वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ४१ · २० श्लोकाःSarga 41 · 20 ślokas

मारीचका रावणको विनाशका भय दिखाकर पुनः समझाना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ४१ — painting

॥ ३ · ४१ · १८–१९ ॥

वनाश्रमे जटिलो मारीचः स्थिरं तिष्ठन् एकं हस्तम् उद्यम्य गम्भीरो निर्भयश्च रावणस्य भाविनं विनाशं वदति—रामो मां हत्वा त्वां च हनिष्यति; शिलासने स्थितो मुकुटी रावणस्तु भ्रूभङ्गी दर्पात् करं निषेधार्थम् उद्यम्य मुखं परावर्तयति।

वन के आश्रम में जटाधारी मारीच स्थिर खड़े होकर एक हाथ उठाए, निर्भय और गम्भीर मुख से आनेवाले विनाश की भविष्यवाणी कर रहा है—कि श्रीराम उसे मारकर फिर रावण का भी वध करेंगे और सीता-हरण से न लङ्का बचेगी न राक्षस; पर शिला-सिंहासन पर बैठा मुकुटधारी रावण भौंहें ताने, अभिमान से मना करने को हाथ उठाए मुख फेर लेता है।

In the forest hermitage the matted-haired Maricha stands firm and lifts a hand in stern prophecy, foretelling without fear that Ram will slay him and then destroy Ravana, and that neither Lanka nor its demons will survive Sita's theft, while the crowned Ravana sits unmoved on his rock throne, brows knit, one hand raised in curt refusal as he turns his face away.

॥ ३ · ४१ · १ ॥
आज्ञप्तो रावणेनेत्थं प्रतिकूलं राजवत्। अब्रवीत् परुषं वाक्यं निःशङ्को राक्षसाधिपम्॥

ājñapto rāvaṇenetthaṁ pratikūlaṁ ca rājavat।
abravīt paruṣaṁ vākyaṁ niḥśaṅko rākṣasādhipam॥

रावण ने जब राजा की भाँति उसे ऐसी प्रतिकूल आज्ञा दी, तब मारीच ने निःशङ्क होकर उस राक्षसराज से कठोर वाणी में कहा—

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · २ ॥
केनायमुपदिष्टस्ते विनाशः पापकर्मणा। सपुत्रस्य सराज्यस्य सामात्यस्य निशाचर॥

kenāyamupadiṣṭaste vināśaḥ pāpakarmaṇā।
saputrasya sarājyasya sāmātyasya niśācara॥

‘निशाचर! किस पापी ने तुम्हें पुत्र, राज्य और मन्त्रियोंसहित तुम्हारे विनाश का यह मार्ग बताया है?

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · ३ ॥
कस्त्वया सुखिना राजन् नाभिनन्दति पापकृत्। केनेदमुपदिष्टं ते मृत्युद्वारमुपायतः॥

kastvayā sukhinā rājan nābhinandati pāpakṛt।
kenedamupadiṣṭaṁ te mṛtyudvāramupāyataḥ॥

‘राजन्! कौन ऐसा पापाचारी है, जो तुम्हें सुखी देखकर प्रसन्न नहीं हो रहा है? किसने युक्ति से तुम्हें मौत के द्वार पर जाने की यह सलाह दी है?

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · ४ ॥
शत्रवस्तव सुव्यक्तं हीनवीर्यं निशाचर। इच्छन्ति त्वां विनश्यन्तमुपरुद्धं बलीयसा॥

śatravastava suvyaktaṁ hīnavīryaṁ niśācara।
icchanti tvāṁ vinaśyantamuparuddhaṁ balīyasā॥

‘निशाचर! आज यह बात स्पष्टरूप से ज्ञात हो गयी कि तुम्हारे दुर्बल शत्रु तुम्हें किसी बलवान् से भिड़ाकर नष्ट होते देखना चाहते हैं

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · ५ ॥
केनेदमुपदिष्टं ते क्षुद्रेणाहितबुद्धिना। यस्त्वामिच्छति नश्यन्तं स्वकृतेन निशाचर॥

kenedamupadiṣṭaṁ te kṣudreṇāhitabuddhinā।
yastvāmicchati naśyantaṁ svakṛtena niśācara॥

‘राक्षसराज! तुम्हारे अहित का विचार रखनेवाले किस नीच ने तुम्हें यह पाप करने का उपदेश दिया है? जान पड़ता है कि वह तुम्हें अपने ही कुकर्म से नष्ट होते देखना चाहता है

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · ६ ॥
वध्याः खलु वध्यन्ते सचिवास्तव रावण। ये त्वामुत्पथमारूढं निगृह्णन्ति सर्वशः॥

vadhyāḥ khalu na vadhyante sacivāstava rāvaṇa।
ye tvāmutpathamārūḍhaṁ na nigṛhṇanti sarvaśaḥ॥

‘रावण! निश्चय ही वध के योग्य तुम्हारे वे मन्त्री हैं जो कुमार्ग पर आरूढ़ हुए तुम-जैसे राजा को सब प्रकार से रोक नहीं रहे हैं; किंतु तुम उनका वध नहीं करते हो

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · ७ ॥
अमात्यैः कामवृत्तो हि राजा कापथमाश्रितः। निग्राह्यः सर्वथा सद्भिः निग्राह्यो गृह्यसे॥

amātyaiḥ kāmavṛtto hi rājā kāpathamāśritaḥ।
nigrāhyaḥ sarvathā sadbhiḥ sa nigrāhyo na gṛhyase॥

‘अच्छे मन्त्रियों को चाहिये कि जो राजा स्वेच्छाचारी होकर कुमार्ग पर चलने लगे, उसे सब प्रकार से वे रोकें। तुम भी रोकने के ही योग्य हो; फिर भी वे मन्त्री तुम्हें रोक नहीं रहे हैं

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · ८ ॥
धर्ममर्थं कामं यशश्च जयतां वर। स्वामिप्रसादात् सचिवाः प्राप्नुवन्ति निशाचर॥

dharmamarthaṁ ca kāmaṁ ca yaśaśca jayatāṁ vara।
svāmiprasādāt sacivāḥ prāpnuvanti niśācara॥

‘विजयी वीरों में श्रेष्ठ निशाचर! मन्त्री अपने स्वामी राजा की कृपा से ही धर्म, अर्थ, काम और यश पाते हैं

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · ९ ॥
विपर्यये तु तत्सर्वं व्यर्थं भवति रावण। व्यसनं स्वामिवैगुण्यात् प्राप्नुवन्तीतरे जनाः॥

viparyaye tu tatsarvaṁ vyarthaṁ bhavati rāvaṇa।
vyasanaṁ svāmivaiguṇyāt prāpnuvantītare janāḥ॥

‘रावण! यदि स्वामी की कृपा न हो तो सब व्यर्थ हो जाता है। राजा के दोष से दूसरे लोगों को भी कष्ट भोगना पड़ता है

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · १० ॥
राजमूलो हि धर्मश्च यशश्च जयतां वर। तस्मात् सर्वास्ववस्थासु रक्षितव्या नराधिपाः॥

rājamūlo hi dharmaśca yaśaśca jayatāṁ vara।
tasmāt sarvāsvavasthāsu rakṣitavyā narādhipāḥ॥

‘विजयशीलों में श्रेष्ठ राक्षसराज! धर्म और यश की प्राप्ति का मूल कारण राजा ही है; अतः सभी अवस्थाओं में राजा की रक्षा करनी चाहिये

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · ११ ॥
राज्यं पालयितुं शक्यं तीक्ष्णेन निशाचर। चातिप्रतिकूलेन नाविनीतेन राक्षस॥

rājyaṁ pālayituṁ śakyaṁ na tīkṣṇena niśācara।
na cātipratikūlena nāvinītena rākṣasa॥

‘रात्रि में विचरनेवाले राक्षस! जिसका स्वभाव अत्यन्त तीखा हो, जो जनता के अत्यन्त प्रतिकूल चलनेवाला और उद्दण्ड हो, ऐसे राजा से राज्य की रक्षा नहीं हो सकती

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · १२ ॥
ये तीक्ष्णमन्त्राः सचिवा भुज्यन्ते सह तेन वै। विषमेषु रथाः शीघ्रं मन्दसारथयो यथा॥

ye tīkṣṇamantrāḥ sacivā bhujyante saha tena vai।
viṣameṣu rathāḥ śīghraṁ mandasārathayo yathā॥

‘जो मन्त्री तीखे उपाय का उपदेश करते हैं, वे अपनी सलाह माननेवाले उस राजा के साथ ही दुःख भोगते हैं, जैसे जिनके सारथि मूर्ख हों, ऐसे रथ नीची-ऊँची भूमि में जाने पर सारथियों के साथ ही संकट में पड़ जाते हैं

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · १३ ॥
बहवः साधवो लोके युक्तधर्ममनुष्ठिताः। परेषामपराधेन विनष्टाः सपरिच्छदाः॥

bahavaḥ sādhavo loke yuktadharmamanuṣṭhitāḥ।
pareṣāmaparādhena vinaṣṭāḥ saparicchadāḥ॥

‘उपयुक्त धर्म का अनुष्ठान करनेवाले बहुत-से साधु-पुरुष इस जगत् में दूसरों के अपराध से परिवारसहित नष्ट हो गये हैं

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · १४ ॥
स्वामिना प्रतिकूलेन प्रजास्तीक्ष्णेन रावण। रक्ष्यमाणा वर्धन्ते मेषा गोमायुना यथा॥

svāminā pratikūlena prajāstīkṣṇena rāvaṇa।
rakṣyamāṇā na vardhante meṣā gomāyunā yathā॥

‘रावण! प्रतिकूल बर्ताव और तीखे स्वभाववाले राजा से रक्षित होनेवाली प्रजा उसी तरह वृद्धि को नहीं प्राप्त होती है, जैसे गीदड़ या भेड़िये से पालित होनेवाली भेड़ें

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · १५ ॥
अवश्यं विनशिष्यन्ति सर्वे रावण राक्षसाः। येषां त्वं कर्कशो राजा दुर्बुद्धिरजितेन्द्रियः॥

avaśyaṁ vinaśiṣyanti sarve rāvaṇa rākṣasāḥ।
yeṣāṁ tvaṁ karkaśo rājā durbuddhirajitendriyaḥ॥

‘रावण! जिनके तुम क्रूर, दुर्बुद्धि और अजितेन्द्रिय राजा हो, वे सब राक्षस अवश्य ही नष्ट हो जायँगे

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · १६ ॥
तदिदं काकतालीयं घोरमासादितं मया। अत्र त्वं शोचनीयोऽसि ससैन्यो विनशिष्यसि॥

tadidaṁ kākatālīyaṁ ghoramāsāditaṁ mayā।
atra tvaṁ śocanīyo'si sasainyo vinaśiṣyasi॥

‘काकतालीय न्याय के अनुसार मुझे तुमसे अकस्मात् ही यह घोर दुःख प्राप्त हो गया। इस विषय में मुझे तुम ही शोक के योग्य जान पड़ते हो; क्योंकि सेनासहित तुम्हारा नाश हो जायगा

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · १७ ॥
मां निहत्य तु रामोऽसावचिरात् त्वां वधिष्यति। अनेन कृतकृत्योऽस्मि म्रिये चाप्यरिणा हतः॥

māṁ nihatya tu rāmo'sāvacirāt tvāṁ vadhiṣyati।
anena kṛtakṛtyo'smi mriye cāpyariṇā hataḥ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी मुझे मारकर तुम्हारा भी शीघ्र ही वध कर डालेंगे। जब दोनों ही तरह से मेरी मृत्यु निश्चित है, तब श्रीराम के हाथ से होनेवाली जो यह मृत्यु है, इसे पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा; क्योंकि शत्रु के द्वारा युद्ध में मारा जाकर प्राणत्याग करूँगा (तुम-जैसे राजा के हाथ से बलपूर्वक प्राणदण्ड पाने का कष्ट नहीं भोगूँगा)

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · १८ ॥
दर्शनादेव रामस्य हतं मामवधारय। आत्मानं हतं विद्धि हृत्वा सीतां सबान्धवम्॥

darśanādeva rāmasya hataṁ māmavadhāraya।
ātmānaṁ ca hataṁ viddhi hṛtvā sītāṁ sabāndhavam॥

‘राजन्! यह निश्चित समझो कि श्रीराम के सामने जाकर उनकी दृष्टि पड़ते ही मैं मारा जाऊँगा और यदि तुमने सीता का हरण किया तो तुम अपनेको भी बन्धु-बान्धवोंसहित मरा हुआ ही मानो

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · १९ ॥
आनयिष्यसि चेत् सीतामाश्रमात् सहितो मया। नैव त्वमपि नाहं वै नैव लङ्का राक्षसाः॥

ānayiṣyasi cet sītāmāśramāt sahito mayā।
naiva tvamapi nāhaṁ vai naiva laṅkā na rākṣasāḥ॥

‘यदि तुम मेरे साथ जाकर श्रीराम के आश्रम से सीता का अपहरण करोगे, तब न तो तुम जीवित बचोगे और न मैं ही। न लंकापुरी रहने पायेगी और न वहाँ के निवासी राक्षस ही

English translation coming soon.

॥ ३ · ४१ · २० ॥
निवार्यमाणस्तु मया हितैषिणा मृष्यसे वाक्यमिदं निशाचर। परेतकल्पा हि गतायुषो नरा हितं गृह्णन्ति सुहृद्भिरीरितम्॥

nivāryamāṇastu mayā hitaiṣiṇā na mṛṣyase vākyamidaṁ niśācara।
paretakalpā hi gatāyuṣo narā hitaṁ na gṛhṇanti suhṛdbhirīritam॥

‘निशाचर! मैं तुम्हारा हितैषी हूँ, इसीलिये तुम्हें पापकर्म से रोक रहा हूँ; किंतु तुम्हें मेरी बात सहन नहीं होती है। सच है जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, वे मरणासन्न पुरुष अपने सुहृदों की कही हुई हितकर बातें नहीं स्वीकार करते हैं’

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकचत्वारिंशः सर्गः॥ ४१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इकतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ४१ ॥