शूर्पणखाका लंकामें रावणके पास जाना
॥ ३ · ३२ · २४–२५ ॥
लङ्कायाः स्वर्णप्रासादे मन्त्रिपरिवृते दीप्ते काञ्चनसिंहासने रावणे स्थिते, विकृतमुखी नष्टनासाभरणा शूर्पणखा त्रस्ता तत्पुरतो नमति, हस्तौ प्रसार्य स्वं दुःखं निवेदयितुम् उद्यता।
लङ्का के स्वर्णमहल में मन्त्रियों से घिरे, सूर्य-समान दीप्त सुवर्ण-सिंहासन पर रावण विराजमान है; उसके सामने कटी नाक-कानोंवाली, नथ और कर्णाभूषण से रहित, फटी नीली साड़ीवाली शूर्पणखा भय से काँपती हुई झुककर पंजे उठाए अपनी करुण कथा कहने को तत्पर है।
Enthroned on a sun-bright golden seat and ringed by his ministers, Ravana sits in Lanka's palace, while before him the disfigured Shurpanakha — her nose-ring and ear-ornaments gone, her torn teal sari dust-grey — sinks down trembling and lifts her clawed hands to pour out her tale.
tataḥ śūrpaṇakhā dṛṣṭvā sahasrāṇi caturdaśa।
hatānyekena rāmeṇa rakṣasāṁ bhīmakarmaṇām॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
dūṣaṇaṁ ca kharaṁ caiva hataṁ triśirasaṁ raṇe।
dṛṣṭvā punarmahānādān nanāda jaladopamā॥
उधर शूर्पणखा ने जब देखा कि श्रीराम ने भयंकर कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसों को अकेले ही मार गिराया तथा युद्ध के मैदान में दूषण, खर और त्रिशिरा को भी मौत के घाट उतार दिया, तब वह शोक के कारण मेघ-गर्जना के समान पुनः बड़े जोर-जोर से घोर चीत्कार करने लगी
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sā dṛṣṭvā karma rāmasya kṛtamanyaiḥ suduṣkaram।
jagāma paramodvignā laṅkāṁ rāvaṇapālitām॥
श्रीराम ने वह कर्म कर दिखाया, जो दूसरों के लिये अत्यन्त दुष्कर है; यह अपनी आँखों देखकर वह अत्यन्त उद्विग्न हो उठी और रावणद्वारा सुरक्षित लंकापुरी को गयी
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sā dadarśa vimānāgre rāvaṇaṁ dīptatejasam।
upopaviṣṭaṁ sacivairmarudbhiriva vāsavam॥
वहाँ पहुँचकर उसने देखा, रावण पुष्पक विमान (या सतमहले मकान) के ऊपरी भाग में बैठा हुआ है। उसका राजोचित तेज उद्दीप्त हो रहा है तथा मरुद्गणों से घिरे हुए इन्द्र की भाँति वह आस-पास बैठे हुए मन्त्रियों से घिरा है
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āsīnaṁ sūryasaṁkāśe kāñcane paramāsane।
rukmavedigataṁ prājyaṁ jvalantamiva pāvakam॥
रावण जिस उत्तम सुवर्णमय सिंहासन पर विराजमान था, वह सूर्य के समान जगमगा रहा था। जैसे सोने की ईंटों से बनी हुई वेदी पर स्थापित अग्निदेव घी की अधिक आहुति पाकर प्रज्वलित हो उठे हों, उसी प्रकार उस स्वर्णसिंहासन पर रावण शोभा पा रहा था
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devagandharvabhūtānāmṛṣīṇāṁ ca mahātmanām।
ajeyaṁ samare ghoraṁ vyāttānanamivāntakam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
devāsuravimardeṣu vajrāśanikṛtavraṇam।
airāvataviṣāṇāgrairutkṛṣṭakiṇavakṣasam॥
देवता, गन्धर्व, भूत और महात्मा ऋषि भी उसे जीतने में असमर्थ थे। समरभूमि में वह मुँह फैलाकर खड़े हुए यमराज की भाँति भयानक जान पड़ता था। देवताओं और असुरों के संग्राम के अवसरों पर उसके शरीर में वज्र और अशनि के जो घाव हुए थे, उनके चिह्न अबतक विद्यमान थे। उसकी छाती में ऐरावत हाथी ने जो अपने दाँत गड़ाये थे, उसके निशान अब भी दिखायी देते थे
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viṁśadbhujaṁ daśagrīvaṁ darśanīyaparicchadam।
viśālavakṣasaṁ vīraṁ rājalakṣaṇalakṣitam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
naddhavaidūryasaṁkāśaṁ taptakāñcanabhūṣaṇam।
subhujaṁ śukladaśanaṁ mahāsyaṁ parvatopamam॥
उसके बीस भुजाएँ और दस मस्तक थे। उसके छत्र, चँवर और आभूषण आदि उपकरण देखने ही योग्य थे। वक्षःस्थल विशाल था। वह वीर राजोचित लक्षणों से सम्पन्न दिखायी देता था। वह अपने शरीर में जो वैदूर्यमणि (नीलम) का आभूषण पहने हुए था, उसके समान ही उसके शरीर की कान्ति भी थी। उसने तपाये हुए सोने के आभूषण भी पहन रखे थे। उसकी भुजाएँ सुन्दर, दाँत सफेद, मुँह बहुत बड़ा और शरीर पर्वत के समान विशाल था
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viṣṇucakranipātaiśca śataśo devasaṁyuge।
anyaiḥ śastraiḥ prahāraiśca mahāyuddheṣu tāḍitam॥
देवताओं के साथ युद्ध करते समय उसके अङ्गों पर सैकड़ों बार भगवान् विष्णु के चक्र का प्रहार हुआ था। बड़े-बड़े युद्धों में अन्यान्य अस्त्र-शस्त्रों की भी उसपर मार पड़ी थी (उन सबके चिह्न दृष्टिगोचर होते थे)
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ahatāṅgaiḥ samastaistaṁ devapraharaṇaistadā।
akṣobhyāṇāṁ samudrāṇāṁ kṣobhaṇaṁ kṣiprakāriṇam॥
देवताओं के समस्त आयुधों के प्रहारों से भी जो खण्डित न हो सके थे, उन्हीं अङ्गों से वह अक्षोभ्य समुद्रों में भी क्षोभ (हलचल) पैदा कर देता था। वह सभी कार्य बड़ी शीघ्रता से करता था
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kṣeptāraṁ parvatāgrāṇāṁ surāṇāṁ ca pramardanam।
ucchettāraṁ ca dharmāṇāṁ paradārābhimarśanam॥
पर्वतशिखरों को भी तोड़कर फेंक देता था, देवताओं को भी रौंद डालता था। धर्म की तो वह जड़ ही काट देता था और परायी स्त्रियों के सतीत्व का नाश करनेवाला था
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sarvadivyāstrayoktāraṁ yajñavighnakaraṁ sadā।
purīṁ bhogavatīṁ gatvā parājitya ca vāsukim॥
takṣakasya priyāṁ bhāryāṁ parājitya jahāra yaḥ।
वह सब प्रकार के दिव्यास्त्रों का प्रयोग करनेवाला और सदा यज्ञों में विघ्न डालनेवाला था। एक समय पाताल की भोगवती पुरी में जाकर नागराज वासुकि को परास्त करके तक्षक को भी हराकर उसकी प्यारी पत्नी को वह हर ले आया था
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kailāsaṁ parvataṁ gatvā vijitya naravāhanam॥
vimānaṁ puṣpakaṁ tasya kāmagaṁ vai jahāra yaḥ।
इसी तरह कैलास पर्वत पर जाकर कुबेर को युद्ध में पराजित करके उसने उनके इच्छानुसार चलनेवाले पुष्पकविमान को अपने अधिकार में कर लिया
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vanaṁ caitrarathaṁ divyaṁ nalinīṁ nandanaṁ vanam॥
vināśayati yaḥ krodhād devodyānāni vīryavān।
वह पराक्रमी निशाचर क्रोधपूर्वक कुबेर के दिव्य चैत्ररथ वन को, सौगन्धिक कमलों से युक्त नलिनी नामवाली पुष्करिणी को, इन्द्र के नन्दनवन को तथा देवताओं के दूसरे-दूसरे उद्यानों को नष्ट करता रहता था
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candrasūryau mahābhāgāvuttiṣṭhantau paraṁtapau॥
nivārayati bāhubhyāṁ yaḥ śailaśikharopamaḥ।
वह पर्वत-शिखर के समान आकार धारण करके शत्रुओं को संताप देनेवाले महाभाग चन्द्रमा और सूर्य को उनके उदयकाल में अपने हाथों से रोक देता था
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daśavarṣasahasrāṇi tapastaptvā mahāvane॥
purā svayaṁbhuve dhīraḥ śirāṁsyupajahāra yaḥ।
उस धीर स्वभाववाले रावण ने पूर्वकाल में एक विशाल वन के भीतर दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करके ब्रह्माजी को अपने मस्तकों की बलि दे दी थी
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devadānavagandharvapiśācapatagoragaiḥ॥
abhayaṁ yasya saṁgrāme mṛtyuto mānuṣādṛte।
उसके प्रभाव से उसे देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और सर्पों से भी संग्राम में अभय प्राप्त हो गया था। मनुष्य के सिवा और किसीके हाथ से उसे मृत्यु का भय नहीं था
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mantrairabhiṣṭutaṁ puṇyamadhvareṣu dvijātibhiḥ॥
havirdhāneṣu yaḥ somamupahanti mahābalaḥ।
वह महाबली राक्षस सोमसवनकर्मविशिष्ट यज्ञों में द्विजातियोंद्वारा वेदमन्त्रों के उच्चारणपूर्वक निकाले गये तथा वैदिक मन्त्रों से ही सुसंस्कृत एवं स्तुत हुए पवित्र सोमरस को वहाँ पहुँचकर नष्ट कर देता था
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prāptayajñaharaṁ duṣṭaṁ brahmaghnaṁ krūrakāriṇam॥
karkaśaṁ niranukrośaṁ prajānāmahite ratam।
समाप्ति के निकट पहुँचे हुए यज्ञों का विध्वंस करनेवाला वह दुष्ट निशाचर ब्राह्मणों की हत्या तथा दूसरे-दूसरे क्रूर कर्म करता था। वह बड़े ही रूखे स्वभाव का और निर्दय था। सदा प्रजाजनों के अहित में ही लगा रहता था
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rāvaṇaṁ sarvabhūtānāṁ sarvalokabhayāvaham॥
rākṣasī bhrātaraṁ krūraṁ sā dadarśa mahābalam।
समस्त लोकों को भय देनेवाले और सम्पूर्ण प्राणियों को रुलानेवाले अपने इस महाबली क्रूर भाई को राक्षसी शूर्पणखा ने उस समय देखा
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taṁ divyavastrābharaṇaṁ divyamālyopaśobhitam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
āsane sūpaviṣṭaṁ taṁ kāle kālamivodyatam।
rākṣasendraṁ mahābhāgaṁ paulastyakulanandanam॥
वह दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से विभूषित था। दिव्य पुष्पों की मालाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। सिंहासन पर बैठा हुआ राक्षसराज पुलस्त्यकुलनन्दन महाभाग दशग्रीव प्रलयकाल में संहार के लिये उद्यत हुए महाकाल के समान जान पड़ता था
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upagamyābravīd vākyaṁ rākṣasī bhayavihvalā।
rāvaṇaṁ śatruhantāraṁ mantribhiḥ parivāritam॥
मन्त्रियों से घिरे हुए शत्रुहन्ता भाई रावण के पास जाकर भय से विह्वल हुई वह राक्षसी कुछ कहने को उद्यत हुई
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tamabravīd dīptaviśālalocanaṁ
pradarśayitvā bhayalobhamohitā।
sudāruṇaṁ vākyamabhītacāriṇī
mahātmanā śūrpaṇakhā virūpitā॥
महात्मा लक्ष्मण ने नाक-कान काटकर जिसे कुरूप कर दिया था तथा जो निर्भय विचरनेवाली थी, वह भय और लोभ से मोहित हुई शूर्पणखा बड़े-बड़े चमकीले नेत्रोंवाले अत्यन्त क्रूर रावण को अपनी दुर्दशा दिखाकर उससे बोली
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वात्रिंशः सर्गः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३२ ॥