वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ५१ · ४६ श्लोकाःSarga 51 · 46 ślokas

जटायु तथा रावणका घोर युद्ध और रावणके द्वारा जटायुका वध

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ५१ — painting

॥ ३ · ५१ · २२–३३ ॥

दण्डकारण्यशिखरोपरि गगने वृद्धोऽपि विशालकायो गृध्रराजो जटायुः—विस्तीर्णपक्षो नीलजीमूतश्यामः श्वेतवक्षा दीप्तपिङ्गनयनः—दशाननं विंशतिभुजं रावणं नखचञ्चुभ्यां दृढं गृहीत्वा युध्यते; रावणस्तु ताम्ररक्तनयनस्तप्तकाञ्चनकुण्डलधरो वामबाहुना रुदतीं सीतां धारयन् अन्येन करेण एकं खड्गमुद्यच्छति, शेषायुधानि नष्टानि; अधस्ताच्च तरुशिखरेषु भग्नः स्वर्णरथः पिशाचमुखखराश्च पतिताः; सीता वल्कलवसना शोकाकुला तं पक्षिणं प्रति करं प्रसारयति।

दंडकारण्य के शिखरों के ऊपर आकाश में वृद्ध किंतु विशालकाय गृध्रराज जटायु—फैले पंख, नीले मेघ-से श्याम शरीर पर श्वेत छाती, दमकती पीली आँखें—दशमुख, बीस भुजाओंवाले रावण को अपने नखों और चोंच से जकड़कर युद्ध कर रहे हैं; रावण ताँबे-सी लाल आँखें और तपे सोने के कुंडल पहने, बायीं बाँह में रोती हुई सीता को दबाए दूसरे हाथ में एक तलवार उठाए है—उसके शेष सब हथियार नष्ट हो चुके हैं; नीचे पेड़ों की चोटियों पर टूटा हुआ सुनहरा रथ और पिशाच-मुख गधे गिरे पड़े हैं; वल्कल-वसना सीता शोक से व्याकुल होकर उस पक्षी की ओर हाथ बढ़ा रही हैं।

High over the Dandaka treetops the aged but colossal vulture-king Jatayu — vast wings spread, storm-cloud dark plumage with a pale white breast, fierce golden eyes — grips the ten-headed, twenty-armed Ravana with talon and beak and fights him; Ravana, with copper-red eyes and molten-gold earrings, clutches the weeping Sita in his left arm and raises a single drawn sword in another hand, his other weapons all destroyed; below, among the treetops, tumble the wreck of his golden chariot and its ghoul-faced donkey-steeds; Sita, in her forest sari, twists in grief and reaches out toward the great bird.

॥ ३ · ५१ · १ ॥
इत्युक्तः क्रोधताम्राक्षस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः। राक्षसेन्द्रोऽभिदुद्राव पतगेन्द्रममर्षणः॥

ityuktaḥ krodhatāmrākṣastaptakāñcanakuṇḍalaḥ।
rākṣasendro'bhidudrāva patagendramamarṣaṇaḥ॥

जटायु के ऐसा कहने पर राक्षसराज रावण क्रोध से आँखें लाल किये अमर्ष में भरकर उन पक्षिराज की ओर दौड़ा। उस समय उसके कानों में तपाये हुए सोने के कुण्डल झलमला रहे थे

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॥ ३ · ५१ · २ ॥
सम्प्रहारस्तुमुलस्तयोस्तस्मिन् महामृधे। बभूव वातोद्धुतयोर्मेघयोर्गगने यथा॥

sa samprahārastumulastayostasmin mahāmṛdhe।
babhūva vātoddhutayormeghayorgagane yathā॥

उस महासमर में उन दोनों का एक-दूसरे पर भयंकर प्रहार होने लगा, मानो आकाश में वायु से उड़ाये गये दो मेघखण्ड आपस में टकरा गये हों

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॥ ३ · ५१ · ३ ॥
तद् बभूवाद्भुतं युद्धं गृध्रराक्षसयोस्तदा। सपक्षयोर्माल्यवतोर्महापर्वतयोरिव॥

tad babhūvādbhutaṁ yuddhaṁ gṛdhrarākṣasayostadā।
sapakṣayormālyavatormahāparvatayoriva॥

उस समय गृध्र और राक्षस में वह बड़ा अद्भुत युद्ध होने लगा, मानो दो पंखधारी माल्यवान् पर्वत एक-दूसरे से भिड़ गये हों

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॥ ३ · ५१ · ४ ॥
ततो नालीकनाराचैस्तीक्ष्णाग्रैश्च विकर्णिभिः। अभ्यवर्षन्महाघोरैर्गृध्रराजं महाबलम्॥

tato nālīkanārācaistīkṣṇāgraiśca vikarṇibhiḥ।
abhyavarṣanmahāghorairgṛdhrarājaṁ mahābalam॥

रावण ने महाबली गृध्रराज जटायु पर नालीक, नाराच तथा तीखे अग्रभागवाले विकर्णी नामक महाभयंकर अस्त्रों की वर्षा आरम्भ कर दी

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॥ ३ · ५१ · ५ ॥
तानि शरजालानि गृध्रः पत्ररथेश्वरः। जटायुः प्रतिजग्राह रावणास्त्राणि संयुगे॥

sa tāni śarajālāni gṛdhraḥ patraratheśvaraḥ।
jaṭāyuḥ pratijagrāha rāvaṇāstrāṇi saṁyuge॥

पक्षिराज गृध्रजातीय जटायु ने युद्ध में रावण के उन बाणसमूहों तथा अन्य अस्त्रों का आघात सह लिया

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॥ ३ · ५१ · ६ ॥
तस्य तीक्ष्णनखाभ्यां तु चरणाभ्यां महाबलः। चकार बहुधा गात्रे व्रणान् पतगसत्तमः॥

tasya tīkṣṇanakhābhyāṁ tu caraṇābhyāṁ mahābalaḥ।
cakāra bahudhā gātre vraṇān patagasattamaḥ॥

साथ ही उन महाबली पक्षिशिरोमणि ने अपने तीखे नखोंवाले पंजों से मार-मारकर रावण के शरीर में बहुत-से घाव कर दिये

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॥ ३ · ५१ · ७ ॥
अथ क्रोधाद् दशग्रीवो जग्राह दश मार्गणान्। मृत्युदण्डनिभान् घोरान् शत्रोर्निधनकांक्षया॥

atha krodhād daśagrīvo jagrāha daśa mārgaṇān।
mṛtyudaṇḍanibhān ghorān śatrornidhanakāṁkṣayā॥

तब दशग्रीव ने क्रोध में भरकर अपने शत्रु को मार डालने की इच्छा से दस बाण हाथ में लिये, जो कालदण्ड के समान भयंकर थे

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॥ ३ · ५१ · ८ ॥
तैर्बाणैर्महावीर्यः पूर्णमुक्तैरजिह्मगैः। बिभेद निशितैस्तीक्ष्णैर्गृध्रं घोरैः शिलीमुखैः॥

sa tairbāṇairmahāvīryaḥ pūrṇamuktairajihmagaiḥ।
bibheda niśitaistīkṣṇairgṛdhraṁ ghoraiḥ śilīmukhaiḥ॥

महापराक्रमी रावण ने धनुष को पूर्णतः खींचकर छोड़े गये उन सीधे जानेवाले तीखे, पैने और भयंकर बाणोंद्वारा, जिनके मुख पर शल्य (काँटे) लगे हुए थे। गृध्रराज को क्षत-विक्षत कर दिया

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॥ ३ · ५१ · ९ ॥
राक्षसरथे पश्यञ्जानकीं बाष्पलोचनाम्। अचिन्तयित्वा बाणांस्तान् राक्षसं समभिद्रवत्॥

sa rākṣasarathe paśyañjānakīṁ bāṣpalocanām।
acintayitvā bāṇāṁstān rākṣasaṁ samabhidravat॥

जटायु ने देखा, जनकनन्दिनी सीता राक्षस के रथ पर बैठी हैं और नेत्रों से आँसू बहा रही हैं। उन्हें देखकर गृध्रराज अपने शरीर में लगते हुए उन बाणों की परवा न करके सहसा उस राक्षस पर टूट पड़े

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॥ ३ · ५१ · १० ॥
ततोऽस्य सशरं चापं मुक्तामणिविभूषितम्। चरणाभ्यां महातेजा बभञ्ज पतगोत्तमः॥

tato'sya saśaraṁ cāpaṁ muktāmaṇivibhūṣitam।
caraṇābhyāṁ mahātejā babhañja patagottamaḥ॥

महातेजस्वी पक्षिराज जटायु ने मोती-मणियों से विभूषित, बाणसहित रावण के धनुष को अपने दोनों पैरों से मारकर तोड़ दिया

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॥ ३ · ५१ · ११ ॥
ततोऽन्यद् धनुरादाय रावणः क्रोधमूर्च्छितः। ववर्ष शरवर्षाणि शतशोऽथ सहस्रशः॥

tato'nyad dhanurādāya rāvaṇaḥ krodhamūrcchitaḥ।
vavarṣa śaravarṣāṇi śataśo'tha sahasraśaḥ॥

फिर तो रावण क्रोध से भर गया और दूसरा धनुष हाथ में लेकर उसने सैकड़ों-हजारों बाणों की झड़ी लगा दी

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॥ ३ · ५१ · १२ ॥
शरैरावारितस्तस्य संयुगे पतगेश्वरः। कुलायमभिसम्प्राप्तः पक्षिवच्च बभौ तदा॥

śarairāvāritastasya saṁyuge patageśvaraḥ।
kulāyamabhisamprāptaḥ pakṣivacca babhau tadā॥

उस समय उस युद्धस्थल में गृध्रराज के चारों ओर बाणों का जाल-सा तन गया। वे उस समय घोंसले में बैठे हुए पक्षी के समान प्रतीत होने लगे

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॥ ३ · ५१ · १३ ॥
तानि शरजालानि पक्षाभ्यां तु विधूय ह। चरणाभ्यां महातेजा बभञ्जास्य महद् धनुः॥

sa tāni śarajālāni pakṣābhyāṁ tu vidhūya ha।
caraṇābhyāṁ mahātejā babhañjāsya mahad dhanuḥ॥

तब महातेजस्वी जटायु ने अपने दोनों पंखों से ही उन बाणों को उड़ा दिया और पंजों की मार से पुनः उसके धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर डाले

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॥ ३ · ५१ · १४ ॥
तच्चाग्निसदृशं दीप्तं रावणस्य शरावरम्। पक्षाभ्यां महातेजा व्यधुनोत् पतगेश्वरः॥

taccāgnisadṛśaṁ dīptaṁ rāvaṇasya śarāvaram।
pakṣābhyāṁ ca mahātejā vyadhunot patageśvaraḥ॥

रावण का कवच अग्नि के समान प्रज्वलित हो रहा था। महातेजस्वी पक्षिराज ने उसे भी पंखों से ही मारकर छिन्न-भिन्न कर दिया

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॥ ३ · ५१ · १५ ॥
काञ्चनोरश्छदान् दिव्यान् पिशाचवदनान् खरान्। तांश्चास्य जवसम्पन्नाञ्जघान समरे बली॥

kāñcanoraśchadān divyān piśācavadanān kharān।
tāṁścāsya javasampannāñjaghāna samare balī॥

तत्पश्चात् उन बलवान् वीर ने समराङ्गण में पिशाच के-से मुखवाले उन वेगशाली गधों को भी, जिनकी छाती पर सोने के कवच बँधे हुए थे, मार डाला

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॥ ३ · ५१ · १६ ॥
अथ त्रिवेणुसम्पन्नं कामगं पावकार्चिषम्। मणिसोपानचित्राङ्गं बभञ्ज महारथम्॥

atha triveṇusampannaṁ kāmagaṁ pāvakārciṣam।
maṇisopānacitrāṅgaṁ babhañja ca mahāratham॥

तदनन्तर अग्नि की भाँति दीप्तिमान्, मणिमय सोपान से विचित्र अङ्गोंवाले तथा इच्छानुसार चलनेवाले उसके त्रिवेणुसम्पन्न विशाल रथ को भी तोड़-फोड़ डाला

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॥ ३ · ५१ · १७ ॥
पूर्णचन्द्रप्रतीकाशं छत्रं व्यजनैः सह। पातयामास वेगेन ग्राहिभी राक्षसैः सह॥

pūrṇacandrapratīkāśaṁ chatraṁ ca vyajanaiḥ saha।
pātayāmāsa vegena grāhibhī rākṣasaiḥ saha॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५१ · १८ ॥
सारथेश्चास्य वेगेन तुण्डेन महच्छिरः। पुनर्व्यपहनच्छ्रीमान् पक्षिराजो महाबलः॥

sāratheścāsya vegena tuṇḍena ca mahacchiraḥ।
punarvyapahanacchrīmān pakṣirājo mahābalaḥ॥

॥ १७–१८ ॥

इसके बाद पूर्ण चन्द्रमा की भाँति सुशोभित छत्र और चवँर को भी उन्हें धारण करनेवाले राक्षसों के साथ ही वेगपूर्वक मार गिराया। फिर उन महाबली तेजस्वी पक्षिराज ने बड़े वेग से चोंच मारकर रावण के सारथि का विशाल मस्तक भी धड़ से अलग कर दिया

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॥ ३ · ५१ · १९ ॥
भग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः। अङ्केनादाय वैदेहीं पपात भुवि रावणः॥

sa bhagnadhanvā viratho hatāśvo hatasārathiḥ।
aṅkenādāya vaidehīṁ papāta bhuvi rāvaṇaḥ॥

इस प्रकार जब धनुष टूटा, रथ चौपट हुआ, घोड़े मारे गये और सारथि भी काल के गाल में चला गया, तब रावण सीता को गोद में लिये-लिये पृथ्वी पर गिर पड़ा

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॥ ३ · ५१ · २० ॥
दृष्ट्वा निपतितं भूमौ रावणं भग्नवाहनम्। साधु साध्विति भूतानि गृध्रराजमपूजयन्॥

dṛṣṭvā nipatitaṁ bhūmau rāvaṇaṁ bhagnavāhanam।
sādhu sādhviti bhūtāni gṛdhrarājamapūjayan॥

रथ टूट जाने से रावण को धरती पर पड़ा देख सब प्राणी ‘साधु-साधु’ कहकर गृध्रराज की प्रशंसा करने लगे

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॥ ३ · ५१ · २१ ॥
परिश्रान्तं तु तं दृष्ट्वा जरया पक्षियूथपम्। उत्पपात पुनर्हृष्टो मैथिलीं गृह्य रावणः॥

pariśrāntaṁ tu taṁ dṛṣṭvā jarayā pakṣiyūthapam।
utpapāta punarhṛṣṭo maithilīṁ gṛhya rāvaṇaḥ॥

वृद्धावस्था के कारण पक्षिराज को थका हुआ देख रावण को बड़ा हर्ष हुआ और वह मैथिली को लिये हुए फिर आकाश में उड़ चला

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॥ ३ · ५१ · २२ ॥
तं प्रहृष्टं निधायाङ्के रावणं जनकात्मजाम्। गच्छन्तं खड्गशेषं प्रणष्टहतसाधनम्॥

taṁ prahṛṣṭaṁ nidhāyāṅke rāvaṇaṁ janakātmajām।
gacchantaṁ khaḍgaśeṣaṁ ca praṇaṣṭahatasādhanam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५१ · २३ ॥
गृध्रराजः समुत्पत्य रावणं समभिद्रवत्। समावार्य महातेजा जटायुरिदमब्रवीत्॥

gṛdhrarājaḥ samutpatya rāvaṇaṁ samabhidravat।
samāvārya mahātejā jaṭāyuridamabravīt॥

॥ २२–२३ ॥

जनककिशोरी को गोद में लेकर जब रावण प्रसन्नतापूर्वक जाने लगा, उस समय उसके अन्य सब साधन तो नष्ट हो गये थे, किंतु एक तलवार उसके पास शेष रह गयी थी। उसे जाते देख महातेजस्वी गृध्रराज जटायु उड़कर रावण की ओर दौड़े और उसे रोककर इस प्रकार बोले—

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॥ ३ · ५१ · २४ ॥
वज्रसंस्पर्शबाणस्य भार्यां रामस्य रावण। अल्पबुद्धे हरस्येनां वधाय खलु रक्षसाम्॥

vajrasaṁsparśabāṇasya bhāryāṁ rāmasya rāvaṇa।
alpabuddhe harasyenāṁ vadhāya khalu rakṣasām॥

‘मन्दबुद्धि रावण! जिनके बाणों का स्पर्श वज्र के समान है, उन श्रीराम की इन धर्मपत्नी सीता को तुम अवश्य राक्षसों के वध के लिये ही लिये जा रहे हो

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॥ ३ · ५१ · २५ ॥
समित्रबन्धुः सामात्यः सबलः सपरिच्छदः। विषपानं पिबस्येतत् पिपासित इवोदकम्॥

samitrabandhuḥ sāmātyaḥ sabalaḥ saparicchadaḥ।
viṣapānaṁ pibasyetat pipāsita ivodakam॥

‘जैसे प्यासा मनुष्य जल पी रहा हो, उसी प्रकार तुम मित्र, बन्धु, मन्त्री, सेना तथा परिवारसहित यह विषपान कर रहे हो

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॥ ३ · ५१ · २६ ॥
अनुबन्धमजानन्तः कर्मणामविचक्षणाः। शीघ्रमेव विनश्यन्ति यथा त्वं विनशिष्यसि॥

anubandhamajānantaḥ karmaṇāmavicakṣaṇāḥ।
śīghrameva vinaśyanti yathā tvaṁ vinaśiṣyasi॥

‘अपने कर्मों का परिणाम न जाननेवाले अज्ञानीजन जैसे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार तुम भी विनाश के गर्त में गिरोगे

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॥ ३ · ५१ · २७ ॥
बद्धस्त्वं कालपाशेन क्व गतस्तस्य मोक्ष्यसे। वधाय बडिशं गृह्य सामिषं जलजो यथा॥

baddhastvaṁ kālapāśena kva gatastasya mokṣyase।
vadhāya baḍiśaṁ gṛhya sāmiṣaṁ jalajo yathā॥

‘तुम कालपाश में बँध गये हो। कहाँ जाकर उससे छुटकारा पाओगे? जैसे जल में उत्पन्न होनेवाला मत्स्य मांसयुक्त बंसी को अपने वध के लिये ही निगल जाता है, उसी प्रकार तुम भी अपने मौत के लिये ही सीता का अपहरण करते हो

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॥ ३ · ५१ · २८ ॥
नहि जातु दुराधर्षौ काकुत्स्थौ तव रावण। धर्षणं चाश्रमस्यास्य क्षमिष्येते तु राघवौ॥

nahi jātu durādharṣau kākutsthau tava rāvaṇa।
dharṣaṇaṁ cāśramasyāsya kṣamiṣyete tu rāghavau॥

‘रावण! ककुत्स्थकुलभूषण रघुकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई दुर्धर्ष वीर हैं। वे तुम्हारे द्वारा अपने आश्रम पर किये गये इस अपमानजनक अपराध को कभी क्षमा नहीं करेंगे

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॥ ३ · ५१ · २९ ॥
यथा त्वया कृतं कर्म भीरुणा लोकगर्हितम्। तस्कराचरितो मार्गो नैष वीरनिषेवितः॥

yathā tvayā kṛtaṁ karma bhīruṇā lokagarhitam।
taskarācarito mārgo naiṣa vīraniṣevitaḥ॥

‘तुम कायर और डरपोक हो। तुमने जैसा लोकनिन्दित कर्म किया है, यह चोरों का मार्ग है। वीर पुरुष ऐसे मार्ग का आश्रय नहीं लेते हैं

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॥ ३ · ५१ · ३० ॥
युद्ध्यस्व यदि शूरोऽसि मुहूर्तं तिष्ठ रावण। शयिष्यसे हतो भूमौ यथा भ्राता खरस्तथा॥

yuddhyasva yadi śūro'si muhūrtaṁ tiṣṭha rāvaṇa।
śayiṣyase hato bhūmau yathā bhrātā kharastathā॥

‘रावण! यदि शूरवीर हो तो दो घड़ी और ठहरो और मुझसे युद्ध करो। फिर तो तुम भी उसी प्रकार मरकर पृथ्वी पर सो जाओगे, जैसे तुम्हारा भाई खर सोया था

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॥ ३ · ५१ · ३१ ॥
परेतकाले पुरुषो यत् कर्म प्रतिपद्यते। विनाशायात्मनोऽधर्म्यं प्रतिपन्नोऽसि कर्म तत्॥

paretakāle puruṣo yat karma pratipadyate।
vināśāyātmano'dharmyaṁ pratipanno'si karma tat॥

‘विनाश के समय पुरुष जैसा कर्म करता है, तुमने भी अपने विनाश के लिये वैसे ही अधर्मपूर्ण कर्म को अपनाया है

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॥ ३ · ५१ · ३२ ॥
पापानुबन्धो वै यस्य कर्मणः को नु तत् पुमान्। कुर्वीत लोकाधिपतिः स्वयंभूर्भगवानपि॥

pāpānubandho vai yasya karmaṇaḥ ko nu tat pumān।
kurvīta lokādhipatiḥ svayaṁbhūrbhagavānapi॥

‘जिस कर्म को करने से कर्ता का पाप के फल से सम्बन्ध होता है, उस कर्म को कौन पुरुष निश्चितरूप से कर सकता है। लोकपाल इन्द्र तथा भगवान् स्वयम्भू (ब्रह्मा) भी वैसा कर्म नहीं कर सकते’

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॥ ३ · ५१ · ३३ ॥
एवमुक्त्वा शुभं वाक्यं जटायुस्तस्य रक्षसः। निपपात भृशं पृष्ठे दशग्रीवस्य वीर्यवान्॥

evamuktvā śubhaṁ vākyaṁ jaṭāyustasya rakṣasaḥ।
nipapāta bhṛśaṁ pṛṣṭhe daśagrīvasya vīryavān॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५१ · ३४ ॥
तं गृहीत्वा नखैस्तीक्ष्णैर्विददार समन्ततः। अधिरूढो गजारोहो यथा स्याद् दुष्टवारणम्॥

taṁ gṛhītvā nakhaistīkṣṇairvidadāra samantataḥ।
adhirūḍho gajāroho yathā syād duṣṭavāraṇam॥

॥ ३३–३४ ॥

इस प्रकार उत्तम वचन कहकर पराक्रमी जटायु उस राक्षस दशग्रीव की पीठ पर बड़े वेग से जा बैठे और उसे पकड़कर अपने तीखे नखोंद्वारा चारों ओर से चीरने लगे। मानो कोई हाथीवान् किसी दुष्ट हाथी के ऊपर सवार होकर उसे अंकुश से छेद रहा हो

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॥ ३ · ५१ · ३५ ॥
विददार नखैरस्य तुण्डं पृष्ठे समर्पयन्। केशांश्चोत्पाटयामास नखपक्षमुखायुधः॥

vidadāra nakhairasya tuṇḍaṁ pṛṣṭhe samarpayan।
keśāṁścotpāṭayāmāsa nakhapakṣamukhāyudhaḥ॥

नख, पाँख और चोंच—ये ही जटायु के हथियार थे। वे नखों से खरोंचते थे, पीठ पर चोंच मारते थे और बाल पकड़कर उखाड़ लेते थे

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॥ ३ · ५१ · ३६ ॥
तथा गृध्रराजेन क्लिश्यमानो मुहुर्मुहुः। अमर्षस्फुरितोष्ठः सन् प्राकम्पत राक्षसः॥

sa tathā gṛdhrarājena kliśyamāno muhurmuhuḥ।
amarṣasphuritoṣṭhaḥ san prākampata ca rākṣasaḥ॥

इस प्रकार जब गृध्रराज ने बारंबार क्लेश पहुँचाया, तब राक्षस रावण काँप उठा। क्रोध के मारे उसके ओठ फड़कने लगे

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॥ ३ · ५१ · ३७ ॥
सम्परिष्वज्य वैदेहीं वामेनाङ्केन रावणः। तलेनाभिजघानार्तो जटायुं क्रोधमूर्च्छितः॥

sampariṣvajya vaidehīṁ vāmenāṅkena rāvaṇaḥ।
talenābhijaghānārto jaṭāyuṁ krodhamūrcchitaḥ॥

उस समय क्रोध से भरे रावण ने विदेहनन्दिनी सीता को बायीं गोद में करके अत्यन्त पीड़ित हो जटायु पर तमाचे का प्रहार किया

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॥ ३ · ५१ · ३८ ॥
जटायुस्तमतिक्रम्य तुण्डेनास्य खगाधिपः। वामबाहून् दश तदा व्यपाहरदरिंदमः॥

jaṭāyustamatikramya tuṇḍenāsya khagādhipaḥ।
vāmabāhūn daśa tadā vyapāharadariṁdamaḥ॥

परंतु उस वार को बचाकर शत्रुदमन गृध्रराज जटायु ने अपनी चोंच से मार-मारकर रावण की दसों बायीं भुजाओं को उखाड़ लिया

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॥ ३ · ५१ · ३९ ॥
संछिन्नबाहोः सद्यो वै बाहवः सहसाभवन्। विषज्वालावलीयुक्ता वल्मीकादिव पन्नगाः॥

saṁchinnabāhoḥ sadyo vai bāhavaḥ sahasābhavan।
viṣajvālāvalīyuktā valmīkādiva pannagāḥ॥

उन बाँहों के कट जाने पर बाँबी से प्रकट होनेवाले विष की ज्वाला-मालाओं से युक्त सर्पों की भाँति तुरंत दूसरी नयी भुजाएँ सहसा उत्पन्न हो गयीं

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॥ ३ · ५१ · ४० ॥
ततः क्रोधाद् दशग्रीवः सीतामुत्सृज्य वीर्यवान्। मुष्टिभ्यां चरणाभ्यां गृध्रराजमपोथयत्॥

tataḥ krodhād daśagrīvaḥ sītāmutsṛjya vīryavān।
muṣṭibhyāṁ caraṇābhyāṁ ca gṛdhrarājamapothayat॥

तब पराक्रमी दशानन ने सीता को तो छोड़ दिया और गृध्रराज को क्रोधपूर्वक मुक्कों और लातों से मारना आरम्भ किया

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॥ ३ · ५१ · ४१ ॥
ततो मुहूर्तं संग्रामो बभूवातुलवीर्ययोः। राक्षसानां मुख्यस्य पक्षिणां प्रवरस्य च॥

tato muhūrtaṁ saṁgrāmo babhūvātulavīryayoḥ।
rākṣasānāṁ ca mukhyasya pakṣiṇāṁ pravarasya ca॥

उस समय उन दोनों अनुपम पराक्रमी वीर राक्षसराज रावण और पक्षिराज जटायु में दो घड़ीतक घोर संग्राम होता रहा

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॥ ३ · ५१ · ४२ ॥
तस्य व्यायच्छमानस्य रामस्यार्थे रावणः। पक्षौ पादौ पार्श्वौ खड्गमुद्धृत्य सोऽच्छिनत्॥

tasya vyāyacchamānasya rāmasyārthe sa rāvaṇaḥ।
pakṣau pādau ca pārśvau ca khaḍgamuddhṛtya so'cchinat॥

तदनन्तर रावण ने तलवार निकाली और श्रीरामचन्द्रजी के लिये पराक्रम करनेवाले जटायु के दोनों पंख, पैर तथा पार्श्वभाग काट डाले

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॥ ३ · ५१ · ४३ ॥
च्छिन्नपक्षः सहसा रक्षसा रौद्रकर्मणा। निपपात महागृध्रो धरण्यामल्पजीवितः॥

sa cchinnapakṣaḥ sahasā rakṣasā raudrakarmaṇā।
nipapāta mahāgṛdhro dharaṇyāmalpajīvitaḥ॥

भयंकर कर्म करनेवाले उस राक्षस के द्वारा सहसा पंख काट लिये जाने पर महागृध्र जटायु पृथ्वी पर गिर पड़े। अब वे थोड़ी ही देर के मेहमान थे

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॥ ३ · ५१ · ४४ ॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ क्षतजार्द्रं जटायुषम्। अभ्यधावत वैदेही स्वबन्धुमिव दुःखिता॥

taṁ dṛṣṭvā patitaṁ bhūmau kṣatajārdraṁ jaṭāyuṣam।
abhyadhāvata vaidehī svabandhumiva duḥkhitā॥

अपने बान्धव के समान जटायु को खून से लथपथ होकर पृथ्वी पर पड़ा देख सीता दुःख से व्याकुल हो उनकी ओर दौड़ीं

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॥ ३ · ५१ · ४५ ॥
तं नीलजीमूतनिकाशकल्पं सपाण्डुरोरस्कमुदारवीर्यम्। ददर्श लङ्काधिपतिः पृथिव्यां जटायुषं शान्तमिवाग्निदावम्॥

taṁ nīlajīmūtanikāśakalpaṁ
sapāṇḍuroraskamudāravīryam।
dadarśa laṅkādhipatiḥ pṛthivyāṁ
jaṭāyuṣaṁ śāntamivāgnidāvam॥

जटायु के शरीर की कान्ति नीले मेघ के समान काली थी। उनकी छाती का रंग श्वेत था। वे बड़े पराक्रमी थे, तो भी उस समय बुझे हुए दावानल के समान पृथ्वी पर पड़ गये। लङ्कापति रावण ने उन्हें इस अवस्था में देखा

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॥ ३ · ५१ · ४६ ॥
ततस्तु तं पत्ररथं महीतले निपातितं रावणवेगमर्दितम्। पुनश्च संगृह्य शशिप्रभानना रुरोद सीता जनकात्मजा तदा॥

tatastu taṁ patrarathaṁ mahītale
nipātitaṁ rāvaṇavegamarditam।
punaśca saṁgṛhya śaśiprabhānanā
ruroda sītā janakātmajā tadā॥

तदनन्तर रावण के वेग से रौंदे जाकर धराशायी हुए जटायु को पकड़कर चन्द्रमुखी जनकनन्दिनी सीता पुनः उस समय वहाँ रोने लगीं

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकपञ्चाशः सर्गः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५१ ॥