वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ४९ · ४० श्लोकाःSarga 49 · 40 ślokas

रावणद्वारा सीताका अपहरण, सीताका विलाप और उनके द्वारा जटायुका दर्शन

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ४९ — painting

॥ ३ · ४९ · १७–२१ ॥

पञ्चवटीवने साधुवेषमपास्य दशाननो विंशतिभुजो रावणः स्वं भीषणं रूपं प्रकटयति—रक्तनयनो दंष्ट्राकरालो नीलजीमूतसंनिभस्तप्तकाञ्चनाभरणो रक्ताम्बरो गिरिशृङ्गाकारः—सीतां बलाद् गृहीत्वा भूमेरुत्क्षिप्य धारयति; सा तु विवृत्तवदना एकं बाहुं दूरवनं प्रति प्रसार्य 'राम' इति क्रन्दति, तस्या वल्कलवस्त्रं मुक्तकेशाश्च वायुना प्रकीर्णाः; पृष्ठतः पिशाचमुखखरयुक्तः स्वर्णरथः, समन्ताच्च वनदेवता भयात् पलायन्ते।

पंचवटी वन में साधु का भेष फेंककर दशमुख, बीस भुजाओंवाला रावण अपना भीषण रूप प्रकट करता है—लाल आँखें, बाहर निकली दाढ़ें, नीले मेघ-सा श्याम शरीर, तपे सोने के आभूषण, रक्तवर्ण वस्त्र, पर्वतशिखर-सा विशाल—और सीता को बलपूर्वक पकड़कर धरती से ऊपर उठा लेता है; सीता मुँह फेरे, एक बाँह दूर वन की ओर बढ़ाए 'हे राम!' पुकार रही हैं, उनका वल्कल वस्त्र और खुले केश हवा में उड़ रहे हैं; पीछे पिशाच-मुख गधों से जुता सुनहरा रथ खड़ा है और चारों ओर वनदेवता भय से भाग रहे हैं।

In the Panchavati grove, having flung off his ascetic disguise, the ten-headed, twenty-armed Ravana rears up in his terrible true form — crimson eyes, bared fangs, a storm-cloud dark body ablaze with pure-gold ornaments and crimson robes, colossal as a mountain peak — and seizes Sita, lifting her clear of the earth; her face turned away, one arm flung out toward the distant forest, she cries 'Rama!' as her forest sari and loosened hair stream in the wind; behind them waits his golden chariot yoked to ghoul-faced donkey-mules, and on every side the little forest deities flee in terror.

॥ ३ · ४९ · १ ॥
सीताया वचनं श्रुत्वा दशग्रीवः प्रतापवान्। हस्ते हस्तं समाहत्य चकार सुमहद् वपुः॥

sītāyā vacanaṁ śrutvā daśagrīvaḥ pratāpavān।
haste hastaṁ samāhatya cakāra sumahad vapuḥ॥

सीता के इस वचन को सुनकर प्रतापी दशमुख रावण ने अपने हाथ पर हाथ मारकर शरीर को बहुत बड़ा बना लिया

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॥ ३ · ४९ · २ ॥
मैथिलीं पुनर्वाक्यं बभाषे वाक्यकोविदः। नोन्मत्तया श्रुतौ मन्ये मम वीर्यपराक्रमौ॥

sa maithilīṁ punarvākyaṁ babhāṣe vākyakovidaḥ।
nonmattayā śrutau manye mama vīryaparākramau॥

वह बातचीत करने की कला जानता था। उसने मिथिलेशकुमारी सीता से फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—‘मेरी समझ में तुम पागल हो गयी हो, इसीलिये तुमने मेरे बल और पराक्रम की बातें अनसुनी कर दी हैं

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॥ ३ · ४९ · ३ ॥
उद्वहेयं भुजाभ्यां तु मेदिनीमम्बरे स्थितः। आपिबेयं समुद्रं मृत्युं हन्यां रणे स्थितः॥

udvaheyaṁ bhujābhyāṁ tu medinīmambare sthitaḥ।
āpibeyaṁ samudraṁ ca mṛtyuṁ hanyāṁ raṇe sthitaḥ॥

‘अरी! मैं आकाश में खड़ा हो इन दोनों भुजाओं से ही सारी पृथ्वी को उठा ले जा सकता हूँ। समुद्र को पी जा सकता हूँ और युद्ध में स्थित हो मौत को भी मार सकता हूँ

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॥ ३ · ४९ · ४ ॥
अर्कं तुद्यां शरैस्तीक्ष्णैर्विभिन्द्यां हि महीतलम्। कामरूपेण उन्मत्ते पश्य मां कामरूपिणम्॥

arkaṁ tudyāṁ śaraistīkṣṇairvibhindyāṁ hi mahītalam।
kāmarūpeṇa unmatte paśya māṁ kāmarūpiṇam॥

‘काम तथा रूप से उन्मत्त रहनेवाली नारी! यदि चाहूँ तो अपने तीखे बाणों से सूर्य को भी व्यथित कर दूँ और इस भूतल को भी विदीर्ण कर डालूँ। मैं इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ हूँ। तुम मेरी ओर देखो’

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॥ ३ · ४९ · ५ ॥
एवमुक्तवतस्तस्य रावणस्य शिखिप्रभे। क्रुद्धस्य हरिपर्यन्ते रक्ते नेत्रे बभूवतुः॥

evamuktavatastasya rāvaṇasya śikhiprabhe।
kruddhasya hariparyante rakte netre babhūvatuḥ॥

ऐसा कहते-कहते क्रोध से भरे हुए रावण की आँखें, जिनके प्रान्तभाग काले थे, जलती आग के समान लाल हो गयीं

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॥ ३ · ४९ · ६ ॥
सद्यः सौम्यं परित्यज्य तीक्ष्णरूपं रावणः। स्वं रूपं कालरूपाभं भेजे वैश्रवणानुजः॥

sadyaḥ saumyaṁ parityajya tīkṣṇarūpaṁ sa rāvaṇaḥ।
svaṁ rūpaṁ kālarūpābhaṁ bheje vaiśravaṇānujaḥ॥

कुबेर के छोटे भाई रावण ने तत्काल अपने सौम्य रूप को त्यागकर तीखा एवं काल के समान विकराल अपना स्वाभाविक रूप धारण कर लिया

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॥ ३ · ४९ · ७ ॥
संरक्तनयनः श्रीमांस्तप्तकाञ्चनभूषणः। क्रोधेन महताविष्टो नीलजीमूतसंनिभः॥

saṁraktanayanaḥ śrīmāṁstaptakāñcanabhūṣaṇaḥ।
krodhena mahatāviṣṭo nīlajīmūtasaṁnibhaḥ॥

उस समय श्रीमान् रावण के सभी नेत्र लाल हो रहे थे। वह पक्के सोने के आभूषणों से अलंकृत था और महान् क्रोध से आविष्ट हो नीलमेघ के समान काला दिखायी देने लगा

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॥ ३ · ४९ · ८ ॥
दशास्यो विंशतिभुजो बभूव क्षणदाचरः। परिव्राजकच्छद्म महाकायो विहाय तत्॥

daśāsyo viṁśatibhujo babhūva kṣaṇadācaraḥ।
sa parivrājakacchadma mahākāyo vihāya tat॥

वह विशालकाय निशाचर परिव्राजक के उस छद्मवेश को त्यागकर दस मुखों और बीस भुजाओं से संयुक्त हो गया

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॥ ३ · ४९ · ९ ॥
प्रतिपेदे स्वकं रूपं रावणो राक्षसाधिपः। रक्ताम्बरधरस्तस्थौ स्त्रीरत्नं प्रेक्ष्य मैथिलीम्॥

pratipede svakaṁ rūpaṁ rāvaṇo rākṣasādhipaḥ।
raktāmbaradharastasthau strīratnaṁ prekṣya maithilīm॥

उस समय राक्षसराज रावण ने अपने सहज रूप को ग्रहण कर लिया और लाल रंग के वस्त्र पहनकर वह स्त्री-रत्न सीता की ओर देखता हुआ खड़ा हो गया

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॥ ३ · ४९ · १० ॥
तामसितकेशान्तां भास्करस्य प्रभामिव। वसनाभरणोपेतां मैथिलीं रावणोऽब्रवीत्॥

sa tāmasitakeśāntāṁ bhāskarasya prabhāmiva।
vasanābharaṇopetāṁ maithilīṁ rāvaṇo'bravīt॥

काले केशवाली मैथिली वस्त्राभूषणों से विभूषित हो सूर्य की प्रभा-सी जान पड़ती थीं। रावण ने उनसे कहा—

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॥ ३ · ४९ · ११ ॥
त्रिषु लोकेषु विख्यातं यदि भर्तारमिच्छसि। मामाश्रय वरारोहे तवाहं सदृशः पतिः॥

triṣu lokeṣu vikhyātaṁ yadi bhartāramicchasi।
māmāśraya varārohe tavāhaṁ sadṛśaḥ patiḥ॥

‘वरारोहे! यदि तुम तीनों लोकों में विख्यात पुरुष को अपना पति बनाना चाहती हो तो मेरा आश्रय लो। मैं ही तुम्हारे योग्य पति हूँ

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॥ ३ · ४९ · १२ ॥
मां भजस्व चिराय त्वमहं श्लाघ्यः पतिस्तव। नैव चाहं क्वचिद् भद्रे करिष्ये तव विप्रियम्॥

māṁ bhajasva cirāya tvamahaṁ ślāghyaḥ patistava।
naiva cāhaṁ kvacid bhadre kariṣye tava vipriyam॥

‘भद्रे! मुझे सुदीर्घकाल के लिये स्वीकार करो। मैं तुम्हारे लिये स्पृहणीय एवं प्रशंसनीय पति होऊँगा तथा कभी तुम्हारे मन के प्रतिकूल कोई बर्ताव नहीं करूँगा

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॥ ३ · ४९ · १३ ॥
त्यज्यतां मानुषो भावो मयि भावः प्रणीयताम्। राज्याच्च्युतमसिद्धार्थं रामं परिमितायुषम्॥ कैर्गुणैरनुरक्तासि मूढे पण्डितमानिनि।

tyajyatāṁ mānuṣo bhāvo mayi bhāvaḥ praṇīyatām।
rājyāccyutamasiddhārthaṁ rāmaṁ parimitāyuṣam॥
kairguṇairanuraktāsi mūḍhe paṇḍitamānini।

‘मनुष्य राम के विषय में जो तुम्हारा अनुराग है, उसे त्याग दो और मुझसे स्नेह करो। अपनेको पण्डित (बुद्धिमती) माननेवाली मूढ़ नारी! जो राज्य से भ्रष्ट है, जिसका मनोरथ सफल नहीं हुआ तथा जिसकी आयु सीमित है, उस राम में किन गुणों के कारण तुम अनुरक्त हो

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॥ ३ · ४९ · १४ ॥
यः स्त्रियो वचनाद् राज्यं विहाय ससुहृज्जनम्॥ अस्मिन् व्यालानुचरिते वने वसति दुर्मतिः।

yaḥ striyo vacanād rājyaṁ vihāya sasuhṛjjanam॥
asmin vyālānucarite vane vasati durmatiḥ।

‘जो एक स्त्री के कहने से सुहृदोंसहित सारे राज्य का त्याग करके इस हिंसक जन्तुओं से सेवित वन में निवास करता है, उसकी बुद्धि कैसी खोटी है? (वह सर्वथा मूढ़ है)’

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॥ ३ · ४९ · १५ ॥
इत्युक्त्वा मैथिलीं वाक्यं प्रियार्हां प्रियवादिनीम्॥

ityuktvā maithilīṁ vākyaṁ priyārhāṁ priyavādinīm॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४९ · १६ ॥
अभिगम्य सुदुष्टात्मा राक्षसः काममोहितः। जग्राह रावणः सीतां बुधः खे रोहिणीमिव॥

abhigamya suduṣṭātmā rākṣasaḥ kāmamohitaḥ।
jagrāha rāvaṇaḥ sītāṁ budhaḥ khe rohiṇīmiva॥

॥ १५–१६ ॥

जो प्रिय वचन सुनने के योग्य और सबसे प्रिय वचन बोलनेवाली थीं, उन मिथिलेशकुमारी सीता से ऐसा अप्रिय वचन कहकर काम से मोहित हुए उस अत्यन्त दुष्टात्मा राक्षस रावण ने निकट जाकर (माता के समान आदरणीया) सीता को पकड़ लिया, मानो बुध ने आकाश में अपनी माता रोहिणी को पकड़ने का दुस्साहस किया हो

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॥ ३ · ४९ · १७ ॥
वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण सः। ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना॥

vāmena sītāṁ padmākṣīṁ mūrdhajeṣu kareṇa saḥ।
ūrvostu dakṣiṇenaiva parijagrāha pāṇinā॥

उसने बायें हाथ से कमलनयनी सीता के केशोंसहित मस्तक को पकड़ा तथा दाहिना हाथ उनकी दोनों जाँघों के नीचे लगाकर उसके द्वारा उन्हें उठा लिया

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॥ ३ · ४९ · १८ ॥
तं दृष्ट्वा गिरिशृङ्गाभं तीक्ष्णदंष्ट्रं महाभुजम्। प्राद्रवन् मृत्युसंकाशं भयार्ता वनदेवताः॥

taṁ dṛṣṭvā giriśṛṅgābhaṁ tīkṣṇadaṁṣṭraṁ mahābhujam।
prādravan mṛtyusaṁkāśaṁ bhayārtā vanadevatāḥ॥

उस समय तीखी दाढ़ों और विशाल भुजाओं से युक्त पर्वतशिखर के समान प्रतीत होनेवाले उस काल के समान विकराल राक्षस को देखकर वन के समस्त देवता भयभीत होकर भाग गये

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॥ ३ · ४९ · १९ ॥
मायामयो दिव्यः खरयुक्तः खरस्वनः। प्रत्यदृश्यत हेमाङ्गो रावणस्य महारथः॥

sa ca māyāmayo divyaḥ kharayuktaḥ kharasvanaḥ।
pratyadṛśyata hemāṅgo rāvaṇasya mahārathaḥ॥

इतने ही में गधों से जुता हुआ और गधों के समान ही शब्द करनेवाला रावण का वह विशाल सुवर्णमय मायानिर्मित दिव्य रथ वहाँ दिखायी दिया

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॥ ३ · ४९ · २० ॥
ततस्तां परुषैर्वाक्यैरभितर्ज्य महास्वनः। अंकेनादाय वैदेहीं रथमारोपयत् तदा॥

tatastāṁ paruṣairvākyairabhitarjya mahāsvanaḥ।
aṁkenādāya vaidehīṁ rathamāropayat tadā॥

रथ के प्रकट होते ही जोर-जोर से गर्जना करनेवाले रावण ने कठोर वचनोंद्वारा विदेहनन्दिनी सीता को डाँटा और पूर्वोक्त रूप से गोद में उठाकर तत्काल रथ पर बिठा दिया

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॥ ३ · ४९ · २१ ॥
सा गृहीतातिचुक्रोश रावणेन यशस्विनी। रामेति सीता दुःखार्ता रामं दूरं गतं वने॥

sā gṛhītāticukrośa rāvaṇena yaśasvinī।
rāmeti sītā duḥkhārtā rāmaṁ dūraṁ gataṁ vane॥

रावण के द्वारा पकड़ी जाने पर यशस्विनी सीता दुःख से व्याकुल हो गयीं और वन में दूर गये हुए श्रीरामचन्द्रजी को ‘हे राम!’ कहकर जोर-जोर से पुकारने लगीं

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॥ ३ · ४९ · २२ ॥
तामकामां कामार्तः पन्नगेन्द्रवधूमिव। विचेष्टमानामादाय उत्पपाताथ रावणः॥

tāmakāmāṁ sa kāmārtaḥ pannagendravadhūmiva।
viceṣṭamānāmādāya utpapātātha rāvaṇaḥ॥

सीता के मन में रावण की कामना नहीं थी—वे उसकी ओर से सर्वथा विरक्त थीं और उसकी कैद से अपनेको छुड़ाने के लिये चोट खायी हुई नागिन की तरह उस रथ पर छटपटा रही थीं। उसी अवस्था में कामपीड़ित राक्षस उन्हें लेकर आकाश में उड़ चला

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॥ ३ · ४९ · २३ ॥
ततः सा राक्षसेन्द्रेण ह्रियमाणा विहायसा। भृशं चुक्रोश मत्तेव भ्रान्तचित्ता यथातुरा॥

tataḥ sā rākṣasendreṇa hriyamāṇā vihāyasā।
bhṛśaṁ cukrośa matteva bhrāntacittā yathāturā॥

राक्षसराज जब सीता को हरकर आकाशमार्ग से ले जाने लगा, उस समय उनका चित्त भ्रमित हो उठा। वे पगली-सी हो गयीं और दुःख से आतुर-सी होकर जोर-जोर से विलाप करने लगीं—

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॥ ३ · ४९ · २४ ॥
हा लक्ष्मण महाबाहो गुरुचित्तप्रसादक। ह्रियमाणां जानीषे रक्षसा कामरूपिणा॥

hā lakṣmaṇa mahābāho gurucittaprasādaka।
hriyamāṇāṁ na jānīṣe rakṣasā kāmarūpiṇā॥

‘हा महाबाहु लक्ष्मण! तुम गुरुजनों के मन को प्रसन्न करनेवाले हो। इस समय इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला राक्षस मुझे हरकर लिये जाता है, किंतु तुम्हें इसका पता नहीं है

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॥ ३ · ४९ · २५ ॥
जीवितं सुखमर्थं धर्महेतोः परित्यजन्। ह्रियमाणामधर्मेण मां राघव पश्यसि॥

jīvitaṁ sukhamarthaṁ ca dharmahetoḥ parityajan।
hriyamāṇāmadharmeṇa māṁ rāghava na paśyasi॥

‘हा रघुनन्दन! आपने धर्म के लिये प्राणों का मोह, शरीर का सुख तथा राज्य-वैभव सब कुछ छोड़ दिया है। यह राक्षस मुझे अधर्मपूर्वक हरकर लिये जा रहा है, परंतु आप नहीं देखते हैं

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॥ ३ · ४९ · २६ ॥
ननु नामाविनीतानां विनेतासि परंतप। कथमेवंविधं पापं त्वं शाधि हि रावणम्॥

nanu nāmāvinītānāṁ vinetāsi paraṁtapa।
kathamevaṁvidhaṁ pāpaṁ na tvaṁ śādhi hi rāvaṇam॥

‘शत्रुओं को संताप देनेवाले आर्यपुत्र! आप तो कुमार्ग पर चलनेवाले उद्दण्ड पुरुषों को दण्ड देकर उन्हें राह पर लानेवाले हैं, फिर ऐसे पापी रावण को क्यों नहीं दण्ड देते हैं

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॥ ३ · ४९ · २७ ॥
तु सद्योऽविनीतस्य दृश्यते कर्मणः फलम्। कालोऽप्यङ्गीभवत्यत्र सस्यानामिव पक्तये॥

na tu sadyo'vinītasya dṛśyate karmaṇaḥ phalam।
kālo'pyaṅgībhavatyatra sasyānāmiva paktaye॥

‘उद्दण्ड पुरुष के उद्दण्डतापूर्ण कर्म का फल तत्काल मिलता नहीं दिखायी देता है; क्योंकि इसमें काल भी सहकारी कारण होता है, जैसे कि खेती के पकने के लिये तदनुकूल समय की अपेक्षा होती है

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॥ ३ · ४९ · २८ ॥
त्वं कर्म कृतवानेतत् कालोपहतचेतनः। जीवितान्तकरं घोरं रामाद् व्यसनमाप्नुहि॥

tvaṁ karma kṛtavānetat kālopahatacetanaḥ।
jīvitāntakaraṁ ghoraṁ rāmād vyasanamāpnuhi॥

‘रावण! तेरे सिर पर काल नाच रहा है। उसीने तेरी विचारशक्ति को नष्ट कर दी है, इसीलिये तूने ऐसा पापकर्म किया है। तुझे श्रीराम से वह भयंकर संकट प्राप्त हो, जो तेरे प्राणों का अन्त कर डाले

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॥ ३ · ४९ · २९ ॥
हन्तेदानीं सकामा तु कैकेयी बान्धवैः सह। ह्रियेयं धर्मकामस्य धर्मपत्नी यशस्विनः॥

hantedānīṁ sakāmā tu kaikeyī bāndhavaiḥ saha।
hriyeyaṁ dharmakāmasya dharmapatnī yaśasvinaḥ॥

‘हाय! इस समय कैकेयी अपने बन्धु-बान्धवोंसहित सफलमनोरथ हो गयी; क्योंकि धर्म की अभिलाषा रखनेवाले यशस्वी श्रीराम की धर्मपत्नी होकर भी मैं एक राक्षसद्वारा हरी जा रही हूँ

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॥ ३ · ४९ · ३० ॥
आमन्त्रये जनस्थाने कर्णिकारांश्च पुष्पितान्। क्षिप्रं रामाय शंसध्वं सीतां हरति रावणः॥

āmantraye janasthāne karṇikārāṁśca puṣpitān।
kṣipraṁ rāmāya śaṁsadhvaṁ sītāṁ harati rāvaṇaḥ॥

‘मैं जनस्थान में खिले हुए कनेर वृक्षों से प्रार्थना करती हूँ, तुमलोग शीघ्र ही श्रीराम से कहना कि सीता को रावण हर ले जा रहा है

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॥ ३ · ४९ · ३१ ॥
हंससारससंघुष्टां वन्दे गोदावरीं नदीम्। क्षिप्रं रामाय शंस त्वं सीतां हरति रावणः॥

haṁsasārasasaṁghuṣṭāṁ vande godāvarīṁ nadīm।
kṣipraṁ rāmāya śaṁsa tvaṁ sītāṁ harati rāvaṇaḥ॥

‘हंसों और सारसों के कलरवों से मुखरित हुई गोदावरी नदी को मैं प्रणाम करती हूँ। माँ! तुम श्रीराम से शीघ्र ही कह देना, सीता को रावण हर ले जा रहा है

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॥ ३ · ४९ · ३२ ॥
दैवतानि यान्यस्मिन् वने विविधपादपे। नमस्करोम्यहं तेभ्यो भर्तुः शंसत मां हताम्॥

daivatāni ca yānyasmin vane vividhapādape।
namaskaromyahaṁ tebhyo bhartuḥ śaṁsata māṁ hatām॥

‘इस वन के विभिन्न वृक्षों पर निवास करनेवाले जो-जो देवता हैं, उन सबको मैं नमस्कार करती हूँ। आप सब लोग शीघ्र ही मेरे स्वामी को सूचना दे दें कि आपकी स्त्री को राक्षस हर ले गया

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॥ ३ · ४९ · ३३ ॥
यानि कानिचिदप्यत्र सत्त्वानि विविधानि च। सर्वाणि शरणं यामि मृगपक्षिगणानि वै॥

yāni kānicidapyatra sattvāni vividhāni ca।
sarvāṇi śaraṇaṁ yāmi mṛgapakṣigaṇāni vai॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४९ · ३४ ॥
ह्रियमाणां प्रियां भर्तुः प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्। विवशा ते हता सीता रावणेनेति शंसत॥

hriyamāṇāṁ priyāṁ bhartuḥ prāṇebhyo'pi garīyasīm।
vivaśā te hatā sītā rāvaṇeneti śaṁsata॥

॥ ३३–३४ ॥

‘यहाँ पशु-पक्षी आदि जो कोई भी नाना प्रकार के प्राणी रहते हों, उन सबकी मैं शरण लेती हूँ। वे मेरे स्वामी श्रीरामचन्द्रजी से कहें कि जो आपको प्राणों से भी बढ़कर प्रिय थी, वह सीता हरी गयी। आपकी सीता को असहाय अवस्था में रावण हर ले गया

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॥ ३ · ४९ · ३५ ॥
विदित्वा तु महाबाहुरमुत्रापि महाबलः। आनेष्यति पराक्रम्य वैवस्वतहतामपि॥

viditvā tu mahābāhuramutrāpi mahābalaḥ।
āneṣyati parākramya vaivasvatahatāmapi॥

‘महाबाहु श्रीराम बड़े बलवान् हैं। वे मुझे परलोक में भी गयी हुई जान लें तो यमराज के द्वारा अपहृत होने पर भी मुझको पराक्रमपूर्वक वहाँ से लौटा लायेंगे’

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॥ ३ · ४९ · ३६ ॥
सा तदा करुणा वाचो विलपन्ती सुदुःखिता। वनस्पतिगतं गृध्रं ददर्शायतलोचना॥

sā tadā karuṇā vāco vilapantī suduḥkhitā।
vanaspatigataṁ gṛdhraṁ dadarśāyatalocanā॥

उस समय अत्यन्त दुःखी हो करुणाजनक बातें कहकर विलाप करती हुई विशाललोचना सीता ने एक वृक्ष पर बैठे हुए गृध्रराज जटायु को देखा

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॥ ३ · ४९ · ३७ ॥
सा तमुद्वीक्ष्य सुश्रोणी रावणस्य वशंगता। समाक्रन्दद् भयपरा दुःखोपहतया गिरा॥

sā tamudvīkṣya suśroṇī rāvaṇasya vaśaṁgatā।
samākrandad bhayaparā duḥkhopahatayā girā॥

रावण के वश में पड़ जाने के कारण सुन्दरी सीता अत्यन्त भयभीत हो रही थीं। जटायु को देखकर वे दुःखभरी वाणी में करुण क्रन्दन करने लगीं—

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॥ ३ · ४९ · ३८ ॥
जटायो पश्य मामार्य ह्रियमाणामनाथवत्। अनेन राक्षसेन्द्रेणाकरुणं पापकर्मणा॥

jaṭāyo paśya māmārya hriyamāṇāmanāthavat।
anena rākṣasendreṇākaruṇaṁ pāpakarmaṇā॥

‘आर्य जटायो! देखिये, यह पापाचारी राक्षसराज अनाथ की भाँति मुझे निर्दयतापूर्वक हरकर लिये जा रहा है

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॥ ३ · ४९ · ३९ ॥
नैष वारयितुं शक्यस्त्वया क्रूरो निशाचरः। सत्त्ववाञ्जितकाशी सायुधश्चैव दुर्मतिः॥

naiṣa vārayituṁ śakyastvayā krūro niśācaraḥ।
sattvavāñjitakāśī ca sāyudhaścaiva durmatiḥ॥

‘परंतु आप इस क्रूर निशाचर को रोक नहीं सकते; क्योंकि यह बलवान् है, अनेक युद्धों में विजय पाने के कारण इसका दुस्साहस बढ़ा हुआ है। इसके हाथों में हथियार है और इसके मन में दुष्टता भी भरी हुई है

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॥ ३ · ४९ · ४० ॥
रामाय तु यथातत्त्वं जटायो हरणं मम। लक्ष्मणाय तत् सर्वमाख्यातव्यमशेषतः॥

rāmāya tu yathātattvaṁ jaṭāyo haraṇaṁ mama।
lakṣmaṇāya ca tat sarvamākhyātavyamaśeṣataḥ॥

‘आर्य जटायो! जिस प्रकार मेरा अपहरण हुआ है, यह सब समाचार आप श्रीराम और लक्ष्मण से ज्यों-का-ज्यों पूर्णरूप से बता दीजियेगा’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकोनपञ्चाशः सर्गः ॥ ४९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४९ ॥