जल से आर्द्र (अथवा लङ्का के राज्य पर अपना अभिषेक कराकर उसके जल से आर्द्र) होकर संतुष्ट हो तुम अपने-आपको क्रीड़ाविनोद में लगाओ। तुम्हारा पहले का जो दुष्कर्म था, वह वनवास का कष्ट देकर समाप्त हो गया। अब जो तुम्हारा पुण्यकर्म शेष है, उसका फल यहाँ भोगो

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॥ ३ · ५५ · २८ ॥
इह सर्वाणि माल्यानि दिव्यगन्धानि मैथिलि॥ भूषणानि मुख्यानि तानि सेव मया सह।

iha sarvāṇi mālyāni divyagandhāni maithili॥
bhūṣaṇāni ca mukhyāni tāni seva mayā saha।

‘मिथिलेशकुमारी! तुम मेरे साथ यहाँ रहकर सब प्रकार के पुष्पहार, दिव्य गन्ध और श्रेष्ठ आभूषण आदि का सेवन करो

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॥ ३ · ५५ · २९ ॥
पुष्पकं नाम सुश्रोणि भ्रातुर्वैश्रवणस्य मे॥

puṣpakaṁ nāma suśroṇi bhrāturvaiśravaṇasya me॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५५ · ३० ॥
विमानं सूर्यसंकाशं तरसा निर्जितं रणे। विशालं रमणीयं तद्विमानं मनोजवम्॥ तत्र सीते मया सार्धं विहरस्व यथासुखम्।

vimānaṁ sūryasaṁkāśaṁ tarasā nirjitaṁ raṇe।
viśālaṁ ramaṇīyaṁ ca tadvimānaṁ manojavam॥
tatra sīte mayā sārdhaṁ viharasva yathāsukham।

॥ २९–३० ॥

‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली सुन्दरि! वह सूर्य के समान प्रकाशित होनेवाला पुष्पकविमान मेरे भाई कुबेर का था। उसे मैंने बलपूर्वक जीता है। यह अत्यन्त रमणीय, विशाल तथा मन के समान वेग से चलनेवाला है। सीते! तुम उसके ऊपर मेरे साथ बैठकर सुखपूर्वक विहार करो

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॥ ३ · ५५ · ३१ ॥
वदनं पद्मसंकाशं विमलं चारुदर्शनम्॥ शोकार्तं तु वरारोहे भ्राजति वरानने।

vadanaṁ padmasaṁkāśaṁ vimalaṁ cārudarśanam॥
śokārtaṁ tu varārohe na bhrājati varānane।

‘वरारोहे सुमुखि! तुम्हारा यह कमल के समान सुन्दर निर्मल और मनोहर दिखायी देनेवाला मुख शोक से पीड़ित होने के कारण शोभा नहीं पा रहा है’

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॥ ३ · ५५ · ३२ ॥
एवं वदति तस्मिन् सा वस्त्रान्तेन वराङ्गना॥ पिधायेन्दुनिभं सीता मन्दमश्रूण्यवर्तयत्।

evaṁ vadati tasmin sā vastrāntena varāṅganā॥
pidhāyendunibhaṁ sītā mandamaśrūṇyavartayat।

जब रावण ऐसी बातें कहने लगा, तब परम सुन्दरी सीता देवी चन्द्रमा के समान मनोहर अपने मुख को आँचल से ढककर धीरे-धीरे आँसू बहाने लगीं

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॥ ३ · ५५ · ३३ ॥
ध्यायन्तीं तामिवास्वस्थां सीतां चिन्ताहतप्रभाम्॥ उवाच वचनं वीरो रावणो रजनीचरः।

dhyāyantīṁ tāmivāsvasthāṁ sītāṁ cintāhataprabhām॥
uvāca vacanaṁ vīro rāvaṇo rajanīcaraḥ।

सीता शोक से अस्वस्थ-सी हो रही थीं, चिन्ता से उनकी कान्ति नष्ट-सी हो गयी थी और वे भगवान् राम का ध्यान करने लगी थीं। उस अवस्था में उनसे वह वीर निशाचर रावण इस प्रकार बोला—

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॥ ३ · ५५ · ३४ ॥
अलं व्रीडेन वैदेहि धर्मलोपकृतेन ते॥ आर्षोऽयं देवि निष्पन्दो यस्त्वामभिभविष्यति।

alaṁ vrīḍena vaidehi dharmalopakṛtena te॥
ārṣo'yaṁ devi niṣpando yastvāmabhibhaviṣyati।

‘विदेहनन्दिनि! अपने पति के त्याग और परपुरुष के अङ्गीकार से जो धर्मलोप की आशङ्का होती है, उसके कारण तुम्हें यहाँ लज्जा नहीं होनी चाहिये, इस तरह की लाज व्यर्थ है। देवि! तुम्हारे साथ जो मेरा स्नेह सम्बन्ध होगा, यह आर्ष धर्मशास्त्रोंद्वारा समर्थित है

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॥ ३ · ५५ · ३५ ॥
एतौ पादौ मया स्निग्धौ शिरोभिः परिपीडितौ॥ प्रसादं कुरु मे क्षिप्रं वश्यो दासोऽहमस्मि ते।

etau pādau mayā snigdhau śirobhiḥ paripīḍitau॥
prasādaṁ kuru me kṣipraṁ vaśyo dāso'hamasmi te।

‘तुम्हारे इन कोमल एवं चिकने चरणों पर मैं अपने ये दसों मस्तक रख रहा हूँ। अब शीघ्र मुझपर कृपा करो। मैं सदा तुम्हारे अधीन रहनेवाला दास हूँ

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॥ ३ · ५५ · ३६ ॥
इमाः शून्या मया वाचः शुष्यमाणेन भाषिताः॥ चापि रावणः कांचिन्मूर्ध्ना स्त्रीं प्रणमेत ह।

imāḥ śūnyā mayā vācaḥ śuṣyamāṇena bhāṣitāḥ॥
na cāpi rāvaṇaḥ kāṁcinmūrdhnā strīṁ praṇameta ha।

‘मैंने कामाग्नि से संतप्त होकर ये बातें कही हैं। ये शून्य (निष्फल) न हों, ऐसी कृपा करो; क्योंकि रावण किसी स्त्री को सिर झुकाकर प्रणाम नहीं करता, (केवल) तुम्हारे सामने इसका मस्तक झुका है’

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॥ ३ · ५५ · ३७ ॥
एवमुक्त्वा दशग्रीवो मैथिलीं जनकात्मजाम्। कृतान्तवशमापन्नो ममेयमिति मन्यते॥

evamuktvā daśagrīvo maithilīṁ janakātmajām।
kṛtāntavaśamāpanno mameyamiti manyate॥

मिथिलेशकुमारी जानकी से ऐसा कहकर काल के वशीभूत हुआ रावण मन-ही-मन मानने लगा कि ‘यह अब मेरे अधीन हो गयी’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चपञ्चाशः सर्गः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पचपनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५५ ॥