वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ५० · २८ श्लोकाःSarga 50 · 28 ślokas

जटायुका रावणको सीताहरणके दुष्कर्मसे निवृत्त होनेके लिये समझाना और अन्तमें युद्धके लिये ललकारना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ५० — painting

॥ ३ · ५० · २–३ ॥

दण्डकारण्योपरि विवृतगगने वृद्धोऽपि विशालकायो गृध्रराजो जटायुः—प्रज्ञचक्षुः स्वर्णवक्रचञ्चुर्विस्तीर्णपिङ्गपक्षः—रक्षोराजस्य पलायनमार्गं पक्षौ विस्तार्य निरुध्य युद्धाय तमाह्वयति; अग्रे दशाननो विंशतिभुजो रावणो जटिलमुकुटो रक्तनयन एकेन बाहुना बन्दिनीं सीतां धारयन् स्वर्णरथं संगृह्य क्रोधात् खड्गं प्रति करमाक्षिपति; सीता तु वल्कलवसना शोकाकुला सहसा आशान्विता एकं करं तं पक्षिणं प्रति प्रसारयति।

दंडकारण्य के ऊपर खुले आकाश में वृद्ध किंतु विशालकाय गृध्रराज जटायु—ज्ञानभरी आँखें, सुनहरी टेढ़ी चोंच, फैले भूरे-ताम्र पंख—अपने दोनों पंख फैलाकर राक्षसराज का भागने का मार्ग रोककर उसे युद्ध के लिये ललकार रहे हैं; सामने दशमुख, बीस भुजाओंवाला रावण जटित मुकुट पहने, लाल आँखें किये, एक बाँह में बंदिनी सीता को दबाए अपने सुनहरे रथ को रोककर क्रोध से तलवार की मूठ की ओर हाथ बढ़ा रहा है; वल्कल-वसना सीता शोक से व्याकुल पर अचानक आशा से भरकर एक हाथ उस पक्षी की ओर बढ़ा रही हैं।

High in the open sky above the Dandaka forest, the aged yet colossal vulture-king Jatayu — wise-eyed, with a great hooked golden beak and vast bronze-and-umber wings spread wide — bars the demon-king's flight and challenges him to battle; before him the ten-headed, twenty-armed Ravana, crowned and red-eyed, one arm clamped about the captive Sita, reins his golden chariot short and flings a hand to his sword-hilt in fury; Sita, in her forest sari, grief-stricken yet suddenly hopeful, reaches out one hand toward the great bird.

॥ ३ · ५० · १ ॥
तं शब्दमवसुप्तस्तु जटायुरथ शुश्रुवे। निरैक्षद् रावणं क्षिप्रं वैदेहीं ददर्श सः॥

taṁ śabdamavasuptastu jaṭāyuratha śuśruve।
niraikṣad rāvaṇaṁ kṣipraṁ vaidehīṁ ca dadarśa saḥ॥

जटायु उस समय सो रहे थे। उसी अवस्था में उन्होंने सीता की वह करुण पुकार सुनी। सुनते ही तुरंत आँख खोलकर उन्होंने विदेहनन्दिनी सीता तथा रावण को देखा

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॥ ३ · ५० · २ ॥
ततः पर्वतशृङ्गाभस्तीक्ष्णतुण्डः खगोत्तमः। वनस्पतिगतः श्रीमान् व्याजहार शुभां गिरम्॥

tataḥ parvataśṛṅgābhastīkṣṇatuṇḍaḥ khagottamaḥ।
vanaspatigataḥ śrīmān vyājahāra śubhāṁ giram॥

पक्षियों में श्रेष्ठ श्रीमान् जटायु का शरीर पर्वत-शिखर के समान ऊँचा था और उनकी चोंच बड़ी ही तीखी थी। वे पेड़ पर बैठे-ही-बैठे रावण को लक्ष्य करके यह शुभ वचन बोले—

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॥ ३ · ५० · ३ ॥
दशग्रीव स्थितो धर्मे पुराणे सत्यसंश्रयः। भ्रातस्त्वं निन्दितं कर्म कर्तुं नार्हसि साम्प्रतम्॥ जटायुर्नाम नाम्नाहं गृध्रराजो महाबलः।

daśagrīva sthito dharme purāṇe satyasaṁśrayaḥ।
bhrātastvaṁ ninditaṁ karma kartuṁ nārhasi sāmpratam॥
jaṭāyurnāma nāmnāhaṁ gṛdhrarājo mahābalaḥ।

‘दशमुख रावण! मैं प्राचीन (सनातन) धर्म में स्थित, सत्यप्रतिज्ञ और महाबलवान् गृध्रराज हूँ। मेरा नाम जटायु है। भैया! इस समय मेरे सामने तुम्हें ऐसा निन्दित कर्म नहीं करना चाहिये

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॥ ३ · ५० · ४ ॥
राजा सर्वस्य लोकस्य महेन्द्रवरुणोपमः॥ लोकानां हिते युक्तो रामो दशरथात्मजः।

rājā sarvasya lokasya mahendravaruṇopamaḥ॥
lokānāṁ ca hite yukto rāmo daśarathātmajaḥ।

‘दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी सम्पूर्ण जगत् के स्वामी, इन्द्र और वरुण के समान पराक्रमी तथा सब लोगों के हित में संलग्न रहनेवाले हैं

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॥ ३ · ५० · ५ ॥
तस्यैषा लोकनाथस्य धर्मपत्नी यशस्विनी॥ सीता नाम वरारोहा यां त्वं हर्तुमिहेच्छसि।

tasyaiṣā lokanāthasya dharmapatnī yaśasvinī॥
sītā nāma varārohā yāṁ tvaṁ hartumihecchasi।

‘ये उन्हीं जगदीश्वर श्रीराम की यशस्विनी धर्मपत्नी हैं। इन सुन्दर शरीरवाली देवी का नाम सीता है, जिन्हें तुम हरकर ले जाना चाहते हो

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॥ ३ · ५० · ६ ॥
कथं राजा स्थितो धर्मे परदारान् परामृशेत्॥

kathaṁ rājā sthito dharme paradārān parāmṛśet॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५० · ७ ॥
रक्षणीया विशेषेण राजदारा महाबल। निवर्तय गतिं नीचां परदाराभिमर्शनात्॥

rakṣaṇīyā viśeṣeṇa rājadārā mahābala।
nivartaya gatiṁ nīcāṁ paradārābhimarśanāt॥

॥ ६–७ ॥

‘अपने धर्म में स्थित रहनेवाला कोई भी राजा भला परायी स्त्री का स्पर्श कैसे कर सकता है? महाबली रावण! राजाओं की स्त्रियों की तो सभी को विशेषरूप से रक्षा करनी चाहिये। परायी स्त्री के स्पर्श से जो नीच गति प्राप्त होनेवाली है, उसे अपने-आप से दूर हटा दो

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॥ ३ · ५० · ८ ॥
तत् समाचरेद् धीरो यत् परोऽस्य विगर्हयेत्। यथाऽऽत्मनस्तथान्येषां दारा रक्ष्या विमर्शनात्॥

na tat samācared dhīro yat paro'sya vigarhayet।
yathā''tmanastathānyeṣāṁ dārā rakṣyā vimarśanāt॥

‘धीर (बुद्धिमान्) वह कर्म न करे जिसकी दूसरे लोग निन्दा करें। जैसे पराये पुरुषों के स्पर्श से अपनी स्त्री की रक्षा की जाती है, उसी प्रकार दूसरों की स्त्रियों की भी रक्षा करनी चाहिये

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॥ ३ · ५० · ९ ॥
अर्थं वा यदि वा कामं शिष्टाः शास्त्रेष्वनागतम्। व्यवस्यन्त्यनुराजानं धर्मं पौलस्त्यनन्दन॥

arthaṁ vā yadi vā kāmaṁ śiṣṭāḥ śāstreṣvanāgatam।
vyavasyantyanurājānaṁ dharmaṁ paulastyanandana॥

‘पुलस्त्यकुलनन्दन! जिनकी शास्त्रों में चर्चा नहीं है ऐसे धर्म, अर्थ अथवा काम का भी श्रेष्ठ पुरुष केवल राजा की देखादेखी आचरण करने लगते हैं (अतः राजा को अनुचित या अशास्त्रीय कर्म में प्रवृत्त नहीं होना चाहिये)

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॥ ३ · ५० · १० ॥
राजा धर्मश्च कामश्च द्रव्याणां चोत्तमो निधिः। धर्मः शुभं वा पापं वा राजमूलं प्रवर्तते॥

rājā dharmaśca kāmaśca dravyāṇāṁ cottamo nidhiḥ।
dharmaḥ śubhaṁ vā pāpaṁ vā rājamūlaṁ pravartate॥

‘राजा धर्म और काम का प्रवर्तक तथा द्रव्यों की उत्तम निधि है, अतः धर्म, सदाचार अथवा पाप—इनकी प्रवृत्ति का मूल कारण राजा ही है

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॥ ३ · ५० · ११ ॥
पापस्वभावश्चपलः कथं त्वं रक्षसां वर। ऐश्वर्यमभिसम्प्राप्तो विमानमिव दुष्कृती॥

pāpasvabhāvaścapalaḥ kathaṁ tvaṁ rakṣasāṁ vara।
aiśvaryamabhisamprāpto vimānamiva duṣkṛtī॥

‘राक्षसराज! जब तुम्हारा स्वभाव ऐसा पापपूर्ण है और तुम इतने चपल हो, तब पापी को देवताओं के विमान की भाँति तुम्हें यह ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हो गया?

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॥ ३ · ५० · १२ ॥
कामस्वभावो यःसोऽसौ शक्यस्तं प्रमार्जितुम्। नहि दुष्टात्मनामार्यमावसत्यालये चिरम्॥

kāmasvabhāvo yaḥso'sau na śakyastaṁ pramārjitum।
nahi duṣṭātmanāmāryamāvasatyālaye ciram॥

‘जिसके स्वभाव में काम की प्रधानता है, उसके उस स्वभाव का परिमार्जन नहीं किया जा सकता; क्योंकि दुष्टात्माओं के घर में दीर्घकाल के बाद भी पुण्य का आवास नहीं होता

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॥ ३ · ५० · १३ ॥
विषये वा पुरे वा ते यदा रामो महाबलः। नापराध्यति धर्मात्मा कथं तस्यापराध्यसि॥

viṣaye vā pure vā te yadā rāmo mahābalaḥ।
nāparādhyati dharmātmā kathaṁ tasyāparādhyasi॥

‘जब महाबली धर्मात्मा श्रीराम तुम्हारे राज्य अथवा नगर में कोई अपराध नहीं करते हैं, तब तुम उनका अपराध कैसे कर रहे हो?

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॥ ३ · ५० · १४ ॥
यदि शूर्पणखाहेतोर्जनस्थानगतः खरः। अतिवृत्तो हतः पूर्वं रामेणाक्लिष्टकर्मणा॥

yadi śūrpaṇakhāhetorjanasthānagataḥ kharaḥ।
ativṛtto hataḥ pūrvaṁ rāmeṇākliṣṭakarmaṇā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ५० · १५ ॥
अत्र ब्रूहि यथातत्त्वं को रामस्य व्यतिक्रमः। यस्य त्वं लोकनाथस्य हत्वा भार्यां गमिष्यसि॥

atra brūhi yathātattvaṁ ko rāmasya vyatikramaḥ।
yasya tvaṁ lokanāthasya hatvā bhāryāṁ gamiṣyasi॥

॥ १४–१५ ॥

‘यदि पहले शूर्पणखा का बदला लेने के लिये चढ़कर आये हुए अत्याचारी खर का अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीराम ने वध किया तो तुम्हीं ठीक-ठीक बताओ कि इसमें श्रीराम का क्या अपराध है, जिससे तुम उन जगदीश्वर की पत्नी को हर ले जाना चाहते हो?

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॥ ३ · ५० · १६ ॥
क्षिप्रं विसृज वैदेहीं मा त्वा घोरेण चक्षुषा। दहेद् दहनभूतेन वृत्रमिन्द्राशनिर्यथा॥

kṣipraṁ visṛja vaidehīṁ mā tvā ghoreṇa cakṣuṣā।
dahed dahanabhūtena vṛtramindrāśaniryathā॥

‘रावण! अब शीघ्र ही विदेहकुमारी सीता को छोड़ दो, जिससे श्रीरामचन्द्रजी अपनी अग्नि के समान भयंकर दृष्टि से तुम्हें जलाकर भस्म न कर डालें। जैसे इन्द्र का वज्र वृत्रासुर का विनाश कर डाला था, उसी प्रकार श्रीराम की रोषपूर्ण दृष्टि दग्ध कर डालेगी

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॥ ३ · ५० · १७ ॥
सर्पमाशीविषं बद्ध्वा वस्त्रान्ते नावबुध्यसे। ग्रीवायां प्रतिमुक्तं कालपाशं पश्यसि॥

sarpamāśīviṣaṁ baddhvā vastrānte nāvabudhyase।
grīvāyāṁ pratimuktaṁ ca kālapāśaṁ na paśyasi॥

‘तुमने अपने कपड़े में विषधर सर्प को बाँध लिया है, फिर भी इस बात को समझ नहीं पाते हो। तुमने अपने गले में मौत की फाँसी डाल ली है, फिर भी यह तुम्हें सूझ नहीं रहा है

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॥ ३ · ५० · १८ ॥
भारः सौम्य भर्तव्यो यो नरं नावसादयेत्। तदन्नमपि भोक्तव्यं जीर्यते यदनामयम्॥

sa bhāraḥ saumya bhartavyo yo naraṁ nāvasādayet।
tadannamapi bhoktavyaṁ jīryate yadanāmayam॥

‘सौम्य! पुरुष को उतना ही बोझ उठाना चाहिये, जो उसे शिथिल न कर दे और वही अन्न भोजन करना चाहिये, जो पेट में जाकर पच जाय, रोग न पैदा करे

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॥ ३ · ५० · १९ ॥
यत् कृत्वा भवेद् धर्मो कीर्तिर्न यशो ध्रुवम्। शरीरस्य भवेत् खेदः कस्तत् कर्म समाचरेत्॥

yat kṛtvā na bhaved dharmo na kīrtirna yaśo dhruvam।
śarīrasya bhavet khedaḥ kastat karma samācaret॥

‘जो कार्य करने से न तो धर्म होता हो, न कीर्ति बढ़ती हो और न अक्षय यश ही प्राप्त होता हो, उलटे शरीर को खेद हो रहा हो, उस कर्म का अनुष्ठान कौन करेगा?

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॥ ३ · ५० · २० ॥
षष्टिवर्षसहस्राणि जातस्य मम रावण। पितृपैतामहं राज्यं यथावदनुतिष्ठतः॥

ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi jātasya mama rāvaṇa।
pitṛpaitāmahaṁ rājyaṁ yathāvadanutiṣṭhataḥ॥

‘रावण! बाप-दादों से प्राप्त इस पक्षियों के राज्य का विधिवत् पालन करते हुए मुझे जन्म से लेकर अबतक साठ हजार वर्ष बीत गये

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॥ ३ · ५० · २१ ॥
वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्वी सरथः कवची शरी। चाप्यादाय कुशली वैदेहीं मे गमिष्यसि॥

vṛddho'haṁ tvaṁ yuvā dhanvī sarathaḥ kavacī śarī।
na cāpyādāya kuśalī vaidehīṁ me gamiṣyasi॥

‘अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ और तुम नवयुवक हो। (मेरे पास कोई युद्ध का साधन नहीं है, किंतु) तुम्हारे पास धनुष, कवच, बाण तथा रथ सब कुछ है, फिर भी तुम सीता को लेकर कुशलपूर्वक नहीं जा सकोगे

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॥ ३ · ५० · २२ ॥
शक्तस्त्वं बलाद्धर्तुं वैदेहीं मम पश्यतः। हेतुभिर्न्यायसंयुक्तैर्ध्रुवां वेदश्रुतीमिव॥

na śaktastvaṁ balāddhartuṁ vaidehīṁ mama paśyataḥ।
hetubhirnyāyasaṁyuktairdhruvāṁ vedaśrutīmiva॥

‘मेरे देखते-देखते तुम विदेहनन्दिनी सीता का बलपूर्वक अपहरण नहीं कर सकते; ठीक उसी तरह जैसे कोई न्यायसङ्गत हेतुओं से सत्य सिद्ध हुई वैदिक श्रुति को अपनी युक्तियों के बल पर पलट नहीं सकता

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॥ ३ · ५० · २३ ॥
युध्यस्व यदि शूरोऽसि मुहूर्तं तिष्ठ रावण। शयिष्यसे हतो भूमौ यथा पूर्वं खरस्तथा॥

yudhyasva yadi śūro'si muhūrtaṁ tiṣṭha rāvaṇa।
śayiṣyase hato bhūmau yathā pūrvaṁ kharastathā॥

‘रावण! यदि शूरवीर हो तो युद्ध करो। मेरे सामने दो घड़ी ठहर जाओ; फिर जैसे पहले खर मारा गया था, उसी प्रकार तुम भी मेरे द्वारा मारे जाकर सदा के लिये सो जाओगे

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॥ ३ · ५० · २४ ॥
असकृत्संयुगे येन निहता दैत्यदानवाः। चिराच्चीरवासास्त्वां रामो युधि वधिष्यति॥

asakṛtsaṁyuge yena nihatā daityadānavāḥ।
na cirāccīravāsāstvāṁ rāmo yudhi vadhiṣyati॥

‘जिन्होंने युद्ध में अनेक बार दैत्यों और दानवों का वध किया है, वे चीरवस्त्रधारी भगवान् श्रीराम तुम्हारा भी शीघ्र ही युद्धभूमि में विनाश करेंगे

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॥ ३ · ५० · २५ ॥
किं नु शक्यं मया कर्तुं गतौ दूरं नृपात्मजौ। क्षिप्रं त्वं नश्यसे नीच तयोर्भीतो संशयः॥

kiṁ nu śakyaṁ mayā kartuṁ gatau dūraṁ nṛpātmajau।
kṣipraṁ tvaṁ naśyase nīca tayorbhīto na saṁśayaḥ॥

‘इस समय मैं क्या कर सकता हूँ, वे दोनों राजकुमार बहुत दूर चले गये हैं। नीच! (यदि मैं उन्हें बुलाने जाऊँ तो) तुम उन दोनों से भयभीत होकर शीघ्र ही भाग जाओगे (आँखों से ओझल हो जाओगे), इसमें संशय नहीं है

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॥ ३ · ५० · २६ ॥
नहि मे जीवमानस्य नयिष्यसि शुभामिमाम्। सीतां कमलपत्राक्षीं रामस्य महिषीं प्रियाम्॥

nahi me jīvamānasya nayiṣyasi śubhāmimām।
sītāṁ kamalapatrākṣīṁ rāmasya mahiṣīṁ priyām॥

‘कमल के समान नेत्रोंवाली ये शुभलक्षणा सीता श्रीरामचन्द्रजी की प्यारी पटरानी हैं। इन्हें मेरे जीते-जी तुम नहीं ले जाने पाओगे

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॥ ३ · ५० · २७ ॥
अवश्यं तु मया कार्यं प्रियं तस्य महात्मनः। जीवितेनापि रामस्य तथा दशरथस्य च॥

avaśyaṁ tu mayā kāryaṁ priyaṁ tasya mahātmanaḥ।
jīvitenāpi rāmasya tathā daśarathasya ca॥

‘मुझे अपने प्राण देकर भी महात्मा श्रीराम तथा राजा दशरथ का प्रिय कार्य अवश्य करना होगा

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॥ ३ · ५० · २८ ॥
तिष्ठ तिष्ठ दशग्रीव मुहूर्तं पश्य रावण। वृन्तादिव फलं त्वां तु पातयेयं रथोत्तमात्। युद्धातिथ्यं प्रदास्यामि यथाप्राणं निशाचर॥

tiṣṭha tiṣṭha daśagrīva muhūrtaṁ paśya rāvaṇa।
vṛntādiva phalaṁ tvāṁ tu pātayeyaṁ rathottamāt।
yuddhātithyaṁ pradāsyāmi yathāprāṇaṁ niśācara॥

‘दशमुख रावण! ठहरो, ठहरो! केवल दो घड़ी रुक जाओ, फिर देखो, जैसे डंठल से फल गिरता है, उसी प्रकार तुम्हें इस उत्तम रथ से नीचे गिराये देता हूँ। निशाचर! अपनी शक्ति के अनुसार युद्ध में मैं तुम्हारा पूरा आतिथ्य-सत्कार करूँगा—तुम्हें भलीभाँति भेंटपूजा दूँगा’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चाशः सर्गः॥ ५० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पचासवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५० ॥