वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ५४ · ३० श्लोकाःSarga 54 · 30 ślokas

सीताका पाँच वानरोंके बीच अपने भूषण और वस्त्रको गिराना, रावणका लङ्कामें पहुँचकर सीताको अन्तःपुरमें रखना तथा जनस्थानमें आठ राक्षसोंको गुप्तचरके रूपमें रहनेके लिये भेजना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ५४ — painting

॥ ३ · ५४ · १–२ ॥

आकाशमार्गेण बाणवद् वेगेन प्रयान् किरीटी रावणो बन्दिनीं सीतां बाहौ वहति; अधः पर्वतशृङ्गे पञ्च कपिश्रेष्ठान् — अग्रे सुग्रीवं — विलोक्य विदेहसुता स्वाभरणानि पीतकौशेये वेष्टयित्वा तं भास्वरं पिण्डं मुञ्चति, ते च पीतरोमाणः कपयः ऊर्ध्वं पश्यन्तः स्तब्धास्तिष्ठन्ति।

आकाशमार्ग से बाण के समान वेग से जाता हुआ मुकुटधारी रावण बंदिनी सीता को भुजा पर लिये उड़ रहा है; नीचे पर्वत-शिखर पर बैठे पाँच श्रेष्ठ वानरों को — जिनमें आगे सुग्रीव हैं — देखकर विदेहकुमारी अपने आभूषणों को पीले रेशमी दुपट्टे में बाँधकर वह चमकता हुआ पिंड नीचे गिरा देती हैं, और सुनहरे रोमोंवाले वे वानर ऊपर की ओर टकटकी लगाये स्तब्ध खड़े हैं।

Speeding through the sky swift as a loosed arrow, the crowned Ravana carries the captive Sita on his arm; sighting five noble vanaras on a mountain peak below — Sugriva foremost — the Videha princess wraps her ornaments in her golden silk upper-cloth and lets the shining bundle fall, while the golden-furred monkeys stand transfixed, gazing up at her.

॥ ३ · ५४ · १ ॥
ह्रियमाणा तु वैदेही कंचिन्नाथमपश्यती। ददर्श गिरिशृङ्गस्थान् पञ्च वानरपुङ्गवान्॥

hriyamāṇā tu vaidehī kaṁcinnāthamapaśyatī।
dadarśa giriśṛṅgasthān pañca vānarapuṅgavān॥

रावण के द्वारा हरी जाती हुई विदेहनन्दिनी सीता को उस समय कोई भी अपना सहायक नहीं दिखायी देता था। मार्ग में उन्होंने एक पर्वत के शिखर पर पाँच श्रेष्ठ वानरों को बैठे देखा

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · २ ॥
तेषां मध्ये विशालाक्षी कौशेयं कनकप्रभम्। उत्तरीयं वरारोहा शुभान्याभरणानि च॥

teṣāṁ madhye viśālākṣī kauśeyaṁ kanakaprabham।
uttarīyaṁ varārohā śubhānyābharaṇāni ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५४ · ३ ॥
मुमोच यदि रामाय शंसेयुरिति भामिनी। वस्त्रमुत्सृज्य तन्मध्ये निक्षिप्तं सहभूषणम्॥

mumoca yadi rāmāya śaṁseyuriti bhāminī।
vastramutsṛjya tanmadhye nikṣiptaṁ sahabhūṣaṇam॥

॥ २–३ ॥

तब सुन्दर अङ्गोंवाली विशाललोचना भामिनी सीता ने यह सोचकर कि शायद ये भगवान् श्रीराम को कुछ समाचार कह सकें, अपने सुनहरे रंग की रेशमी चादर उतारी और उसमें वस्त्र और आभूषण रखकर उसे उनके बीच में फेंक दिया

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · ४ ॥
सम्भ्रमात् तु दशग्रीवस्तत्कर्म बुद्धवान्। पिङ्गाक्षास्तां विशालाक्षीं नेत्रैरनिमिषैरिव॥ विक्रोशन्तीं तदा सीतां ददृशुर्वानरोत्तमाः।

sambhramāt tu daśagrīvastatkarma ca na buddhavān।
piṅgākṣāstāṁ viśālākṣīṁ netrairanimiṣairiva॥
vikrośantīṁ tadā sītāṁ dadṛśurvānarottamāḥ।

रावण बड़ी घबराहट में था, इसलिये सीता के इस कार्य को वह न जान सका। वे भूरी आँखोंवाले श्रेष्ठ वानर उस समय उच्च स्वर से विलाप करती हुई विशाललोचना सीता की ओर एकटक नेत्रों से देखने लगे

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · ५ ॥
पम्पामतिक्रम्य लङ्कामभिमुखः पुरीम्॥ जगाम मैथिलीं गृह्य रुदतीं राक्षसेश्वरः।

sa ca pampāmatikramya laṅkāmabhimukhaḥ purīm॥
jagāma maithilīṁ gṛhya rudatīṁ rākṣaseśvaraḥ।

राक्षसराज रावण पम्पासरोवर को लाँघकर रोती हुई मैथिली सीता को साथ लिये लङ्कापुरी की ओर चल दिया

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · ६ ॥
तां जहार सुसंहृष्टो रावणो मृत्युमात्मनः॥ उत्सङ्गेनेव भुजगीं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाविषाम्।

tāṁ jahāra susaṁhṛṣṭo rāvaṇo mṛtyumātmanaḥ॥
utsaṅgeneva bhujagīṁ tīkṣṇadaṁṣṭraṁ mahāviṣām।

निशाचर रावण बड़े हर्ष में भरकर सीता के रूप में अपनी मौत को ही हरकर लिये जा रहा था। उसने वैदेही के रूप में तीखे दाढ़वाली महाविषैली नागिन को ही अपनी गोद में उठा रखा था

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · ७ ॥
वनानि सरितः शैलान् सरांसि विहायसा॥ क्षिप्रं समतीयाय शरश्चापादिव च्युतः।

vanāni saritaḥ śailān sarāṁsi ca vihāyasā॥
sa kṣipraṁ samatīyāya śaraścāpādiva cyutaḥ।

वह धनुष से छूटे हुए बाण की तरह तीव्र गति से चलकर आकाशमार्ग से अनेकानेक वनों, नदियों, पर्वतों और सरोवरों को तुरंत लाँघ गया

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · ८ ॥
तिमिनक्रनिकेतं तु वरुणालयमक्षयम्॥ सरितां शरणं गत्वा समतीयाय सागरम्।

timinakraniketaṁ tu varuṇālayamakṣayam॥
saritāṁ śaraṇaṁ gatvā samatīyāya sāgaram।

उसने तिमि नामक मत्स्यों और नाकों के निवासस्थान एवं वरुण के अक्षय गृह समुद्र को भी, जो समस्त नदियों का आश्रय है, पार कर लिया

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · ९ ॥
सम्भ्रमात् परिवृत्तोर्मी रुद्धमीनमहोरगः॥ वैदेह्यां ह्रियमाणायां बभूव वरुणालयः।

sambhramāt parivṛttormī ruddhamīnamahoragaḥ॥
vaidehyāṁ hriyamāṇāyāṁ babhūva varuṇālayaḥ।

विदेहनन्दिनी जगन्माता जानकी का अपहरण होते समय वरुणालय समुद्र को बड़ी घबराहट हुई। उससे उसकी उठती हुई लहरें शान्त हो गयीं। उसके भीतर रहनेवाली मछलियों और बड़े-बड़े सर्पों की गति रुक गयी

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · १० ॥
अन्तरिक्षगता वाचः ससृजुश्चारणास्तदा॥ एतदन्तो दशग्रीव इति सिद्धास्तथाब्रुवन्।

antarikṣagatā vācaḥ sasṛjuścāraṇāstadā॥
etadanto daśagrīva iti siddhāstathābruvan।

उस समय आकाश में विचरनेवाले चारण यों बोले—‘अब दशग्रीव रावण का यह अन्तकाल निकट आ पहुँचा है’ तथा सिद्धों ने भी यही बात दुहरायी

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · ११ ॥
तु सीतां विचेष्टन्तीमङ्केनादाय रावणः॥ प्रविवेश पुरीं लङ्कां रूपिणीं मृत्युमात्मनः।

sa tu sītāṁ viceṣṭantīmaṅkenādāya rāvaṇaḥ॥
praviveśa purīṁ laṅkāṁ rūpiṇīṁ mṛtyumātmanaḥ।

सीता छटपटा रही थीं। रावण ने अपनी साकार मृत्यु की भाँति उन्हें अङ्क में लेकर लङ्कापुरी में प्रवेश किया

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · १२ ॥
सोऽभिगम्य पुरीं लङ्कां सुविभक्तमहापथाम्॥ संरूढकक्ष्यां बहुलां स्वमन्तःपुरमाविशत्।

so'bhigamya purīṁ laṅkāṁ suvibhaktamahāpathām॥
saṁrūḍhakakṣyāṁ bahulāṁ svamantaḥpuramāviśat।

वहाँ पृथक्-पृथक् विशाल राजमार्ग बने हुए थे। पुरी के द्वार पर बहुत-से राक्षस इधर-उधर फैले हुए थे तथा उस नगरी का विस्तार बहुत बड़ा था। उसमें जाकर रावण ने अपने अन्तःपुर में प्रवेश किया

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · १३ ॥
तत्र तामसितापाङ्गीं शोकमोहसमन्विताम्॥ निदधे रावणः सीतां मयो मायामिवासुरीम्।

tatra tāmasitāpāṅgīṁ śokamohasamanvitām॥
nidadhe rāvaṇaḥ sītāṁ mayo māyāmivāsurīm।

कजरारे नेत्रप्रान्तवाली सीता शोक और मोह में डूबी हुई थीं। रावण ने उन्हें अन्तःपुर में रख दिया, मानो मयासुर ने मूर्तिमती आसुरी माया को वहाँ स्थापित कर दिया हो

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · १४ ॥
अब्रवीच्च दशग्रीवः पिशाचीर्घोरदर्शनाः॥ यथा नैनां पुमान् स्त्री वा सीतां पश्यत्यसम्मतः।

abravīcca daśagrīvaḥ piśācīrghoradarśanāḥ॥
yathā naināṁ pumān strī vā sītāṁ paśyatyasammataḥ।

इसके बाद दशग्रीव ने भयंकर आकारवाली पिशाचिनों को बुलाकर कहा—‘(तुम सब सावधानी के साथ सीता की रक्षा करो।) कोई भी स्त्री या पुरुष मेरी आज्ञा के बिना सीता को देखने या इनसे मिलने न पाये

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · १५ ॥
मुक्तामणिसुवर्णानि वस्त्राण्याभरणानि च॥ यद् यदिच्छेत् तदैवास्या देयं मच्छन्दतो यथा।

muktāmaṇisuvarṇāni vastrāṇyābharaṇāni ca॥
yad yadicchet tadaivāsyā deyaṁ macchandato yathā।

‘उन्हें मोती, मणि, सुवर्ण, वस्त्र और आभूषण आदि जिस-जिस वस्तु की इच्छा हो, वह तुरंत दी जाय; इसके लिये मेरी खुली आज्ञा है

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · १६ ॥
या वक्ष्यति वैदेहीं वचनं किंचिदप्रियम्॥ अज्ञानाद् यदि वा ज्ञानान्न तस्या जीवितं प्रियम्।

yā ca vakṣyati vaidehīṁ vacanaṁ kiṁcidapriyam॥
ajñānād yadi vā jñānānna tasyā jīvitaṁ priyam।

‘तुमलोगों में से जो कोई भी जानकर या बिना जाने विदेहकुमारी सीता से कोई अप्रिय बात कहेगी, मैं समझूँगा, उसे अपनी जिंदगी प्यारी नहीं है’

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · १७ ॥
तथोक्त्वा राक्षसीस्तास्तु राक्षसेन्द्रः प्रतापवान्॥

tathoktvā rākṣasīstāstu rākṣasendraḥ pratāpavān॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५४ · १८ ॥
निष्क्रम्यान्तःपुरात् तस्मात् किं कृत्यमिति चिन्तयन्। ददर्शाष्टौ महावीर्यान् राक्षसान् पिशिताशनान्॥

niṣkramyāntaḥpurāt tasmāt kiṁ kṛtyamiti cintayan।
dadarśāṣṭau mahāvīryān rākṣasān piśitāśanān॥

॥ १७–१८ ॥

राक्षसियों को वैसी आज्ञा देकर प्रतापी राक्षसराज ‘अब आगे क्या करना चाहिये’ यह सोचता हुआ अन्तःपुर से बाहर निकला और कच्चे मांस का आहार करनेवाले आठ महापराक्रमी राक्षसों से तत्काल मिला

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · १९ ॥
तान् दृष्ट्वा महावीर्यो वरदानेन मोहितः। उवाच तानिदं वाक्यं प्रशस्य बलवीर्यतः॥

sa tān dṛṣṭvā mahāvīryo varadānena mohitaḥ।
uvāca tānidaṁ vākyaṁ praśasya balavīryataḥ॥

उनसे मिलकर ब्रह्माजी के वरदान से मोहित हुए महापराक्रमी रावण ने उसके बल और वीर्य की प्रशंसा करके उनसे इस प्रकार कहा—

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · २० ॥
नानाप्रहरणाः क्षिप्रमितो गच्छत सत्वराः। जनस्थानं हतस्थानं भूतपूर्वं खरालयम्॥

nānāpraharaṇāḥ kṣipramito gacchata satvarāḥ।
janasthānaṁ hatasthānaṁ bhūtapūrvaṁ kharālayam॥

‘वीरो! तुमलोग नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र साथ लेकर शीघ्र ही जनस्थान को, जहाँ पहले खर रहता था, जाओ। वह स्थान इस समय उजाड़ पड़ा है

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · २१ ॥
तत्रास्यतां जनस्थाने शून्ये निहतराक्षसे। पौरुषं बलमाश्रित्य त्रासमुत्सृज्य दूरतः॥

tatrāsyatāṁ janasthāne śūnye nihatarākṣase।
pauruṣaṁ balamāśritya trāsamutsṛjya dūrataḥ॥

‘वहाँ के सभी राक्षस मार डाले गये हैं। उस सूने जनस्थान में तुमलोग अपने ही बल-पौरुष का भरोसा करके भय को दूर हटाकर रहो

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · २२ ॥
बहुसैन्यं महावीर्यं जनस्थाने निवेशितम्। सदूषणखरं युद्धे निहतं रामसायकैः॥

bahusainyaṁ mahāvīryaṁ janasthāne niveśitam।
sadūṣaṇakharaṁ yuddhe nihataṁ rāmasāyakaiḥ॥

‘मैंने वहाँ बहुत बड़ी सेना के साथ महापराक्रमी खर और दूषण को बसा रखा था, किंतु वे सब-के-सब युद्ध में राम के बाणों से मारे गये

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · २३ ॥
ततः क्रोधो ममापूर्वो धैर्यस्योपरि वर्धते। वैरं सुमहज्जातं रामं प्रति सुदारुणम्॥

tataḥ krodho mamāpūrvo dhairyasyopari vardhate।
vairaṁ ca sumahajjātaṁ rāmaṁ prati sudāruṇam॥

‘इससे मेरे मन में अपूर्व क्रोध जाग उठा है और वह धैर्य की सीमा से ऊपर उठकर बढ़ने लगा है; इसीलिये राम के साथ मेरा बड़ा भारी और भयंकर वैर ठन गया है

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · २४ ॥
निर्यातयितुमिच्छामि तच्च वैरं महारिपोः। नहि लप्स्याम्यहं निद्रामहत्वा संयुगे रिपुम्॥

niryātayitumicchāmi tacca vairaṁ mahāripoḥ।
nahi lapsyāmyahaṁ nidrāmahatvā saṁyuge ripum॥

‘मैं अपने महान् शत्रु से उस वैर का बदला लेना चाहता हूँ। उस शत्रु को संग्राम में मारे बिना मैं चैन से सो नहीं सकूँगा

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · २५ ॥
तं त्विदानीमहं हत्वा खरदूषणघातिनम्। रामं शर्मोपलप्स्यामि धनं लब्ध्वेव निर्धनः॥

taṁ tvidānīmahaṁ hatvā kharadūṣaṇaghātinam।
rāmaṁ śarmopalapsyāmi dhanaṁ labdhveva nirdhanaḥ॥

‘राम ने खर और दूषण का वध किया है, अतः मैं भी इस समय उन्हें मारकर जब बदला चुका लूँगा, तभी मुझे शान्ति मिलेगी। जैसे निर्धन मनुष्य धन पाकर संतुष्ट होता है, उसी प्रकार मैं राम का वध करके शान्ति पा सकूँगा

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · २६ ॥
जनस्थाने वसद्भिस्तु भवद्भी राममाश्रिता। प्रवृत्तिरुपनेतव्या किं करोतीति तत्त्वतः॥

janasthāne vasadbhistu bhavadbhī rāmamāśritā।
pravṛttirupanetavyā kiṁ karotīti tattvataḥ॥

‘जनस्थान में रहकर तुमलोग रामचन्द्र का समाचार जानो और वे कब क्या कर रहे हैं, इसका ठीक-ठीक पता लगाते रहो और जो कुछ मालूम हो, उसकी सूचना मेरे पास भेज दिया करो

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · २७ ॥
अप्रमादाच्च गन्तव्यं सर्वैरेव निशाचरैः। कर्तव्यश्च सदा यत्नो राघवस्य वधं प्रति॥

apramādācca gantavyaṁ sarvaireva niśācaraiḥ।
kartavyaśca sadā yatno rāghavasya vadhaṁ prati॥

‘तुम सभी निशाचर सावधानी के साथ वहाँ जाना और राम के वध के लिये सदा प्रयत्न करते रहना

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · २८ ॥
युष्माकं तु बलं ज्ञातं बहुशो रणमूर्धनि। अतश्चास्मिञ्जनस्थाने मया यूयं निवेशिताः॥

yuṣmākaṁ tu balaṁ jñātaṁ bahuśo raṇamūrdhani।
ataścāsmiñjanasthāne mayā yūyaṁ niveśitāḥ॥

‘मुझे अनेक बार युद्ध के मुहाने पर तुमलोगों के बल का परिचय मिल चुका है; इसीलिये इस जनस्थान में मैंने तुम्हीं लोगों को रखने का निश्चय किया है’

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · २९ ॥
ततः प्रियं वाक्यमुपेत्य राक्षसा महार्थमष्टावभिवाद्य रावणम्। विहाय लङ्कां सहिताः प्रतस्थिरे यतो जनस्थानमलक्ष्यदर्शनाः॥

tataḥ priyaṁ vākyamupetya rākṣasā
mahārthamaṣṭāvabhivādya rāvaṇam।
vihāya laṅkāṁ sahitāḥ pratasthire
yato janasthānamalakṣyadarśanāḥ॥

रावण की यह महान् प्रयोजन से भरी हुई प्रिय बातें सुनकर वे आठों राक्षस उसे प्रणाम करके अदृश्य हो एक साथ ही लङ्का को छोड़कर जनस्थान की ओर प्रस्थित हो गये

English translation coming soon.

॥ ३ · ५४ · ३० ॥
ततस्तु सीतामुपलभ्य रावणः सुसम्प्रहृष्टः परिगृह्य मैथिलीम्। प्रसज्य रामेण वैरमुत्तमं बभूव मोहान्मुदितः रावणः॥

tatastu sītāmupalabhya rāvaṇaḥ
susamprahṛṣṭaḥ parigṛhya maithilīm।
prasajya rāmeṇa ca vairamuttamaṁ
babhūva mohānmuditaḥ sa rāvaṇaḥ॥

तदनन्तर मिथिलेशकुमारी सीता को पाकर उन्हें राक्षसियों की देख-रेख में सौंपकर रावण को बड़ा हर्ष हुआ। श्रीराम के साथ भारी वैर ठानकर वह राक्षस मोहवश आनन्द मानने लगा

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुष्पञ्चाशः सर्गः ॥ ५४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौवनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५४ ॥