वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः २७ · २० श्लोकाःSarga 27 · 20 ślokas

त्रिशिराका वध

अरण्यकाण्डम् · सर्गः २७ — painting

॥ ३ · २७ · १६–१७ ॥

जनस्थानरणभूमौ एकाकी पादचारी नीलवर्णो रामो मण्डलाकृष्टधनुस्त्रीन् शरान् एकयैव मुक्त्या क्षिपति; पुरतस्त्रिशिरा नाम त्रिशीर्षः षड्भुजो राक्षससेनापतिः प्रत्येकशिरसि लोहशिरस्त्राणधरो भग्नरथादुत्प्लुत्य विवशायुधस्त्रिशृङ्गपर्वतवद् भूमौ पतति; समीपे भग्नो रथः, पतिताश्वाः, छिन्नध्वजश्च, दूरे भग्ना राक्षससेना पलायते।

जनस्थान की रणभूमि में अकेले पैदल खड़े नीलवर्ण श्रीराम अपने धनुष को मण्डलाकार खींचकर एक ही बार में तीन बाण छोड़ते हैं; सामने तीन सिर और छह भुजाओंवाला सेनापति त्रिशिरा — हर सिर पर लोहे का टोप — अपने टूटे रथ से कूदकर, हथियार हाथ से छूटते हुए, त्रिशृंग पर्वत-सा धराशायी हो रहा है; पास ही उसका चूर हुआ रथ, गिरे घोड़े और कटी ध्वजा पड़े हैं, और दूर पर टूटी हुई राक्षस-सेना भाग रही है।

On the Janasthan battlefield the lone blue-hued Ram, on foot, bends his bow into a full circle and looses three arrows in a single flight; before him the three-headed, six-armed general Trishiras — an iron helm on each head — has leapt from his shattered chariot and, his weapons struck from his grip, topples earthward like a three-peaked mountain; his wrecked chariot, fallen horses and severed banner lie close by, while far behind the broken demon host flees.

॥ ३ · २७ · १ ॥
खरं तु रामाभिमुखं प्रयान्तं वाहिनीपतिः। राक्षसस्त्रिशिरा नाम संनिपत्येदमब्रवीत्॥

kharaṁ tu rāmābhimukhaṁ prayāntaṁ vāhinīpatiḥ।
rākṣasastriśirā nāma saṁnipatyedamabravīt॥

खर को भगवान् श्रीराम के सम्मुख जाते देख सेनापति राक्षस त्रिशिरा तुरंत उसके पास आ पहुँचा और इस प्रकार बोला—

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॥ ३ · २७ · २ ॥
मां नियोजय विक्रान्तं त्वं निवर्तस्व साहसात्। पश्य रामं महाबाहुं संयुगे विनिपातितम्॥

māṁ niyojaya vikrāntaṁ tvaṁ nivartasva sāhasāt।
paśya rāmaṁ mahābāhuṁ saṁyuge vinipātitam॥

‘राक्षसराज! मुझ पराक्रमी वीर को इस युद्ध में लगाइये और स्वयं इस साहसपूर्ण कार्य से अलग रहिये। देखिये, मैं अभी महाबाहु राम को युद्ध में मार गिराता हूँ

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॥ ३ · २७ · ३ ॥
प्रतिजानामि ते सत्यमायुधं चाहमालभे। यथा रामं वधिष्यामि वधार्हं सर्वरक्षसाम्॥

pratijānāmi te satyamāyudhaṁ cāhamālabhe।
yathā rāmaṁ vadhiṣyāmi vadhārhaṁ sarvarakṣasām॥

‘आपके सामने मैं सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ और अपने हथियार छूकर शपथ खाता हूँ कि जो समस्त राक्षसों के लिये वध के योग्य हैं, उन राम का मैं अवश्य वध करूँगा

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॥ ३ · २७ · ४ ॥
अहं वास्य रणे मृत्युरेष वा समरे मम। विनिवर्त्य रणोत्साहं मुहूर्तं प्राश्निको भव॥

ahaṁ vāsya raṇe mṛtyureṣa vā samare mama।
vinivartya raṇotsāhaṁ muhūrtaṁ prāśniko bhava॥

‘इस युद्ध में या तो मैं इनकी मृत्यु बनूँगा, या ये ही समराङ्गण में मेरी मृत्यु का कारण होंगे। आप इस समय अपने युद्धविषयक उत्साह को रोककर एक मुहूर्त के लिये जय-पराजय का निर्णय करनेवाले साक्षी बन जाइये

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॥ ३ · २७ · ५ ॥
प्रहष्टो वा हते रामे जनस्थानं प्रयास्यसि। मयि वा निहते रामं संयुगाय प्रयास्यसि॥

prahaṣṭo vā hate rāme janasthānaṁ prayāsyasi।
mayi vā nihate rāmaṁ saṁyugāya prayāsyasi॥

‘यदि मेरे द्वारा राम मारे गये तो आप प्रसन्नतापूर्वक जनस्थान को लौट जाइये अथवा यदि राम ने ही मुझे मार दिया तो आप युद्ध के लिये इन पर धावा बोल दीजियेगा’

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॥ ३ · २७ · ६ ॥
खरस्त्रिशिरसा तेन मृत्युलोभात् प्रसादितः। गच्छ युध्येत्यनुज्ञातो राघवाभिमुखो ययौ॥

kharastriśirasā tena mṛtyulobhāt prasāditaḥ।
gaccha yudhyetyanujñāto rāghavābhimukho yayau॥

भगवान् के हाथ से मृत्यु का लोभ होने के कारण जब त्रिशिरा ने इस प्रकार खर को राजी किया, तब उसने आज्ञा दे दी—‘अच्छा जाओ, युद्ध करो।’ आज्ञा पाकर वह श्रीरामचन्द्रजी की ओर चला

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॥ ३ · २७ · ७ ॥
त्रिशिरास्तु रथेनैव वाजियुक्तेन भास्वता। अभ्यद्रवद् रणे रामं त्रिशृङ्ग इव पर्वतः॥

triśirāstu rathenaiva vājiyuktena bhāsvatā।
abhyadravad raṇe rāmaṁ triśṛṅga iva parvataḥ॥

घोड़े जुते हुए एक तेजस्वी रथ के द्वारा त्रिशिरा ने रणभूमि में श्रीराम पर आक्रमण किया। उस समय वह तीन शिखरोंवाले पर्वत के समान जान पड़ता था

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॥ ३ · २७ · ८ ॥
शरधारासमूहान् महामेघ इवोत्सृजन्। व्यसृजत् सदृशं नादं जलार्द्रस्येव दुन्दुभेः॥

śaradhārāsamūhān sa mahāmegha ivotsṛjan।
vyasṛjat sadṛśaṁ nādaṁ jalārdrasyeva dundubheḥ॥

उसने आते ही बड़े भारी मेघ की भाँति बाणरूपी धाराओं की वर्षा प्रारम्भ कर दी और वह जल से भीगे हुए नगाड़े की तरह विकट गर्जना करने लगा

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॥ ३ · २७ · ९ ॥
आगच्छन्तं त्रिशिरसं राक्षसं प्रेक्ष्य राघवः। धनुषा प्रतिजग्राह विधुन्वन् सायकान् शितान्॥

āgacchantaṁ triśirasaṁ rākṣasaṁ prekṣya rāghavaḥ।
dhanuṣā pratijagrāha vidhunvan sāyakān śitān॥

त्रिशिरा नामक राक्षस को आते देख श्रीरघुनाथजी ने धनुष के द्वारा पैने बाण छोड़ते हुए उसे अपने प्रतिद्वन्द्वी के रूप में ग्रहण किया (अथवा उसे आगे बढ़ने से रोक दिया)

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॥ ३ · २७ · १० ॥
सम्प्रहारस्तुमुलो रामत्रिशिरसोस्तदा। सम्बभूवातिबलिनोः सिंहकुञ्जरयोरिव॥

sa samprahārastumulo rāmatriśirasostadā।
sambabhūvātibalinoḥ siṁhakuñjarayoriva॥

अत्यन्त बलशाली श्रीराम और त्रिशिरा का वह संग्राम महाबली सिंह और गजराज के युद्ध की भाँति बड़ा भयंकर प्रतीत होता था

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॥ ३ · २७ · ११ ॥
ततस्त्रिशिरसा बाणैर्ललाटे ताडितस्त्रिभिः। अमर्षी कुपितो रामः संरब्ध इदमब्रवीत्॥

tatastriśirasā bāṇairlalāṭe tāḍitastribhiḥ।
amarṣī kupito rāmaḥ saṁrabdha idamabravīt॥

उस समय त्रिशिरा ने तीन बाणों से श्रीरामचन्द्रजी के ललाट को बींध डाला। श्रीराम उसकी यह उद्दण्डता सहन न कर सके। वे कुपित हो रोषावेश में भरकर इस प्रकार बोले—

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॥ ३ · २७ · १२ ॥
अहो विक्रमशूरस्य राक्षसस्येदृशं बलम्। पुष्पैरिव शरैर्योऽहं ललाटेऽस्मि परिक्षतः॥ ममापि प्रतिगृह्णीष्व शरांश्चापगुणाच्च्युतान्।

aho vikramaśūrasya rākṣasasyedṛśaṁ balam।
puṣpairiva śarairyo'haṁ lalāṭe'smi parikṣataḥ॥
mamāpi pratigṛhṇīṣva śarāṁścāpaguṇāccyutān।

‘अहो! पराक्रम प्रकट करने में शूरवीर राक्षस का ऐसा ही बल है, जो तुमने फूलों-जैसे बाणोंद्वारा मेरे ललाट पर प्रहार किया है। अच्छा, अब धनुष की डोरी से छूटे हुए मेरे बाणों को भी ग्रहण करो’

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॥ ३ · २७ · १३ ॥
एवमुक्त्वा सुसंरब्धः शरानाशीविषोपमान्॥ त्रिशिरोवक्षसि क्रुद्धो निजघान चतुर्दश।

evamuktvā susaṁrabdhaḥ śarānāśīviṣopamān॥
triśirovakṣasi kruddho nijaghāna caturdaśa।

ऐसा कहकर रोष में भरे हुए श्रीराम ने त्रिशिरा की छाती में क्रोधपूर्वक चौदह बाण मारे, जो विषधर सर्पों के समान भयंकर थे

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॥ ३ · २७ · १४ ॥
चतुर्भिस्तुरगानस्य शरैः संनतपर्वभिः॥

caturbhisturagānasya śaraiḥ saṁnataparvabhiḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · २७ · १५ ॥
न्यपातयत तेजस्वी चतुरस्तस्य वाजिनः। अष्टभिः सायकैः सूतं रथोपस्थे न्यपातयत्॥

nyapātayata tejasvī caturastasya vājinaḥ।
aṣṭabhiḥ sāyakaiḥ sūtaṁ rathopasthe nyapātayat॥

॥ १४–१५ ॥

तदनन्तर तेजस्वी रघुनाथजी ने झुकी गाँठवाले चार बाणों से उसके चारों घोड़ों को मार गिराया। फिर आठ सायकोंद्वारा उसके सारथि को भी रथ की बैठक में ही सुला दिया

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॥ ३ · २७ · १६ ॥
रामश्चिच्छेद बाणेन ध्वजं चास्य समुच्छ्रितम्। ततो हतरथात् तस्मादुत्पतन्तं निशाचरम्॥ चिच्छेद रामस्तं बाणैर्हृदये सोऽभवज्जडः।

rāmaściccheda bāṇena dhvajaṁ cāsya samucchritam।
tato hatarathāt tasmādutpatantaṁ niśācaram॥
ciccheda rāmastaṁ bāṇairhṛdaye so'bhavajjaḍaḥ।

इसके बाद श्रीराम ने एक बाण से उसकी ध्वजा भी काट डाली। तदनन्तर जब वह उस नष्ट हुए रथ से कूदने लगा, उसी समय श्रीराघवेन्द्र ने अनेक बाणोंद्वारा उस निशाचर की छाती छेद डाली। फिर तो वह जडवत् हो गया

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॥ ३ · २७ · १७ ॥
सायकैश्चाप्रमेयात्मा सामर्षस्तस्य रक्षसः॥ शिरांस्यपातयत् त्रीणि वेगवद्भिस्त्रिभिः शरैः।

sāyakaiścāprameyātmā sāmarṣastasya rakṣasaḥ॥
śirāṁsyapātayat trīṇi vegavadbhistribhiḥ śaraiḥ।

इसके बाद अप्रमेयस्वरूप श्रीराम ने अमर्ष में भरकर तीन वेगशाली एवं विनाशकारी बाणोंद्वारा उस राक्षस के तीनों मस्तक काट गिराये

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॥ ३ · २७ · १८ ॥
धूमशोणितोद्गारी रामबाणाभिपीडितः॥ न्यपतत् पतितैः पूर्वं समरस्थो निशाचरः।

sa dhūmaśoṇitodgārī rāmabāṇābhipīḍitaḥ॥
nyapatat patitaiḥ pūrvaṁ samarastho niśācaraḥ।

समराङ्गण में खड़ा हुआ वह निशाचर श्रीरामचन्द्रजी के बाणों से पीड़ित हो अपने धड़ से भापसहित रुधिर उगलता हुआ पहले गिरे हुए मस्तकों के साथ ही धराशायी हो गया

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॥ ३ · २७ · १९ ॥
हतशेषास्ततो भग्ना राक्षसाः खरसंश्रयाः॥ द्रवन्ति स्म तिष्ठन्ति व्याघ्रत्रस्ता मृगा इव।

hataśeṣāstato bhagnā rākṣasāḥ kharasaṁśrayāḥ॥
dravanti sma na tiṣṭhanti vyāghratrastā mṛgā iva।

तत्पश्चात् खर की सेवा में रहनेवाले राक्षस, जो मरने से बचे हुए थे, भाग खड़े हुए। वे व्याघ्र से डरे हुए मृगों के समान भागते ही चले जाते थे, खड़े नहीं होते थे

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॥ ३ · २७ · २० ॥
तान् खरो द्रवतो दृष्ट्वा निवर्त्य रुषितस्त्वरन्। राममेवाभिदुद्राव राहुश्चन्द्रमसं यथा॥

tān kharo dravato dṛṣṭvā nivartya ruṣitastvaran।
rāmamevābhidudrāva rāhuścandramasaṁ yathā॥

उन्हें भागते देख रोष में भरे हुए खर ने तुरंत लौटाया और जैसे राहु चन्द्रमा पर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उसने श्रीराम पर ही धावा किया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे सप्तविंशः सर्गः ॥ २७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सत्ताईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २७ ॥