वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः २० · २५ श्लोकाःSarga 20 · 25 ślokas

श्रीरामद्वारा खरके भेजे हुए चौदह राक्षसोंका वध

अरण्यकाण्डम् · सर्गः २० — painting

॥ ३ · २० · १७–२१ ॥

पञ्चवटीवने पर्णशालायाः पुरतो नीलवर्णो रामः एकाकी अकम्पितः स्वर्णभूषितं महाधनुः आकर्णं कृष्ट्वा सूर्यतुल्यान् नाराचान् वर्षति; वामतः चतुर्दश राक्षसयोधाः शूलत्रिशूलगदाखड्गैः अभिद्रवन्ति, तेषां क्षिप्ताः शूलाः छिन्ना अन्तरिक्षे लम्बन्ते, राक्षसाश्च छिन्नमूलवृक्षवद् धरणौ पतन्ति; रामस्य वदनं धर्मशान्तं गम्भीरं च; दक्षिणे खड्गधरो लक्ष्मणः सीतां रक्षति, दूरान्ते छिन्ननासा शूर्पणखा भयाद् अपसरति।

पञ्चवटी वन में पर्णशाला के सामने नीले वर्ण के श्रीराम अकेले, अविचल खड़े होकर स्वर्णभूषित महान् धनुष को कानतक खींचकर सूर्यतुल्य नाराच-बाणों की वर्षा कर रहे हैं; बायीं ओर से चौदह राक्षस-योद्धा शूल, त्रिशूल, गदा और तलवार लिये टूट पड़ते हैं, किंतु उनके फेंके शूल कटकर आकाश में ही लटके रह जाते हैं और राक्षस जड़ से कटे वृक्षों की भाँति धराशायी हो रहे हैं; श्रीराम का मुख धर्ममय शान्ति से गम्भीर है; दायीं ओर तलवारधारी लक्ष्मण सीता की रक्षा कर रहे हैं और दूर छोर पर नाक-कान से रहित शूर्पणखा भयभीत होकर भाग रही है।

Before the leaf-hut in the Panchavati wood the blue Ram stands alone and unshaken, his great gold-adorned bow drawn full to the ear, loosing a storm of sun-bright iron arrows; the fourteen demon warriors rush in from the left with spears, tridents, maces and swords, but their hurled spears hang shattered in mid-air and the rakshasas topple to earth like felled trees, while Ram's face is grave with righteous calm; on the right the sword-bearing Lakshman guards Sita, and at the far edge the disfigured Shurpanakha recoils and flees.

॥ ३ · २० · १ ॥
ततः शूर्पणखा घोरा राघवाश्रममागता। राक्षसानाचचक्षे तौ भ्रातरौ सह सीतया॥

tataḥ śūrpaṇakhā ghorā rāghavāśramamāgatā।
rākṣasānācacakṣe tau bhrātarau saha sītayā॥

तदनन्तर भयानक राक्षसी शूर्पणखा श्रीरामचन्द्रजी के आश्रम पर आयी। उसने सीतासहित उन दोनों भाइयों का उन राक्षसों को परिचय दिया।

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॥ ३ · २० · २ ॥
ते रामं पर्णशालायामुपविष्टं महाबलम्। ददृशुः सीतया सार्धं लक्ष्मणेनापि सेवितम्॥

te rāmaṁ parṇaśālāyāmupaviṣṭaṁ mahābalam।
dadṛśuḥ sītayā sārdhaṁ lakṣmaṇenāpi sevitam॥

राक्षसों ने देखा—महाबली श्रीराम सीता के साथ पर्णशाला में बैठे हैं और लक्ष्मण भी उनकी सेवा में उपस्थित हैं।

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॥ ३ · २० · ३ ॥
तां दृष्ट्वा राघवः श्रीमानागतांस्तांश्च राक्षसान्। अब्रवीद् भ्रातरं रामो लक्ष्मणं दीप्ततेजसम्॥

tāṁ dṛṣṭvā rāghavaḥ śrīmānāgatāṁstāṁśca rākṣasān।
abravīd bhrātaraṁ rāmo lakṣmaṇaṁ dīptatejasam॥

इधर श्रीमान् रघुनाथजी ने भी शूर्पणखा तथा उसके साथ आये हुए उन राक्षसों को भी देखा। देखकर वे उद्दीप्त तेजवाले अपने भाई लक्ष्मण से इस प्रकार बोले—

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॥ ३ · २० · ४ ॥
मुहूर्तं भव सौमित्रे सीतायाः प्रत्यनन्तरः। इमानस्या वधिष्यामि पदवीमागतानिह॥

muhūrtaṁ bhava saumitre sītāyāḥ pratyanantaraḥ।
imānasyā vadhiṣyāmi padavīmāgatāniha॥

‘सुमित्राकुमार! तुम थोड़ी देरतक सीता के पास खड़े हो जाओ। मैं इस राक्षसी के सहायक बनकर पीछे-पीछे आये हुए इन निशाचरों का यहाँ अभी वध कर डालूँगा’

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॥ ३ · २० · ५ ॥
वाक्यमेतत् ततः श्रुत्वा रामस्य विदितात्मनः। तथेति लक्ष्मणो वाक्यं राघवस्य प्रपूजयन्॥

vākyametat tataḥ śrutvā rāmasya viditātmanaḥ।
tatheti lakṣmaṇo vākyaṁ rāghavasya prapūjayan॥

अपने स्वरूप को समझनेवाले श्रीरामचन्द्रजी की यह बात सुनकर लक्ष्मण ने इसकी भूरि-भूरि सराहना करते हुए ‘तथास्तु’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की।

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॥ ३ · २० · ६ ॥
राघवोऽपि महच्चापं चामीकरविभूषितम्। चकार सज्यं धर्मात्मा तानि रक्षांसि चाब्रवीत्॥

rāghavo'pi mahaccāpaṁ cāmīkaravibhūṣitam।
cakāra sajyaṁ dharmātmā tāni rakṣāṁsi cābravīt॥

तब धर्मात्मा रघुनाथजी ने अपने सुवर्णमण्डित विशाल धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और उन राक्षसों से कहा—

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॥ ३ · २० · ७ ॥
पुत्रौ दशरथस्यावां भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ। प्रविष्टौ सीतया सार्धं दुश्चरं दण्डकावनम्॥

putrau daśarathasyāvāṁ bhrātarau rāmalakṣmaṇau।
praviṣṭau sītayā sārdhaṁ duścaraṁ daṇḍakāvanam॥

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॥ ३ · २० · ८ ॥
फलमूलाशनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ। वसन्तौ दण्डकारण्ये किमर्थमुपहिंसथ॥

phalamūlāśanau dāntau tāpasau brahmacāriṇau।
vasantau daṇḍakāraṇye kimarthamupahiṁsatha॥

॥ ७–८ ॥

‘हम दोनों भाई राजा दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं तथा सीता के साथ इस दुर्गम दण्डकारण्य में आकर फल-मूल का आहार करते हुए इन्द्रियसंयमपूर्वक तपस्या में संलग्न हैं और ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। इस प्रकार दण्डकवन में निवास करनेवाले हम दोनों भाइयों की तुम किसलिये हिंसा करना चाहते हो ?

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॥ ३ · २० · ९ ॥
युष्मान् पापात्मकान् हन्तुं विप्रकारान् महाहवे। ऋषीणां तु नियोगेन सम्प्राप्तः सशरासनः॥

yuṣmān pāpātmakān hantuṁ viprakārān mahāhave।
ṛṣīṇāṁ tu niyogena samprāptaḥ saśarāsanaḥ॥

‘देखो, तुम सब-के-सब पापात्मा तथा ऋषियों का अपराध करनेवाले हो। उन ऋषि-मुनियों की आज्ञा से ही मैं धनुष-बाण लेकर महासमर में तुम्हारा वध करने के लिये यहाँ आया हूँ।

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॥ ३ · २० · १० ॥
तिष्ठतैवात्र संतुष्टा नोपवर्तितुमर्हथ। यदि प्राणैरिहार्थो वो निवर्तध्वं निशाचराः॥

tiṣṭhataivātra saṁtuṣṭā nopavartitumarhatha।
yadi prāṇairihārtho vo nivartadhvaṁ niśācarāḥ॥

‘निशाचरो! यदि तुम्हें युद्ध से संतोष प्राप्त होता हो तो यहाँ खड़े ही रहो, भाग मत जाना और यदि तुम्हें प्राणों का लोभ हो तो लौट जाओ (एक क्षण के लिये भी यहाँ न रुको)’

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॥ ३ · २० · ११ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसास्ते चतुर्दश। ऊचुर्वाचं सुसंक्रुद्धा ब्रह्मघ्नाः शूलपाणयः॥

tasya tad vacanaṁ śrutvā rākṣasāste caturdaśa।
ūcurvācaṁ susaṁkruddhā brahmaghnāḥ śūlapāṇayaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · २० · १२ ॥
संरक्तनयना घोरा रामं संरक्तलोचनम्। परुषा मधुराभाषं हृष्टा दृष्टपराक्रमम्॥

saṁraktanayanā ghorā rāmaṁ saṁraktalocanam।
paruṣā madhurābhāṣaṁ hṛṣṭā dṛṣṭaparākramam॥

॥ ११–१२ ॥

श्रीराम की यह बात सुनकर वे चौदहों राक्षस अत्यन्त कुपित हो उठे। ब्राह्मणों की हत्या करनेवाले वे घोर निशाचर हाथों में शूल लिये क्रोध से लाल आँखें करके कठोर वाणी में हर्ष और उत्साह के साथ स्वभावतः लाल नेत्रोंवाले मधुरभाषी श्रीराम से, जिनका पराक्रम वे देख चुके थे, यों बोले—

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॥ ३ · २० · १३ ॥
क्रोधमुत्पाद्य नो भर्तुः खरस्य सुमहात्मनः। त्वमेव हास्यसे प्राणान् सद्योऽस्माभिर्हतो युधि॥

krodhamutpādya no bhartuḥ kharasya sumahātmanaḥ।
tvameva hāsyase prāṇān sadyo'smābhirhato yudhi॥

‘अरे! तूने हमारे स्वामी महाकाय खर को क्रोध दिलाया है; अतः हमलोगों के हाथ से युद्ध में मारा जाकर तू स्वयं ही तत्काल अपने प्राणों से हाथ धो बैठेगा।

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॥ ३ · २० · १४ ॥
का हि ते शक्तिरेकस्य बहूनां रणमूर्धनि। अस्माकमग्रतः स्थातुं किं पुनर्योद्धुमाहवे॥

kā hi te śaktirekasya bahūnāṁ raṇamūrdhani।
asmākamagrataḥ sthātuṁ kiṁ punaryoddhumāhave॥

‘हम बहुत-से हैं और तू अकेला, तेरी क्या शक्ति है कि तू हमारे सामने रणभूमि में खड़ा भी रह सके, फिर युद्ध करना तो दूर की बात है।

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॥ ३ · २० · १५ ॥
एभिर्बाहुप्रयुक्तैश्च परिघैः शूलपट्टिशैः। प्राणांस्त्यक्ष्यसि वीर्यं धनुश्च करपीडितम्॥

ebhirbāhuprayuktaiśca parighaiḥ śūlapaṭṭiśaiḥ।
prāṇāṁstyakṣyasi vīryaṁ ca dhanuśca karapīḍitam॥

‘हमारी भुजाओंद्वारा छोड़े गये इन परिघों, शूलों और पट्टिशों की मार खाकर तू अपने हाथ में दबाये हुए इस धनुष को, बल-पराक्रम के अभिमान को तथा अपने प्राणों को भी एक साथ ही त्याग देगा’

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॥ ३ · २० · १६ ॥
इत्येवमुक्त्वा संरब्धा राक्षसास्ते चतुर्दश। उद्यतायुधनिस्त्रिंशा राममेवाभिदुद्रुवुः॥

ityevamuktvā saṁrabdhā rākṣasāste caturdaśa।
udyatāyudhanistriṁśā rāmamevābhidudruvuḥ॥

ऐसा कहकर क्रोध में भरे हुए वे चौदहों राक्षस तरह-तरह के आयुध और तलवारें लिये श्रीराम पर ही टूट पड़े।

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॥ ३ · २० · १७ ॥
चिक्षिपुस्तानि शूलानि राघवं प्रति दुर्जयम्। तानि शूलानि काकुत्स्थः समस्तानि चतुर्दश॥ तावद्भिरिव चिच्छेद शरैः काञ्चनभूषितैः।

cikṣipustāni śūlāni rāghavaṁ prati durjayam।
tāni śūlāni kākutsthaḥ samastāni caturdaśa॥
tāvadbhiriva ciccheda śaraiḥ kāñcanabhūṣitaiḥ।

उन राक्षसों ने दुर्जय वीर श्रीराघवेन्द्र पर वे शूल चलाये, परंतु ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामचन्द्रजी ने उन समस्त चौदहों शूलों को उतने ही सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा काट डाला।

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॥ ३ · २० · १८ ॥
ततः पश्चान्महातेजा नाराचान् सूर्यसंनिभान्॥

tataḥ paścānmahātejā nārācān sūryasaṁnibhān॥

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॥ ३ · २० · १९ ॥
जग्राह परमक्रुद्धश्चतुर्दश शिलाशितान्। गृहीत्वा धनुरायम्य लक्ष्यानुद्दिश्य राक्षसान्॥ मुमोच राघवो बाणान् वज्रानिव शतक्रतुः।

jagrāha paramakruddhaścaturdaśa śilāśitān।
gṛhītvā dhanurāyamya lakṣyānuddiśya rākṣasān॥
mumoca rāghavo bāṇān vajrāniva śatakratuḥ।

॥ १८–१९ ॥

तत्पश्चात् महातेजस्वी रघुनाथजी ने अत्यन्त कुपित हो शान पर चढ़ाकर तेज किये गये सूर्यतुल्य तेजस्वी चौदह नाराच हाथ में लिये। फिर धनुष लेकर उसपर उन बाणों को रखा और कानतक खींचकर राक्षसों को लक्ष्य करके छोड़ दिया। मानो इन्द्र ने वज्रों का प्रहार किया हो।

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॥ ३ · २० · २० ॥
ते भित्त्वा रक्षसां वेगाद् वक्षांसि रुधिरप्लुताः॥ विनिष्पेतुस्तदा भूमौ वल्मीकादिव पन्नगाः।

te bhittvā rakṣasāṁ vegād vakṣāṁsi rudhiraplutāḥ॥
viniṣpetustadā bhūmau valmīkādiva pannagāḥ।

वे बाण बड़े वेग से उन राक्षसों की छाती छेदकर रुधिर में डूबे हुए निकले और बाँबी से बाहर आये हुए सर्पों की भाँति तत्काल पृथ्वी पर गिर पड़े।

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॥ ३ · २० · २१ ॥
तैर्भग्नहृदया भूमौ छिन्नमूला इव द्रुमाः॥ निपेतुः शोणितस्नाता विकृता विगतासवः।

tairbhagnahṛdayā bhūmau chinnamūlā iva drumāḥ॥
nipetuḥ śoṇitasnātā vikṛtā vigatāsavaḥ।

उन नाराचों से हृदय विदीर्ण हो जाने के कारण वे राक्षस जड़ से कटे हुए वृक्षों की भाँति धराशायी हो गये। वे सब-के-सब खून से नहा गये थे। उनके शरीर विकृत हो गये थे। उस अवस्था में उनके प्राणपखेरू उड़ गये।

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॥ ३ · २० · २२ ॥
तान् भूमौ पतितान् दृष्ट्वा राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता॥

tān bhūmau patitān dṛṣṭvā rākṣasī krodhamūrcchitā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · २० · २३ ॥
उपगम्य खरं सा तु किंचित्संशुष्कशोणिता। पपात पुनरेवार्ता सनिर्यासेव वल्लूरी॥

upagamya kharaṁ sā tu kiṁcitsaṁśuṣkaśoṇitā।
papāta punarevārtā saniryāseva vallūrī॥

॥ २२–२३ ॥

उन सब को पृथ्वी पर पड़ा देख वह राक्षसी क्रोध से मूर्च्छित हो गयी और खर के पास जाकर पुनः आर्तभाव से गिर पड़ी। उसके कटे हुए कानों और नाकों का खून सूख गया था, इसलिये गोंदयुक्त लता के समान प्रतीत होती थी।

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॥ ३ · २० · २४ ॥
भ्रातुः समीपे शोकार्ता ससर्ज निनदं महत्। सस्वरं मुमुचे बाष्पं विवर्णवदना तदा॥

bhrātuḥ samīpe śokārtā sasarja ninadaṁ mahat।
sasvaraṁ mumuce bāṣpaṁ vivarṇavadanā tadā॥

भाई के निकट शोक से पीड़ित हुई शूर्पणखा बड़े जोर से आर्तनाद करने और फूट-फूटकर रोने तथा आँसू बहाने लगी। उस समय उसके मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी थी।

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॥ ३ · २० · २५ ॥
निपातितान् प्रेक्ष्य रणे तु राक्षसान् प्रधाविता शूर्पणखा पुनस्ततः। वधं तेषां निखिलेन रक्षसां शशंस सर्वं भगिनी खरस्य सा॥

nipātitān prekṣya raṇe tu rākṣasān
pradhāvitā śūrpaṇakhā punastataḥ।
vadhaṁ ca teṣāṁ nikhilena rakṣasāṁ
śaśaṁsa sarvaṁ bhaginī kharasya sā॥

रणभूमि में उन राक्षसों को मारा गया देख खर की बहिन शूर्पणखा पुनः वहाँ से भागी हुई आयी। उसने उन समस्त राक्षसों के वध का सारा समाचार भाई से कह सुनाया।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे विंशः सर्गः ॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ २० ॥