रावणका साधुवेषमें सीताके पास जाकर उनका परिचय पूछना और सीताका आतिथ्यके लिये उसे आमन्त्रित करना
॥ ३ · ४६ · १०–११ ॥
पञ्चवटीपर्णशालाद्वारे भिक्षुवेषधारी रावणः—एकशिरा गैरिककषायवस्त्रधरः शिखी वामांसे यष्टिकमण्डलुधरः पात्रच्छत्रोपानद्युतो रक्तेक्षणो गूढहिंसः—द्वारि उपविष्टां भर्तृविरहशोकार्तामश्रुमुखीं सीतां निरीक्षते, सा च निर्दोषा तमतिथिं सादरमूर्ध्वं पश्यति; समन्तात् स्तम्भितं मौनं वृक्षा निश्चला गोदावरी च मन्दगामिनी।
पंचवटी की पर्णशाला के द्वार पर भिक्षु का वेष धरे रावण—एक मुख, गेरुए कषाय वस्त्र में, शिखाधारी, बायें कंधे पर डंडा-कमंडलु, हाथ में भिक्षापात्र, ऊपर छाता और पैरों में जूते, किंतु लाल आँखों में छिपी हिंसा लिये—द्वार पर बैठी, पति के विरह में शोकार्त, अश्रुमुखी सीता को देख रहा है; भोली सीता उस अतिथि को आदरपूर्वक ऊपर की ओर निहार रही हैं; चारों ओर अस्वाभाविक सन्नाटा छाया है—वृक्ष निश्चल और गोदावरी मंद बह रही है।
At the door of the Panchavati leaf-hut, Ravana in mendicant's guise — one head, in ochre-saffron robes, a topknot, a staff and water-pot on his left shoulder, a begging bowl in hand, a parasol above and sandals on his feet, yet with red-tinged eyes hiding his menace — gazes at Sita, who sits worn with grief and tears for her absent lord; the innocent princess looks up at the seeming holy guest with courteous respect, while an unnatural hush hangs over all, the trees motionless and the Godavari sliding slowly by.
tayā paruṣamuktastu kupito rāghavānujaḥ।
sa vikāṁkṣan bhṛśaṁ rāmaṁ pratasthe nacirādiva॥
सीता के कठोर वचन कहने पर कुपित हुए लक्ष्मण श्रीराम से मिलने की विशेष इच्छा रखकर शीघ्र ही वहाँ से चल दिये
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tadāsādya daśagrīvaḥ kṣipramantaramāsthitaḥ।
abhicakrāma vaidehīṁ parivrājakarūpadhṛk॥
लक्ष्मण के चले जाने पर रावण को मौका मिल गया, अतः वह संन्यासी का वेष धारण करके शीघ्र ही सीता के समीप गया
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ślakṣṇakāṣāyasaṁvītaḥ śikhī chatrī upānahī।
vāme cāṁse'vasajyātha śubhe yaṣṭikamaṇḍalū॥
वह शरीर पर साफ-सुथरा गेरुए रंग का वस्त्र लपेटे हुए था। उसके मस्तक पर शिखा, हाथ में छाता और पैरों में जूते थे। उसने बायें कंधे पर डंडा रखकर उसमें कमण्डलु लटका रखा था
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parivrājakarūpeṇa vaidehīmanvavartata।
tāmāsasādātibalo bhrātṛbhyāṁ rahitāṁ vane॥
अत्यन्त बलवान् रावण उस वन में परिव्राजक का रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण दोनों बन्धुओं से रहित हुई अकेली विदेहकुमारी सीता के पास गया
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rahitāṁ sūryacandrābhyāṁ saṁdhyāmiva mahattamaḥ।
tāmapaśyat tato bālāṁ rājaputrīṁ yaśasvinīm॥
rohiṇīṁ śaśinā hīnāṁ grahavad bhṛśadāruṇaḥ।
जैसे सूर्य और चन्द्रमा से हीन हुई संध्या के पास महान् अंधकार उपस्थित हो, उसी प्रकार वह सीता के निकट गया। तदनन्तर जैसे चन्द्रमा से रहित हुई रोहिणी पर अत्यन्त दारुण ग्रह मंगल या शनैश्चर की दृष्टि पड़े, उसी प्रकार उस अतिशय क्रूर रावण ने उस भोली-भाली यशस्विनी राजकुमारी की ओर देखा
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tamugraṁ pāpakarmāṇaṁ janasthānagatā drumāḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
saṁdṛśya na prakampante na pravāti ca mārutaḥ।
śīghrasrotāśca taṁ dṛṣṭvā vīkṣantaṁ raktalocanam॥
stimitaṁ gantumārebhe bhayād godāvarī nadī।
उस भयंकर पापाचारी को आया देख जनस्थान के वृक्षों ने हिलना बंद कर दिया और हवा का वेग रुक गया। लाल नेत्रोंवाले रावण को अपनी ओर दृष्टिपात करते देख तीव्र गति से बहनेवाली गोदावरी नदी भय के मारे धीरे-धीरे बहने लगी
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rāmasya tvantaraṁ prepsurdaśagrīvastadantare॥
upatasthe ca vaidehīṁ bhikṣurūpeṇa rāvaṇaḥ।
राम से बदला लेने का अवसर ढूँढ़नेवाला दशमुख रावण उस समय भिक्षुरूप से विदेहकुमारी सीता के पास पहुँचा
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abhavyo bhavyarūpeṇa bhartāramanuśocatīm॥
abhyavartata vaidehīṁ citrāmiva śanaiścaraḥ।
उस समय विदेहराजकुमारी सीता अपने पति के लिये शोक और चिन्ता में डूबी हुई थीं। उसी अवस्था में अभव्य रावण भव्य रूप धारण करके उनके सामने उपस्थित हुआ, मानो शनैश्चर ग्रह चित्रा के सामने जा पहुँचा हो
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sahasā bhavyarūpeṇa tṛṇaiḥ kūpa ivāvṛtaḥ॥
atiṣṭhat prekṣya vaidehīṁ rāmapatnīṁ yaśasvinīm।
जैसे कुआँ तिनकों से ढका हुआ हो, उसी प्रकार भव्य रूप से अपनी अभव्यता को छिपाकर रावण सहसा वहाँ जा पहुँचा और यशस्विनी रामपत्नी वैदेही को देखकर खड़ा हो गया
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tiṣṭhan samprekṣya ca tadā patnīṁ rāmasya rāvaṇaḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
śubhāṁ ruciradantoṣṭhīṁ pūrṇacandranibhānanām।
āsīnāṁ parṇaśālāyāṁ bāṣpaśokābhipīḍitām॥
उस समय रावण वहाँ खड़ा-खड़ा रामपत्नी सीता को देखने लगा। वे बड़ी सुन्दरी थीं। उनके दाँत और ओठ भी सुन्दर थे, मुख पूर्ण चन्द्रमा की शोभा को छीने लेता था। वे पर्णशाला में बैठी हुई शोक से पीड़ित हो आँसू बहा रही थीं
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sa tāṁ padmapalāśākṣīṁ pītakauśeyavāsinīm।
abhyagacchata vaidehīṁ hṛṣṭacetā niśācaraḥ॥
वह निशाचर प्रसन्नचित्त हो रेशमी पीताम्बर से सुशोभित कमलनयनी विदेहकुमारी के सामने गया
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dṛṣṭvā kāmaśarāviddho brahmaghoṣamudīrayan।
abravīt praśritaṁ vākyaṁ rahite rākṣasādhipaḥ॥
उन्हें देखते ही कामदेव के बाणों से घायल हो राक्षसराज रावण वेदमन्त्र का उच्चारण करने लगा और उस एकान्त स्थान में विनीतभाव से उनसे कुछ कहने को उद्यत हुआ
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tāmuttamāṁ trilokānāṁ padmahīnāmiva śriyam।
vibhrājamānāṁ vapuṣā rāvaṇaḥ praśaśaṁsa ha॥
त्रिलोकसुन्दरी सीता अपने शरीर से कमल से रहित कमलालया लक्ष्मी की भाँति शोभा पा रही थीं। रावण उनकी प्रशंसा करता हुआ बोला—
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raupyakāñcanavarṇābhe pītakauśeyavāsini।
kamalānāṁ śubhāṁ mālāṁ padminīva ca bibhratī॥
‘उत्तम सुवर्ण की-सी कान्तिवाली तथा रेशमी पीताम्बर धारण करनेवाली सुन्दरी! (तुम कौन हो?) तुम्हारे मुख, नेत्र, हाथ और पैर कमलों के समान हैं, अतः तुम पद्मिनी (पुष्करिणी) की भाँति कमलों की सुन्दर-सी माला धारण करती हो
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hrīḥ śrīḥ kīrtiḥ śubhā lakṣmīrapsarā vā śubhānane।
bhūtirvā tvaṁ varārohe ratirvā svairacāriṇī॥
‘शुभानने! तुम श्री, ह्री, कीर्ति, शुभस्वरूपा लक्ष्मी अथवा अप्सरा तो नहीं हो? अथवा वरारोहे! तुम भूति या स्वेच्छापूर्वक विहार करनेवाली कामदेव की पत्नी रति तो नहीं हो?
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samāḥ śikhariṇaḥ snigdhāḥ pāṇḍurā daśanāstava।
viśāle vimale netre raktānte kṛṣṇatārake॥
viśālaṁ jaghanaṁ pīnamūrū karikaropamau।
‘तुम्हारे दाँत बराबर हैं। उनके अग्रभाग कुन्द की कलियों के समान शोभा पाते हैं। वे सब-के-सब चिकने और सफेद हैं। तुम्हारी दोनों आँखें बड़ी-बड़ी और निर्मल हैं। उनके दोनों कोये लाल हैं और पुतलियाँ काली हैं। कटि का अग्रभाग विशाल एवं मांसल है। दोनों जाँघें हाथी की सूँड़ के समान शोभा पाती हैं
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etāvupacitau vṛttau saṁhatau sampragalbhitau॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
pīnonnatamukhau kāntau snigdhatālaphalopamau।
maṇipravekābharaṇau rucirau te payodharau॥
‘तुम्हारे ये दोनों स्तन पुष्ट, गोलाकार, परस्पर सटे हुए, प्रगल्भ, मोटे, उठे हुए मुखवाले, कमनीय, चिकने ताड़फल के समान आकारवाले, परम सुन्दर और श्रेष्ठ मणिमय आभूषणों से विभूषित हैं
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cārusmite cārudati cārunetre vilāsini।
mano harasi me rāme nadīkūlamivāmbhasā॥
‘सुन्दर मुसकान, रुचिर दन्तावली और मनोहर नेत्रवाली विलासिनी रमणी! तुम अपने रूप-सौन्दर्य से मेरे मन को वैसे ही हरे लेती हो, जैसे नदी जल के द्वारा अपने तट का अपहरण करती है
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karāntamitamadhyāsi sukeśe saṁhatastani।
naiva devī na gandharvī na yakṣī na ca kiṁnarī॥
‘तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि मुट्ठी में आ जाय। केश चिकने और मनोहर हैं। दोनों स्तन एक-दूसरे से सटे हुए हैं। सुन्दरी! देवता, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर जाति की स्त्रियों में भी कोई तुम-जैसी नहीं है
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naivaṁrūpā mayā nārī dṛṣṭapūrvā mahītale।
rūpamagryaṁ ca lokeṣu saukumāryaṁ vayaśca te॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
iha vāsaśca kāntāre cittamunmāthayanti me।
sā pratikrāma bhadraṁ te na tvaṁ vastumihārhasi॥
‘पृथ्वी पर तो ऐसी रूपवती नारी मैंने आज से पहले कभी देखी ही नहीं थी। कहाँ तो तुम्हारा यह तीनों लोकों में सबसे सुन्दर रूप, सुकुमारता और नयी अवस्था और कहाँ इस दुर्गम वन में निवास! ये सब बातें ध्यान में आते ही मेरे मन को मथे डालती हैं। तुम्हारा कल्याण हो। यहाँ से चली जाओ। तुम यहाँ रहने के योग्य नहीं हो
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rākṣasānāmayaṁ vāso ghorāṇāṁ kāmarūpiṇām।
prāsādāgrāṇi ramyāṇi nagaropavanāni ca॥
sampannāni sugandhīni yuktānyācarituṁ tvayā।
‘यह तो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले भयंकर राक्षसों के रहने की जगह है। तुम्हें तो रमणीय राजमहलों, समृद्धिशाली नगरों और सुगन्धयुक्त उपवनों में निवास करना और विचरना चाहिये
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varaṁ mālyaṁ varaṁ gandhaṁ varaṁ vastraṁ ca śobhane॥
bhartāraṁ ca varaṁ manye tvadyuktamasitekṣaṇe।
‘शोभने! वही पुरुष श्रेष्ठ है, वही गन्ध उत्तम है और वही वस्त्र सुन्दर है, जो तुम्हारे उपयोग में आये। कजरारे नेत्रोंवाली सुन्दरि! मैं उसीको श्रेष्ठ पति मानता हूँ, जिसे तुम्हारा सुखद संयोग प्राप्त हो
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kā tvaṁ bhavasi rudrāṇāṁ marutāṁ vā śucismite॥
vasūnāṁ vā varārohe devatā pratibhāsi me।
‘पवित्र मुसकान और सुन्दर अङ्गोंवाली देवि! तुम कौन हो? मुझे तो तुम रुद्रों, मरुद्गणों अथवा वसुओं से सम्बन्ध रखनेवाली देवी जान पड़ती हो
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neha gacchanti gandharvā na devā na ca kinnarāḥ॥
rākṣasānāmayaṁ vāsaḥ kathaṁ tu tvamihāgatā।
‘यहाँ गन्धर्व, देवता तथा किन्नर नहीं आते-जाते हैं। यह राक्षसों का निवासस्थान है, फिर तुम कैसे यहाँ आ गयी
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iha śākhāmṛgāḥ siṁhā dvīpivyāghramṛgā vṛkāḥ॥
ṛkṣāstarakṣavaḥ kaṅkāḥ kathaṁ tebhyo na bibhyase।
‘यहाँ वानर, सिंह, चीते, व्याघ्र, मृग, भेड़िये, रीछ, शेर और कंक (गीध आदि पक्षी) रहते हैं। तुम्हें इनसे भय क्यों नहीं हो रहा है?
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madānvitānāṁ ghorāṇāṁ kuñjarāṇāṁ tarasvinām॥
kathamekā mahāraṇye na bibheṣi varānane।
‘वरानने! इस विशाल वन के भीतर अत्यन्त वेगशाली और भयंकर मदमत्त गजराजों के बीच अकेली रहती हुई तुम भयभीत कैसे नहीं होती हो?
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kāsi kasya kutaśca tvaṁ kiṁ nimittaṁ ca daṇḍakān॥
ekā carasi kalyāṇi ghorān rākṣasasevitān।
‘कल्याणमयी देवि! बताओ, तुम कौन हो? किसकी हो? और कहाँ से आकर किस कारण इस राक्षससेवित घोर दण्डकारण्य में अकेली विचरण करती हो?’
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iti praśastā vaidehī rāvaṇena mahātmanā॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
dvijātiveṣeṇa hi taṁ dṛṣṭvā rāvaṇamāgatam।
sarvairatithisatkāraiḥ pūjayāmāsa maithilī॥
वेशभूषा से महात्मा बनकर आये हुए रावण ने जब विदेहकुमारी सीता की इस प्रकार प्रशंसा की, तब ब्राह्मणवेष में वहाँ पधारे हुए रावण को देखकर मैथिली ने अतिथि-सत्कार के लिये उपयोगी सभी सामग्रियोंद्वारा उसका पूजन किया
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upānīyāsanaṁ pūrvaṁ pādyenābhinimantrya ca।
abravīt siddhamityeva tadā taṁ saumyadarśanam॥
पहले बैठने के लिये आसन दे, पाद्य (पैर धोने के लिये जल) निवेदन किया। तदनन्तर ऊपर से सौम्य दिखायी देनेवाले उस अतिथि को भोजन के लिये निमन्त्रण देते हुए कहा—‘ब्रह्मन्! भोजन तैयार है, ग्रहण कीजिये’
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dvijātiveṣeṇa samīkṣya maithilī samāgataṁ pātrakusumbhadhāriṇam।
aśakyamuddveṣṭumupāyadarśanānnyamantrayad brāhmaṇavat tathāgatam॥
वह ब्राह्मण के वेष में आया था, कमण्डलु और गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए था। ब्राह्मण-वेष में आये हुए अतिथि की उपेक्षा असम्भव थी। उसकी वेशभूषा में ब्राह्मणत्व का निश्चय करानेवाले चिह्न दिखायी देते थे, अतः उस रूप में आये हुए उस रावण को देखकर मैथिली ने ब्राह्मण के योग्य सत्कार करने के लिये ही उसे निमन्त्रित किया
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iyaṁ bṛsī brāhmaṇa kāmamāsyatāmidaṁ ca pādyaṁ pratigṛhyatāmiti।
idaṁ ca siddhaṁ vanajātamuttamaṁ tvadarthamavyagramihopabhujyatām॥
वे बोलीं—‘ब्राह्मण! यह चटाई है, इसपर इच्छानुसार बैठ जाइये। यह पैर धोने के लिये जल है, इसे ग्रहण कीजिये और यह वन में ही उत्पन्न हुआ उत्तम फल-मूल आपके लिये ही तैयार करके रखा गया है, यहाँ शान्तभाव से उसका उपभोग कीजिये’
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nimantryamāṇaḥ pratipūrṇabhāṣiṇīṁ narendrapatnīṁ prasamīkṣya maithilīm।
prasahya tasyā haraṇe dṛḍhaṁ manaḥ samarpayāmāsa vadhāya rāvaṇaḥ॥
‘अतिथि के लिये सब कुछ तैयार है’ ऐसा कहकर सीता ने जब उसे भोजन के लिये निमन्त्रित किया, तब रावण ने ‘सर्व सम्पन्नम्’ कहनेवाली राजरानी मैथिली की ओर देखा और अपने ही वध के लिये उसने हठपूर्वक सीता का हरण करने के निमित्त मन में दृढ़ निश्चय कर लिया
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tataḥ suveṣaṁ mṛgayāgataṁ patiṁ pratīkṣamāṇā sahalakṣmaṇaṁ tadā।
nirīkṣamāṇā haritaṁ dadarśa tanmahad vanaṁ naiva tu rāmalakṣmaṇau॥
तदनन्तर सीता शिकार खेलने के लिये गये हुए लक्ष्मणसहित अपने सुन्दर वेषधारी पति श्रीरामचन्द्रजी की प्रतीक्षा करने लगीं। उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी, किंतु उन्हें सब ओर हराभरा विशाल वन ही दिखायी दिया, श्रीराम और लक्ष्मण नहीं दीख पड़े
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४६ ॥