वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ४४ · २७ श्लोकाःSarga 44 · 27 ślokas

श्रीरामके द्वारा मारीचका वध और उसके द्वारा सीता और लक्ष्मणके पुकारनेका शब्द सुनकर श्रीरामकी चिन्ता

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ४४ — painting

॥ ३ · ४४ · १९–२० ॥

गहनदण्डकारण्ये नीलवर्णो जटाधरो वल्कलधरो राम आकृष्टचापो मुक्तबाणस्तिष्ठति, तस्य ब्रह्मास्त्रं सूर्यरश्मिवत् प्रदीप्तं लक्ष्यं प्रति धावति; अग्रे स्वर्णमृगो मायां त्यक्त्वा महाकायं रक्षोरूपं मारीचं प्रकटयन् भूमौ पतति, ऊर्ध्वमुखो विवृतास्यश्च रामस्वरेण 'हा सीते हा लक्ष्मण' इति क्रन्दति; रामस्य मुखे च आगामिशङ्काविषादौ प्रकाशेते।

घने दंडकारण्य में नील वर्ण, जटाधारी, वल्कलधारी श्रीराम धनुष खींचकर बाण छोड़ चुके हैं; उनका सूर्यकिरण-सा दमकता ब्रह्मास्त्र लक्ष्य की ओर उड़ रहा है। सामने वह स्वर्णमृग माया त्यागकर विशालकाय राक्षस मारीच के रूप में प्रकट होता हुआ धरती पर गिर रहा है और मुँह खोलकर श्रीराम के ही स्वर में 'हा सीते! हा लक्ष्मण!' चिल्ला रहा है; श्रीराम के मुख पर अनिष्ट की आशंका और विषाद उभर आया है।

Deep in the Dandaka forest the blue-hued, matted-haired Ram stands with his bow drawn and the string just loosed, his sun-bright brahma-arrow streaking to its mark; before him the golden deer sheds its illusion and, revealed as the colossal demon Maricha, crashes to the earth, its head flung back and mouth wrenched open, crying in Ram's own voice, 'Ha Sita! Ha Lakshman!' — while dread and grief dawn on Ram's face.

॥ ३ · ४४ · १ ॥
तथा तु तं समादिश्य भ्रातरं रघुनन्दनः। बबन्धासिं महातेजा जाम्बूनदमयत्सरुम्‌॥

tathā tu taṁ samādiśya bhrātaraṁ raghunandanaḥ।
babandhāsiṁ mahātejā jāmbūnadamayatsarum‌॥

लक्ष्मण को इस प्रकार आदेश देकर रघुकुल का आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी ने सोने की मूँठवाली तलवार कमर में बाँध ली

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॥ ३ · ४४ · २ ॥
ततस्त्रिविनतं चापमादायात्मविभूषणम्‌। आबध्य कपालौ द्वौ जगामोदग्रविक्रमः॥

tatastrivinataṁ cāpamādāyātmavibhūṣaṇam‌।
ābadhya ca kapālau dvau jagāmodagravikramaḥ॥

तत्पश्चात् महापराक्रमी रघुनाथजी तीन स्थानों में झुके हुए अपने आभूषणरूप धनुष को हाथ में ले पीठ पर दो तरकस बाँधकर वहाँ से चल दिये

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॥ ३ · ४४ · ३ ॥
तं वन्यराजो राजेन्द्रमापतन्तं निरीक्ष्य वै। बभूवान्तर्हितस्त्रासात्‌ पुनः संदर्शनेऽभवत्‌॥

taṁ vanyarājo rājendramāpatantaṁ nirīkṣya vai।
babhūvāntarhitastrāsāt‌ punaḥ saṁdarśane'bhavat‌॥

राजाधिराज श्रीराम को आते देख वह वन्य मृगों का राजा काञ्चनमृग भय के मारे छिप गया, किंतु फिर तुरंत ही उनके दृष्टिपथ में आ गया

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॥ ३ · ४४ · ४ ॥
बद्धासिर्धनुरादाय प्रदुद्राव यतो मृगः। तं स्म पश्यति रूपेण द्योतयन्तमिवाग्रतः॥

baddhāsirdhanurādāya pradudrāva yato mṛgaḥ।
taṁ sma paśyati rūpeṇa dyotayantamivāgrataḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४४ · ५ ॥
अवेक्ष्यावेक्ष्य धावन्तं धनुष्पाणिर्महावने। अतिवृत्तमिवोत्पाताल्लोभयानं कदाचन॥

avekṣyāvekṣya dhāvantaṁ dhanuṣpāṇirmahāvane।
ativṛttamivotpātāllobhayānaṁ kadācana॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४४ · ६ ॥
शङ्कितं तु समुद्भ्रान्तमुत्पतन्तमिवाम्बरम्‌। दृश्यमानमदृश्यं वनोद्देशेषु केषुचित्‌॥

śaṅkitaṁ tu samudbhrāntamutpatantamivāmbaram‌।
dṛśyamānamadṛśyaṁ ca vanoddeśeṣu keṣucit‌॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४४ · ७ ॥
छिन्नाभ्रैरिव संवीतं शारदं चन्द्रमण्डलम्‌। मुहूर्तादेव ददृशे मुहुर्दूरात्‌ प्रकाशते॥

chinnābhrairiva saṁvītaṁ śāradaṁ candramaṇḍalam‌।
muhūrtādeva dadṛśe muhurdūrāt‌ prakāśate॥

॥ ४–७ ॥

तब तलवार बाँधे और धनुष लिये श्रीराम जिस ओर वह मृग था, उसी ओर दौड़े। धनुर्धर श्रीराम ने देखा, वह अपने रूप से सामने की दिशा को प्रकाशित-सी कर रहा था। उस महान् वन में वह पीछे की ओर देख-देखकर आगे की ओर भाग रहा था। कभी छलाँगें मारकर बहुत दूर निकल जाता और कभी इतना निकट दिखायी देता कि हाथ से पकड़ लेने का लोभ पैदा कर देता था। कभी डरा हुआ, कभी घबराया हुआ और कभी आकाश में उछलता हुआ दीख पड़ता था। कभी वन के किन्हीं स्थानों में छिपकर अदृश्य हो जाता था, मानो शरद्-ऋतु का चन्द्रमण्डल मेघखण्डों से आवृत हो गया हो। एक ही मुहूर्त में वह निकट दिखायी देता और पुनः बहुत दूर के स्थान में चमक उठता था

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॥ ३ · ४४ · ८ ॥
दर्शनादर्शनेनैव सोऽपाकर्षत राघवम्‌। दूरमाश्रमस्यास्य मारीचो मृगतां गतः॥

darśanādarśanenaiva so'pākarṣata rāghavam‌।
sa dūramāśramasyāsya mārīco mṛgatāṁ gataḥ॥

इस तरह प्रकट होता और छिपता हुआ वह मृगरूपधारी मारीच श्रीरघुनाथजी को उनके आश्रम से बहुत दूर खींच ले गया

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॥ ३ · ४४ · ९ ॥
आसीत्‌ क्रुद्धस्तु काकुत्स्थो विवशस्तेन मोहितः। अथावतस्थे सुश्रान्तश्छायामाश्रित्य शाद्वले॥

āsīt‌ kruddhastu kākutstho vivaśastena mohitaḥ।
athāvatasthe suśrāntaśchāyāmāśritya śādvale॥

उस समय उससे मोहित और विवश होकर श्रीराम कुछ कुपित हो उठे और थककर एक जगह छाया का आश्रय ले हरी-हरी घासवाली भूमि पर खड़े हो गये

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॥ ३ · ४४ · १० ॥
तमुन्मादयामास मृगरूपो निशाचरः। मृगैः परिवृतोऽथान्यैरदूरात्‌ प्रत्यदृश्यत॥

sa tamunmādayāmāsa mṛgarūpo niśācaraḥ।
mṛgaiḥ parivṛto'thānyairadūrāt‌ pratyadṛśyata॥

इस मृगरूपधारी निशाचर ने उन्हें उन्मत्त-सा कर दिया था। थोड़ी ही देर में वह दूसरे मृगों से घिरा हुआ पास ही दिखायी दिया

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॥ ३ · ४४ · ११ ॥
ग्रहीतुकामं दृष्ट्वा तं पुनरेवाभ्यधावत। तत्क्षणादेव संत्रासात्‌ पुनरन्तर्हितोऽभवत्‌॥

grahītukāmaṁ dṛṣṭvā taṁ punarevābhyadhāvata।
tatkṣaṇādeva saṁtrāsāt‌ punarantarhito'bhavat‌॥

श्रीराम मुझे पकड़ना चाहते हैं, यह देखकर वह फिर भागा और भय के मारे पुनः तत्काल ही अदृश्य हो गया

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॥ ३ · ४४ · १२ ॥
पुनरेव ततो दूराद्‌ वृक्षखण्डाद्‌ विनिःसृतः। दृष्ट्वा रामो महातेजास्तं हन्तुं कृतनिश्चयः॥

punareva tato dūrād‌ vṛkṣakhaṇḍād‌ viniḥsṛtaḥ।
dṛṣṭvā rāmo mahātejāstaṁ hantuṁ kṛtaniścayaḥ॥

तदनन्तर वह पुनः दूरवर्ती वृक्ष-समूह से होकर निकला। उसे देखकर महातेजस्वी श्रीराम ने मार डालने का निश्चय किया

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॥ ३ · ४४ · १३ ॥
भूयस्तु शरमुद्धृत्य कुपितस्तत्र राघवः। सूर्यरश्मिप्रतीकाशं ज्वलन्तमरिमर्दनम्‌॥

bhūyastu śaramuddhṛtya kupitastatra rāghavaḥ।
sūryaraśmipratīkāśaṁ jvalantamarimardanam‌॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४४ · १४ ॥
संधाय सुदृढे चापे विकृष्य बलवद्बली। तमेव मृगमुद्दिश्य श्वसन्तमिव पन्नगम्‌॥ मुमोच ज्वलितं दीप्तमस्त्रं ब्रह्मविनिर्मितम्‌।

saṁdhāya sudṛḍhe cāpe vikṛṣya balavadbalī।
tameva mṛgamuddiśya śvasantamiva pannagam‌॥
mumoca jvalitaṁ dīptamastraṁ brahmavinirmitam‌।

॥ १३–१४ ॥

तब वहाँ क्रोध में भरे हुए बलवान् राघवेन्द्र श्रीराम ने तरकस से सूर्य की किरणों के समान तेजस्वी एक प्रज्वलित एवं शत्रु-संहारक बाण निकालकर उसे अपने सुदृढ़ धनुष पर रखा और उस धनुष को जोर से खींचकर उस मृग को ही लक्ष्य करके फुफकारते सर्प के समान सनसनाता हुआ वह प्रज्वलित एवं तेजस्वी बाण, जिसे ब्रह्माजी ने बनाया था, छोड़ दिया

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॥ ३ · ४४ · १५ ॥
शरीरं मृगरूपस्य विनिर्भिद्य शरोत्तमः॥ मारीचस्यैव हृदयं बिभेदाशनिसंनिभः।

śarīraṁ mṛgarūpasya vinirbhidya śarottamaḥ॥
mārīcasyaiva hṛdayaṁ bibhedāśanisaṁnibhaḥ।

वज्र के समान तेजस्वी उस उत्तम बाण ने मृगरूपधारी मारीच के शरीर को चीरकर उसके हृदय को भी विदीर्ण कर दिया

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॥ ३ · ४४ · १६ ॥
तालमात्रमथोत्प्लुत्य न्यपतत्‌ भृशातुरः॥ व्यनदद्‌ भैरवं नादं धरण्यामल्पजीवितः।

tālamātramathotplutya nyapatat‌ sa bhṛśāturaḥ॥
vyanadad‌ bhairavaṁ nādaṁ dharaṇyāmalpajīvitaḥ।

‘उसकी चोट से अत्यन्त आतुर हो वह राक्षस ताड़ के बराबर उछलकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसका जीवन समाप्त हो चला। वह पृथ्वी पर पड़ा-पड़ा भयंकर गर्जना करने लगा

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॥ ३ · ४४ · १७ ॥
म्रियमाणस्तु मारीचो जहौ तां कृत्रिमां तनुम्‌॥

mriyamāṇastu mārīco jahau tāṁ kṛtrimāṁ tanum‌॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४४ · १८ ॥
स्मृत्वा तद्वचनं रक्षो दध्यौ केन तु लक्ष्मणम्‌। इह प्रस्थापयेत्‌ सीता तां शून्ये रावणो हरेत्‌॥

smṛtvā tadvacanaṁ rakṣo dadhyau kena tu lakṣmaṇam‌।
iha prasthāpayet‌ sītā tāṁ śūnye rāvaṇo haret‌॥

॥ १७–१८ ॥

मरते समय मारीच ने अपने उस कृत्रिम शरीर को त्याग दिया। फिर रावण के वचन का स्मरण करके उस राक्षस ने सोचा, किस उपाय से सीता लक्ष्मण को यहाँ भेज दे और सूने आश्रम से रावण उसे हर ले जाय

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॥ ३ · ४४ · १९ ॥
प्राप्तकालमाज्ञाय चकार ततः स्वनम्‌। सदृशं राघवस्येव हा सीते लक्ष्मणेति च॥

sa prāptakālamājñāya cakāra ca tataḥ svanam‌।
sadṛśaṁ rāghavasyeva hā sīte lakṣmaṇeti ca॥

रावण के बताये हुए उपाय को काम में लाने का अवसर आ गया है—यह समझकर उसने श्रीरामचन्द्रजी के ही समान स्वर में ‘हा सीते! हा लक्ष्मण!’ कहकर पुकारा

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॥ ३ · ४४ · २० ॥
तेन मर्मणि निर्विद्धं शरेणानुपमेन हि। मृगरूपं तु तत्‌ त्यक्त्वा राक्षसं रूपमास्थितः॥

tena marmaṇi nirviddhaṁ śareṇānupamena hi।
mṛgarūpaṁ tu tat‌ tyaktvā rākṣasaṁ rūpamāsthitaḥ॥

श्रीराम के अनुपम बाण से उसका मर्म विदीर्ण हो गया था, अतः उस मृगरूप को त्यागकर उसने राक्षसरूप धारण कर लिया

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॥ ३ · ४४ · २१ ॥
चक्रे सुमहाकायं मारीचो जीवितं त्यजन्‌। तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ राक्षसं भीमदर्शनम्‌॥

cakre sa sumahākāyaṁ mārīco jīvitaṁ tyajan‌।
taṁ dṛṣṭvā patitaṁ bhūmau rākṣasaṁ bhīmadarśanam‌॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४४ · २२ ॥
रामो रुधिरसिक्ताङ्गं चेष्टमानं महीतले। जगाम मनसा सीतां लक्ष्मणस्य वचः स्मरन्‌॥

rāmo rudhirasiktāṅgaṁ ceṣṭamānaṁ mahītale।
jagāma manasā sītāṁ lakṣmaṇasya vacaḥ smaran‌॥

॥ २१–२२ ॥

प्राणत्याग करते समय मारीच ने अपने शरीर को बहुत बड़ा बना लिया था। भयंकर दिखायी देनेवाले उस राक्षस को भूमि पर पड़कर खून से लथपथ हो धरती पर लोटते और छटपटाते देख श्रीराम को लक्ष्मण की कही हुई बात याद आ गयी और वे मन-ही-मन सीता की चिन्ता करने लगे

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॥ ३ · ४४ · २३ ॥
मारीचस्य तु मायैषा पूर्वोक्तं लक्ष्मणेन तु। तत्‌ तथा ह्यभवच्चाद्य मारीचोऽयं मया हतः॥

mārīcasya tu māyaiṣā pūrvoktaṁ lakṣmaṇena tu।
tat‌ tathā hyabhavaccādya mārīco'yaṁ mayā hataḥ॥

वे सोचने लगे, ‘अहो! जैसा लक्ष्मण ने पहले कहा था, उसके अनुसार यह वास्तव में मारीच की माया ही थी। लक्ष्मण की बात ठीक निकली। आज मेरे द्वारा यह मारीच ही मारा गया

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॥ ३ · ४४ · २४ ॥
हा सीते लक्ष्मणेत्येवमाक्रुश्य तु महास्वनम्‌। ममार राक्षसः सोऽयं श्रुत्वा सीता कथं भवेत्‌॥ लक्ष्मणश्च महाबाहुः कामवस्थां गमिष्यति।

hā sīte lakṣmaṇetyevamākruśya tu mahāsvanam‌।
mamāra rākṣasaḥ so'yaṁ śrutvā sītā kathaṁ bhavet‌॥
lakṣmaṇaśca mahābāhuḥ kāmavasthāṁ gamiṣyati।

‘परंतु यह राक्षस उच्च स्वर से ‘हा सीते! हा लक्ष्मण!’ की पुकार करके मरा है। उसके उस शब्द को सुनकर सीता की कैसी अवस्था हो जायगी और महाबाहु लक्ष्मण की भी क्या दशा होगी?’

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॥ ३ · ४४ · २५ ॥
इति संचिन्त्य धर्मात्मा रामो हृष्टतनूरुहः॥

iti saṁcintya dharmātmā rāmo hṛṣṭatanūruhaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४४ · २६ ॥
तत्र रामं भयं तीव्रमाविवेश विषादजम्‌। राक्षसं मृगरूपं तं हत्वा श्रुत्वा तत्स्वनम्‌॥

tatra rāmaṁ bhayaṁ tīvramāviveśa viṣādajam‌।
rākṣasaṁ mṛgarūpaṁ taṁ hatvā śrutvā ca tatsvanam‌॥

॥ २५–२६ ॥

ऐसा सोचकर धर्मात्मा श्रीराम के रोंगटे खड़े हो गये। उस समय वहाँ मृगरूपधारी उस राक्षस को मारकर और उसके उस शब्द को सुनकर श्रीराम के मन में विषादजनित तीव्र भय समा गया

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॥ ३ · ४४ · २७ ॥
निहत्य पृषतं चान्यं मांसमादाय राघवः। त्वरमाणो जनस्थानं ससाराभिमुखं तदा॥

nihatya pṛṣataṁ cānyaṁ māṁsamādāya rāghavaḥ।
tvaramāṇo janasthānaṁ sasārābhimukhaṁ tadā॥

उस लोकविलक्षण मृग का वध करके तपस्वी के उपभोग में आनेयोग्य फल-मूल आदि लेकर श्रीराम तत्काल ही जनस्थान के निकटवर्ती पञ्चवटी में स्थित अपने आश्रम की ओर बड़ी उतावली के साथ चले

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुश्चत्वारिंशः सर्गः॥ ४४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौवालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४४ ॥