रावणके पूछनेपर शूर्पणखाका उससे राम, लक्ष्मण और सीताका परिचय देते हुए सीताको भार्या बनानेके लिये उसे प्रेरित करना
॥ ३ · ३४ · २२–२३ ॥
लङ्कायाः स्तम्भमण्डपे विकृतमुखी शूर्पणखा एकं करं दक्षिणदिशं प्रसार्य अपरं वक्षसि निधाय पूर्णचन्द्रमुखीं काञ्चनगौरीं सीतां वर्णयन्ती रावणं तद्ग्रहणाय प्रेरयति, स च सोत्सुको रत्नसिंहासने प्रह्वः कामक्रोधमिश्रदृष्टिः शृणोति।
लङ्का के स्तम्भयुक्त सभामण्डप में कटे मुखवाली शूर्पणखा एक हाथ दक्षिण दिशा की ओर बढ़ाए और दूसरा वक्ष पर रखे, पूर्णचन्द्र-मुखी सुवर्ण-गौरवर्णा सीता का बखान करती हुई रावण को उसके हरण के लिये उकसा रही है; रावण अपने रत्नजटित ऊँचे सिंहासन पर आगे झुककर काम और क्रोध से मिली-जुली दृष्टि से सुन रहा है।
In Lanka's pillared hall the disfigured Shurpanakha flings one hand toward the south and presses the other to her breast, extolling the golden-hued, moon-faced Sita and goading Ravana to seize her, while he leans forward on his jewelled throne, listening with kindled desire and stirred wrath.
tataḥ śūrpaṇakhāṁ dṛṣṭvā bruvantīṁ paruṣaṁ vacaḥ।
amātyamadhye saṁkruddhaḥ paripapraccha rāvaṇaḥ॥
शूर्पणखा को इस प्रकार कठोर बातें कहती देख मन्त्रियों के बीच में बैठे हुए रावण ने अत्यन्त कुपित होकर पूछा—
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kaśca rāmaḥ kathaṁvīryaḥ kiṁrūpaḥ kiṁparākramaḥ।
kimarthaṁ daṇḍakāraṇyaṁ praviṣṭaśca sudustaram॥
‘राम कौन है? उसका बल कैसा है? रूप और पराक्रम कैसे हैं? अत्यन्त दुस्तर दण्डकारण्य में उसने किस लिये प्रवेश किया है?
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āyudhaṁ kiṁ ca rāmasya yena te rākṣasā hatāḥ।
kharaśca nihataḥ saṁkhye dūṣaṇastriśirāstathā॥
‘राम के पास कौन-सा ऐसा अस्त्र है, जिससे वे सब राक्षस मारे गये तथा युद्ध में खर, दूषण और त्रिशिरा का भी संहार हो गया
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tattvaṁ brūhi manojñāṅgi kena tvaṁ ca virūpitā।
ityuktā rākṣasendreṇa rākṣasī krodhamūrcchitā॥
‘मनोहर अङ्गोंवाली शूर्पणखे! ठीक-ठीक बताओ, किसने तुम्हें कुरूप बनाया है—किसने तुम्हारी नाक और कान काट डाले हैं?’ राक्षसराज रावण के इस प्रकार पूछने पर वह राक्षसी क्रोध से अचेत-सी हो उठी
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tato rāmaṁ yathānyāyamākhyātumupacakrame।
dīrghabāhurviśālākṣaścīrakṛṣṇājināmbaraḥ॥
kandarpasamarūpaśca rāmo daśarathātmajaḥ।
तदनन्तर उसने श्रीराम का यथावत् परिचय देना आरम्भ किया—‘भैया! श्रीरामचन्द्र राजा दशरथ के पुत्र हैं, उनकी भुजाएँ लंबी, आँखें बड़ी-बड़ी और रूप कामदेव के समान है। वे चीर और काला मृगचर्म धारण करते हैं
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śakracāpanibhaṁ cāpaṁ vikṛṣya kanakāṅgadam॥
dīptān kṣipati nārācān sarpāniva mahāviṣān।
‘श्रीराम इन्द्रधनुष के समान अपने विशाल धनुष को, जिसमें सोने के छल्ले शोभा दे रहे हैं, खींचकर उसके द्वारा महाविषैले सर्पों के समान तेजस्वी नाराचों की वर्षा करते हैं
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nādadānaṁ śarān ghorān vimuñcantaṁ mahābalam॥
na kārmukaṁ vikarṣantaṁ rāmaṁ paśyāmi saṁyuge।
‘वे महाबली राम युद्धस्थल में कब धनुष खींचते, कब भयंकर बाण हाथ में लेते और कब उन्हें छोड़ते हैं—यह मैं नहीं देख पाती थी
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hanyamānaṁ tu tatsainyaṁ paśyāmi śaravṛṣṭibhiḥ॥
indreṇevottamaṁ sasyamāhataṁ tvaśmavṛṣṭibhiḥ।
‘उनके बाणों की वर्षा से राक्षसों की सेना मर रही है—इतना ही मुझे दिखायी देता था। जैसे इन्द्र (मेघ) द्वारा बरसाये गये ओलों की वृष्टि से अच्छी खेती चौपट हो जाती है, उसी प्रकार राम के बाणों से राक्षसों का विनाश हो गया
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rakṣasāṁ bhīmavīryāṇāṁ sahasrāṇi caturdaśa॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
nihatāni śaraistīkṣṇaistenaikena padātinā।
ardhādhikamuhūrtena kharaśca sahadūṣaṇaḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
ṛṣīṇāmabhayaṁ dattaṁ kṛtakṣemāśca daṇḍakāḥ॥
‘श्रीराम अकेले और पैदल थे, तो भी उन्होंने डेढ़ मुहूर्त (तीन घड़ी) के भीतर ही खर और दूषणसहित चौदह हजार भयंकर बलशाली राक्षसों का तीखे बाणों से संहार कर डाला, ऋषियों को अभय दे दिया और समस्त दण्डकवन को राक्षसों की विघ्न-बाधा से रहित कर दिया
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ekā kathaṁcinmuktāhaṁ paribhūya mahātmanā।
strīvadhaṁ śaṅkamānena rāmeṇa viditātmanā॥
‘आत्मज्ञानी महात्मा श्रीराम ने स्त्री का वध हो जाने के भय से एकमात्र मुझे किसी तरह केवल अपमानित करके ही छोड़ दिया
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bhrātā cāsya mahātejā guṇatastulyavikramaḥ।
anuraktaśca bhaktaśca lakṣmaṇo nāma vīryavān॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
amarṣī durjayo jetā vikrānto buddhimān balī।
rāmasya dakṣiṇo bāhurnityaṁ prāṇo bahiścaraḥ॥
‘उनका एक बड़ा ही तेजस्वी भाई है, जो गुण और पराक्रम में उन्हींके समान है। उसका नाम है लक्ष्मण। वह पराक्रमी वीर अपने बड़े भाई का प्रेमी और भक्त है, उसकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण है, वह अमर्षशील, दुर्जय, विजयी तथा बल-विक्रम से सम्पन्न है। श्रीराम का वह मानो दाहिना हाथ और सदा बाहर विचरनेवाला प्राण है
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rāmasya tu viśālākṣī pūrṇendusadṛśānanā।
dharmapatnī priyā nityaṁ bhartuḥ priyahite ratā॥
‘श्रीराम की धर्मपत्नी भी उनके साथ है। वह पति को बहुत प्यारी है और सदा अपने स्वामी का प्रिय तथा हित करने में ही लगी रहती है। उसकी आँखें विशाल और मुख पूर्ण चन्द्र के समान मनोरम है
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sā sukeśī sunāsorūḥ surūpā ca yaśasvinī।
devateva vanasyāsya rājate śrīrivāparā॥
‘उसके केश, नासिका, ऊरु तथा रूप बड़े ही सुन्दर तथा मनोहर हैं। वह यशस्विनी राजकुमारी इस दण्डकवन की देवी-सी जान पड़ती है और दूसरी लक्ष्मी के समान शोभा पाती है
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taptakāñcanavarṇābhā raktatuṅganakhī śubhā।
sītā nāma varārohā vaidehī tanumadhyamā॥
‘उसका सुन्दर शरीर तपाये हुए सुवर्ण की कान्ति धारण करता है, नख ऊँचे तथा लाल हैं। वह शुभलक्षणों से सम्पन्न है। उसके सभी अङ्ग सुडौल हैं और कटिभाग सुन्दर तथा पतला है। वह विदेहराज जनक की कन्या है और सीता उसका नाम है
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naiva devī na gandharvī na yakṣī na ca kiṁnarī।
tathārūpā mayā nārī dṛṣṭapūrvā mahītale॥
‘देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों और किन्नरों की स्त्रियों में भी कोई उसके समान सुन्दरी नहीं है। इस भूतल पर वैसी रूपवती नारी मैंने पहले कभी नहीं देखी थी
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yasya sītā bhaved bhāryā yaṁ ca hṛṣṭā pariṣvajet।
abhijīvet sa sarveṣu lokeṣvapi puraṁdarāt॥
‘सीता जिसकी भार्या हो और वह हर्ष में भरकर जिसका आलिङ्गन करे, समस्त लोकों में उसीका जीवन इन्द्र से भी अधिक भाग्यशाली है
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sā suśīlā vapuḥślāghyā rūpeṇāpratimā bhuvi।
tavānurūpā bhāryā sā tvaṁ ca tasyāḥ patirvaraḥ॥
‘उसका शील-स्वभाव बड़ा ही उत्तम है। उसका एक-एक अङ्ग स्तुत्य एवं स्पृहणीय है। उसके रूप की समानता करनेवाली भूमण्डल में दूसरी कोई स्त्री नहीं है। वह तुम्हारे योग्य भार्या होगी और तुम भी उसके योग्य श्रेष्ठ पति होओगे
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tāṁ tu vistīrṇajaghanāṁ pīnottuṅgapayodharām।
bhāryārthe tu tavānetumudyatāhaṁ varānanām॥
virūpitāsmi krūreṇa lakṣmaṇena mahābhuja।
‘महाबाहो! विस्तृत जघन और उठे हुए पुष्ट कुचोंवाली उस सुमुखी स्त्री को जब मैं तुम्हारी भार्या बनाने के लिये ले आने को उद्यत हुई, तब क्रूर लक्ष्मण ने मुझे इस तरह कुरूप कर दिया
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tāṁ tu dṛṣṭvādya vaidehīṁ pūrṇacandranibhānanām॥
manmathasya śarāṇāṁ ca tvaṁ vidheyo bhaviṣyasi।
‘पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुखवाली विदेहराजकुमारी सीता को देखते ही तुम कामदेव के बाणों के लक्ष्य बन जाओगे
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yadi tasyāmabhiprāyo bhāryātve tava jāyate।
śīghramuddhriyatāṁ pādo jayārthamiha dakṣiṇaḥ॥
‘यदि तुम्हें सीता को अपनी भार्या बनाने की इच्छा हो तो शीघ्र ही श्रीराम को जीतने के लिये यहाँ अपना दाहिना पैर आगे बढ़ाओ
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rocate yadi te vākyaṁ mamaitad rākṣaseśvara।
kriyatāṁ nirviśaṅkena vacanaṁ mama rāvaṇa॥
‘राक्षसराज रावण! यदि तुम्हें मेरी यह बात पसंद हो तो निःशङ्क होकर मेरे कथनानुसार कार्य करो
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vijñāyaiṣāmaśaktiṁ ca kriyatāṁ ca mahābala।
sītā tavānavadyāṅgī bhāryātve rākṣaseśvara॥
‘महाबली राक्षसेश्वर! इन राम आदि की असमर्थता और अपनी शक्ति का विचार करके सर्वाङ्गसुन्दरी सीता को अपनी भार्या बनाने का प्रयत्न करो (उसे हर लाओ)
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niśamya rāmeṇa śarairajihmagairhatāñjanasthānagatān niśācarān।
kharaṁ ca dṛṣṭvā nihataṁ ca dūṣaṇaṁ tvamadya kṛtyaṁ pratipattumarhasi॥
‘श्रीराम ने अपने सीधे जानेवाले बाणोंद्वारा जनस्थाननिवासी निशाचरों को मार डाला और खर तथा दूषण को भी मौत के घाट उतार दिया, यह सब सुनकर और देखकर अब तुम्हारा क्या कर्तव्य है, इसका निश्चय तुम्हें कर लेना चाहिये
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे चतुस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३४ ॥