वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ४६ · ३८ श्लोकाःSarga 46 · 38 ślokas

रावणका साधुवेषमें सीताके पास जाकर उनका परिचय पूछना और सीताका आतिथ्यके लिये उसे आमन्त्रित करना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ४६ — painting

॥ ३ · ४६ · १०–११ ॥

पञ्चवटीपर्णशालाद्वारे भिक्षुवेषधारी रावणः—एकशिरा गैरिककषायवस्त्रधरः शिखी वामांसे यष्टिकमण्डलुधरः पात्रच्छत्रोपानद्युतो रक्तेक्षणो गूढहिंसः—द्वारि उपविष्टां भर्तृविरहशोकार्तामश्रुमुखीं सीतां निरीक्षते, सा च निर्दोषा तमतिथिं सादरमूर्ध्वं पश्यति; समन्तात् स्तम्भितं मौनं वृक्षा निश्चला गोदावरी च मन्दगामिनी।

पंचवटी की पर्णशाला के द्वार पर भिक्षु का वेष धरे रावण—एक मुख, गेरुए कषाय वस्त्र में, शिखाधारी, बायें कंधे पर डंडा-कमंडलु, हाथ में भिक्षापात्र, ऊपर छाता और पैरों में जूते, किंतु लाल आँखों में छिपी हिंसा लिये—द्वार पर बैठी, पति के विरह में शोकार्त, अश्रुमुखी सीता को देख रहा है; भोली सीता उस अतिथि को आदरपूर्वक ऊपर की ओर निहार रही हैं; चारों ओर अस्वाभाविक सन्नाटा छाया है—वृक्ष निश्चल और गोदावरी मंद बह रही है।

At the door of the Panchavati leaf-hut, Ravana in mendicant's guise — one head, in ochre-saffron robes, a topknot, a staff and water-pot on his left shoulder, a begging bowl in hand, a parasol above and sandals on his feet, yet with red-tinged eyes hiding his menace — gazes at Sita, who sits worn with grief and tears for her absent lord; the innocent princess looks up at the seeming holy guest with courteous respect, while an unnatural hush hangs over all, the trees motionless and the Godavari sliding slowly by.

॥ ३ · ४६ · १ ॥
तया परुषमुक्तस्तु कुपितो राघवानुजः। विकांक्षन् भृशं रामं प्रतस्थे नचिरादिव॥

tayā paruṣamuktastu kupito rāghavānujaḥ।
sa vikāṁkṣan bhṛśaṁ rāmaṁ pratasthe nacirādiva॥

सीता के कठोर वचन कहने पर कुपित हुए लक्ष्मण श्रीराम से मिलने की विशेष इच्छा रखकर शीघ्र ही वहाँ से चल दिये

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · २ ॥
तदासाद्य दशग्रीवः क्षिप्रमन्तरमास्थितः। अभिचक्राम वैदेहीं परिव्राजकरूपधृक्॥

tadāsādya daśagrīvaḥ kṣipramantaramāsthitaḥ।
abhicakrāma vaidehīṁ parivrājakarūpadhṛk॥

लक्ष्मण के चले जाने पर रावण को मौका मिल गया, अतः वह संन्यासी का वेष धारण करके शीघ्र ही सीता के समीप गया

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ३ ॥
श्लक्ष्णकाषायसंवीतः शिखी छत्री उपानही। वामे चांसेऽवसज्याथ शुभे यष्टिकमण्डलू॥

ślakṣṇakāṣāyasaṁvītaḥ śikhī chatrī upānahī।
vāme cāṁse'vasajyātha śubhe yaṣṭikamaṇḍalū॥

वह शरीर पर साफ-सुथरा गेरुए रंग का वस्त्र लपेटे हुए था। उसके मस्तक पर शिखा, हाथ में छाता और पैरों में जूते थे। उसने बायें कंधे पर डंडा रखकर उसमें कमण्डलु लटका रखा था

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ४ ॥
परिव्राजकरूपेण वैदेहीमन्ववर्तत। तामाससादातिबलो भ्रातृभ्यां रहितां वने॥

parivrājakarūpeṇa vaidehīmanvavartata।
tāmāsasādātibalo bhrātṛbhyāṁ rahitāṁ vane॥

अत्यन्त बलवान् रावण उस वन में परिव्राजक का रूप धारण करके श्रीराम और लक्ष्मण दोनों बन्धुओं से रहित हुई अकेली विदेहकुमारी सीता के पास गया

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ५ ॥
रहितां सूर्यचन्द्राभ्यां संध्यामिव महत्तमः। तामपश्यत् ततो बालां राजपुत्रीं यशस्विनीम्॥ रोहिणीं शशिना हीनां ग्रहवद् भृशदारुणः।

rahitāṁ sūryacandrābhyāṁ saṁdhyāmiva mahattamaḥ।
tāmapaśyat tato bālāṁ rājaputrīṁ yaśasvinīm॥
rohiṇīṁ śaśinā hīnāṁ grahavad bhṛśadāruṇaḥ।

जैसे सूर्य और चन्द्रमा से हीन हुई संध्या के पास महान् अंधकार उपस्थित हो, उसी प्रकार वह सीता के निकट गया। तदनन्तर जैसे चन्द्रमा से रहित हुई रोहिणी पर अत्यन्त दारुण ग्रह मंगल या शनैश्चर की दृष्टि पड़े, उसी प्रकार उस अतिशय क्रूर रावण ने उस भोली-भाली यशस्विनी राजकुमारी की ओर देखा

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ६ ॥
तमुग्रं पापकर्माणं जनस्थानगता द्रुमाः॥

tamugraṁ pāpakarmāṇaṁ janasthānagatā drumāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४६ · ७ ॥
संदृश्य प्रकम्पन्ते प्रवाति मारुतः। शीघ्रस्रोताश्च तं दृष्ट्वा वीक्षन्तं रक्तलोचनम्॥ स्तिमितं गन्तुमारेभे भयाद् गोदावरी नदी।

saṁdṛśya na prakampante na pravāti ca mārutaḥ।
śīghrasrotāśca taṁ dṛṣṭvā vīkṣantaṁ raktalocanam॥
stimitaṁ gantumārebhe bhayād godāvarī nadī।

॥ ६–७ ॥

उस भयंकर पापाचारी को आया देख जनस्थान के वृक्षों ने हिलना बंद कर दिया और हवा का वेग रुक गया। लाल नेत्रोंवाले रावण को अपनी ओर दृष्टिपात करते देख तीव्र गति से बहनेवाली गोदावरी नदी भय के मारे धीरे-धीरे बहने लगी

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ८ ॥
रामस्य त्वन्तरं प्रेप्सुर्दशग्रीवस्तदन्तरे॥ उपतस्थे वैदेहीं भिक्षुरूपेण रावणः।

rāmasya tvantaraṁ prepsurdaśagrīvastadantare॥
upatasthe ca vaidehīṁ bhikṣurūpeṇa rāvaṇaḥ।

राम से बदला लेने का अवसर ढूँढ़नेवाला दशमुख रावण उस समय भिक्षुरूप से विदेहकुमारी सीता के पास पहुँचा

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ९ ॥
अभव्यो भव्यरूपेण भर्तारमनुशोचतीम्॥ अभ्यवर्तत वैदेहीं चित्रामिव शनैश्चरः।

abhavyo bhavyarūpeṇa bhartāramanuśocatīm॥
abhyavartata vaidehīṁ citrāmiva śanaiścaraḥ।

उस समय विदेहराजकुमारी सीता अपने पति के लिये शोक और चिन्ता में डूबी हुई थीं। उसी अवस्था में अभव्य रावण भव्य रूप धारण करके उनके सामने उपस्थित हुआ, मानो शनैश्चर ग्रह चित्रा के सामने जा पहुँचा हो

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · १० ॥
सहसा भव्यरूपेण तृणैः कूप इवावृतः॥ अतिष्ठत् प्रेक्ष्य वैदेहीं रामपत्नीं यशस्विनीम्।

sahasā bhavyarūpeṇa tṛṇaiḥ kūpa ivāvṛtaḥ॥
atiṣṭhat prekṣya vaidehīṁ rāmapatnīṁ yaśasvinīm।

जैसे कुआँ तिनकों से ढका हुआ हो, उसी प्रकार भव्य रूप से अपनी अभव्यता को छिपाकर रावण सहसा वहाँ जा पहुँचा और यशस्विनी रामपत्नी वैदेही को देखकर खड़ा हो गया

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ११ ॥
तिष्ठन् सम्प्रेक्ष्य तदा पत्नीं रामस्य रावणः॥

tiṣṭhan samprekṣya ca tadā patnīṁ rāmasya rāvaṇaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४६ · १२ ॥
शुभां रुचिरदन्तोष्ठीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम्। आसीनां पर्णशालायां बाष्पशोकाभिपीडिताम्॥

śubhāṁ ruciradantoṣṭhīṁ pūrṇacandranibhānanām।
āsīnāṁ parṇaśālāyāṁ bāṣpaśokābhipīḍitām॥

॥ ११–१२ ॥

उस समय रावण वहाँ खड़ा-खड़ा रामपत्नी सीता को देखने लगा। वे बड़ी सुन्दरी थीं। उनके दाँत और ओठ भी सुन्दर थे, मुख पूर्ण चन्द्रमा की शोभा को छीने लेता था। वे पर्णशाला में बैठी हुई शोक से पीड़ित हो आँसू बहा रही थीं

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · १३ ॥
तां पद्मपलाशाक्षीं पीतकौशेयवासिनीम्। अभ्यगच्छत वैदेहीं हृष्टचेता निशाचरः॥

sa tāṁ padmapalāśākṣīṁ pītakauśeyavāsinīm।
abhyagacchata vaidehīṁ hṛṣṭacetā niśācaraḥ॥

वह निशाचर प्रसन्नचित्त हो रेशमी पीताम्बर से सुशोभित कमलनयनी विदेहकुमारी के सामने गया

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · १४ ॥
दृष्ट्वा कामशराविद्धो ब्रह्मघोषमुदीरयन्। अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं रहिते राक्षसाधिपः॥

dṛṣṭvā kāmaśarāviddho brahmaghoṣamudīrayan।
abravīt praśritaṁ vākyaṁ rahite rākṣasādhipaḥ॥

उन्हें देखते ही कामदेव के बाणों से घायल हो राक्षसराज रावण वेदमन्त्र का उच्चारण करने लगा और उस एकान्त स्थान में विनीतभाव से उनसे कुछ कहने को उद्यत हुआ

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · १५ ॥
तामुत्तमां त्रिलोकानां पद्महीनामिव श्रियम्। विभ्राजमानां वपुषा रावणः प्रशशंस ह॥

tāmuttamāṁ trilokānāṁ padmahīnāmiva śriyam।
vibhrājamānāṁ vapuṣā rāvaṇaḥ praśaśaṁsa ha॥

त्रिलोकसुन्दरी सीता अपने शरीर से कमल से रहित कमलालया लक्ष्मी की भाँति शोभा पा रही थीं। रावण उनकी प्रशंसा करता हुआ बोला—

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · १६ ॥
रौप्यकाञ्चनवर्णाभे पीतकौशेयवासिनि। कमलानां शुभां मालां पद्मिनीव बिभ्रती॥

raupyakāñcanavarṇābhe pītakauśeyavāsini।
kamalānāṁ śubhāṁ mālāṁ padminīva ca bibhratī॥

‘उत्तम सुवर्ण की-सी कान्तिवाली तथा रेशमी पीताम्बर धारण करनेवाली सुन्दरी! (तुम कौन हो?) तुम्हारे मुख, नेत्र, हाथ और पैर कमलों के समान हैं, अतः तुम पद्मिनी (पुष्करिणी) की भाँति कमलों की सुन्दर-सी माला धारण करती हो

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · १७ ॥
ह्रीः श्रीः कीर्तिः शुभा लक्ष्मीरप्सरा वा शुभानने। भूतिर्वा त्वं वरारोहे रतिर्वा स्वैरचारिणी॥

hrīḥ śrīḥ kīrtiḥ śubhā lakṣmīrapsarā vā śubhānane।
bhūtirvā tvaṁ varārohe ratirvā svairacāriṇī॥

‘शुभानने! तुम श्री, ह्री, कीर्ति, शुभस्वरूपा लक्ष्मी अथवा अप्सरा तो नहीं हो? अथवा वरारोहे! तुम भूति या स्वेच्छापूर्वक विहार करनेवाली कामदेव की पत्नी रति तो नहीं हो?

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · १८ ॥
समाः शिखरिणः स्निग्धाः पाण्डुरा दशनास्तव। विशाले विमले नेत्रे रक्तान्ते कृष्णतारके॥ विशालं जघनं पीनमूरू करिकरोपमौ।

samāḥ śikhariṇaḥ snigdhāḥ pāṇḍurā daśanāstava।
viśāle vimale netre raktānte kṛṣṇatārake॥
viśālaṁ jaghanaṁ pīnamūrū karikaropamau।

‘तुम्हारे दाँत बराबर हैं। उनके अग्रभाग कुन्द की कलियों के समान शोभा पाते हैं। वे सब-के-सब चिकने और सफेद हैं। तुम्हारी दोनों आँखें बड़ी-बड़ी और निर्मल हैं। उनके दोनों कोये लाल हैं और पुतलियाँ काली हैं। कटि का अग्रभाग विशाल एवं मांसल है। दोनों जाँघें हाथी की सूँड़ के समान शोभा पाती हैं

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · १९ ॥
एतावुपचितौ वृत्तौ संहतौ सम्प्रगल्भितौ॥

etāvupacitau vṛttau saṁhatau sampragalbhitau॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४६ · २० ॥
पीनोन्नतमुखौ कान्तौ स्निग्धतालफलोपमौ। मणिप्रवेकाभरणौ रुचिरौ ते पयोधरौ॥

pīnonnatamukhau kāntau snigdhatālaphalopamau।
maṇipravekābharaṇau rucirau te payodharau॥

॥ १९–२० ॥

‘तुम्हारे ये दोनों स्तन पुष्ट, गोलाकार, परस्पर सटे हुए, प्रगल्भ, मोटे, उठे हुए मुखवाले, कमनीय, चिकने ताड़फल के समान आकारवाले, परम सुन्दर और श्रेष्ठ मणिमय आभूषणों से विभूषित हैं

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · २१ ॥
चारुस्मिते चारुदति चारुनेत्रे विलासिनि। मनो हरसि मे रामे नदीकूलमिवाम्भसा॥

cārusmite cārudati cārunetre vilāsini।
mano harasi me rāme nadīkūlamivāmbhasā॥

‘सुन्दर मुसकान, रुचिर दन्तावली और मनोहर नेत्रवाली विलासिनी रमणी! तुम अपने रूप-सौन्दर्य से मेरे मन को वैसे ही हरे लेती हो, जैसे नदी जल के द्वारा अपने तट का अपहरण करती है

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · २२ ॥
करान्तमितमध्यासि सुकेशे संहतस्तनि। नैव देवी गन्धर्वी यक्षी किंनरी॥

karāntamitamadhyāsi sukeśe saṁhatastani।
naiva devī na gandharvī na yakṣī na ca kiṁnarī॥

‘तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि मुट्ठी में आ जाय। केश चिकने और मनोहर हैं। दोनों स्तन एक-दूसरे से सटे हुए हैं। सुन्दरी! देवता, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर जाति की स्त्रियों में भी कोई तुम-जैसी नहीं है

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · २३ ॥
नैवंरूपा मया नारी दृष्टपूर्वा महीतले। रूपमग्र्यं लोकेषु सौकुमार्यं वयश्च ते॥

naivaṁrūpā mayā nārī dṛṣṭapūrvā mahītale।
rūpamagryaṁ ca lokeṣu saukumāryaṁ vayaśca te॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४६ · २४ ॥
इह वासश्च कान्तारे चित्तमुन्माथयन्ति मे। सा प्रतिक्राम भद्रं ते त्वं वस्तुमिहार्हसि॥

iha vāsaśca kāntāre cittamunmāthayanti me।
sā pratikrāma bhadraṁ te na tvaṁ vastumihārhasi॥

॥ २३–२४ ॥

‘पृथ्वी पर तो ऐसी रूपवती नारी मैंने आज से पहले कभी देखी ही नहीं थी। कहाँ तो तुम्हारा यह तीनों लोकों में सबसे सुन्दर रूप, सुकुमारता और नयी अवस्था और कहाँ इस दुर्गम वन में निवास! ये सब बातें ध्यान में आते ही मेरे मन को मथे डालती हैं। तुम्हारा कल्याण हो। यहाँ से चली जाओ। तुम यहाँ रहने के योग्य नहीं हो

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · २५ ॥
राक्षसानामयं वासो घोराणां कामरूपिणाम्। प्रासादाग्राणि रम्याणि नगरोपवनानि च॥ सम्पन्नानि सुगन्धीनि युक्तान्याचरितुं त्वया।

rākṣasānāmayaṁ vāso ghorāṇāṁ kāmarūpiṇām।
prāsādāgrāṇi ramyāṇi nagaropavanāni ca॥
sampannāni sugandhīni yuktānyācarituṁ tvayā।

‘यह तो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले भयंकर राक्षसों के रहने की जगह है। तुम्हें तो रमणीय राजमहलों, समृद्धिशाली नगरों और सुगन्धयुक्त उपवनों में निवास करना और विचरना चाहिये

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · २६ ॥
वरं माल्यं वरं गन्धं वरं वस्त्रं शोभने॥ भर्तारं वरं मन्ये त्वद्युक्तमसितेक्षणे।

varaṁ mālyaṁ varaṁ gandhaṁ varaṁ vastraṁ ca śobhane॥
bhartāraṁ ca varaṁ manye tvadyuktamasitekṣaṇe।

‘शोभने! वही पुरुष श्रेष्ठ है, वही गन्ध उत्तम है और वही वस्त्र सुन्दर है, जो तुम्हारे उपयोग में आये। कजरारे नेत्रोंवाली सुन्दरि! मैं उसीको श्रेष्ठ पति मानता हूँ, जिसे तुम्हारा सुखद संयोग प्राप्त हो

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · २७ ॥
का त्वं भवसि रुद्राणां मरुतां वा शुचिस्मिते॥ वसूनां वा वरारोहे देवता प्रतिभासि मे।

kā tvaṁ bhavasi rudrāṇāṁ marutāṁ vā śucismite॥
vasūnāṁ vā varārohe devatā pratibhāsi me।

‘पवित्र मुसकान और सुन्दर अङ्गोंवाली देवि! तुम कौन हो? मुझे तो तुम रुद्रों, मरुद्गणों अथवा वसुओं से सम्बन्ध रखनेवाली देवी जान पड़ती हो

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · २८ ॥
नेह गच्छन्ति गन्धर्वा देवा किन्नराः॥ राक्षसानामयं वासः कथं तु त्वमिहागता।

neha gacchanti gandharvā na devā na ca kinnarāḥ॥
rākṣasānāmayaṁ vāsaḥ kathaṁ tu tvamihāgatā।

‘यहाँ गन्धर्व, देवता तथा किन्नर नहीं आते-जाते हैं। यह राक्षसों का निवासस्थान है, फिर तुम कैसे यहाँ आ गयी

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · २९ ॥
इह शाखामृगाः सिंहा द्वीपिव्याघ्रमृगा वृकाः॥ ऋक्षास्तरक्षवः कङ्काः कथं तेभ्यो बिभ्यसे।

iha śākhāmṛgāḥ siṁhā dvīpivyāghramṛgā vṛkāḥ॥
ṛkṣāstarakṣavaḥ kaṅkāḥ kathaṁ tebhyo na bibhyase।

‘यहाँ वानर, सिंह, चीते, व्याघ्र, मृग, भेड़िये, रीछ, शेर और कंक (गीध आदि पक्षी) रहते हैं। तुम्हें इनसे भय क्यों नहीं हो रहा है?

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ३० ॥
मदान्वितानां घोराणां कुञ्जराणां तरस्विनाम्॥ कथमेका महारण्ये बिभेषि वरानने।

madānvitānāṁ ghorāṇāṁ kuñjarāṇāṁ tarasvinām॥
kathamekā mahāraṇye na bibheṣi varānane।

‘वरानने! इस विशाल वन के भीतर अत्यन्त वेगशाली और भयंकर मदमत्त गजराजों के बीच अकेली रहती हुई तुम भयभीत कैसे नहीं होती हो?

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ३१ ॥
कासि कस्य कुतश्च त्वं किं निमित्तं दण्डकान्॥ एका चरसि कल्याणि घोरान् राक्षससेवितान्।

kāsi kasya kutaśca tvaṁ kiṁ nimittaṁ ca daṇḍakān॥
ekā carasi kalyāṇi ghorān rākṣasasevitān।

‘कल्याणमयी देवि! बताओ, तुम कौन हो? किसकी हो? और कहाँ से आकर किस कारण इस राक्षससेवित घोर दण्डकारण्य में अकेली विचरण करती हो?’

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ३२ ॥
इति प्रशस्ता वैदेही रावणेन महात्मना॥

iti praśastā vaidehī rāvaṇena mahātmanā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४६ · ३३ ॥
द्विजातिवेषेण हि तं दृष्ट्वा रावणमागतम्। सर्वैरतिथिसत्कारैः पूजयामास मैथिली॥

dvijātiveṣeṇa hi taṁ dṛṣṭvā rāvaṇamāgatam।
sarvairatithisatkāraiḥ pūjayāmāsa maithilī॥

॥ ३२–३३ ॥

वेशभूषा से महात्मा बनकर आये हुए रावण ने जब विदेहकुमारी सीता की इस प्रकार प्रशंसा की, तब ब्राह्मणवेष में वहाँ पधारे हुए रावण को देखकर मैथिली ने अतिथि-सत्कार के लिये उपयोगी सभी सामग्रियोंद्वारा उसका पूजन किया

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ३४ ॥
उपानीयासनं पूर्वं पाद्येनाभिनिमन्त्र्य च। अब्रवीत् सिद्धमित्येव तदा तं सौम्यदर्शनम्॥

upānīyāsanaṁ pūrvaṁ pādyenābhinimantrya ca।
abravīt siddhamityeva tadā taṁ saumyadarśanam॥

पहले बैठने के लिये आसन दे, पाद्य (पैर धोने के लिये जल) निवेदन किया। तदनन्तर ऊपर से सौम्य दिखायी देनेवाले उस अतिथि को भोजन के लिये निमन्त्रण देते हुए कहा—‘ब्रह्मन्! भोजन तैयार है, ग्रहण कीजिये’

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ३५ ॥
द्विजातिवेषेण समीक्ष्य मैथिली समागतं पात्रकुसुम्भधारिणम्। अशक्यमुद्द्वेष्टुमुपायदर्शनान्न्यमन्त्रयद् ब्राह्मणवत् तथागतम्॥

dvijātiveṣeṇa samīkṣya maithilī samāgataṁ pātrakusumbhadhāriṇam।
aśakyamuddveṣṭumupāyadarśanānnyamantrayad brāhmaṇavat tathāgatam॥

वह ब्राह्मण के वेष में आया था, कमण्डलु और गेरुआ वस्त्र धारण किये हुए था। ब्राह्मण-वेष में आये हुए अतिथि की उपेक्षा असम्भव थी। उसकी वेशभूषा में ब्राह्मणत्व का निश्चय करानेवाले चिह्न दिखायी देते थे, अतः उस रूप में आये हुए उस रावण को देखकर मैथिली ने ब्राह्मण के योग्य सत्कार करने के लिये ही उसे निमन्त्रित किया

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ३६ ॥
इयं बृसी ब्राह्मण काममास्यतामिदं पाद्यं प्रतिगृह्यतामिति। इदं सिद्धं वनजातमुत्तमं त्वदर्थमव्यग्रमिहोपभुज्यताम्॥

iyaṁ bṛsī brāhmaṇa kāmamāsyatāmidaṁ ca pādyaṁ pratigṛhyatāmiti।
idaṁ ca siddhaṁ vanajātamuttamaṁ tvadarthamavyagramihopabhujyatām॥

वे बोलीं—‘ब्राह्मण! यह चटाई है, इसपर इच्छानुसार बैठ जाइये। यह पैर धोने के लिये जल है, इसे ग्रहण कीजिये और यह वन में ही उत्पन्न हुआ उत्तम फल-मूल आपके लिये ही तैयार करके रखा गया है, यहाँ शान्तभाव से उसका उपभोग कीजिये’

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ३७ ॥
निमन्त्र्यमाणः प्रतिपूर्णभाषिणीं नरेन्द्रपत्नीं प्रसमीक्ष्य मैथिलीम्। प्रसह्य तस्या हरणे दृढं मनः समर्पयामास वधाय रावणः॥

nimantryamāṇaḥ pratipūrṇabhāṣiṇīṁ narendrapatnīṁ prasamīkṣya maithilīm।
prasahya tasyā haraṇe dṛḍhaṁ manaḥ samarpayāmāsa vadhāya rāvaṇaḥ॥

‘अतिथि के लिये सब कुछ तैयार है’ ऐसा कहकर सीता ने जब उसे भोजन के लिये निमन्त्रित किया, तब रावण ने ‘सर्व सम्पन्नम्’ कहनेवाली राजरानी मैथिली की ओर देखा और अपने ही वध के लिये उसने हठपूर्वक सीता का हरण करने के निमित्त मन में दृढ़ निश्चय कर लिया

English translation coming soon.

॥ ३ · ४६ · ३८ ॥
ततः सुवेषं मृगयागतं पतिं प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा। निरीक्षमाणा हरितं ददर्श तन्महद् वनं नैव तु रामलक्ष्मणौ॥

tataḥ suveṣaṁ mṛgayāgataṁ patiṁ pratīkṣamāṇā sahalakṣmaṇaṁ tadā।
nirīkṣamāṇā haritaṁ dadarśa tanmahad vanaṁ naiva tu rāmalakṣmaṇau॥

तदनन्तर सीता शिकार खेलने के लिये गये हुए लक्ष्मणसहित अपने सुन्दर वेषधारी पति श्रीरामचन्द्रजी की प्रतीक्षा करने लगीं। उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी, किंतु उन्हें सब ओर हराभरा विशाल वन ही दिखायी दिया, श्रीराम और लक्ष्मण नहीं दीख पड़े

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षट्चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४६ ॥