वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ४८ · २४ श्लोकाःSarga 48 · 24 ślokas

रावणके द्वारा अपने पराक्रमका वर्णन और सीताद्वारा उसको कड़ी फटकार

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ४८ — painting

॥ ३ · ४८ · २०–२४ ॥

विजने पञ्चवटीपर्णशालाङ्गणे कषायवस्त्रधरस्त्रिदण्डकमण्डलुधर एकशिरा रावणः, ललाटे भ्रुकुटिं कृत्वा वर्धमानगर्वः स्वप्रतापं स्वर्णलङ्कां च श्लाघमानः, सीतां प्रति आनम्यते; सीता तु शुद्धवल्कलवसना सुमङ्गली संरक्तलोचना उन्नता निर्भया एकं करमुत्थाप्य तं तर्जयति—रामपत्नीमपहृत्य अमृतं पीत्वापि न जीवसीति।

पंचवटी की पर्णशाला के निर्जन आँगन में कषाय वस्त्र, त्रिदंड और कमंडलु धारी, एक मुखवाला रावण ललाट पर भौंहें टेढ़ी किये, बढ़ते अहंकार में अपने पराक्रम और स्वर्णमयी लंका की डींग हाँकता हुआ सीता की ओर झुक रहा है; किंतु शुद्ध वल्कल-वसना सुमंगली सीता क्रोध से लाल आँखें किये, तनकर, निर्भय एक हाथ उठाकर उसे फटकार रही हैं—कि राम की पत्नी का हरण करके तू अमृत पीकर भी जीवित नहीं रह सकता।

In the lonely clearing before the Panchavati hut, Ravana — still in ochre robes with triple staff and water-pot, single-headed, brows knit and arrogance swelling as he boasts of his prowess and golden Lanka — leans toward Sita; but she, in her undyed forest sari, eyes reddened with wrath, stands tall and unafraid and lifts a hand to rebuke him, flinging back the vow that no one who carries off Ram's wife can live, even were he to drink the nectar of immortality.

॥ ३ · ४८ · १ ॥
एवं ब्रुवत्यां सीतायां संरब्धः परुषं वचः। ललाटे भ्रुकुटिं कृत्वा रावणः प्रत्युवाच ह॥

evaṁ bruvatyāṁ sītāyāṁ saṁrabdhaḥ paruṣaṁ vacaḥ।
lalāṭe bhrukuṭiṁ kṛtvā rāvaṇaḥ pratyuvāca ha॥

सीता के ऐसा कहने पर रावण रोष में भर गया और ललाट में भौंहें टेढ़ी करके वह कठोर वाणी में बोला—

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॥ ३ · ४८ · २ ॥
भ्राता वैश्रवणस्याहं सापत्नो वरवर्णिनि। रावणो नाम भद्रं ते दशग्रीवः प्रतापवान्॥

bhrātā vaiśravaṇasyāhaṁ sāpatno varavarṇini।
rāvaṇo nāma bhadraṁ te daśagrīvaḥ pratāpavān॥

‘सुन्दरि! मैं कुबेर का सौतेला भाई परम प्रतापी दशग्रीव रावण हूँ। तुम्हारा भला हो

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॥ ३ · ४८ · ३ ॥
यस्य देवाः सगन्धर्वाः पिशाचपतगोरगाः। विद्रवन्ति सदा भीता मृत्योरिव सदा प्रजाः॥

yasya devāḥ sagandharvāḥ piśācapatagoragāḥ।
vidravanti sadā bhītā mṛtyoriva sadā prajāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४८ · ४ ॥
येन वैश्रवणो भ्राता वैमात्राः कारणान्तरे। द्वन्द्वमासादितः क्रोधाद् रणे विक्रम्य निर्जितः॥

yena vaiśravaṇo bhrātā vaimātrāḥ kāraṇāntare।
dvandvamāsāditaḥ krodhād raṇe vikramya nirjitaḥ॥

॥ ३–४ ॥

‘जैसे प्रजा मौत के भय से सदा डरती रहती है, उसी प्रकार देवता, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और नाग सदा जिससे भयभीत होकर भागते हैं, जिसने किसी कारणवश अपने सौतेले भाई कुबेर के साथ द्वन्द्वयुद्ध किया और क्रोधपूर्वक पराक्रम करके रणभूमि में उन्हें परास्त कर दिया था, वही रावण मैं हूँ

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॥ ३ · ४८ · ५ ॥
मद्भयार्तः परित्यज्य स्वमधिष्ठानमृद्धिमत्। कैलासं पर्वतश्रेष्ठमध्यास्ते नरवाहनः॥

madbhayārtaḥ parityajya svamadhiṣṭhānamṛddhimat।
kailāsaṁ parvataśreṣṭhamadhyāste naravāhanaḥ॥

‘मेरे ही भय से पीड़ित हो नरवाहन कुबेर ने अपनी समृद्धिशालिनी पुरी लङ्का का परित्याग करके इस समय पर्वतश्रेष्ठ कैलास की शरण ली है

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॥ ३ · ४८ · ६ ॥
यस्य तत् पुष्पकं नाम विमानं कामगं शुभम्। वीर्यादावर्जितं भद्रे येन यामि विहायसम्॥

yasya tat puṣpakaṁ nāma vimānaṁ kāmagaṁ śubham।
vīryādāvarjitaṁ bhadre yena yāmi vihāyasam॥

‘भद्रे! उनका सुप्रसिद्ध पुष्पक नामक सुन्दर विमान, जो इच्छा के अनुसार चलनेवाला है, मैंने पराक्रम से जीत लिया है और उसी विमान के द्वारा मैं आकाश में विचरता हूँ

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॥ ३ · ४८ · ७ ॥
मम संजातरोषस्य मुखं दृष्ट्वैव मैथिलि। विद्रवन्ति परित्रस्ताः सुराः शक्रपुरोगमाः॥

mama saṁjātaroṣasya mukhaṁ dṛṣṭvaiva maithili।
vidravanti paritrastāḥ surāḥ śakrapurogamāḥ॥

‘मिथिलेशकुमारी! जब मुझे रोष चढ़ता है, उस समय इन्द्र आदि सब देवता मेरा मुँह देखकर ही भय से थर्रा उठते हैं और इधर-उधर भाग जाते हैं

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॥ ३ · ४८ · ८ ॥
यत्र तिष्ठाम्यहं तत्र मारुतो वाति शङ्कितः। तीव्रांशुः शिशिरांशुश्च भयात् सम्पद्यते दिवि॥

yatra tiṣṭhāmyahaṁ tatra māruto vāti śaṅkitaḥ।
tīvrāṁśuḥ śiśirāṁśuśca bhayāt sampadyate divi॥

‘जहाँ मैं खड़ा होता हूँ, वहाँ हवा डरकर धीरे-धीरे चलने लगती है। मेरे भय से आकाश में प्रचण्ड किरणोंवाला सूर्य भी चन्द्रमा के समान शीतल हो जाता है

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॥ ३ · ४८ · ९ ॥
निष्कम्पपत्रास्तरवो नद्यश्च स्तिमितोदकाः। भवन्ति यत्र तत्राहं तिष्ठामि चरामि च॥

niṣkampapatrāstaravo nadyaśca stimitodakāḥ।
bhavanti yatra tatrāhaṁ tiṣṭhāmi ca carāmi ca॥

‘जिस स्थान पर मैं ठहरता या भ्रमण करता हूँ वहाँ वृक्षों के पत्तेतक नहीं हिलते और नदियों का पानी स्थिर हो जाता है

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॥ ३ · ४८ · १० ॥
मम पारे समुद्रस्य लङ्का नाम पुरी शुभा। सम्पूर्णा राक्षसैर्घोरैर्यथेन्द्रस्यामरावती॥

mama pāre samudrasya laṅkā nāma purī śubhā।
sampūrṇā rākṣasairghorairyathendrasyāmarāvatī॥

‘समुद्र के उस पार लङ्का नामक मेरी सुन्दर पुरी है, जो इन्द्र की अमरावती के समान मनोहर तथा घोर राक्षसों से भरी हुई है

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॥ ३ · ४८ · ११ ॥
प्राकारेण परिक्षिप्ता पाण्डुरेण विराजिता। हेमकक्ष्या पुरी रम्या वैदूर्यमयतोरणा॥

prākāreṇa parikṣiptā pāṇḍureṇa virājitā।
hemakakṣyā purī ramyā vaidūryamayatoraṇā॥

‘उसके चारों ओर बनी हुई सफेद चहारदिवारी उस पुरी की शोभा बढ़ाती है। लङ्कापुरी के महलों के दालान, फर्श आदि सोने के बने हैं और उसके बाहरी दरवाजे वैदूर्यमय हैं। वह पुरी बहुत ही रमणीय है

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॥ ३ · ४८ · १२ ॥
हस्त्यश्वरथसम्बाधा तूर्यनादविनादिता। सर्वकामफलैर्वृक्षैः संकुलोद्यानभूषिता॥

hastyaśvarathasambādhā tūryanādavināditā।
sarvakāmaphalairvṛkṣaiḥ saṁkulodyānabhūṣitā॥

‘हाथी, घोड़े और रथों से वहाँ की सड़कें भरी रहती हैं। भाँति-भाँति के वाद्यों की ध्वनि गूँजा करती है। सब प्रकार के मनोवाञ्छित फल देनेवाले वृक्षों से लङ्कापुरी व्याप्त है। नाना प्रकार के उद्यान उसकी शोभा बढ़ाते हैं

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॥ ३ · ४८ · १३ ॥
तत्र त्वं वस हे सीते राजपुत्रि मया सह। स्मरिष्यसि नारीणां मानुषीणां मनस्विनि॥

tatra tvaṁ vasa he sīte rājaputri mayā saha।
na smariṣyasi nārīṇāṁ mānuṣīṇāṁ manasvini॥

‘राजकुमारी सीते! तुम मेरे साथ उस पुरी में चलकर निवास करो। मनस्विनि! वहाँ रहकर तुम मानवी स्त्रियों को भूल जाओगी

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॥ ३ · ४८ · १४ ॥
भुञ्जाना मानुषान् भोगान् दिव्यांश्च वरवर्णिनि। स्मरिष्यसि रामस्य मानुषस्य गतायुषः॥

bhuñjānā mānuṣān bhogān divyāṁśca varavarṇini।
na smariṣyasi rāmasya mānuṣasya gatāyuṣaḥ॥

‘सुन्दरि! लङ्का में दिव्य और मानुष-भोगों का उपभोग करती हुई तुम उस मनुष्य राम का कभी स्मरण नहीं करोगी, जिसकी आयु अब समाप्त हो चली है

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॥ ३ · ४८ · १५ ॥
स्थापयित्वा प्रियं पुत्रं राज्ये दशरथो नृपः। मन्दवीर्यस्ततो ज्येष्ठः सुतः प्रस्थापितो वनम्॥

sthāpayitvā priyaṁ putraṁ rājye daśaratho nṛpaḥ।
mandavīryastato jyeṣṭhaḥ sutaḥ prasthāpito vanam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४८ · १६ ॥
तेन किं भ्रष्टराज्येन रामेण गतचेतसा। करिष्यसि विशालाक्षि तापसेन तपस्विना॥

tena kiṁ bhraṣṭarājyena rāmeṇa gatacetasā।
kariṣyasi viśālākṣi tāpasena tapasvinā॥

॥ १५–१६ ॥

‘विशाललोचने! राजा दशरथ ने अपने प्यारे पुत्र को राज्य पर बिठाकर जिस अल्पपराक्रमी ज्येष्ठ पुत्र को वन में भेज दिया, उस राज्यभ्रष्ट, बुद्धिहीन एवं तपस्या में लगे हुए तापस राम को लेकर क्या करोगी?

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॥ ३ · ४८ · १७ ॥
रक्ष राक्षसभर्तारं कामय स्वयमागतम्। मन्मथशराविष्टं प्रत्याख्यातुं त्वमर्हसि॥

rakṣa rākṣasabhartāraṁ kāmaya svayamāgatam।
na manmathaśarāviṣṭaṁ pratyākhyātuṁ tvamarhasi॥

‘यह राक्षसों का स्वामी स्वयं तुम्हारे द्वार पर आया है, तुम इसकी रक्षा करो, इसे मन से चाहो। यह कामदेव के बाणों से पीड़ित है। इसे ठुकराना तुम्हारे लिये उचित नहीं है

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॥ ३ · ४८ · १८ ॥
प्रत्याख्याय हि मां भीरु पश्चात्तापं गमिष्यसि। चरणेनाभिहत्येव पुरूरवसमुर्वशी॥

pratyākhyāya hi māṁ bhīru paścāttāpaṁ gamiṣyasi।
caraṇenābhihatyeva purūravasamurvaśī॥

‘भीरु! मुझे ठुकराकर तुम उसी तरह पश्चात्ताप करोगी, जैसे पुरूरवा को लात मारकर उर्वशी पछतायी थी

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॥ ३ · ४८ · १९ ॥
अङ्गुल्या समो रामो मम युद्धे मानुषः। तव भाग्येन सम्प्राप्तं भजस्व वरवर्णिनि॥

aṅgulyā na samo rāmo mama yuddhe sa mānuṣaḥ।
tava bhāgyena samprāptaṁ bhajasva varavarṇini॥

‘सुन्दरि! युद्ध में मनुष्यजातीय राम मेरी एक अङ्गुलि के बराबर भी नहीं है। तुम्हारे भाग्य से मैं आ गया हूँ। तुम मुझे स्वीकार करो’

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॥ ३ · ४८ · २० ॥
एवमुक्ता तु वैदेही क्रुद्धा संरक्तलोचना। अब्रवीत् परुषं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपम्॥

evamuktā tu vaidehī kruddhā saṁraktalocanā।
abravīt paruṣaṁ vākyaṁ rahite rākṣasādhipam॥

रावण के ऐसा कहने पर विदेहकुमारी सीता के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने उस एकान्त स्थान में राक्षसराज रावण से कठोर वाणी में कहा—

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॥ ३ · ४८ · २१ ॥
कथं वैश्रवणं देवं सर्वदेवनमस्कृतम्। भ्रातरं व्यपदिश्य त्वमशुभं कर्तुमिच्छसि॥

kathaṁ vaiśravaṇaṁ devaṁ sarvadevanamaskṛtam।
bhrātaraṁ vyapadiśya tvamaśubhaṁ kartumicchasi॥

‘अरे! भगवान् कुबेर तो सम्पूर्ण देवताओं के वन्दनीय हैं। तू उन्हें अपना भाई बताकर ऐसा पापकर्म कैसे करना चाहता है?

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॥ ३ · ४८ · २२ ॥
अवश्यं विनशिष्यन्ति सर्वे रावण राक्षसाः। येषां त्वं कर्कशो राजा दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः॥

avaśyaṁ vinaśiṣyanti sarve rāvaṇa rākṣasāḥ।
yeṣāṁ tvaṁ karkaśo rājā durbuddhirajitendriyaḥ॥

‘रावण! जिनका तुझ-जैसा क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा है, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायँगे

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॥ ३ · ४८ · २३ ॥
अपहृत्य शचीं भार्यां शक्यमिन्द्रस्य जीवितुम्। नहि रामस्य भार्यां मामानीय स्वस्तिमान् भवेत्॥

apahṛtya śacīṁ bhāryāṁ śakyamindrasya jīvitum।
nahi rāmasya bhāryāṁ māmānīya svastimān bhavet॥

‘इन्द्र की पत्नी शची का अपहरण करके सम्भव है कोई जीवित रह जाय; किंतु रामपत्नी मुझ सीता का हरण करके कोई कुशल से नहीं रह सकता

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॥ ३ · ४८ · २४ ॥
जीवेच्चिरं वज्रधरस्य पश्चाच्छचीं प्रधृष्याप्रतिरूपरूपाम्। मादृशीं राक्षस धर्षयित्वा पीतामृतस्यापि तवास्ति मोक्षः॥

jīvecciraṁ vajradharasya paścācchacīṁ pradhṛṣyāpratirūparūpām।
na mādṛśīṁ rākṣasa dharṣayitvā pītāmṛtasyāpi tavāsti mokṣaḥ॥

‘राक्षस! वज्रधारी इन्द्र की अनुपम रूपवती भार्या शची का तिरस्कार करके सम्भव है कोई उसके बाद भी चिरकालतक जीवित रह जाय; परंतु मेरी-जैसी स्त्री का अपमान करके तू अमृत पी ले तो भी तुझे जीते-जी छुटकारा नहीं मिल सकता’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टचत्वारिंशः सर्गः॥ ४८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अड़तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४८॥