वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः २२ · २४ श्लोकाःSarga 22 · 24 ślokas

चौदह हजार राक्षसोंकी सेनाके साथ खर-दूषणका जनस्थानसे पञ्चवटीकी ओर प्रस्थान

अरण्यकाण्डम् · सर्गः २२ — painting

॥ ३ · २२ · १६–१७ ॥

जनस्थानाद्रामाश्रमं प्रति युद्धाय निर्गच्छन्ती राक्षससेना — अग्रे मेरुशिखरतुल्ये सुवर्णरथे स्थितः किरीटधरः ताम्रवर्णः खरो बाहुमुद्यम्य सारथिं प्रचोदयति, तस्याग्रे हरितकटिबन्धो लोहशिरस्त्राणधरो दूषणो महतीं गदां भ्रामयन् सेनां संचालयति, पृष्ठतः सहस्रशो निशाचराः शूलखड्गपरिघपताकाभिः सज्जिता मेघवत् प्रवहन्ति।

जनस्थान से श्रीराम के आश्रम की ओर युद्ध के लिये निकलती राक्षस-सेना — आगे मेरु-शिखर-सी ऊँची सुनहरी रथ पर विराजमान मुकुटधारी ताम्रवर्ण खर भुजा उठाकर सारथि को आगे बढ़ने का संकेत करता है; उसके आगे हरे कटिबन्ध और लोहे के टोपवाला सेनापति दूषण विशाल गदा घुमाता सेना का संचालन कर रहा है; पीछे हजारों निशाचर शूल, खड्ग, परिघ और पताकाएँ लिये मेघमाला-से उमड़ते चले आ रहे हैं।

The demon army pours out of Janasthan toward Ram's hermitage for war: at its head, on a towering, Meru-tall golden chariot, the crowned coppery Khara raises his arm to urge his charioteer onward; before him the green-sashed, iron-helmed general Dushana swings a great mace as he marshals the host; and behind them thousands of night-demons surge forward like storm-clouds, bristling with pikes, swords, iron clubs and banners.

॥ ३ · २२ · १ ॥
एवमाधर्षितः शूरः शूर्पणख्या खरस्ततः। उवाच रक्षसां मध्ये खरः खरतरं वचः॥

evamādharṣitaḥ śūraḥ śūrpaṇakhyā kharastataḥ।
uvāca rakṣasāṁ madhye kharaḥ kharataraṁ vacaḥ॥

शूर्पणखाद्वारा इस प्रकार तिरस्कृत होकर शूरवीर खर ने राक्षसों के बीच अत्यन्त कठोर वाणी में कहा—

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॥ ३ · २२ · २ ॥
तवापमानप्रभवः क्रोधोऽयमतुलो मम। शक्यते धारयितुं लवणाम्भ इवोल्बणम्॥

tavāpamānaprabhavaḥ krodho'yamatulo mama।
na śakyate dhārayituṁ lavaṇāmbha ivolbaṇam॥

‘बहिन! तुम्हारे अपमान के कारण मुझे बेतरह क्रोध चढ़ आया है। इसे धारण करना या दबा देना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे पूर्णिमा को प्रचण्ड वेग से बढ़े हुए खारे पानी के समुद्र के जल को (अथवा यह उसी प्रकार असह्य है, जैसे घाव पर नमकीन पानी का छिड़कना)

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॥ ३ · २२ · ३ ॥
रामं गणये वीर्यान्मानुषं क्षीणजीवितम्। आत्मदुश्चरितैः प्राणान् हतो योऽद्य विमोक्ष्यते॥

na rāmaṁ gaṇaye vīryānmānuṣaṁ kṣīṇajīvitam।
ātmaduścaritaiḥ prāṇān hato yo'dya vimokṣyate॥

‘मैं पराक्रम की दृष्टि से राम को कुछ भी नहीं गिनता हूँ; क्योंकि उस मनुष्य का जीवन अब क्षीण हो चला है। वह अपने दुष्कर्मों से ही मारा जाकर आज प्राणों से हाथ धो बैठेगा

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॥ ३ · २२ · ४ ॥
बाष्पः संधार्यतामेष सम्भ्रमश्च विमुच्यताम्। अहं रामं सह भ्रात्रा नयामि यमसादनम्॥

bāṣpaḥ saṁdhāryatāmeṣa sambhramaśca vimucyatām।
ahaṁ rāmaṁ saha bhrātrā nayāmi yamasādanam॥

‘तुम अपने आँसुओं को रोको और यह घबराहट छोड़ो। मैं भाईसहित राम को अभी यमलोक पहुँचा देता हूँ

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॥ ३ · २२ · ५ ॥
परश्वधहतस्याद्य मन्दप्राणस्य भूतले। रामस्य रुधिरं रक्तमुष्णं पास्यसि राक्षसि॥

paraśvadhahatasyādya mandaprāṇasya bhūtale।
rāmasya rudhiraṁ raktamuṣṇaṁ pāsyasi rākṣasi॥

‘राक्षसी! आज मेरे फरसे की मार से निष्प्राण होकर धरती पर पड़े हुए राम का गरम-गरम रक्त तुम्हें पीने को मिलेगा’

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॥ ३ · २२ · ६ ॥
सम्प्रहृष्टा वचः श्रुत्वा खरस्य वदनाच्च्युतम्। प्रशशंस पुनर्मौर्ख्याद् भ्रातरं रक्षसां वरम्॥

samprahṛṣṭā vacaḥ śrutvā kharasya vadanāccyutam।
praśaśaṁsa punarmaurkhyād bhrātaraṁ rakṣasāṁ varam॥

खर के मुख से निकली हुई इस बात को सुनकर शूर्पणखा को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने मूर्खतावश राक्षसों में श्रेष्ठ भाई खर की पुनः भूरि-भूरि प्रशंसा की

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॥ ३ · २२ · ७ ॥
तया परुषितः पूर्वं पुनरेव प्रशंसितः। अब्रवीद् दूषणं नाम खरः सेनापतिं तदा॥

tayā paruṣitaḥ pūrvaṁ punareva praśaṁsitaḥ।
abravīd dūṣaṇaṁ nāma kharaḥ senāpatiṁ tadā॥

उसने पहले जिसका कठोर वाणीद्वारा तिरस्कार किया और पुनः जिसकी अत्यन्त सराहना की, उस खर ने उस समय अपने सेनापति दूषण से कहा—

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॥ ३ · २२ · ८ ॥
चतुर्दश सहस्राणि मम चित्तानुवर्तिनाम्। रक्षसां भीमवेगानां समरेष्वनिवर्तिनाम्॥

caturdaśa sahasrāṇi mama cittānuvartinām।
rakṣasāṁ bhīmavegānāṁ samareṣvanivartinām॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · २२ · ९ ॥
नीलजीमूतवर्णानां लोकहिंसाविहारिणाम्। सर्वोद्योगमुदीर्णानां रक्षसां सौम्य कारय॥

nīlajīmūtavarṇānāṁ lokahiṁsāvihāriṇām।
sarvodyogamudīrṇānāṁ rakṣasāṁ saumya kāraya॥

॥ ८–९ ॥

‘सौम्य! मेरे मन के अनुकूल चलनेवाले, युद्ध के मैदान से पीछे न हटनेवाले, भयंकर वेगशाली, मेघों की काली घटा के समान काले रंगवाले, लोगों की हिंसा से ही क्रीड़ा-विहार करनेवाले तथा युद्ध में उत्साहपूर्वक आगे बढ़नेवाले चौदह सहस्र राक्षसों को युद्ध के लिये भेजने की पूरी तैयारी कराओ

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॥ ३ · २२ · १० ॥
उपस्थापय मे क्षिप्रं रथं सौम्य धनूंषि च। शरांश्च चित्रान् खड्गांश्च शक्तीश्च विविधाः शिताः॥

upasthāpaya me kṣipraṁ rathaṁ saumya dhanūṁṣi ca।
śarāṁśca citrān khaḍgāṁśca śaktīśca vividhāḥ śitāḥ॥

सौम्य सेनापते! तुम शीघ्र ही मेरा रथ भी यहाँ मँगवा लो। उसपर बहुत-से धनुष, बाण, विचित्र-विचित्र खड्ग और नाना प्रकार की तीखी शक्तियों को भी रख दो

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॥ ३ · २२ · ११ ॥
अग्रे निर्यातुमिच्छामि पौलस्त्यानां महात्मनाम्। वधार्थं दुर्विनीतस्य रामस्य रणकोविद॥

agre niryātumicchāmi paulastyānāṁ mahātmanām।
vadhārthaṁ durvinītasya rāmasya raṇakovida॥

‘रणकुशल वीर! मैं इस उद्दण्ड राम का वध करने के लिये महामनस्वी पुलस्त्यवंशी राक्षसों के आगे-आगे जाना चाहता हूँ’

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॥ ३ · २२ · १२ ॥
इति तस्य ब्रुवाणस्य सूर्यवर्णं महारथम्। सदश्वैः शबलैर्युक्तमाचचक्षेऽथ दूषणः॥

iti tasya bruvāṇasya sūryavarṇaṁ mahāratham।
sadaśvaiḥ śabalairyuktamācacakṣe'tha dūṣaṇaḥ॥

उसके इस प्रकार आज्ञा देते ही एक सूर्य के समान प्रकाशमान और चितकबरे रंग के अच्छे घोड़ों से जुता हुआ विशाल रथ वहाँ आ गया। दूषण ने खर को इसकी सूचना दी

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॥ ३ · २२ · १३ ॥
तं मेरुशिखराकारं तप्तकाञ्चनभूषणम्। हेमचक्रमसम्बाधं वैदूर्यमयकूबरम्॥

taṁ meruśikharākāraṁ taptakāñcanabhūṣaṇam।
hemacakramasambādhaṁ vaidūryamayakūbaram॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · २२ · १४ ॥
मत्स्यैः पुष्पैर्द्रुमैः शैलैश्चन्द्रसूर्यैश्च काञ्चनैः। माङ्गल्यैः पक्षिसङ्घैश्च ताराभिश्च समावृतम्॥

matsyaiḥ puṣpairdrumaiḥ śailaiścandrasūryaiśca kāñcanaiḥ।
māṅgalyaiḥ pakṣisaṅghaiśca tārābhiśca samāvṛtam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · २२ · १५ ॥
ध्वजनिस्त्रिंशसम्पन्नं किंकिणीवरभूषितम्। सदश्वयुक्तं सोऽमर्षादारुरोह खरस्तदा॥

dhvajanistriṁśasampannaṁ kiṁkiṇīvarabhūṣitam।
sadaśvayuktaṁ so'marṣādāruroha kharastadā॥

॥ १३–१५ ॥

वह रथ मेरुपर्वत के शिखर की भाँति ऊँचा था, उसे तपाये हुए सोने के बने हुए साज-बाज से सजाया गया था, उसके पहियों में सोना जड़ा हुआ था, उसका विस्तार बहुत बड़ा था, उस रथ के कूबर वैदूर्यमणि से जड़े गये थे, उसकी सजावट के लिये सोने के बने हुए मत्स्य, फूल, वृक्ष, पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, माङ्गलिक पक्षियों के समुदाय तथा तारिकाओं से वह रथ सुशोभित हो रहा था, उसपर ध्वजा फहरा रही थी तथा रथ के भीतर खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे, छोटी-छोटी घण्टियों अथवा सुन्दर घुँघुरुओं से सजे और उत्तम घोड़ों से जुते हुए उस रथ पर राक्षसराज खर उस समय आरूढ़ हुआ। अपनी बहिन के अपमान का स्मरण करके उसके मन में बड़ा अमर्ष हो रहा था

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॥ ३ · २२ · १६ ॥
खरस्तु तन्महत्सैन्यं रथचर्मायुधध्वजम्। निर्यातेत्यब्रवीत् प्रेक्ष्य दूषणः सर्वराक्षसान्॥

kharastu tanmahatsainyaṁ rathacarmāyudhadhvajam।
niryātetyabravīt prekṣya dūṣaṇaḥ sarvarākṣasān॥

रथ, ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वज से सम्पन्न उस विशाल सेना की ओर देखकर खर और दूषण ने समस्त राक्षसों से कहा—‘निकलो, आगे बढ़ो’

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॥ ३ · २२ · १७ ॥
ततस्तद् राक्षसं सैन्यं घोरचर्मायुधध्वजम्। निर्जगाम जनस्थानान्महानादं महाजवम्॥

tatastad rākṣasaṁ sainyaṁ ghoracarmāyudhadhvajam।
nirjagāma janasthānānmahānādaṁ mahājavam॥

कूच करने की आज्ञा प्राप्त होते ही भयंकर ढाल, अस्त्र-शस्त्र तथा ध्वजा से युक्त वह विशाल राक्षस-सेना जोर-जोर से गर्जना करती हुई जनस्थान से बड़े वेग के साथ निकली

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॥ ३ · २२ · १८ ॥
मुद्गरैः पट्टिशैः शूलैः सुतीक्ष्णैश्च परश्वधैः। खड्गैश्चक्रैश्च हस्तस्थैर्भ्राजमानैः सतोमरैः॥

mudgaraiḥ paṭṭiśaiḥ śūlaiḥ sutīkṣṇaiśca paraśvadhaiḥ।
khaḍgaiścakraiśca hastasthairbhrājamānaiḥ satomaraiḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · २२ · १९ ॥
शक्तिभिः परिघैर्घोरैरतिमात्रैश्च कार्मुकैः। गदासिमुसलैर्वज्रैर्गृहीतैर्भीमदर्शनैः॥

śaktibhiḥ parighairghorairatimātraiśca kārmukaiḥ।
gadāsimusalairvajrairgṛhītairbhīmadarśanaiḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · २२ · २० ॥
राक्षसानां सुघोराणां सहस्राणि चतुर्दश। निर्यातानि जनस्थानात् खरचित्तानुवर्तिनाम्॥

rākṣasānāṁ sughorāṇāṁ sahasrāṇi caturdaśa।
niryātāni janasthānāt kharacittānuvartinām॥

॥ १८–२० ॥

सैनिकों के हाथ में मुद्गर, पट्टिश, शूल, अत्यन्त तीखे फरसे, खड्ग, चक्र और तोमर चमक उठे। शक्ति, भयंकर परिघ, विशाल धनुष, गदा, तलवार, मुसल तथा वज्र (आठ कोणवाले आयुधविशेष) उन राक्षसों के हाथों में आकर बड़े भयानक दिखायी दे रहे थे। इन अस्त्र-शस्त्रों से उपलक्षित और खर के मन की इच्छा के अनुसार चलनेवाले अत्यन्त भयंकर चौदह हजार राक्षस जनस्थान से युद्ध के लिये चले

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॥ ३ · २२ · २१ ॥
तांस्तु निर्धावतो दृष्ट्वा राक्षसान् भीमदर्शनान्। खरस्याथ रथः किंचिज्जगाम तदनन्तरम्॥

tāṁstu nirdhāvato dṛṣṭvā rākṣasān bhīmadarśanān।
kharasyātha rathaḥ kiṁcijjagāma tadanantaram॥

उन भयंकर दिखायी देनेवाले राक्षसों को धावा करते देख खर का रथ भी कुछ देर सैनिकों के निकलने की प्रतीक्षा करके उनके साथ ही आगे बढ़ा

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॥ ३ · २२ · २२ ॥
ततस्ताञ्छबलानश्वांस्तप्तकाञ्चनभूषितान्। खरस्य मतमाज्ञाय सारथिः पर्यचोदयत्॥

tatastāñchabalānaśvāṁstaptakāñcanabhūṣitān।
kharasya matamājñāya sārathiḥ paryacodayat॥

तदनन्तर खर का अभिप्राय जानकर उसके सारथि ने तपाये हुए सोने के आभूषणों से विभूषित उन चितकबरे घोड़ों को हाँका

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॥ ३ · २२ · २३ ॥
संचोदितो रथः शीघ्रं खरस्य रिपुघातिनः। शब्देनापूरयामास दिशः सप्रदिशस्तथा॥

saṁcodito rathaḥ śīghraṁ kharasya ripughātinaḥ।
śabdenāpūrayāmāsa diśaḥ sapradiśastathā॥

उसके हाँकने पर शत्रुघाती खर का रथ शीघ्र ही अपने घर-घर शब्द से सम्पूर्ण दिशाओं तथा उपदिशाओं को प्रतिध्वनित करने लगा

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॥ ३ · २२ · २४ ॥
प्रवृद्धमन्युस्तु खरः खरस्वरो रिपोर्वधार्थं त्वरितो यथान्तकः। अचूचुदत् सारथिमुन्नदन् पुनर्महाबलो मेघ इवाश्मवर्षवान्॥

pravṛddhamanyustu kharaḥ kharasvaro riporvadhārthaṁ tvarito yathāntakaḥ।
acūcudat sārathimunnadan punarmahābalo megha ivāśmavarṣavān॥

उस समय खर का क्रोध बढ़ा हुआ था। उसका स्वर भी कठोर हो गया था। वह शत्रु के वध के लिये उतावला होकर यमराज के समान भयानक जान पड़ता था। जैसे ओलों की वर्षा करनेवाला मेघ बड़े जोर से गर्जना करता है, उसी प्रकार महाबली खर ने उच्चस्वर से सिंहनाद करके पुनः सारथि को रथ हाँकने के लिये प्रेरित किया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्वाविंशः सर्गः ॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बाईसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २२ ॥