वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः २१ · २२ श्लोकाःSarga 21 · 22 ślokas

शूर्पणखाका खरके पास आकर उन राक्षसोंके वधका समाचार बताना और रामका भय दिखाकर उसे युद्धके लिये उत्तेजित करना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः २१ — painting

॥ ३ · २१ · १४–१५ ॥

जनस्थानस्य धूम्रदीपिते राक्षससभायां हृतनासामुद्रिका विकीर्णताम्रकेशा त्रुटितनीलाम्बरा शूर्पणखा एकहस्तेन प्रच्छाद्य वदनं भ्रातुः खरस्य पुरतो भूमौ पतित्वा बाहुं प्रसार्य विलपन्ती रामवधाय तं प्रचोदयति, ताम्रवर्णः किरीटधरः खरस्तु खड्गमुष्टिं गृहीत्वाऽऽसनादुत्थाय क्रोधेन प्रज्वलति।

जनस्थान की धुँधली, मशाल-जगमग राक्षस-सभा में नाक की नथ खोयी, बिखरे ताम्र-केश और फटी नीली साड़ीवाली शूर्पणखा एक हाथ से मुख ढके भाई खर के आगे धरती पर गिरकर बाँह फैलाये विलाप करती हुई उसे श्रीराम के वध के लिये उकसा रही है; ताम्रवर्ण, मुकुटधारी खर तलवार की मूठ थामे अपने आसन से आधा उठकर क्रोध से जल उठा है।

In the smoky, torchlit demon court of Janasthan, Shurpanakha — her nose-ring gone, her coppery hair wild, her teal sari torn — has cast herself to the ground before her brother Khara, one hand veiling her face and the other flung wide in a wail, goading him to kill Ram; the coppery, crowned Khara, gripping his sword-hilt, has half-risen from his seat, ablaze with wrath.

॥ ३ · २१ · १ ॥
पुनः पतितां दृष्ट्वा क्रोधाच्छूर्पणखां पुनः। उवाच व्यक्तया वाचा तामनर्थार्थमागताम्॥

sa punaḥ patitāṁ dṛṣṭvā krodhācchūrpaṇakhāṁ punaḥ।
uvāca vyaktayā vācā tāmanarthārthamāgatām॥

शूर्पणखा को पुनः पृथ्वी पर पड़ी हुई देख अनर्थ के लिये आयी हुई उस बहिन से खर ने क्रोधपूर्वक स्पष्ट वाणी में फिर कहा—

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॥ ३ · २१ · २ ॥
मया त्विदानीं शूरास्ते राक्षसाः पिशिताशनाः। त्वत्प्रियार्थं विनिर्दिष्टाः किमर्थं रुद्यते पुनः॥

mayā tvidānīṁ śūrāste rākṣasāḥ piśitāśanāḥ।
tvatpriyārthaṁ vinirdiṣṭāḥ kimarthaṁ rudyate punaḥ॥

‘बहिन! मैंने तुम्हारा प्रिय करने के लिये उस समय बहुत-से शूरवीर एवं मांसाहारी राक्षसों को जाने की आज्ञा दे दी थी, अब फिर तुम किसलिये रो रही हो?

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॥ ३ · २१ · ३ ॥
भक्ताश्चैवानुरक्ताश्च हिताश्च मम नित्यशः। हन्यमाना हन्यन्ते कुर्युर्वचो मम॥

bhaktāścaivānuraktāśca hitāśca mama nityaśaḥ।
hanyamānā na hanyante na na kuryurvaco mama॥

‘मैंने जिन राक्षसों को भेजा था, वे मेरे भक्त, मुझमें अनुराग रखनेवाले और सदा मेरा हित चाहनेवाले हैं। वे किसीके मारने पर भी मर नहीं सकते। उनके द्वारा मेरी आज्ञा का पालन न हो, यह भी सम्भव नहीं है

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॥ ३ · २१ · ४ ॥
किमेतच्छ्रोतुमिच्छामि कारणं यत्कृते पुनः। हा नाथेति विनर्दन्ती सर्पवच्चेष्टसे क्षितौ॥

kimetacchrotumicchāmi kāraṇaṁ yatkṛte punaḥ।
hā nātheti vinardantī sarpavacceṣṭase kṣitau॥

‘फिर ऐसा कौन-सा कारण उपस्थित हो गया, जिसके लिये तुम ‘हा नाथ’ की पुकार मचाती हुई साँप की तरह धरती पर लोट रही हो। मैं उसे सुनना चाहता हूँ

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॥ ३ · २१ · ५ ॥
अनाथवद् विलपसि किं नु नाथे मयि स्थिते। उत्तिष्ठोत्तिष्ठ मा मैवं वैक्लव्यं त्यज्यतामिति॥

anāthavad vilapasi kiṁ nu nāthe mayi sthite।
uttiṣṭhottiṣṭha mā maivaṁ vaiklavyaṁ tyajyatāmiti॥

‘मेरे-जैसे संरक्षक के रहते हुए तुम अनाथ की तरह विलाप क्यों करती हो? उठो! उठो!! इस तरह लोटो मत। घबराहट छोड़ दो’

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॥ ३ · २१ · ६ ॥
इत्येवमुक्ता दुर्धर्षा खरेण परिसान्त्विता। विमृज्य नयने सास्रे खरं भ्रातरमब्रवीत्॥

ityevamuktā durdharṣā khareṇa parisāntvitā।
vimṛjya nayane sāsre kharaṁ bhrātaramabravīt॥

खर के इस प्रकार सान्त्वना देने पर वह दुर्धर्ष राक्षसी अपने आँसूभरे नेत्रों को पोंछकर भाई खर से बोली—

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॥ ३ · २१ · ७ ॥
अस्मीदानीमहं प्राप्ता हतश्रवणनासिका। शोणितौघपरिक्लिन्ना त्वया परिसान्त्विता॥

asmīdānīmahaṁ prāptā hataśravaṇanāsikā।
śoṇitaughapariklinnā tvayā ca parisāntvitā॥

‘भैया मैं इस समय फिर तुम्हारे पास क्यों आयी हूँ—यह बताती हूँ, सुनो—मेरे नाक-कान कट गये और मैं खून की धारा से नहा उठी, उस अवस्था में जब पहली बार मैं आयी थी, तब तुमने मुझे बड़ी सान्त्वना दी थी

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॥ ३ · २१ · ८ ॥
प्रेषिताश्च त्वया शूरा राक्षसास्ते चतुर्दश। निहन्तुं राघवं घोरं मत्प्रियार्थं सलक्ष्मणम्॥

preṣitāśca tvayā śūrā rākṣasāste caturdaśa।
nihantuṁ rāghavaṁ ghoraṁ matpriyārthaṁ salakṣmaṇam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · २१ · ९ ॥
ते तु रामेण सामर्षाः शूलपट्टिशपाणयः। समरे निहताः सर्वे सायकैर्मर्मभेदिभिः॥

te tu rāmeṇa sāmarṣāḥ śūlapaṭṭiśapāṇayaḥ।
samare nihatāḥ sarve sāyakairmarmabhedibhiḥ॥

॥ ८–९ ॥

‘तत्पश्चात् मेरा प्रिय करने के लिये लक्ष्मणसहित राम का वध करने के उद्देश्य से तुमने जो वे चौदह शूरवीर राक्षस भेजे थे, वे सब-के-सब अमर्ष में भरकर हाथों में शूल और पट्टिश लिये वहाँ जा पहुँचे, परंतु राम ने अपने मर्मभेदी बाणोंद्वारा उन सबको समराङ्गण में मार गिराया

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॥ ३ · २१ · १० ॥
तान् भूमौ पतितान् दृष्ट्वा क्षणेनैव महाजवान्। रामस्य महत्कर्म महांस्त्रासोऽभवन्मम॥

tān bhūmau patitān dṛṣṭvā kṣaṇenaiva mahājavān।
rāmasya ca mahatkarma mahāṁstrāso'bhavanmama॥

‘उन महान् वेगशाली निशाचरों को क्षणभर में ही धराशायी हुआ देख राम के उस महान् पराक्रम पर दृष्टिपात करके मेरे मन में बड़ा भय उत्पन्न हो गया

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॥ ३ · २१ · ११ ॥
सास्मि भीता समुद्विग्ना विषण्णा निशाचर। शरणं त्वां पुनः प्राप्ता सर्वतो भयदर्शिनी॥

sāsmi bhītā samudvignā viṣaṇṇā ca niśācara।
śaraṇaṁ tvāṁ punaḥ prāptā sarvato bhayadarśinī॥

‘निशाचरराज! मैं भयभीत, उद्विग्न और विषादग्रस्त हो गयी हूँ। मुझे सब ओर भय-ही-भय दिखायी देता है, इसीलिये फिर तुम्हारी शरण में आयी हूँ

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॥ ३ · २१ · १२ ॥
विषादनक्राध्युषिते परित्रासोर्मिमालिनि। किं मां त्रायसे मग्नां विपुले शोकसागरे॥

viṣādanakrādhyuṣite paritrāsormimālini।
kiṁ māṁ na trāyase magnāṁ vipule śokasāgare॥

‘मैं शोक के उस विशाल समुद्र में डूब गयी हूँ, जहाँ विषादरूपी मगर निवास करते हैं और त्रास की तरङ्गमालाएँ उठती रहती हैं। तुम उस शोकसागर से मेरा उद्धार क्यों नहीं करते हो?

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॥ ३ · २१ · १३ ॥
एते निहता भूमौ रामेण निशितैः शरैः। ये मे पदवीं प्राप्ता राक्षसाः पिशिताशनाः॥

ete ca nihatā bhūmau rāmeṇa niśitaiḥ śaraiḥ।
ye ca me padavīṁ prāptā rākṣasāḥ piśitāśanāḥ॥

‘जो मांसभक्षी राक्षस मेरे साथ गये थे, वे सब-के-सब राम के पैने बाणों से मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हैं

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॥ ३ · २१ · १४ ॥
मयि ते यद्यनुक्रोशो यदि रक्षःसु तेषु च। रामेण यदि शक्तिस्ते तेजो वास्ति निशाचर॥ दण्डकारण्यनिलयं जहि राक्षसकण्टकम्।

mayi te yadyanukrośo yadi rakṣaḥsu teṣu ca।
rāmeṇa yadi śaktiste tejo vāsti niśācara॥
daṇḍakāraṇyanilayaṁ jahi rākṣasakaṇṭakam।

‘राक्षसराज! यदि मुझपर और उन मरे हुए राक्षसों पर तुम्हें दया आती हो तथा यदि राम के साथ लोहा लेने के लिये तुममें शक्ति और तेज हो तो उन्हें मार डालो; क्योंकि दण्डकारण्य में घर बनाकर रहनेवाले राम राक्षसों के लिये कण्टक हैं

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॥ ३ · २१ · १५ ॥
यदि रामममित्रघ्नं त्वमद्य वधिष्यसि॥ तव चैवाग्रतः प्राणांस्त्यक्ष्यामि निरपत्रपा।

yadi rāmamamitraghnaṁ na tvamadya vadhiṣyasi॥
tava caivāgrataḥ prāṇāṁstyakṣyāmi nirapatrapā।

‘यदि तुम आज ही शत्रुघाती राम का वध नहीं कर डालोगे तो मैं तुम्हारे सामने ही अपने प्राण त्याग दूँगी; क्योंकि मेरी लाज लुट चुकी है

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॥ ३ · २१ · १६ ॥
बुद्ध्याहमनुपश्यामि त्वं रामस्य संयुगे॥ स्थातुं प्रतिमुखे शक्तः सबलोऽपि महारणे।

buddhyāhamanupaśyāmi na tvaṁ rāmasya saṁyuge॥
sthātuṁ pratimukhe śaktaḥ sabalo'pi mahāraṇe।

‘मैं बुद्धि से बारंबार सोचकर देखती हूँ कि तुम महासमर में सबल होकर भी राम के सामने युद्ध में नहीं ठहर सकोगे

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॥ ३ · २१ · १७ ॥
शूरमानी शूरस्त्वं मिथ्यारोपितविक्रमः॥

śūramānī na śūrastvaṁ mithyāropitavikramaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · २१ · १८ ॥
अपयाहि जनस्थानात् त्वरितः सहबान्धवः। जहि त्वं समरे मूढान्यथा तु कुलपांसन॥

apayāhi janasthānāt tvaritaḥ sahabāndhavaḥ।
jahi tvaṁ samare mūḍhānyathā tu kulapāṁsana॥

॥ १७–१८ ॥

‘तुम अपने को शूरवीर मानते हो, किंतु तुममें शौर्य है ही नहीं। तुमने झूठे ही अपने-आप में पराक्रम का आरोप कर लिया है। मूढ! तुम समराङ्गण में उन दोनों को मार डालो अन्यथा अपने कुल में कलङ्क लगाकर भाई-बन्धुओं के साथ तुरंत ही इस जनस्थान से भाग जाओ

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॥ ३ · २१ · १९ ॥
मानुषौ तौ शक्नोषि हन्तुं वै रामलक्ष्मणौ। निःसत्त्वस्याल्पवीर्यस्य वासस्ते कीदृशस्त्विह॥

mānuṣau tau na śaknoṣi hantuṁ vai rāmalakṣmaṇau।
niḥsattvasyālpavīryasya vāsaste kīdṛśastviha॥

‘राम और लक्ष्मण मनुष्य हैं, यदि उन्हें भी मारने की तुममें शक्ति नहीं है तो तुम्हारे-जैसे निर्बल और पराक्रमशून्य राक्षस का यहाँ रहना कैसे सम्भव हो सकता है?

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॥ ३ · २१ · २० ॥
रामतेजोऽभिभूतो हि त्वं क्षिप्रं विनशिष्यसि। हि तेजःसमायुक्तो रामो दशरथात्मजः॥ भ्राता चास्य महावीर्यो येन चास्मि विरूपिता।

rāmatejo'bhibhūto hi tvaṁ kṣipraṁ vinaśiṣyasi।
sa hi tejaḥsamāyukto rāmo daśarathātmajaḥ॥
bhrātā cāsya mahāvīryo yena cāsmi virūpitā।

‘तुम राम के तेज से पराजित होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे; क्योंकि दशरथकुमार राम बड़े तेजस्वी हैं। उनका भाई भी महान् पराक्रमी है, जिसने मुझे नाक-कान से हीन करके अत्यन्त कुरूप बना दिया’

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॥ ३ · २१ · २१ ॥
एवं विलप्य बहुशो राक्षसी प्रदरोदरी॥

evaṁ vilapya bahuśo rākṣasī pradarodarī॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · २१ · २२ ॥
भ्रातुः समीपे शोकार्ता नष्टसंज्ञा बभूव ह। कराभ्यामुदरं हत्वा रुरोद भृशदुःखिता॥

bhrātuḥ samīpe śokārtā naṣṭasaṁjñā babhūva ha।
karābhyāmudaraṁ hatvā ruroda bhṛśaduḥkhitā॥

॥ २१–२२ ॥

इस प्रकार बहुत विलाप करके गुफा के समान गहरे पेटवाली वह राक्षसी शोक से आतुर हो अपने भाई के पास मूर्च्छित-सी हो गयी और अत्यन्त दुःखी हो दोनों हाथों से पेट पीटती हुई फूट-फूटकर रोने लगी

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे एकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २१ ॥