वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ४० · २७ श्लोकाःSarga 40 · 27 ślokas

रावणका मारीचको फटकारना और सीताहरणके कार्यमें सहायता करनेकी आज्ञा देना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ४० — painting

॥ ३ · ४० · २६–२७ ॥

मारीचस्य पर्णकुट्यां रावणो मुकुटी क्रोधाविष्टः पुरो नम्रः एकं बाहुं प्रसार्य तर्जयन् आज्ञापयति—आज्ञां कुरु म्रियस्व वा; कृशो मारीचस्तु बद्धाञ्जलिः कम्पमानो भयविस्फारिताक्षः संकुचति; तयोर्मध्ये मायामयः काञ्चनो रजतबिन्दुमृगः सूक्ष्मरूपेण प्रतिभाति।

मारीच की पर्णकुटी में मुकुटधारी रावण क्रोध में भरकर आगे झुकता है और एक बाँह फैलाकर तर्जनी-मुद्रा में आज्ञा देता है—आज्ञा मानो या मरो; दुबला मारीच हाथ जोड़े, काँपता, भय से फैली आँखोंवाला सिकुड़ जाता है; और दोनों के बीच वह मायामय सुवर्ण-रजतबिन्दुवाला मृग धुँधले रूप में झलकता है, जिसका रूप धरने की आज्ञा दी जा रही है।

In Maricha's leaf-hut the crowned Ravana leans forward in wrath, one arm flung out in a threatening command — obey or die — while the gaunt Maricha shrinks back with folded, trembling hands and dread-widened eyes; between them shimmers the faint magic deer, golden and silver-spotted, whose shape he is being ordered to take.

॥ ३ · ४० · १ ॥
मारीचस्य तु तद् वाक्यं क्षमं युक्तं रावणः। उक्तो प्रतिजग्राह मर्तुकाम इवौषधम्॥

mārīcasya tu tad vākyaṁ kṣamaṁ yuktaṁ ca rāvaṇaḥ।
ukto na pratijagrāha martukāma ivauṣadham॥

मारीचका वह कथन उचित और माननेयोग्य था तो भी जैसे मरनेकी इच्छावाला रोगी दवा नहीं लेता, उसी प्रकार उसके बहुत कहनेपर भी रावणने उसकी बात नहीं मानी

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॥ ३ · ४० · २ ॥
तं पथ्यहितवक्तारं मारीचं राक्षसाधिपः। अब्रवीत् परुषं वाक्यमयुक्तं कालचोदितः॥

taṁ pathyahitavaktāraṁ mārīcaṁ rākṣasādhipaḥ।
abravīt paruṣaṁ vākyamayuktaṁ kālacoditaḥ॥

कालसे प्रेरित हुए उस राक्षसराजने यथार्थ और हितकी बात बतानेवाले मारीचसे अनुचित और कठोर वाणीमें कहा—

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॥ ३ · ४० · ३ ॥
दुष्कुलैतदयुक्तार्थं मारीच मयि कथ्यते। वाक्यं निष्फलमत्यर्थं बीजमुप्तमिवोषरे॥

duṣkulaitadayuktārthaṁ mārīca mayi kathyate।
vākyaṁ niṣphalamatyarthaṁ bījamuptamivoṣare॥

‘दूषित कुलमें उत्पन्न मारीच! तुमने मेरे प्रति जो ये अनाप-शनाप बातें कही हैं, ये मेरे लिये अनुचित और असंगत हैं, ऊसरमें बोये हुए बीजके समान अत्यन्त निष्फल हैं

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॥ ३ · ४० · ४ ॥
त्वद्वाक्यैर्न तु मां शक्यं भेत्तुं रामस्य संयुगे। मूर्खस्य पापशीलस्य मानुषस्य विशेषतः॥

tvadvākyairna tu māṁ śakyaṁ bhettuṁ rāmasya saṁyuge।
mūrkhasya pāpaśīlasya mānuṣasya viśeṣataḥ॥

‘तुम्हारे इन वचनोंद्वारा मूर्ख, पापाचारी और विशेषतः मनुष्य रामके साथ युद्ध करने अथवा उसकी स्त्रीका अपहरण करनेके निश्चयसे मुझे विचलित नहीं किया जा सकता

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॥ ३ · ४० · ५ ॥
यस्त्यक्त्वा सुहृदो राज्यं मातरं पितरं तथा। स्त्रीवाक्यं प्राकृतं श्रुत्वा वनमेकपदे गतः॥

yastyaktvā suhṛdo rājyaṁ mātaraṁ pitaraṁ tathā।
strīvākyaṁ prākṛtaṁ śrutvā vanamekapade gataḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४० · ६ ॥
अवश्यं तु मया तस्य संयुगे खरघातिनः। प्राणैः प्रियतरा सीता हर्तव्या तव संनिधौ॥

avaśyaṁ tu mayā tasya saṁyuge kharaghātinaḥ।
prāṇaiḥ priyatarā sītā hartavyā tava saṁnidhau॥

॥ ५–६ ॥

‘एक स्त्री (कैकेयी) के मूर्खतापूर्ण वचन सुनकर जो राज्य, मित्र, माता और पिताको छोड़कर सहसा जंगलमें चला आया है तथा जिसने युद्धमें खरका वध किया है, उस रामचन्द्रकी प्राणोंसे भी प्यारी भार्या सीताका मैं तुम्हारे निकट ही अवश्य हरण करूँगा

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॥ ३ · ४० · ७ ॥
एवं मे निश्चिता बुद्धिर्हृदि मारीच विद्यते। व्यावर्तयितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरैः॥

evaṁ me niścitā buddhirhṛdi mārīca vidyate।
na vyāvartayituṁ śakyā sendrairapi surāsuraiḥ॥

‘मारीच! ऐसा मेरे हृदयका निश्चित विचार है, इसे इन्द्र आदि देवता और सारे असुर मिलकर भी बदल नहीं सकते

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॥ ३ · ४० · ८ ॥
दोषं गुणं वा सम्पृष्टस्त्वमेवं वक्तुमर्हसि। अपायं वा उपायं वा कार्यस्यास्य विनिश्चये॥

doṣaṁ guṇaṁ vā sampṛṣṭastvamevaṁ vaktumarhasi।
apāyaṁ vā upāyaṁ vā kāryasyāsya viniścaye॥

‘यदि इस कार्यका निर्णय करनेके लिये तुमसे पूछा जाता ‘इसमें क्या दोष है, क्या गुण है, इसकी सिद्धिमें कौन-सा विघ्न है अथवा इस कार्यको सिद्ध करनेका कौन-सा उपाय है’ तो तुम्हें ऐसी बातें कहनी चाहिये थीं

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॥ ३ · ४० · ९ ॥
सम्पृष्टेन तु वक्तव्यं सचिवेन विपश्चिता। उद्यताञ्जलिना राज्ञो इच्छेद् भूतिमात्मनः॥

sampṛṣṭena tu vaktavyaṁ sacivena vipaścitā।
udyatāñjalinā rājño ya icched bhūtimātmanaḥ॥

‘जो अपना कल्याण चाहता हो, उस बुद्धिमान् मन्त्रीको उचित है कि वह राजासे उसके पूछनेपर ही अपना अभिप्राय प्रकट करे और वह भी हाथ जोड़कर नम्रताके साथ

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॥ ३ · ४० · १० ॥
वाक्यमप्रतिकूलं तु मृदुपूर्वं शुभं हितम्। उपचारेण वक्तव्यो युक्तं वसुधाधिपः॥

vākyamapratikūlaṁ tu mṛdupūrvaṁ śubhaṁ hitam।
upacāreṇa vaktavyo yuktaṁ ca vasudhādhipaḥ॥

‘राजाके सामने ऐसी बात कहनी चाहिये, जो सर्वथा अनुकूल, मधुर, उत्तम, हितकर, आदरसे युक्त और उचित हो

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॥ ३ · ४० · ११ ॥
सावमर्दं तु यद्वाक्यमथवा हितमुच्यते। नाभिनन्देत तद् राजा मानार्थी मानवर्जितम्॥

sāvamardaṁ tu yadvākyamathavā hitamucyate।
nābhinandeta tad rājā mānārthī mānavarjitam॥

‘राजा सम्मानका भूखा होता है। उसकी बातका खण्डन करके आक्षेपपूर्ण भाषामें यदि हितकर वचन भी कहा जाय तो उस अपमानपूर्ण वचनका वह कभी अभिनन्दन नहीं कर सकता

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॥ ३ · ४० · १२ ॥
पञ्च रूपाणि राजानो धारयन्त्यमितौजसः। अग्नेरिन्द्रस्य सोमस्य यमस्य वरुणस्य च॥

pañca rūpāṇi rājāno dhārayantyamitaujasaḥ।
agnerindrasya somasya yamasya varuṇasya ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४० · १३ ॥
औष्ण्यं तथा विक्रमं सौम्यं दण्डं प्रसन्नताम्। धारयन्ति महात्मानो राजानः क्षणदाचर॥

auṣṇyaṁ tathā vikramaṁ ca saumyaṁ daṇḍaṁ prasannatām।
dhārayanti mahātmāno rājānaḥ kṣaṇadācara॥

॥ १२–१३ ॥

‘निशाचर! अमित तेजस्वी महामनस्वी राजा अग्नि, इन्द्र, सोम, यम और वरुण—इन पाँच देवताओंके स्वरूप धारण किये रहते हैं, इसीलिये वे अपनेमें इन पाँचोंके गुण-प्रताप, पराक्रम, सौम्यभाव, दण्ड और प्रसन्नता भी धारण करते हैं

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॥ ३ · ४० · १४ ॥
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु मान्याः पूज्याश्च नित्यदा। त्वं तु धर्ममविज्ञाय केवलं मोहमाश्रितः॥

tasmāt sarvāsvavasthāsu mānyāḥ pūjyāśca nityadā।
tvaṁ tu dharmamavijñāya kevalaṁ mohamāśritaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४० · १५ ॥
अभ्यागतं तु दौरात्म्यात् परुषं वदसीदृशम्। गुणदोषौ पृच्छामि क्षेमं चात्मनि राक्षस॥

abhyāgataṁ tu daurātmyāt paruṣaṁ vadasīdṛśam।
guṇadoṣau na pṛcchāmi kṣemaṁ cātmani rākṣasa॥

॥ १४–१५ ॥

‘अतः सभी अवस्थाओंमें सदा राजाओंका सम्मान और पूजन ही करना चाहिये। तुम तो अपने धर्मको न जानकर केवल मोहके वशीभूत हो रहे हो। मैं तुम्हारा अभ्यागत-अतिथि हूँ तो भी तुम दुष्टतावश मुझसे ऐसी कठोर बातें कह रहे हो। राक्षस! मैं तुमसे अपने कर्तव्यके गुण-दोष नहीं पूछता हूँ और न यही जानना चाहता हूँ कि मेरे लिये क्या उचित है

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॥ ३ · ४० · १६ ॥
मयोक्तमपि चैतावत् त्वां प्रत्यमितविक्रम। अस्मिंस्तु भवान् कृत्ये साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥

mayoktamapi caitāvat tvāṁ pratyamitavikrama।
asmiṁstu sa bhavān kṛtye sāhāyyaṁ kartumarhasi॥

‘अमितपराक्रमी मारीच! मैंने तो तुमसे इतना ही कहा था कि इस कार्यमें तुम्हें मेरी सहायता करनी चाहिये

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॥ ३ · ४० · १७ ॥
शृणु तत्कर्म साहाय्ये यत्कार्यं वचनान्मम। सौवर्णस्त्वं मृगो भूत्वा चित्रो रजतबिन्दुभिः॥

śṛṇu tatkarma sāhāyye yatkāryaṁ vacanānmama।
sauvarṇastvaṁ mṛgo bhūtvā citro rajatabindubhiḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ४० · १८ ॥
आश्रमे तस्य रामस्य सीतायाः प्रमुखे चर। प्रलोभयित्वा वैदेहीं यथेष्टं गन्तुमर्हसि॥

āśrame tasya rāmasya sītāyāḥ pramukhe cara।
pralobhayitvā vaidehīṁ yatheṣṭaṁ gantumarhasi॥

॥ १७–१८ ॥

‘अच्छा, अब तुम्हें सहायताके लिये मेरे कथनानुसार जो कार्य करना है, उसे सुनो। तुम सुवर्णमय चर्मसे युक्त चितकबरे रंगके मृग हो जाओ। तुम्हारे सारे अङ्गमें चाँदीकी-सी सफेद बूँदें रहनी चाहिये। ऐसा रूप धारण करके तुम रामके आश्रममें सीताके सामने विचरो। एक बार विदेहकुमारीको लुभाकर जहाँ तुम्हारी इच्छा हो उधर ही चले जाओ

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॥ ३ · ४० · १९ ॥
त्वां हि मायामयं दृष्ट्वा काञ्चनं जातविस्मया। आनयैनमिति क्षिप्रं रामं वक्ष्यति मैथिली॥

tvāṁ hi māyāmayaṁ dṛṣṭvā kāñcanaṁ jātavismayā।
ānayainamiti kṣipraṁ rāmaṁ vakṣyati maithilī॥

‘तुम मायामय काञ्चन मृगको देखकर मिथिलेशकुमारी सीताको बड़ा आश्चर्य होगा और वह शीघ्र ही रामसे कहेगी कि आप इसे पकड़ लाइये

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॥ ३ · ४० · २० ॥
अपक्रान्ते काकुत्स्थे दूरं गत्वाप्युदाहर। हा सीते लक्ष्मणेत्येवं रामवाक्यानुरूपकम्॥

apakrānte ca kākutsthe dūraṁ gatvāpyudāhara।
hā sīte lakṣmaṇetyevaṁ rāmavākyānurūpakam॥

‘जब राम तुम्हें पकड़नेके लिये आश्रमसे दूर चले जायँ तो तुम भी दूरतक जाकर श्रीरामकी बोलीके अनुरूप ही—ठीक उन्हींके स्वरमें ‘हा सीते! हा लक्ष्मण!’ कहकर पुकारना

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॥ ३ · ४० · २१ ॥
तच्छ्रुत्वा रामपदवीं सीतया प्रचोदितः। अनुगच्छति सम्भ्रान्तः सौमित्रिरपि सौहृदात्॥

tacchrutvā rāmapadavīṁ sītayā ca pracoditaḥ।
anugacchati sambhrāntaḥ saumitrirapi sauhṛdāt॥

‘तुम्हारी उस पुकारको सुनकर सीताकी प्रेरणासे सुमित्राकुमार लक्ष्मण भी स्नेहवश घबराये हुए अपने भाईके ही मार्गका अनुसरण करेंगे

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॥ ३ · ४० · २२ ॥
अपक्रान्ते काकुत्स्थे लक्ष्मणे यथासुखम्। आहरिष्यामि वैदेहीं सहस्राक्षः शचीमिव॥

apakrānte ca kākutsthe lakṣmaṇe ca yathāsukham।
āhariṣyāmi vaidehīṁ sahasrākṣaḥ śacīmiva॥

‘इस प्रकार राम और लक्ष्मण दोनोंके आश्रमसे दूर निकल जानेपर मैं सुखपूर्वक सीताको हर लाऊँगा, ठीक उसी तरह जैसे इन्द्र शचीको हर लाये थे

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॥ ३ · ४० · २३ ॥
एवं कृत्वा त्विदं कार्यं यथेष्टं गच्छ राक्षस। राज्यस्यार्धं प्रदास्यामि मारीच तव सुव्रत॥

evaṁ kṛtvā tvidaṁ kāryaṁ yatheṣṭaṁ gaccha rākṣasa।
rājyasyārdhaṁ pradāsyāmi mārīca tava suvrata॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राक्षस मारीच! इस प्रकार इस कार्यको सम्पन्न करके जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहाँ चले जाना। मैं इसके लिये तुम्हें अपना आधा राज्य दे दूँगा

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॥ ३ · ४० · २४ ॥
गच्छ सौम्य शिवं मार्गं कार्यस्यास्य विवृद्धये। अहं त्वानुगमिष्यामि सरथो दण्डकावनम्॥

gaccha saumya śivaṁ mārgaṁ kāryasyāsya vivṛddhaye।
ahaṁ tvānugamiṣyāmi saratho daṇḍakāvanam॥

‘सौम्य! अब इस कार्यकी सिद्धिके लिये प्रस्थान करो। तुम्हारा मार्ग मङ्गलमय हो। मैं रथपर बैठकर दण्डकवनतक तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगा

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॥ ३ · ४० · २५ ॥
प्राप्य सीतामयुद्धेन वञ्चयित्वा तु राघवम्। लङ्कां प्रति गमिष्यामि कृतकार्यः सह त्वया॥

prāpya sītāmayuddhena vañcayitvā tu rāghavam।
laṅkāṁ prati gamiṣyāmi kṛtakāryaḥ saha tvayā॥

‘रामको धोखा देकर बिना युद्ध किये ही सीताको अपने हाथमें करके कृतार्थ हो तुम्हारे साथ ही लंकाको लौट चलूँगा

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॥ ३ · ४० · २६ ॥
नो चेत् करोषि मारीच हन्मि त्वामहमद्य वै। एतत् कार्यमवश्यं मे बलादपि करिष्यसि। राज्ञो विप्रतिकूलस्थो जातु सुखमेधते॥

no cet karoṣi mārīca hanmi tvāmahamadya vai।
etat kāryamavaśyaṁ me balādapi kariṣyasi।
rājño vipratikūlastho na jātu sukhamedhate॥

‘मारीच! यदि तुम इनकार करोगे तो तुम्हें अभी मार डालूँगा। मेरा यह कार्य तुम्हें अवश्य करना पड़ेगा। मैं बलप्रयोग करके भी तुमसे यह काम कराऊँगा। राजाके प्रतिकूल चलनेवाला पुरुष कभी सुखी नहीं होता है

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॥ ३ · ४० · २७ ॥
आसाद्य तं जीवितसंशयस्ते मृत्युर्ध्रुवो ह्यद्य मया विरुध्यतः। एतद् यथावत् परिगण्य बुद्ध्या यदत्र पथ्यं कुरु तत्तथा त्वम्॥

āsādya taṁ jīvitasaṁśayaste
mṛtyurdhruvo hyadya mayā virudhyataḥ।
etad yathāvat parigaṇya buddhyā
yadatra pathyaṁ kuru tattathā tvam॥

‘रामके सामने जानेपर तुम्हारे प्राण जानेका संदेहमात्र है, परंतु मेरे साथ विरोध करनेपर तो आज ही तुम्हारी मृत्यु निश्चित है। इन बातोंपर बुद्धि लगाकर भलीभाँति विचार कर लो। उसके बाद यहाँ जो हितकर जान पड़े, उसे उसी प्रकार तुम करो’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चत्वारिंशः सर्गः ॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४० ॥