वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः १८ · २६ श्लोकाःSarga 18 · 26 ślokas

श्रीरामके टाल देनेपर शूर्पणखाका लक्ष्मणसे प्रणययाचना करना, फिर उनके भी टालनेपर उसका सीतापर आक्रमण और लक्ष्मणका उसके नाक-कान काट लेना

अरण्यकाण्डम् · सर्गः १८ — painting

॥ ३ · १८ · १७–२१ ॥

पर्णशालायाः बहिः क्रुद्धा राक्षसी शूर्पणखा—प्रकीर्णताम्रकेशा ज्वलन्नयना—सौम्यां सीताम् अभिद्रवति; तदा वल्कलधरो लक्ष्मणः शीतक्रोधवदनो निष्कोषितं खड्गम् आवर्तयति, सा च विह्वला पराङ्मुखी पराक्रामति; पार्श्वे धनुर्धरो नीलवर्णो रामो गम्भीरः सीतायाः पुरतो रक्षार्थं बाहुं प्रसारयति, भीता सीता तत्पृष्ठे लीयते।

पर्णशाला के बाहर क्रुद्ध राक्षसी शूर्पणखा—बिखरे ताम्रकेश और जलते नेत्रोंवाली—सौम्य सीता पर झपटती है; उसी क्षण वल्कलधारी लक्ष्मण शीतल क्रोध से भरे मुख से म्यान से खींची तलवार घुमाते हैं और वह राक्षसी विह्वल होकर पीछे हटती है; पार्श्व में धनुषधारी नीलवर्ण श्रीराम गम्भीर मुद्रा में सीता के आगे रक्षा हेतु भुजा फैलाते हैं, और भयभीत सीता उनके पीछे छिप जाती हैं।

Outside the leaf-hut the raging rakshasi Shurpanakha, copper hair flying and eyes ablaze, lunges at the gentle Sita; in that instant the bark-clad Lakshman, his face set in cold wrath, sweeps his drawn sword and the demoness reels back undone, while the grave blue Ram, bow in hand, flings a protecting arm before Sita, who draws behind him in alarm.

॥ ३ · १८ · १ ॥
तां तु शूर्पणखां रामः कामपाशावपाशिताम्। स्वेच्छया श्लक्ष्णया वाचा स्मितपूर्वमथाब्रवीत्॥

tāṁ tu śūrpaṇakhāṁ rāmaḥ kāmapāśāvapāśitām।
svecchayā ślakṣṇayā vācā smitapūrvamathābravīt॥

श्रीराम ने कामपाश से बँधी हुई उस शूर्पणखा से अपनी इच्छा के अनुसार मधुर वाणी में मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा—

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॥ ३ · १८ · २ ॥
कृतदारोऽस्मि भवति भार्येयं दयिता मम। त्वद्विधानां तु नारीणां सुदुःखा ससपत्नता॥

kṛtadāro'smi bhavati bhāryeyaṁ dayitā mama।
tvadvidhānāṁ tu nārīṇāṁ suduḥkhā sasapatnatā॥

‘आदरणीया देवि! मैं विवाह कर चुका हूँ। यह मेरी प्यारी पत्नी विद्यमान है। तुम-जैसी स्त्रियों के लिये तो सौत का रहना अत्यन्त दुःखदायी ही होगा

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॥ ३ · १८ · ३ ॥
अनुजस्त्वेष मे भ्राता शीलवान् प्रियदर्शनः। श्रीमानकृतदारश्च लक्ष्मणो नाम वीर्यवान्॥

anujastveṣa me bhrātā śīlavān priyadarśanaḥ।
śrīmānakṛtadāraśca lakṣmaṇo nāma vīryavān॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · १८ · ४ ॥
अपूर्वी भार्यया चार्थी तरुणः प्रियदर्शनः। अनुरूपश्च ते भर्ता रूपस्यास्य भविष्यति॥

apūrvī bhāryayā cārthī taruṇaḥ priyadarśanaḥ।
anurūpaśca te bhartā rūpasyāsya bhaviṣyati॥

॥ ३–४ ॥

‘ये मेरे छोटे भाई श्रीमान् लक्ष्मण बड़े शीलवान्, देखने में प्रिय लगनेवाले और बल-पराक्रम से सम्पन्न हैं। इनके साथ स्त्री नहीं है। ये अपूर्व गुणों से सम्पन्न हैं। ये तरुण तो हैं ही, इनका रूप भी देखने में बड़ा मनोरम है। अतः यदि इन्हें भार्या की चाह होगी तो ये ही तुम्हारे इस सुन्दर रूप के योग्य पति होंगे

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॥ ३ · १८ · ५ ॥
एनं भज विशालाक्षि भर्तारं भ्रातरं मम। असपत्ना वरारोहे मेरुमर्कप्रभा यथा॥

enaṁ bhaja viśālākṣi bhartāraṁ bhrātaraṁ mama।
asapatnā varārohe merumarkaprabhā yathā॥

‘विशाललोचने! वरारोहे! जैसे सूर्य की प्रभा मेरुपर्वत का सेवन करती है, उसी प्रकार तुम मेरे इन छोटे भाई लक्ष्मण को पति के रूप में अपनाकर सौत के भय से रहित हो इनकी सेवा करो’

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॥ ३ · १८ · ६ ॥
इति रामेण सा प्रोक्ता राक्षसी काममोहिता। विसृज्य रामं सहसा ततो लक्ष्मणमब्रवीत्॥

iti rāmeṇa sā proktā rākṣasī kāmamohitā।
visṛjya rāmaṁ sahasā tato lakṣmaṇamabravīt॥

श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर वह काम से मोहित हुई राक्षसी उन्हें छोड़कर सहसा लक्ष्मण के पास जा पहुँची और इस प्रकार बोली—

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॥ ३ · १८ · ७ ॥
अस्य रूपस्य ते युक्ता भार्याहं वरवर्णिनी। मया सह सुखं सर्वान् दण्डकान् विचरिष्यसि॥

asya rūpasya te yuktā bhāryāhaṁ varavarṇinī।
mayā saha sukhaṁ sarvān daṇḍakān vicariṣyasi॥

‘लक्ष्मण! तुम्हारे इस सुन्दर रूप के योग्य मैं ही हूँ, अतः मैं ही तुम्हारी परम सुन्दरी भार्या हो सकती हूँ। मुझे अङ्गीकार कर लेने पर तुम मेरे साथ समूचे दण्डकारण्य में सुखपूर्वक विचरण कर सकोगे’

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॥ ३ · १८ · ८ ॥
एवमुक्तस्तु सौमित्री राक्षस्या वाक्यकोविदः। ततः शूर्पनखीं स्मित्वा लक्ष्मणो युक्तमब्रवीत्॥

evamuktastu saumitrī rākṣasyā vākyakovidaḥ।
tataḥ śūrpanakhīṁ smitvā lakṣmaṇo yuktamabravīt॥

उस राक्षसी के ऐसा कहने पर बातचीत में निपुण सुमित्राकुमार लक्ष्मण मुसकराकर सूप-जैसे नखवाली उस निशाचरी से यह युक्तियुक्त बात बोले—

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॥ ३ · १८ · ९ ॥
कथं दासस्य मे दासी भार्या भवितुमिच्छसि। सोऽहमार्येण परवान् भ्रात्रा कमलवर्णिनि॥

kathaṁ dāsasya me dāsī bhāryā bhavitumicchasi।
so'hamāryeṇa paravān bhrātrā kamalavarṇini॥

‘लाल कमल के समान गौर वर्णवाली सुन्दरि! मैं तो दास हूँ, अपने बड़े भाई भगवान् श्रीराम के अधीन हूँ, तुम मेरी स्त्री होकर दासी बनना क्यों चाहती हो?

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॥ ३ · १८ · १० ॥
समृद्धार्थस्य सिद्धार्था मुदितामलवर्णिनी। आर्यस्य त्वं विशालाक्षि भार्या भव यवीयसी॥

samṛddhārthasya siddhārthā muditāmalavarṇinī।
āryasya tvaṁ viśālākṣi bhāryā bhava yavīyasī॥

‘विशाललोचने! मेरे बड़े भैया सम्पूर्ण ऐश्वर्यों (अथवा सभी अभीष्ट वस्तुओं) से सम्पन्न हैं। तुम उन्हींको छोटी स्त्री हो जाओ। इससे तुम्हारे सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँगे और तुम सदा प्रसन्न रहोगी। तुम्हारे रूप-रंग उन्हींके योग्य निर्मल हैं

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॥ ३ · १८ · ११ ॥
एतां विरूपामसतीं करालां निर्णतोदरीम्। भार्यां वृद्धां परित्यज्य त्वामेवैष भजिष्यति॥

etāṁ virūpāmasatīṁ karālāṁ nirṇatodarīm।
bhāryāṁ vṛddhāṁ parityajya tvāmevaiṣa bhajiṣyati॥

‘कुरूप, ओछी, विकृत, धँसे हुए पेटवाली और वृद्धा भार्या को त्यागकर ये तुम्हें ही सादर ग्रहण करेंगे

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॥ ३ · १८ · १२ ॥
को हि रूपमिदं श्रेष्ठं संत्यज्य वरवर्णिनि। मानुषीषु वरारोहे कुर्याद् भावं विचक्षणः॥

ko hi rūpamidaṁ śreṣṭhaṁ saṁtyajya varavarṇini।
mānuṣīṣu varārohe kuryād bhāvaṁ vicakṣaṇaḥ॥

‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली वरवर्णिनि! कौन ऐसा बुद्धिमान् मनुष्य होगा, जो तुम्हारे इस श्रेष्ठ रूप को छोड़कर मानवकन्याओं से प्रेम करेगा?’

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॥ ३ · १८ · १३ ॥
इति सा लक्ष्मणेनोक्ता कराला निर्णतोदरी। मन्यते तद्वचः सत्यं परिहासाविचक्षणा॥

iti sā lakṣmaṇenoktā karālā nirṇatodarī।
manyate tadvacaḥ satyaṁ parihāsāvicakṣaṇā॥

लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर परिहास को न समझनेवाली उस लंबे पेटवाली विकराल राक्षसी ने उनकी बात को सच्ची माना

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॥ ३ · १८ · १४ ॥
सा रामं पर्णशालायामुपविष्टं परंतपम्। सीतया सह दुर्धर्षमब्रवीत् काममोहिता॥

sā rāmaṁ parṇaśālāyāmupaviṣṭaṁ paraṁtapam।
sītayā saha durdharṣamabravīt kāmamohitā॥

वह पर्णशाला में सीता के साथ बैठे हुए शत्रुसंतापी दुर्जय वीर श्रीरामचन्द्रजी के पास लौट आयी और काम से मोहित होकर बोली—

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॥ ३ · १८ · १५ ॥
इमां विरूपामसतीं करालां निर्णतोदरीम्। वृद्धां भार्यामवष्टभ्य मां त्वं बहु मन्यसे॥

imāṁ virūpāmasatīṁ karālāṁ nirṇatodarīm।
vṛddhāṁ bhāryāmavaṣṭabhya na māṁ tvaṁ bahu manyase॥

‘राम! तुम इस कुरूप, ओछी, विकृत, धँसे हुए पेटवाली और वृद्धा का आश्रय लेकर मेरा विशेष आदर नहीं करते हो

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॥ ३ · १८ · १६ ॥
अद्येमां भक्षयिष्यामि पश्यतस्तव मानुषीम्। त्वया सह चरिष्यामि निःसपत्ना यथासुखम्॥

adyemāṁ bhakṣayiṣyāmi paśyatastava mānuṣīm।
tvayā saha cariṣyāmi niḥsapatnā yathāsukham॥

‘अतः आज तुम्हारे देखते-देखते मैं इस मानुषी को खा जाऊँगी और इस सौत के न रहने पर तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचरण करूँगी’

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॥ ३ · १८ · १७ ॥
इत्युक्त्वा मृगशावाक्षीमलातसदृशेक्षणा। अभ्यगच्छत् सुसंक्रुद्धा महोल्का रोहिणीमिव॥

ityuktvā mṛgaśāvākṣīmalātasadṛśekṣaṇā।
abhyagacchat susaṁkruddhā maholkā rohiṇīmiva॥

ऐसा कहकर दहकते हुए अंगारों के समान नेत्रोंवाली शूर्पणखा अत्यन्त क्रोध में भरकर मृगनयनी सीता की ओर झपटी, मानो कोई बड़ी भारी उल्का रोहिणी नामक तारे पर टूट पड़ी हो

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॥ ३ · १८ · १८ ॥
तां मृत्युपाशप्रतिमामापतन्तीं महाबलः। विगृह्य रामः कुपितस्ततो लक्ष्मणमब्रवीत्॥

tāṁ mṛtyupāśapratimāmāpatantīṁ mahābalaḥ।
vigṛhya rāmaḥ kupitastato lakṣmaṇamabravīt॥

महाबली श्रीराम ने मौत के फंदे की तरह आती हुई उस राक्षसी को हुंकार से रोककर कुपित हो लक्ष्मण से कहा—

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॥ ३ · १८ · १९ ॥
क्रूरैरनार्यैः सौमित्रे परिहासः कथंचन। कार्यः पश्य वैदेहीं कथंचित् सौम्य जीवतीम्॥

krūrairanāryaiḥ saumitre parihāsaḥ kathaṁcana।
na kāryaḥ paśya vaidehīṁ kathaṁcit saumya jīvatīm॥

‘सुमित्रानन्दन! क्रूर कर्म करनेवाले अनार्यों से किसी प्रकार का परिहास भी नहीं करना चाहिये। सौम्य! देखो न, इस समय सीता के प्राण किसी प्रकार बड़ी मुश्किल से बचे हैं

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॥ ३ · १८ · २० ॥
इमां विरूपामसतीमतिमत्तां महोदरीम्। राक्षसीं पुरुषव्याघ्र विरूपयितुमर्हसि॥

imāṁ virūpāmasatīmatimattāṁ mahodarīm।
rākṣasīṁ puruṣavyāghra virūpayitumarhasi॥

‘पुरुषसिंह! तुम्हें इस कुरूपा, कुलटा, अत्यन्त मतवाली और लंबे पेटवाली राक्षसी को कुरूप—किसी अङ्ग से हीन कर देना चाहिये’

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॥ ३ · १८ · २१ ॥
इत्युक्तो लक्ष्मणस्तस्याः क्रुद्धो रामस्य पश्यतः। उद्धृत्य खड्गं चिच्छेद कर्णनासे महाबलः॥

ityukto lakṣmaṇastasyāḥ kruddho rāmasya paśyataḥ।
uddhṛtya khaḍgaṁ ciccheda karṇanāse mahābalaḥ॥

श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार आदेश देने पर क्रोध में भरे हुए महाबली लक्ष्मण ने उनके देखते-देखते म्यान से तलवार खींच ली और शूर्पणखा के नाक-कान काट लिये

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॥ ३ · १८ · २२ ॥
निकृत्तकर्णनासा तु विस्वरं सा विनद्य च। यथागतं प्रदुद्राव घोरा शूर्पणखा वनम्॥

nikṛttakarṇanāsā tu visvaraṁ sā vinadya ca।
yathāgataṁ pradudrāva ghorā śūrpaṇakhā vanam॥

नाक और कान कट जाने पर भयंकर राक्षसी शूर्पणखा बड़े जोर से चिल्लाकर जैसे आयी थी, उसी तरह वन में भाग गयी

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॥ ३ · १८ · २३ ॥
सा विरूपा महाघोरा राक्षसी शोणितोक्षिता। ननाद विविधान् नादान् यथा प्रावृषि तोयदः॥

sā virūpā mahāghorā rākṣasī śoṇitokṣitā।
nanāda vividhān nādān yathā prāvṛṣi toyadaḥ॥

खून से भीगी हुई वह महाभयंकर एवं विकराल रूपवाली निशाचरी नाना प्रकार के स्वरों में जोर-जोर से चीत्कार करने लगी, मानो वर्षाकाल में मेघों की घटा गर्जन-तर्जन कर रही हो

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॥ ३ · १८ · २४ ॥
सा विक्षरन्ती रुधिरं बहुधा घोरदर्शना। प्रगृह्य बाहू गर्जन्ती प्रविवेश महावनम्॥

sā vikṣarantī rudhiraṁ bahudhā ghoradarśanā।
pragṛhya bāhū garjantī praviveśa mahāvanam॥

वह देखने में बड़ी भयानक थी। उसने अपने कटे हुए अङ्गों से बारंबार खून की धारा बहाते और दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर चिग्घाड़ते हुए एक विशाल वन के भीतर प्रवेश किया

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॥ ३ · १८ · २५ ॥
ततस्तु सा राक्षससङ्घसंवृतं खरं जनस्थानगतं विरूपिता। उपेत्य तं भ्रातरमुग्रतेजसं पपात भूमौ गगनाद् यथाशनिः॥

tatastu sā rākṣasasaṅghasaṁvṛtaṁ
kharaṁ janasthānagataṁ virūpitā।
upetya taṁ bhrātaramugratejasaṁ
papāta bhūmau gaganād yathāśaniḥ॥

लक्ष्मण के द्वारा कुरूप की गयी शूर्पणखा वहाँ से भागकर राक्षससमूह से घिरे हुए भयंकर तेजवाले जनस्थान-निवासी भ्राता खर के पास गयी और जैसे आकाश से बिजली गिरती है, उसी प्रकार वह पृथ्वी पर गिर पड़ी

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॥ ३ · १८ · २६ ॥
ततः सभार्यं भयमोहमूर्च्छिता सलक्ष्मणं राघवमागतं वनम्। विरूपणं चात्मनि शोणितोक्षिता शशंस सर्वं भगिनी खरस्य सा॥

tataḥ sabhāryaṁ bhayamohamūrcchitā
salakṣmaṇaṁ rāghavamāgataṁ vanam।
virūpaṇaṁ cātmani śoṇitokṣitā
śaśaṁsa sarvaṁ bhaginī kharasya sā॥

खर की वह बहन रक्त से नहा गयी थी और भय तथा मोह से अचेत-सी हो रही थी। उसने वन में सीता और लक्ष्मण के साथ श्रीरामचन्द्रजी के आने और अपने कुरूप किये जाने का सारा वृत्तान्त खर से कह सुनाया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १८ ॥