वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः ३८ · ३३ श्लोकाःSarga 38 · 33 ślokas

श्रीरामकी शक्तिके विषयमें अपना अनुभव बताकर मारीचका रावणको उनका अपराध करनेसे मना करना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः ३८ — painting

॥ ३ · ३८ · १८–१९ ॥

विश्वामित्रस्य यज्ञवेद्यां श्यामो बालरामो धनुरायम्य दीप्तं बाणं मुञ्चति, येन मेघश्यामो महाकायो मारीचस्तप्तकाञ्चनकुण्डलश्च्युतपरिघो दूरं समुद्राभिमुखं क्षिप्यते, पार्श्वे च मुनिर्विश्वामित्रो हुताशनसमीपे मौनेन आस्ते।

विश्वामित्र की यज्ञवेदी के पास श्यामवर्ण बालक राम अपना विशाल धनुष खींचकर तेजस्वी बाण छोड़ते हैं, जिससे मेघ के समान काले, विशालकाय मारीच—तपे सोने के कुण्डल झूलते, मुकुट टेढ़ा, लोहे का परिघ हाथ से छूटा—दूर समुद्र की ओर उछाल दिया जाता है; पास ही मुनि विश्वामित्र यज्ञाग्नि के निकट मौन बैठे हैं।

At Vishvamitra's fire-altar the blue boy Ram draws his great bow and looses a blazing arrow that flings the colossal, cloud-dark Maricha — gold earrings swinging, crown askew, iron club torn from his grip — hurtling backward toward the distant sea, while the sage Vishvamitra sits in silence by the sacrificial fire.

॥ ३ · ३८ · १ ॥
कदाचिदप्यहं वीर्यात्‌ पर्यटन्‌ पृथिवीमिमाम्‌। बलं नागसहस्रस्य धारयन्‌ पर्वतोपमः॥

kadācidapyahaṁ vīryāt‌ paryaṭan‌ pṛthivīmimām‌।
balaṁ nāgasahasrasya dhārayan‌ parvatopamaḥ॥

‘एक समय की बात है कि मैं अपने पराक्रम के अभिमान में आकर पर्वत के समान शरीर धारण किये इस पृथ्वी पर चक्कर लगा रहा था। उस समय मुझमें एक हजार हाथियों का बल था

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॥ ३ · ३८ · २ ॥
नीलजीमूतसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः। भयं लोकस्य जनयन्‌ किरीटी परिघायुधः॥ व्यचरन्‌ दण्डकारण्यमृषिमांसानि भक्षयन्‌।

nīlajīmūtasaṁkāśastaptakāñcanakuṇḍalaḥ।
bhayaṁ lokasya janayan‌ kirīṭī parighāyudhaḥ॥
vyacaran‌ daṇḍakāraṇyamṛṣimāṁsāni bhakṣayan‌।

‘मेरा शरीर नील मेघ के समान काला था। मैंने कानों में पक्के सोने के कुण्डल पहन रखे थे। मेरे मस्तक पर किरीट था और हाथ में परिघ। मैं ऋषियों के मांस खाता और समस्त जगत् के मन में भय उत्पन्न करता हुआ दण्डकारण्य में विचर रहा था

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॥ ३ · ३८ · ३ ॥
विश्वामित्रोऽथ धर्मात्मा मद्वित्रस्तो महामुनिः॥ स्वयं गत्वा दशरथं नरेन्द्रमिदमब्रवीत्‌।

viśvāmitro'tha dharmātmā madvitrasto mahāmuniḥ॥
svayaṁ gatvā daśarathaṁ narendramidamabravīt‌।

‘उन दिनों धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्र को मुझसे बड़ा भय हो गया था। वे स्वयं राजा दशरथ के पास गये और उनसे इस प्रकार बोले—

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॥ ३ · ३८ · ४ ॥
अयं रक्षतु मां रामः पर्वकाले समाहितः॥ मारीचान्मे भयं घोरं समुत्पन्नं नरेश्वर।

ayaṁ rakṣatu māṁ rāmaḥ parvakāle samāhitaḥ॥
mārīcānme bhayaṁ ghoraṁ samutpannaṁ nareśvara।

‘नरेश्वर! मुझे मारीच नामक राक्षस से घोर भय प्राप्त हुआ है, अतः ये श्रीराम मेरे साथ चलें और पर्व के दिन एकाग्रचित्त हो मेरी रक्षा करें’

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॥ ३ · ३८ · ५ ॥
इत्येवमुक्तो धर्मात्मा राजा दशरथस्तदा॥ प्रत्युवाच महाभागं विश्वामित्रं महामुनिम्‌।

ityevamukto dharmātmā rājā daśarathastadā॥
pratyuvāca mahābhāgaṁ viśvāmitraṁ mahāmunim‌।

‘मुनि के ऐसा कहने पर उस समय धर्मात्मा राजा दशरथ ने महाभाग महामुनि विश्वामित्र को इस प्रकार उत्तर दिया—

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॥ ३ · ३८ · ६ ॥
ऊनद्वादशवर्षोऽयमकृतास्त्रश्च राघवः॥

ūnadvādaśavarṣo'yamakṛtāstraśca rāghavaḥ॥

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॥ ३ · ३८ · ७ ॥
कामं तु मम तत्‌ सैन्यं मया सह गमिष्यति। बलेन चतुरङ्गेण स्वयमेत्य निशाचरम्‌॥ वधिष्यामि मुनिश्रेष्ठ शत्रुं तव यथेप्सितम्‌।

kāmaṁ tu mama tat‌ sainyaṁ mayā saha gamiṣyati।
balena caturaṅgeṇa svayametya niśācaram‌॥
vadhiṣyāmi muniśreṣṭha śatruṁ tava yathepsitam‌।

॥ ६–७ ॥

‘मुनिश्रेष्ठ! रघुकुलनन्दन राम की अवस्था अभी बारह वर्ष से भी कम है। इन्हें अस्त्र-शस्त्रों के चलाने का पूरा अभ्यास भी नहीं है। आप चाहें तो मेरे साथ मेरी सारी सेना वहाँ चलेगी और मैं चतुरङ्गिणी सेना के साथ स्वयं ही चलकर आपकी इच्छा के अनुसार उस शत्रुरूप निशाचर का वध करूँगा’

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॥ ३ · ३८ · ८ ॥
एवमुक्तः तु मुनी राजानमिदमब्रवीत्‌॥ रामान्नान्यद्‌ बलं लोके पर्याप्तं तस्य रक्षसः।

evamuktaḥ sa tu munī rājānamidamabravīt‌॥
rāmānnānyad‌ balaṁ loke paryāptaṁ tasya rakṣasaḥ।

‘राजा के ऐसा कहने पर मुनि उनसे इस प्रकार बोले—‘उस राक्षस के लिये श्रीराम के सिवा दूसरी कोई शक्ति पर्याप्त नहीं है

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॥ ३ · ३८ · ९ ॥
देवतानामपि भवान्‌ समरेष्वभिपालकः॥ आसीत्‌ तव कृतं कर्म त्रिलोकविदितं नृप।

devatānāmapi bhavān‌ samareṣvabhipālakaḥ॥
āsīt‌ tava kṛtaṁ karma trilokaviditaṁ nṛpa।

‘राजन्! इसमें संदेह नहीं कि आप समरभूमि में देवताओं की भी रक्षा करने में समर्थ हैं। आपने जो महान् कार्य किया है, वह तीनों लोकों में प्रसिद्ध है

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॥ ३ · ३८ · १० ॥
काममस्ति महत्‌ सैन्यं तिष्ठत्विह परंतप॥

kāmamasti mahat‌ sainyaṁ tiṣṭhatviha paraṁtapa॥

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॥ ३ · ३८ · ११ ॥
बालोऽप्येष महातेजाः समर्थस्तस्य निग्रहे। गमिष्ये राममादाय स्वस्ति तेऽस्तु परंतप॥

bālo'pyeṣa mahātejāḥ samarthastasya nigrahe।
gamiṣye rāmamādāya svasti te'stu paraṁtapa॥

॥ १०–११ ॥

‘शत्रुओं को संताप देनेवाले नरेश! आपके पास जो विशाल सेना है, वह आपकी इच्छा हो तो यहीं रहे (आप भी यहीं रहें।) महातेजस्वी श्रीराम बालक हैं तो भी उस राक्षस का दमन करने में समर्थ हैं, अतः मैं श्रीराम को ही साथ लेकर जाऊँगा; आपका कल्याण हो’

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॥ ३ · ३८ · १२ ॥
इत्येवमुक्त्वा मुनिस्तमादाय नृपात्मजम्‌। जगाम परमप्रीतो विश्वामित्रः स्वमाश्रमम्‌॥

ityevamuktvā sa munistamādāya nṛpātmajam‌।
jagāma paramaprīto viśvāmitraḥ svamāśramam‌॥

‘ऐसा कहकर (लक्ष्मणसहित) राजकुमार श्रीराम को साथ ले महामुनि विश्वामित्र बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने आश्रम को गये

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॥ ३ · ३८ · १३ ॥
तं तथा दण्डकारण्ये यज्ञमुद्दिश्य दीक्षितम्‌। बभूवोपस्थितो रामश्चित्रं विस्फारयन्‌ धनुः॥

taṁ tathā daṇḍakāraṇye yajñamuddiśya dīkṣitam‌।
babhūvopasthito rāmaścitraṁ visphārayan‌ dhanuḥ॥

‘इस प्रकार दण्डकारण्य में जाकर उन्होंने यज्ञ के लिये दीक्षा ग्रहण की और श्रीराम अपने अद्भुत धनुष की टङ्कार करते हुए उनकी रक्षा के लिये पास ही खड़े हो गये

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॥ ३ · ३८ · १४ ॥
अजातव्यञ्जनः श्रीमान्‌ बालः श्यामः शुभेक्षणः। एकवस्त्रधरो धन्वी शिखी कनकमालया॥

ajātavyañjanaḥ śrīmān‌ bālaḥ śyāmaḥ śubhekṣaṇaḥ।
ekavastradharo dhanvī śikhī kanakamālayā॥

‘उस समयतक श्रीराम में जवानी के चिह्न प्रकट नहीं हुए थे। (उनकी किशोरावस्था थी।) वे एक शोभाशाली बालक के रूप में दिखायी देते थे। उनके श्रीअङ्ग का रंग साँवला और आँखें बड़ी सुन्दर थीं। वे एक वस्त्र धारण किये, हाथों में धनुष लिये सुन्दर शिखा और सोने के हार से सुशोभित थे

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॥ ३ · ३८ · १५ ॥
शोभयन्‌ दण्डकारण्यं दीप्तेन स्वेन तेजसा। अदृश्यत तदा रामो बालचन्द्र इवोदितः॥

śobhayan‌ daṇḍakāraṇyaṁ dīptena svena tejasā।
adṛśyata tadā rāmo bālacandra ivoditaḥ॥

‘उस समय अपने उद्दीप्त तेज से दण्डकारण्य की शोभा बढ़ाते हुए श्रीरामचन्द्र नवोदित बालचन्द्र के समान दृष्टिगोचर होते थे

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॥ ३ · ३८ · १६ ॥
ततोऽहं मेघसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः। बली दत्तवरो दर्पादाजगामाश्रमान्तरम्‌॥

tato'haṁ meghasaṁkāśastaptakāñcanakuṇḍalaḥ।
balī dattavaro darpādājagāmāśramāntaram‌॥

‘इधर मैं भी मेघ के समान काले शरीर से बड़े घमंड के साथ उस आश्रम के भीतर घुसा। मेरे कानों में तपाये हुए सुवर्ण के कुण्डल झलमला रहे थे। मैं बलवान् तो था ही, मुझे वरदान भी मिल चुका था कि देवता मुझे मार नहीं सकेंगे

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॥ ३ · ३८ · १७ ॥
तेन दृष्टः प्रविष्टोऽहं सहसैवोद्यतायुधः। मां तु दृष्ट्वा धनुः सज्यमसम्भ्रान्तश्चकार ह॥

tena dṛṣṭaḥ praviṣṭo'haṁ sahasaivodyatāyudhaḥ।
māṁ tu dṛṣṭvā dhanuḥ sajyamasambhrāntaścakāra ha॥

‘भीतर प्रवेश करते ही श्रीरामचन्द्रजी की दृष्टि मुझपर पड़ी। मुझे देखते ही उन्होंने सहसा धनुष उठा लिया और बिना किसी घबराहट के उसपर डोरी चढ़ा दी

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॥ ३ · ३८ · १८ ॥
अवजानन्नहं मोहाद्‌ बालोऽयमिति राघवम्‌। विश्वामित्रस्य तां वेदिमभ्यधावं कृतत्वरः॥

avajānannahaṁ mohād‌ bālo'yamiti rāghavam‌।
viśvāmitrasya tāṁ vedimabhyadhāvaṁ kṛtatvaraḥ॥

‘मैं मोहवश श्रीरामचन्द्रजी को ‘यह बालक है’ ऐसा समझकर उनकी अवहेलना करता हुआ बड़ी तेजी के साथ विश्वामित्र की उस यज्ञवेदी की ओर दौड़ा

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॥ ३ · ३८ · १९ ॥
तेन मुक्तस्ततो बाणः शितः शत्रुनिबर्हणः। तेनाहं ताडितः क्षिप्तः समुद्रे शतयोजने॥

tena muktastato bāṇaḥ śitaḥ śatrunibarhaṇaḥ।
tenāhaṁ tāḍitaḥ kṣiptaḥ samudre śatayojane॥

‘इतने ही में श्रीराम ने एक ऐसा तीखा बाण छोड़ा, जो शत्रु का संहार करनेवाला था; परंतु उस बाण की चोट खाकर (मैं मरा नहीं) सौ योजन दूर समुद्र में आकर गिर पड़ा

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॥ ३ · ३८ · २० ॥
नेच्छता तात मां हन्तुं तदा वीरेण रक्षितः। रामस्य शरवेगेन निरस्तो भ्रान्तचेतनः॥

necchatā tāta māṁ hantuṁ tadā vīreṇa rakṣitaḥ।
rāmasya śaravegena nirasto bhrāntacetanaḥ॥

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॥ ३ · ३८ · २१ ॥
पातितोऽहं तदा तेन गम्भीरे सागराम्भसि। प्राप्य संज्ञां चिरात्‌ तात लङ्कां प्रति गतः पुरीम्‌॥

pātito'haṁ tadā tena gambhīre sāgarāmbhasi।
prāpya saṁjñāṁ cirāt‌ tāta laṅkāṁ prati gataḥ purīm‌॥

॥ २०–२१ ॥

‘तात! वीर श्रीरामचन्द्रजी उस समय मुझे मारना नहीं चाहते थे, इसीलिये मेरी जान बच गयी। उनके बाण के वेग से मैं भ्रान्तचित्त होकर दूर फेंक दिया गया और समुद्र के गहरे जल में गिरा दिया गया। तात! फिर दीर्घकाल के पश्चात् जब मुझे चेत हुआ, तब मैं लंकापुरी में गया

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॥ ३ · ३८ · २२ ॥
एवमस्मि तदा मुक्तः सहायास्ते निपातिताः। अकृतास्त्रेण रामेण बालेनाक्लिष्टकर्मणा॥

evamasmi tadā muktaḥ sahāyāste nipātitāḥ।
akṛtāstreṇa rāmeṇa bālenākliṣṭakarmaṇā॥

‘इस प्रकार उस समय मैं मरने से बचा। अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीराम उन दिनों अभी बालक थे और उन्हें अस्त्र चलाने का पूरा अभ्यास भी नहीं था तो भी उन्होंने मेरे उन सभी सहायकों को मार गिराया, जो मेरे साथ गये थे

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॥ ३ · ३८ · २३ ॥
तन्मया वार्यमाणस्तु यदि रामेण विग्रहम्‌। करिष्यस्यापदां घोरां क्षिप्रं प्राप्य शिष्यसि॥

tanmayā vāryamāṇastu yadi rāmeṇa vigraham‌।
kariṣyasyāpadāṁ ghorāṁ kṣipraṁ prāpya na śiṣyasi॥

‘इसलिये मेरे मना करने पर भी यदि तुम श्रीराम के साथ विरोध करोगे तो शीघ्र ही घोर आपत्ति में पड़ जाओगे और अन्त में अपने जीवन से भी हाथ धो बैठोगे

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॥ ३ · ३८ · २४ ॥
क्रीडारतिविधिज्ञानां समाजोत्सवदर्शिनाम्‌। रक्षसां चैव संतापमनर्थं चाहरिष्यसि॥

krīḍāratividhijñānāṁ samājotsavadarśinām‌।
rakṣasāṁ caiva saṁtāpamanarthaṁ cāhariṣyasi॥

‘खेल-कूद और भोग-विलास के क्रम को जाननेवाले तथा सामाजिक उत्सवों को ही देख-देखकर दिल बहलानेवाले राक्षसों के लिये तुम संताप और अनर्थ (मौत) बुला लाओगे

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॥ ३ · ३८ · २५ ॥
हर्म्यप्रासादसम्बाधां नानारत्नविभूषिताम्‌। द्रक्ष्यसि त्वं पुरीं लङ्कां विनष्टां मैथिलीकृते॥

harmyaprāsādasambādhāṁ nānāratnavibhūṣitām‌।
drakṣyasi tvaṁ purīṁ laṅkāṁ vinaṣṭāṁ maithilīkṛte॥

‘मिथिलेशकुमारी सीता के लिये तुम्हें धनियों की अट्टालिकाओं तथा राजभवनों से भरी हुई एवं नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित लंकापुरी का विनाश भी अपनी आँखों देखना पड़ेगा

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॥ ३ · ३८ · २६ ॥
अकुर्वन्तोऽपि पापानि शुचयः पापसंश्रयात्‌। परपापैर्विनश्यन्ति मत्स्या नागहृदे यथा॥

akurvanto'pi pāpāni śucayaḥ pāpasaṁśrayāt‌।
parapāpairvinaśyanti matsyā nāgahṛde yathā॥

‘जो लोग आचार-विचार से शुद्ध हैं और पाप या अपराध नहीं करते हैं, वे भी यदि पापियों के सम्पर्क में चले जायँ तो दूसरों के पापों से ही नष्ट हो जाते हैं, जैसे साँपवाले सरोवर में निवास करनेवाली मछलियाँ उस सर्प के साथ ही मारी जाती हैं

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॥ ३ · ३८ · २७ ॥
दिव्यचन्दनदिग्धाङ्गान्‌ दिव्याभरणभूषितान्‌। द्रक्ष्यस्यभिहतान्‌ भूमौ तव दोषात्‌ तु राक्षसान्‌॥

divyacandanadigdhāṅgān‌ divyābharaṇabhūṣitān‌।
drakṣyasyabhihatān‌ bhūmau tava doṣāt‌ tu rākṣasān‌॥

‘तुम देखोगे कि जिनके अङ्ग दिव्य चन्दन से चर्चित होते थे तथा जो दिव्य आभूषणों से विभूषित रहते थे, वे ही राक्षस तुम्हारे ही अपराध से मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हुए हैं

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॥ ३ · ३८ · २८ ॥
हतदारान्‌ सदारांश्च दश विद्रवतो दिशः। हतशेषानशरणान्‌ द्रक्ष्यसि त्वं निशाचरान्‌॥

hatadārān‌ sadārāṁśca daśa vidravato diśaḥ।
hataśeṣānaśaraṇān‌ drakṣyasi tvaṁ niśācarān‌॥

‘तुम्हें यह भी दिखायी देगा कि कितने ही निशाचरों की स्त्रियाँ हर ली गयी हैं और कुछ की स्त्रियाँ साथ हैं तथा वे युद्ध में मरने से बचकर असहाय अवस्था में दसों दिशाओं की ओर भाग रहे हैं

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॥ ३ · ३८ · २९ ॥
शरजालपरिक्षिप्तामग्निज्वालासमावृताम्‌। प्रदग्धभवनां लङ्कां द्रक्ष्यसि त्वमसंशयम्‌॥

śarajālaparikṣiptāmagnijvālāsamāvṛtām‌।
pradagdhabhavanāṁ laṅkāṁ drakṣyasi tvamasaṁśayam‌॥

‘निःसंदेह तुम्हारे सामने वह दृश्य भी आयेगा कि लंकापुरी पर बाणों का जाल-सा बिछ गया है। वह आग की ज्वालाओं से घिर गयी है और उसका एक-एक घर जलकर भस्म हो गया है

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॥ ३ · ३८ · ३० ॥
परदाराभिमर्शात्‌ तु नान्यत्‌ पापतरं महत्‌। प्रमदानां सहस्राणि तव राजन्‌ परिग्रहे॥

paradārābhimarśāt‌ tu nānyat‌ pāpataraṁ mahat‌।
pramadānāṁ sahasrāṇi tava rājan‌ parigrahe॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · ३८ · ३१ ॥
भव स्वदारनिरतः स्वकुलं रक्ष राक्षसान्‌। मानं वृद्धिं राज्यं जीवितं चेष्टमात्मनः॥

bhava svadāranirataḥ svakulaṁ rakṣa rākṣasān‌।
mānaṁ vṛddhiṁ ca rājyaṁ ca jīvitaṁ ceṣṭamātmanaḥ॥

॥ ३०–३१ ॥

‘राजन्! परायी स्त्री के संसर्ग से बढ़कर दूसरा कोई महान् पाप नहीं है। तुम्हारे अन्तःपुर में हजारों युवती स्त्रियाँ हैं, उन अपनी ही स्त्रियों में अनुराग रखो। अपने कुल की रक्षा करो, राक्षसों के प्राण बचाओ तथा अपनी मान, प्रतिष्ठा, उन्नति, राज्य और प्यारे जीवन को नष्ट न होने दो

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॥ ३ · ३८ · ३२ ॥
कलत्राणि सौम्यानि मित्रवर्गं तथैव च। यदीच्छसि चिरं भोक्तुं मा कृथा रामविप्रियम्‌॥

kalatrāṇi ca saumyāni mitravargaṁ tathaiva ca।
yadīcchasi ciraṁ bhoktuṁ mā kṛthā rāmavipriyam‌॥

‘यदि तुम अपनी सुन्दरी स्त्रियों तथा मित्रों का सुख अधिक कालतक भोगना चाहते हो तो श्रीराम का अपराध न करो

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॥ ३ · ३८ · ३३ ॥
निवार्यमाणः सुहृदा मया भृशं प्रसह्य सीतां यदि धर्षयिष्यसि। गमिष्यसि क्षीणबलः सबान्धवो यमक्षयं रामशरास्तजीवितः॥

nivāryamāṇaḥ suhṛdā mayā bhṛśaṁ prasahya sītāṁ yadi dharṣayiṣyasi।
gamiṣyasi kṣīṇabalaḥ sabāndhavo yamakṣayaṁ rāmaśarāstajīvitaḥ॥

‘मैं तुम्हारा हितैषी सुहृद् हूँ। यदि मेरे बारंबार मना करने पर भी तुम हठपूर्वक सीता का अपहरण करोगे तो तुम्हारी सारी सेना नष्ट हो जायगी और तुम श्रीराम के बाणों से अपने प्राण गँवाकर बन्धु-बान्धवों के साथ यमलोक की यात्रा करोगे’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टात्रिंशः सर्गः॥ ३८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३८ ॥