वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ४२ · ३५ श्लोकाःSarga 42 · 35 ślokas

मारीचका सुवर्णमय मृगरूप धारण करके श्रीरामके आश्रमपर जाना और सीताका उसे देखना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ४२ — painting

॥ ३ · ४२ · ३२–३३ ॥

पञ्चवटीवाटिकायां पुष्पाणि चिन्वन्ती शुद्धवल्कलवसना सुमङ्गली सीता करे कतिपयकुसुमानि दधाना विस्मयोत्फुल्लनयना सस्नेहं समीपस्थं रत्नमयं मायामृगं पश्यति, यश्च स्वर्णदेहो रजतबिन्दुचित्रो मृगः कर्णिकाराशोकवृक्षमध्ये मन्दं विचरन् तां प्रति परावृत्य निरीक्षते।

पंचवटी के फूल-बगीचे में फूल चुनती हुई, बिना रँगी वनवासिनी साड़ी में सुमंगली सीता हाथ में कुछ फूल लिये, विस्मय से खिली आँखों से स्नेहपूर्वक पास आये उस रत्नमय मायामृग को निहार रही हैं; कनेर और अशोक के वृक्षों के बीच सुनहरे शरीरवाला, चाँदी की बूँदों से चित्रित वह मृग धीरे-धीरे विचरता हुआ उनकी ओर मुड़कर देख रहा है।

In the flowering garden of Panchavati, Sita, in her undyed forest sari as a married woman, pauses over the blossoms she has gathered and gazes in wide-eyed wonder and tenderness at the jewel-bright magic deer that has strayed near; among the karnikara and ashoka trees the golden, silver-flecked stag steps softly and glances back at her.

॥ ३ · ४२ · १ ॥
एवमुक्त्वा तु परुषं मारीचो रावणं ततः। गच्छावेत्यब्रवीद् दीनो भयाद् रात्रिंचरप्रभोः॥

evamuktvā tu paruṣaṁ mārīco rāvaṇaṁ tataḥ।
gacchāvetyabravīd dīno bhayād rātriṁcaraprabhoḥ॥

रावणसे इस प्रकार कठोर बातें कहकर उस निशाचरराजके भयसे दुःखी हुए मारीचने कहा—‘चलो चलें

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॥ ३ · ४२ · २ ॥
दृष्टश्चाहं पुनस्तेन शरचापासिधारिणा। मद्वधोद्यतशस्त्रेण निहतं जीवितं मे॥

dṛṣṭaścāhaṁ punastena śaracāpāsidhāriṇā।
madvadhodyataśastreṇa nihataṁ jīvitaṁ ca me॥

‘मेरे वधके लिये जिनका हथियार सदा उठा ही रहता है, उन धनुष-बाण और तलवार धारण करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने यदि फिर मुझे देख लिया तो मेरे जीवनका अन्त निश्चित है

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॥ ३ · ४२ · ३ ॥
नहि रामं पराक्रम्य जीवन् प्रतिनिवर्तते। वर्तते प्रतिरूपोऽसौ यमदण्डहतस्य ते॥

nahi rāmaṁ parākramya jīvan pratinivartate।
vartate pratirūpo'sau yamadaṇḍahatasya te॥

‘श्रीरामचन्द्रजीके साथ पराक्रम दिखाकर कोई जीवित नहीं लौटता है। तुम यमदण्डसे मारे गये हो (इसीलिये उनसे भिड़नेकी बात सोचते हो)। वे श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे लिये यमदण्डके ही समान हैं

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॥ ३ · ४२ · ४ ॥
किं नु कर्तुं मया शक्यमेवं त्वयि दुरात्मनि। एष गच्छाम्यहं तात स्वस्ति तेऽस्तु निशाचर॥

kiṁ nu kartuṁ mayā śakyamevaṁ tvayi durātmani।
eṣa gacchāmyahaṁ tāta svasti te'stu niśācara॥

‘परंतु जब तुम इस प्रकार दुष्टतापर उतारू हो गये, तब मैं क्या कर सकता हूँ। लो, यह मैं चलता हूँ। तात निशाचर! तुम्हारा कल्याण हो’

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॥ ३ · ४२ · ५ ॥
प्रहृष्टस्त्वभवत् तेन वचनेन राक्षसः। परिष्वज्य सुसंश्लिष्टमिदं वचनमब्रवीत्॥

prahṛṣṭastvabhavat tena vacanena sa rākṣasaḥ।
pariṣvajya susaṁśliṣṭamidaṁ vacanamabravīt॥

मारीचके उस वचनसे राक्षस रावणको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने उसे कसकर हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा—

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॥ ३ · ४२ · ६ ॥
एतच्छौटीर्ययुक्तं ते मच्छन्दवशवर्तिनः। इदानीमसि मारीचः पूर्वमन्यो हि राक्षसः॥

etacchauṭīryayuktaṁ te macchandavaśavartinaḥ।
idānīmasi mārīcaḥ pūrvamanyo hi rākṣasaḥ॥

‘यह तुमने वीरताकी बात कही है; क्योंकि अब तुम मेरी इच्छाके वशवर्ती हो गये हो। इस समय तुम वास्तवमें मारीच हो। पहले तुममें किसी दूसरे राक्षसका आवेश हो गया था

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॥ ३ · ४२ · ७ ॥
आरुह्यतामयं शीघ्रं खगो रत्नविभूषितः। मया सह रथो युक्तः पिशाचवदनैः खरैः॥

āruhyatāmayaṁ śīghraṁ khago ratnavibhūṣitaḥ।
mayā saha ratho yuktaḥ piśācavadanaiḥ kharaiḥ॥

‘यह रत्नोंसे विभूषित मेरा आकाशगामी रथ तैयार है, इसमें पिशाचोंके-से मुखवाले गधे जुते हुए हैं, इसपर मेरे साथ जल्दीसे बैठ जाओ

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॥ ३ · ४२ · ८ ॥
प्रलोभयित्वा वैदेहीं यथेष्टं गन्तुमर्हसि। तां शून्ये प्रसभं सीतामानयिष्यामि मैथिलीम्॥

pralobhayitvā vaidehīṁ yatheṣṭaṁ gantumarhasi।
tāṁ śūnye prasabhaṁ sītāmānayiṣyāmi maithilīm॥

‘(तुम्हारे जिम्मे एक ही काम है) विदेहकुमारी सीताके मनमें अपने लिये लोभ उत्पन्न कर दो। उसे लुभाकर तुम जहाँ चाहो जा सकते हो। आश्रम सूना हो जानेपर मैं मिथिलेशकुमारी सीताको जबरदस्ती उठा लाऊँगा’

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॥ ३ · ४२ · ९ ॥
ततस्तथेत्युवाचैनं रावणं ताटकासुतः। ततो रावणमारीचौ विमानमिव तं रथम्॥ आरुह्याययतुः शीघ्रं तस्मादाश्रममण्डलात्।

tatastathetyuvācainaṁ rāvaṇaṁ tāṭakāsutaḥ।
tato rāvaṇamārīcau vimānamiva taṁ ratham॥
āruhyāyayatuḥ śīghraṁ tasmādāśramamaṇḍalāt।

तब ताटकाकुमार मारीचने रावणसे कहा—‘तथास्तु’ ऐसा ही हो। तदनन्तर रावण और मारीच दोनों उस विमानाकार रथपर बैठकर शीघ्र ही उस आश्रममण्डलसे चल दिये

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॥ ३ · ४२ · १० ॥
तथैव तत्र पश्यन्तौ पत्तनानि वनानि च॥

tathaiva tatra paśyantau pattanāni vanāni ca॥

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॥ ३ · ४२ · ११ ॥
गिरींश्च सरितः सर्वा राष्ट्राणि नगराणि च। समेत्य दण्डकारण्यं राघवस्याश्रमं ततः॥ ददर्श सहमारीचो रावणो राक्षसाधिपः।

girīṁśca saritaḥ sarvā rāṣṭrāṇi nagarāṇi ca।
sametya daṇḍakāraṇyaṁ rāghavasyāśramaṁ tataḥ॥
dadarśa sahamārīco rāvaṇo rākṣasādhipaḥ।

॥ १०–११ ॥

मार्गमें पहलेकी ही भाँति अनेकानेक पत्तनों, वनों, पर्वतों, समस्त नदियों, राष्ट्रों तथा नगरोंको देखते हुए दोनोंने दण्डकारण्यमें प्रवेश किया और वहाँ मारीचसहित राक्षसराज रावणने श्रीरामचन्द्रजीका आश्रम देखा

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॥ ३ · ४२ · १२ ॥
अवतीर्य रथात् तस्मात् ततः काञ्चनभूषणात्॥ हस्ते गृहीत्वा मारीचं रावणो वाक्यमब्रवीत्।

avatīrya rathāt tasmāt tataḥ kāñcanabhūṣaṇāt॥
haste gṛhītvā mārīcaṁ rāvaṇo vākyamabravīt।

तब उस सुवर्णभूषित रथसे उतरकर रावणने मारीचका हाथ अपने हाथमें ले उससे कहा—

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॥ ३ · ४२ · १३ ॥
एतद् रामाश्रमपदं दृश्यते कदलीवृतम्॥ क्रियतां तत् सखे शीघ्रं यदर्थं वयमागताः।

etad rāmāśramapadaṁ dṛśyate kadalīvṛtam॥
kriyatāṁ tat sakhe śīghraṁ yadarthaṁ vayamāgatāḥ।

‘सखे! यह केलोंसे घिरा हुआ रामका आश्रम दिखायी दे रहा है। अब शीघ्र ही वह कार्य करो, जिसके लिये हमलोग यहाँ आये हैं’

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॥ ३ · ४२ · १४ ॥
रावणवचः श्रुत्वा मारीचो राक्षसस्तदा॥ मृगो भूत्वाऽऽश्रमद्वारि रामस्य विचचार ह।

sa rāvaṇavacaḥ śrutvā mārīco rākṣasastadā॥
mṛgo bhūtvā''śramadvāri rāmasya vicacāra ha।

रावणकी बात सुनकर राक्षस मारीच उस समय मृगका रूप धारण करके श्रीरामके आश्रमके द्वारपर विचरने लगा

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॥ ३ · ४२ · १५ ॥
तु रूपं समास्थाय महदद्भुतदर्शनम्॥

sa tu rūpaṁ samāsthāya mahadadbhutadarśanam॥

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॥ ३ · ४२ · १६ ॥
मणिप्रवरशृङ्गाग्रः सितासितमुखाकृतिः। रक्तपद्मोत्पलमुख इन्द्रनीलोत्पलश्रवाः॥

maṇipravaraśṛṅgāgraḥ sitāsitamukhākṛtiḥ।
raktapadmotpalamukha indranīlotpalaśravāḥ॥

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॥ ३ · ४२ · १७ ॥
किंचिदभ्युन्नतग्रीव इन्द्रनीलनिभोदरः। मधूकनिभपार्श्वश्च कञ्जकिञ्जल्कसंनिभः॥

kiṁcidabhyunnatagrīva indranīlanibhodaraḥ।
madhūkanibhapārśvaśca kañjakiñjalkasaṁnibhaḥ॥

॥ १५–१७ ॥

उस समय उसने देखनेमें बड़ा ही अद्भुत रूप धारण कर रखा था। उसके सींगोंके ऊपरी भाग इन्द्रनील नामक श्रेष्ठ मणिके बने हुए जान पड़ते थे, मुखमण्डलपर सफेद और काले रंगकी बूँदें थीं, मुखका रंग लाल कमलके समान था। उसके कान नीलकमलके तुल्य थे और गरदन कुछ ऊँची थी, उदरका भाग इन्द्रनीलमणिकी कान्ति धारण कर रहा था। पार्श्वभाग महुएके फूलके समान श्वेतवर्णके थे, शरीरका सुनहरा रंग कमलके केसरकी भाँति सुशोभित होता था

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॥ ३ · ४२ · १८ ॥
वैदूर्यसंकाशखुरस्तनुजङ्घः सुसंहतः। इन्द्रायुधसवर्णेन पुच्छेनोर्ध्वं विराजितः॥

vaidūryasaṁkāśakhurastanujaṅghaḥ susaṁhataḥ।
indrāyudhasavarṇena pucchenordhvaṁ virājitaḥ॥

उसके खुर वैदूर्यमणिके समान, पिंडलियाँ पतली और पूँछ ऊपरसे इन्द्रधनुषके रंगकी थी, जिससे उसका संगठित शरीर विशेष शोभा पा रहा था

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॥ ३ · ४२ · १९ ॥
मनोहरस्निग्धवर्णो रत्नैर्नानाविधैर्वृतः। क्षणेन राक्षसो जातो मृगः परमशोभनः॥

manoharasnigdhavarṇo ratnairnānāvidhairvṛtaḥ।
kṣaṇena rākṣaso jāto mṛgaḥ paramaśobhanaḥ॥

उसकी देहकी कान्ति बड़ी ही मनोहर और चिकनी थी। वह नाना प्रकारकी रत्नमयी बुँदकियोंसे विभूषित दिखायी देता था। राक्षस मारीच क्षणभरमें ही परम शोभाशाली मृग बन गया

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॥ ३ · ४२ · २० ॥
वनं प्रज्वलयन् रम्यं रामाश्रमपदं तत्। मनोहरं दर्शनीयं रूपं कृत्वा राक्षसः॥

vanaṁ prajvalayan ramyaṁ rāmāśramapadaṁ ca tat।
manoharaṁ darśanīyaṁ rūpaṁ kṛtvā sa rākṣasaḥ॥

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॥ ३ · ४२ · २१ ॥
प्रलोभनार्थं वैदेह्या नानाधातुविचित्रितम्। विचरन् गच्छते सम्यक् शाद्वलानि समन्ततः॥

pralobhanārthaṁ vaidehyā nānādhātuvicitritam।
vicaran gacchate samyak śādvalāni samantataḥ॥

॥ २०–२१ ॥

सीताको लुभानेके लिये विविध धातुओंसे चित्रित मनोहर एवं दर्शनीय रूप बनाकर वह निशाचर उस रमणीय वन तथा श्रीरामके उस आश्रमको प्रकाशित करता हुआ सब ओर उत्तम घासोंको चरने और विचरने लगा

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॥ ३ · ४२ · २२ ॥
रौप्यैर्बिन्दुशतैश्चित्रं भूत्वा प्रियदर्शनः। विटपीनां किसलयान् भक्षयन् विचचार ह॥

raupyairbinduśataiścitraṁ bhūtvā ca priyadarśanaḥ।
viṭapīnāṁ kisalayān bhakṣayan vicacāra ha॥

सैकड़ों रजतमय विन्दुओंसे युक्त विचित्र रूप धारण करके वह मृग बड़ा प्यारा दिखायी देता था। वह वृक्षोंके कोमल पल्लवोंको खाता हुआ इधर-उधर विचरने लगा

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॥ ३ · ४२ · २३ ॥
कदलीगृहकं गत्वा कर्णिकारानितस्ततः। समाश्रयन् मन्दगतिं सीतासंदर्शनं ततः॥

kadalīgṛhakaṁ gatvā karṇikārānitastataḥ।
samāśrayan mandagatiṁ sītāsaṁdarśanaṁ tataḥ॥

केलेके बगीचेमें जाकर वह कनेरोंके कुञ्जमें जा पहुँचा। फिर जहाँ सीताकी दृष्टि पड़ सके, ऐसे स्थानमें जाकर मन्दगतिका आश्रय ले इधर-उधर घूमने लगा

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॥ ३ · ४२ · २४ ॥
राजीवचित्रपृष्ठः विरराज महामृगः। रामाश्रमपदाभ्याशे विचचार यथासुखम्॥

rājīvacitrapṛṣṭhaḥ sa virarāja mahāmṛgaḥ।
rāmāśramapadābhyāśe vicacāra yathāsukham॥

उसका पृष्ठभाग कमलके केसरकी भाँति सुनहरे रंगका होनेके कारण विचित्र दिखायी देता था, इससे उस महान् मृगकी बड़ी शोभा हो रही थी। श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमके निकट ही वह अपनी मौजसे घूम रहा था

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॥ ३ · ४२ · २५ ॥
पुनर्गत्वा निवृत्तश्च विचचार मृगोत्तमः। गत्वा मुहूर्तं त्वरया पुनः प्रतिनिवर्तते॥

punargatvā nivṛttaśca vicacāra mṛgottamaḥ।
gatvā muhūrtaṁ tvarayā punaḥ pratinivartate॥

वह श्रेष्ठ मृग कुछ दूर जाकर फिर लौट आता था और वहीं घूमने लगता था। दो घड़ीके लिये कहीं चला जाता और फिर बड़ी उतावलीके साथ लौट आता था

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॥ ३ · ४२ · २६ ॥
विक्रीडंश्च क्वचिद् भूमौ पुनरेव निषीदति। आश्रमद्वारमागम्य मृगयूथानि गच्छति॥

vikrīḍaṁśca kvacid bhūmau punareva niṣīdati।
āśramadvāramāgamya mṛgayūthāni gacchati॥

वह कहीं खेलता, कूदता और पुनः भूमिपर ही बैठ जाता था, फिर आश्रमके द्वारपर आकर मृगोंके झुंडके पीछे-पीछे चल देता

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॥ ३ · ४२ · २७ ॥
मृगयूथैरनुगतः पुनरेव निवर्तते। सीतादर्शनमाकांक्षन् राक्षसो मृगतां गतः॥

mṛgayūthairanugataḥ punareva nivartate।
sītādarśanamākāṁkṣan rākṣaso mṛgatāṁ gataḥ॥

तत्पश्चात् झुंड-के-झुंड मृगोंको साथ लिये फिर लौट आता था। उस मृगरूपधारी राक्षसके मनमें केवल यह अभिलाषा थी कि किसी तरह सीताकी दृष्टि मुझपर पड़ जाय

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॥ ३ · ४२ · २८ ॥
परिभ्रमति चित्राणि मण्डलानि विनिष्पतन्। समुद्वीक्ष्य सर्वे तं मृगा येऽन्ये वनेचराः॥ उपगम्य समाघ्राय विद्रवन्ति दिशो दश।

paribhramati citrāṇi maṇḍalāni viniṣpatan।
samudvīkṣya ca sarve taṁ mṛgā ye'nye vanecarāḥ॥
upagamya samāghrāya vidravanti diśo daśa।

सीताके समीप आते समय वह विचित्र मण्डल (पैंतरे) दिखाता हुआ चारों ओर चक्कर लगाता था। उस वनमें विचरनेवाले जो दूसरे मृग थे, वे सब उसे देखकर पास आते और उसे सूँघकर दसों दिशाओंमें भाग जाते थे

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॥ ३ · ४२ · २९ ॥
राक्षसः सोऽपि तान् वन्यान् मृगान् मृगवधे रतः॥ प्रच्छादनार्थं भावस्य भक्षयति संस्पृशन्।

rākṣasaḥ so'pi tān vanyān mṛgān mṛgavadhe rataḥ॥
pracchādanārthaṁ bhāvasya na bhakṣayati saṁspṛśan।

राक्षस मारीच यद्यपि मृगोंके वधमें ही तत्पर रहता था तथापि उस समय अपने भावको छिपानेके लिये उन वन्य मृगोंका स्पर्श करके भी उन्हें खाता नहीं था

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॥ ३ · ४२ · ३० ॥
तस्मिन्नेव ततः काले वैदेही शुभलोचना॥

tasminneva tataḥ kāle vaidehī śubhalocanā॥

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॥ ३ · ४२ · ३१ ॥
कुसुमापचये व्यग्रा पादपानत्यवर्तत। कर्णिकारानशोकांश्च चूतांश्च मदिरेक्षणा॥

kusumāpacaye vyagrā pādapānatyavartata।
karṇikārānaśokāṁśca cūtāṁśca madirekṣaṇā॥

॥ ३०–३१ ॥

उसी समय मदभरे सुन्दर नेत्रोंवाली विदेहनन्दिनी सीता, जो फूल चुननेमें लगी हुई थीं, कनेर, अशोक और आमके वृक्षोंको लाँघती हुई उधर आ निकलीं

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॥ ३ · ४२ · ३२ ॥
कुसुमान्यपचिन्वन्ती चचार रुचिरानना। अनर्हां वनवासस्य सा तं रत्नमयं मृगम्॥ मुक्तामणिविचित्राङ्गं ददर्श परमाङ्गना।

kusumānyapacinvantī cacāra rucirānanā।
anarhāṁ vanavāsasya sā taṁ ratnamayaṁ mṛgam॥
muktāmaṇivicitrāṅgaṁ dadarśa paramāṅganā।

फूलोंको चुनती हुई वे वहीं विचरने लगीं। उनका मुख बड़ा ही सुन्दर था। वे वनवासका कष्ट भोगनेके योग्य नहीं थीं। परम सुन्दरी सीताने उस रत्नमय मृगको देखा, जिसका अङ्ग-प्रत्यङ्ग मुक्तामणियोंसे चित्रित-सा जान पड़ता था

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॥ ३ · ४२ · ३३ ॥
तं वै रुचिरदन्तोष्ठं रूप्यधातुतनूरुहम्॥ विस्मयोत्फुल्लनयना सस्नेहं समुदैक्षत।

taṁ vai ruciradantoṣṭhaṁ rūpyadhātutanūruham॥
vismayotphullanayanā sasnehaṁ samudaikṣata।

उसके दाँत और ओठ बड़े सुन्दर थे तथा शरीरके रोएँ चाँदी एवं ताँबे आदि धातुओंके बने हुए जान पड़ते थे। उसके ऊपर दृष्टि पड़ते ही सीताजीकी आँखें आश्चर्यसे खिल उठीं और वे बड़े स्नेहसे उसकी ओर निहारने लगीं

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॥ ३ · ४२ · ३४ ॥
तां रामदयितां पश्यन् मायामयो मृगः॥ विचचार ततस्तत्र दीपयन्निव तद् वनम्।

sa ca tāṁ rāmadayitāṁ paśyan māyāmayo mṛgaḥ॥
vicacāra tatastatra dīpayanniva tad vanam।

वह मायामय मृग भी श्रीरामको प्राणवल्लभा सीताको देखता और उस वनको प्रकाशित-सा करता हुआ वहीं विचरने लगा

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॥ ३ · ४२ · ३५ ॥
अदृष्टपूर्वं दृष्ट्वा तं नानारत्नमयं मृगम्। विस्मयं परमं सीता जगाम जनकात्मजा॥

adṛṣṭapūrvaṁ dṛṣṭvā taṁ nānāratnamayaṁ mṛgam।
vismayaṁ paramaṁ sītā jagāma janakātmajā॥

सीताने वैसा मृग पहले कभी नहीं देखा था। वह नाना प्रकारके रत्नोंका ही बना जान पड़ता था। उसे देखकर जनककिशोरी सीताको बड़ा विस्मय हुआ

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विचत्वारिंशः सर्गः॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बयालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४२ ॥