शूर्पणखाका रावणको फटकारना
॥ ३ · ३३ · २३–२४ ॥
लङ्कायाः सभायां मन्त्रिमध्ये सिंहासनस्थं रावणं शूर्पणखा दर्पयुक्ता तर्जयति, एकाम् अङ्गुलिं प्रसार्य तं प्रमत्तं विषयासक्तं राजानम् आक्षिपति, स च निजदोषान् विचारयन् चिन्तामग्नो भ्रूभङ्गं करोति।
लङ्का की सभा में मन्त्रियों के बीच सिंहासन पर बैठे रावण को शूर्पणखा तिरस्कारभरी मुद्रा में फटकार रही है; एक पंजेदार अँगुली उठाकर वह उसे भोग-मत्त, असावधान राजा कहकर लताड़ती है, और वह अपने दोषों पर विचार करता हुआ भौंहें ताने चिन्तित दृष्टि से घूर रहा है।
In Lanka's council-hall Shurpanakha stands before the enthroned Ravana and lashes him with scorn, one clawed finger thrust out as she brands him a heedless, pleasure-drunk king, while he sits amid his ministers, brow darkening into a long brooding stare as he weighs his own faults.
tataḥ śūrpaṇakhā dīnā rāvaṇaṁ lokarāvaṇam।
amātyamadhye saṁkruddhā paruṣaṁ vākyamabravīt॥
उस समय शूर्पणखा श्रीराम से तिरस्कृत होने के कारण बहुत दुःखी थी। उसने मन्त्रियों के बीच में बैठे हुए समस्त लोकों को रुलानेवाले रावण से अत्यन्त कुपित होकर कठोर वाणी में कहा—
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pramattaḥ kāmabhogeṣu svairavṛtto niraṅkuśaḥ।
samutpannaṁ bhayaṁ ghoraṁ boddhavyaṁ nāvabudhyase॥
‘राक्षसराज! तुम स्वेच्छाचारी और निरङ्कुश होकर विषय-भोगों में मतवाले हो रहे हो। तुम्हारे लिये घोर भय उत्पन्न हो गया है। तुम्हें इसकी जानकारी होनी चाहिये थी, किंतु तुम इसके विषय में कुछ नहीं जानते हो।
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saktaṁ grāmyeṣu bhogeṣu kāmavṛttaṁ mahīpatim।
lubdhaṁ na bahu manyante śmaśānāgnimiva prajāḥ॥
‘जो राजा निम्न श्रेणी के भोगों में आसक्त हो स्वेच्छाचारी और लोभी हो जाता है, उसे मरघट की आग के समान हेय मानकर प्रजा उसका अधिक आदर नहीं करती है।
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svayaṁ kāryāṇi yaḥ kāle nānutiṣṭhati pārthivaḥ।
sa tu vai saha rājyena taiśca kāryairvinaśyati॥
‘जो राजा ठीक समय पर स्वयं ही अपने कार्यों का सम्पादन नहीं करता है, वह राज्य और उन कार्यों के साथ ही नष्ट हो जाता है।
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ayuktacāraṁ durdarśamasvādhīnaṁ narādhipam।
varjayanti narā dūrānnadīpaṅkamiva dvipāḥ॥
‘जो राज्य की देखभाल के लिये गुप्तचरों को नियुक्त नहीं करता है, प्रजाजनों को जिसका दर्शन दुर्लभ हो जाता है और कामिनी आदि भोगों में आसक्त होने के कारण अपनी स्वाधीनता खो बैठता है, ऐसे राजा को प्रजा दूर से ही त्याग देती है। ठीक उसी तरह, जैसे हाथी नदी की कीचड़ से दूर ही रहते हैं।
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ye na rakṣanti viṣayamasvādhīnaṁ narādhipāḥ।
te na vṛddhyā prakāśante girayaḥ sāgare yathā॥
जो नरेश अपने राज्य के उस प्रान्त की, जो अपनी ही असावधानी के कारण दूसरे के अधिकार में चला गया हो, रक्षा नहीं करते—उसे पुनः अपने अधिकार में नहीं लाते, वे समुद्र में डूबे हुए पर्वतों की भाँति अपने अभ्युदय से प्रकाशित नहीं होते हैं।
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ātmavadbhirvigṛhya tvaṁ devagandharvadānavaiḥ।
ayuktacāraścapalaḥ kathaṁ rājā bhaviṣyasi॥
‘जो अपने मन को काबू में रखनेवाले एवं प्रयत्नशील हैं, उन देवताओं, गन्धर्वों तथा दानवों के साथ विरोध करके तुमने अपने राज्य की देखभाल के लिये गुप्तचर नहीं नियुक्त किये हैं, ऐसी दशा में तुम-जैसा विषयलोलुप चपल पुरुष कैसे राजा बना रह सकेगा?
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tvaṁ tu bālasvabhāvaśca buddhihīnaśca rākṣasa।
jñātavyaṁ tanna jānīṣe kathaṁ rājā bhaviṣyasi॥
‘राक्षस! तुम्हारा स्वभाव बालकों-जैसा है। तुम निरे बुद्धिहीन हो। तुम्हें जाननेयोग्य बातों का भी ज्ञान नहीं है। ऐसी दशा में तुम किस तरह राजा बने रह सकोगे?
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yeṣāṁ cārāśca kośaśca nayaśca jayatāṁ vara।
asvādhīnā narendrāṇāṁ prākṛtaiste janaiḥ samāḥ॥
‘विजयी वीरों में श्रेष्ठ निशाचरपते! जिन नरेशों के गुप्तचर, कोष और नीति—ये सब अपने अधीन नहीं हैं, वे साधारण लोगों के ही समान हैं।
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yasmāt paśyanti dūrasthān sarvānarthān narādhipāḥ।
cāreṇa tasmāducyante rājāno dīrghacakṣuṣaḥ॥
‘गुप्तचरों की सहायता से राजालोग दूर-दूर के सारे कार्यों की देखभाल करते रहते हैं, इसीलिये वे दीर्घदर्शी या दूरदर्शी कहलाते हैं।
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ayuktacāraṁ manye tvāṁ prākṛtaiḥ sacivairyutaḥ।
svajanaṁ ca janasthānaṁ nihataṁ nāvabudhyase॥
‘मैं समझती हूँ, तुम गवाँर मन्त्रियों से घिरे हुए हो, तभी तो तुमने अपने राज्य के भीतर गुप्तचर नहीं तैनात किये हैं। तुम्हारे स्वजन मारे गये और जनस्थान उजाड़ हो गया, फिर भी तुम्हें इसका पता नहीं लगा है।
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caturdaśa sahasrāṇi rakṣasāṁ bhīmakarmaṇām।
hatānyekena rāmeṇa kharaśca sahadūṣaṇaḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
ṛṣīṇāmabhayaṁ dattaṁ kṛtakṣemāśca daṇḍakāḥ।
dharṣitaṁ ca janasthānaṁ rāmeṇākliṣṭakāriṇā॥
‘अकेले राम ने, जो अनायास ही महान् कर्म करनेवाले हैं, भीमकर्मा राक्षसों की चौदह हजार सेना को यमलोक पहुँचा दिया, खर और दूषण के भी प्राण ले लिये, ऋषियों को भी अभयदान कर दिया तथा दण्डकारण्य में राक्षसों की ओर से जो विघ्न-बाधाएँ थीं, उन सबको दूर करके वहाँ शान्ति स्थापित कर दी। जनस्थान को तो उन्होंने चौपट ही कर डाला।
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tvaṁ tu lubdhaḥ pramattaśca parādhīnaśca rākṣasa।
viṣaye sve samutpannaṁ yad bhayaṁ nāvabudhyase॥
‘राक्षस! तुम तो लोभ और प्रमाद में फँसकर पराधीन हो रहे हो, अतः अपने ही राज्य में उत्पन्न हुए भय का तुम्हें कुछ पता ही नहीं है।
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tīkṣṇamalpapradātāraṁ pramattaṁ garvitaṁ śaṭham।
vyasane sarvabhūtāni nābhidhāvanti pārthivam॥
‘जो राजा कठोरतापूर्ण बर्ताव करता अथवा तीखे स्वभाव का परिचय देता है, सेवकों को बहुत कम वेतन देता है, प्रमाद में पड़ा और गर्व में भरा रहता है तथा स्वभाव से ही शठ होता है, उसके संकट में पड़ने पर सभी प्राणी उसका साथ छोड़ देते हैं—उसकी सहायता के लिये आगे नहीं बढ़ते हैं।
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atimāninamagrāhyamātmasambhāvitaṁ naram।
krodhanaṁ vyasane hanti svajano'pi narādhipam॥
‘जो अत्यन्त अभिमानी, अपनाने के अयोग्य, आप ही अपनेको बहुत बड़ा माननेवाला और क्रोधी होता है, ऐसे नर अथवा नरेश को संकटकाल में आत्मीय जन भी मार डालते हैं।
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nānutiṣṭhati kāryāṇi bhayeṣu na bibheti ca।
kṣipraṁ rājyāccyuto dīnastṛṇaistulyo bhavediha॥
‘जो राजा अपने कर्तव्य का पालन अथवा करनेयोग्य कार्यों का सम्पादन नहीं करता तथा भय के अवसरों पर भयभीत (एवं अपनी रक्षा के लिये सावधान) नहीं होता, वह शीघ्र ही राज्य से भ्रष्ट एवं दीन होकर इस भूतल पर तिनकों के समान उपेक्षणीय हो जाता है।
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śuṣkakāṣṭhairbhavet kāryaṁ loṣṭhairapi ca pāṁsubhiḥ।
na tu sthānāt paribhraṣṭaiḥ kāryaṁ syād vasudhādhipaiḥ॥
‘लोगों को सूखे काठों से, मिट्टी के ढेलों तथा धूल से भी कुछ प्रयोजन होता है, किंतु स्थानभ्रष्ट राजाओं से उन्हें कोई प्रयोजन नहीं रहता।
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upabhuktaṁ yathā vāsaḥ srajo vā mṛditā yathā।
evaṁ rājyāt paribhraṣṭaḥ samartho'pi nirarthakaḥ॥
‘जैसे पहना हुआ वस्त्र और मसल डाली गयी फूलों की माला दूसरों के उपयोग में आनेयोग्य नहीं होती, इसी प्रकार राज्य से भ्रष्ट हुआ राजा समर्थ होने पर भी दूसरों के लिये निरर्थक है।
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apramattaśca yo rājā sarvajño vijitendriyaḥ।
kṛtajño dharmaśīlaśca sa rājā tiṣṭhate ciram॥
‘परंतु जो राजा सदा सावधान रहता, राज्य के समस्त कार्यों की जानकारी रखता, इन्द्रियों को वश में किये रहता, कृतज्ञ (दूसरों के उपकार को माननेवाला) तथा स्वभाव से ही धर्मपरायण होता है, वह राजा बहुत दिनोंतक राज्य करता है।
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nayanābhyāṁ prasupto vā jāgarti nayacakṣuṣā।
vyaktakrodhaprasādaśca sa rājā pūjyate janaiḥ॥
‘जो स्थूल आँखों से तो सोता है, परंतु नीति की आँखों से सदा जागता रहता है तथा जिसके क्रोध और अनुग्रह का फल प्रत्यक्ष प्रकट होता है, उसी राजा की लोग पूजा करते हैं।
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tvaṁ tu rāvaṇa durbuddhirguṇairetairvivarjitaḥ।
yasya te'viditaścārai rakṣasāṁ sumahān vadhaḥ॥
‘रावण! तुम्हारी बुद्धि दूषित है और तुम इन सभी राजोचित गुणों से वञ्चित हो; क्योंकि तुम्हें अबतक गुप्तचरों की सहायता से राक्षसों के इस महान् संहार का समाचार ज्ञात नहीं हो सका था।
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parāvamantā viṣayeṣu saṅgavān na deśakālapravibhāgatattvavit।
ayuktabuddhirguṇadoṣaniścaye vipannarājyo na cirād vipatsyase॥
‘तुम दूसरों का अनादर करनेवाले, विषयासक्त और देश-काल के विभाग को यथार्थरूप से न जाननेवाले हो, तुमने गुण और दोष के विचार एवं निश्चय में कभी अपनी बुद्धि को नहीं लगाया है, अतः तुम्हारा राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जायगा और तुम स्वयं भी भारी विपत्ति में पड़ जाओगे’
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iti svadoṣān parikīrtitāṁstathā samīkṣya buddhyā kṣaṇadācareśvaraḥ।
dhanena darpeṇa balena cānvito vicintayāmāsa ciraṁ sa rāvaṇaḥ॥
शूर्पणखा के द्वारा कहे गये अपने दोषों पर बुद्धिपूर्वक विचार करके धन, अभिमान और बल से सम्पन्न वह निशाचर रावण बहुत देरतक सोच-विचार एवं चिन्ता में पड़ा रहा।
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रयस्त्रिंशः सर्गः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३३ ॥