श्रीरामके टाल देनेपर शूर्पणखाका लक्ष्मणसे प्रणययाचना करना, फिर उनके भी टालनेपर उसका सीतापर आक्रमण और लक्ष्मणका उसके नाक-कान काट लेना
॥ ३ · १८ · १७–२१ ॥
पर्णशालायाः बहिः क्रुद्धा राक्षसी शूर्पणखा—प्रकीर्णताम्रकेशा ज्वलन्नयना—सौम्यां सीताम् अभिद्रवति; तदा वल्कलधरो लक्ष्मणः शीतक्रोधवदनो निष्कोषितं खड्गम् आवर्तयति, सा च विह्वला पराङ्मुखी पराक्रामति; पार्श्वे धनुर्धरो नीलवर्णो रामो गम्भीरः सीतायाः पुरतो रक्षार्थं बाहुं प्रसारयति, भीता सीता तत्पृष्ठे लीयते।
पर्णशाला के बाहर क्रुद्ध राक्षसी शूर्पणखा—बिखरे ताम्रकेश और जलते नेत्रोंवाली—सौम्य सीता पर झपटती है; उसी क्षण वल्कलधारी लक्ष्मण शीतल क्रोध से भरे मुख से म्यान से खींची तलवार घुमाते हैं और वह राक्षसी विह्वल होकर पीछे हटती है; पार्श्व में धनुषधारी नीलवर्ण श्रीराम गम्भीर मुद्रा में सीता के आगे रक्षा हेतु भुजा फैलाते हैं, और भयभीत सीता उनके पीछे छिप जाती हैं।
Outside the leaf-hut the raging rakshasi Shurpanakha, copper hair flying and eyes ablaze, lunges at the gentle Sita; in that instant the bark-clad Lakshman, his face set in cold wrath, sweeps his drawn sword and the demoness reels back undone, while the grave blue Ram, bow in hand, flings a protecting arm before Sita, who draws behind him in alarm.
tāṁ tu śūrpaṇakhāṁ rāmaḥ kāmapāśāvapāśitām।
svecchayā ślakṣṇayā vācā smitapūrvamathābravīt॥
श्रीराम ने कामपाश से बँधी हुई उस शूर्पणखा से अपनी इच्छा के अनुसार मधुर वाणी में मन्द-मन्द मुसकराते हुए कहा—
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kṛtadāro'smi bhavati bhāryeyaṁ dayitā mama।
tvadvidhānāṁ tu nārīṇāṁ suduḥkhā sasapatnatā॥
‘आदरणीया देवि! मैं विवाह कर चुका हूँ। यह मेरी प्यारी पत्नी विद्यमान है। तुम-जैसी स्त्रियों के लिये तो सौत का रहना अत्यन्त दुःखदायी ही होगा
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anujastveṣa me bhrātā śīlavān priyadarśanaḥ।
śrīmānakṛtadāraśca lakṣmaṇo nāma vīryavān॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
apūrvī bhāryayā cārthī taruṇaḥ priyadarśanaḥ।
anurūpaśca te bhartā rūpasyāsya bhaviṣyati॥
‘ये मेरे छोटे भाई श्रीमान् लक्ष्मण बड़े शीलवान्, देखने में प्रिय लगनेवाले और बल-पराक्रम से सम्पन्न हैं। इनके साथ स्त्री नहीं है। ये अपूर्व गुणों से सम्पन्न हैं। ये तरुण तो हैं ही, इनका रूप भी देखने में बड़ा मनोरम है। अतः यदि इन्हें भार्या की चाह होगी तो ये ही तुम्हारे इस सुन्दर रूप के योग्य पति होंगे
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enaṁ bhaja viśālākṣi bhartāraṁ bhrātaraṁ mama।
asapatnā varārohe merumarkaprabhā yathā॥
‘विशाललोचने! वरारोहे! जैसे सूर्य की प्रभा मेरुपर्वत का सेवन करती है, उसी प्रकार तुम मेरे इन छोटे भाई लक्ष्मण को पति के रूप में अपनाकर सौत के भय से रहित हो इनकी सेवा करो’
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iti rāmeṇa sā proktā rākṣasī kāmamohitā।
visṛjya rāmaṁ sahasā tato lakṣmaṇamabravīt॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर वह काम से मोहित हुई राक्षसी उन्हें छोड़कर सहसा लक्ष्मण के पास जा पहुँची और इस प्रकार बोली—
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asya rūpasya te yuktā bhāryāhaṁ varavarṇinī।
mayā saha sukhaṁ sarvān daṇḍakān vicariṣyasi॥
‘लक्ष्मण! तुम्हारे इस सुन्दर रूप के योग्य मैं ही हूँ, अतः मैं ही तुम्हारी परम सुन्दरी भार्या हो सकती हूँ। मुझे अङ्गीकार कर लेने पर तुम मेरे साथ समूचे दण्डकारण्य में सुखपूर्वक विचरण कर सकोगे’
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evamuktastu saumitrī rākṣasyā vākyakovidaḥ।
tataḥ śūrpanakhīṁ smitvā lakṣmaṇo yuktamabravīt॥
उस राक्षसी के ऐसा कहने पर बातचीत में निपुण सुमित्राकुमार लक्ष्मण मुसकराकर सूप-जैसे नखवाली उस निशाचरी से यह युक्तियुक्त बात बोले—
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kathaṁ dāsasya me dāsī bhāryā bhavitumicchasi।
so'hamāryeṇa paravān bhrātrā kamalavarṇini॥
‘लाल कमल के समान गौर वर्णवाली सुन्दरि! मैं तो दास हूँ, अपने बड़े भाई भगवान् श्रीराम के अधीन हूँ, तुम मेरी स्त्री होकर दासी बनना क्यों चाहती हो?
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samṛddhārthasya siddhārthā muditāmalavarṇinī।
āryasya tvaṁ viśālākṣi bhāryā bhava yavīyasī॥
‘विशाललोचने! मेरे बड़े भैया सम्पूर्ण ऐश्वर्यों (अथवा सभी अभीष्ट वस्तुओं) से सम्पन्न हैं। तुम उन्हींको छोटी स्त्री हो जाओ। इससे तुम्हारे सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँगे और तुम सदा प्रसन्न रहोगी। तुम्हारे रूप-रंग उन्हींके योग्य निर्मल हैं
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etāṁ virūpāmasatīṁ karālāṁ nirṇatodarīm।
bhāryāṁ vṛddhāṁ parityajya tvāmevaiṣa bhajiṣyati॥
‘कुरूप, ओछी, विकृत, धँसे हुए पेटवाली और वृद्धा भार्या को त्यागकर ये तुम्हें ही सादर ग्रहण करेंगे
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ko hi rūpamidaṁ śreṣṭhaṁ saṁtyajya varavarṇini।
mānuṣīṣu varārohe kuryād bhāvaṁ vicakṣaṇaḥ॥
‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली वरवर्णिनि! कौन ऐसा बुद्धिमान् मनुष्य होगा, जो तुम्हारे इस श्रेष्ठ रूप को छोड़कर मानवकन्याओं से प्रेम करेगा?’
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iti sā lakṣmaṇenoktā karālā nirṇatodarī।
manyate tadvacaḥ satyaṁ parihāsāvicakṣaṇā॥
लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर परिहास को न समझनेवाली उस लंबे पेटवाली विकराल राक्षसी ने उनकी बात को सच्ची माना
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sā rāmaṁ parṇaśālāyāmupaviṣṭaṁ paraṁtapam।
sītayā saha durdharṣamabravīt kāmamohitā॥
वह पर्णशाला में सीता के साथ बैठे हुए शत्रुसंतापी दुर्जय वीर श्रीरामचन्द्रजी के पास लौट आयी और काम से मोहित होकर बोली—
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imāṁ virūpāmasatīṁ karālāṁ nirṇatodarīm।
vṛddhāṁ bhāryāmavaṣṭabhya na māṁ tvaṁ bahu manyase॥
‘राम! तुम इस कुरूप, ओछी, विकृत, धँसे हुए पेटवाली और वृद्धा का आश्रय लेकर मेरा विशेष आदर नहीं करते हो
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adyemāṁ bhakṣayiṣyāmi paśyatastava mānuṣīm।
tvayā saha cariṣyāmi niḥsapatnā yathāsukham॥
‘अतः आज तुम्हारे देखते-देखते मैं इस मानुषी को खा जाऊँगी और इस सौत के न रहने पर तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचरण करूँगी’
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ityuktvā mṛgaśāvākṣīmalātasadṛśekṣaṇā।
abhyagacchat susaṁkruddhā maholkā rohiṇīmiva॥
ऐसा कहकर दहकते हुए अंगारों के समान नेत्रोंवाली शूर्पणखा अत्यन्त क्रोध में भरकर मृगनयनी सीता की ओर झपटी, मानो कोई बड़ी भारी उल्का रोहिणी नामक तारे पर टूट पड़ी हो
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tāṁ mṛtyupāśapratimāmāpatantīṁ mahābalaḥ।
vigṛhya rāmaḥ kupitastato lakṣmaṇamabravīt॥
महाबली श्रीराम ने मौत के फंदे की तरह आती हुई उस राक्षसी को हुंकार से रोककर कुपित हो लक्ष्मण से कहा—
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krūrairanāryaiḥ saumitre parihāsaḥ kathaṁcana।
na kāryaḥ paśya vaidehīṁ kathaṁcit saumya jīvatīm॥
‘सुमित्रानन्दन! क्रूर कर्म करनेवाले अनार्यों से किसी प्रकार का परिहास भी नहीं करना चाहिये। सौम्य! देखो न, इस समय सीता के प्राण किसी प्रकार बड़ी मुश्किल से बचे हैं
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imāṁ virūpāmasatīmatimattāṁ mahodarīm।
rākṣasīṁ puruṣavyāghra virūpayitumarhasi॥
‘पुरुषसिंह! तुम्हें इस कुरूपा, कुलटा, अत्यन्त मतवाली और लंबे पेटवाली राक्षसी को कुरूप—किसी अङ्ग से हीन कर देना चाहिये’
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ityukto lakṣmaṇastasyāḥ kruddho rāmasya paśyataḥ।
uddhṛtya khaḍgaṁ ciccheda karṇanāse mahābalaḥ॥
श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार आदेश देने पर क्रोध में भरे हुए महाबली लक्ष्मण ने उनके देखते-देखते म्यान से तलवार खींच ली और शूर्पणखा के नाक-कान काट लिये
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nikṛttakarṇanāsā tu visvaraṁ sā vinadya ca।
yathāgataṁ pradudrāva ghorā śūrpaṇakhā vanam॥
नाक और कान कट जाने पर भयंकर राक्षसी शूर्पणखा बड़े जोर से चिल्लाकर जैसे आयी थी, उसी तरह वन में भाग गयी
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sā virūpā mahāghorā rākṣasī śoṇitokṣitā।
nanāda vividhān nādān yathā prāvṛṣi toyadaḥ॥
खून से भीगी हुई वह महाभयंकर एवं विकराल रूपवाली निशाचरी नाना प्रकार के स्वरों में जोर-जोर से चीत्कार करने लगी, मानो वर्षाकाल में मेघों की घटा गर्जन-तर्जन कर रही हो
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sā vikṣarantī rudhiraṁ bahudhā ghoradarśanā।
pragṛhya bāhū garjantī praviveśa mahāvanam॥
वह देखने में बड़ी भयानक थी। उसने अपने कटे हुए अङ्गों से बारंबार खून की धारा बहाते और दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर चिग्घाड़ते हुए एक विशाल वन के भीतर प्रवेश किया
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tatastu sā rākṣasasaṅghasaṁvṛtaṁ
kharaṁ janasthānagataṁ virūpitā।
upetya taṁ bhrātaramugratejasaṁ
papāta bhūmau gaganād yathāśaniḥ॥
लक्ष्मण के द्वारा कुरूप की गयी शूर्पणखा वहाँ से भागकर राक्षससमूह से घिरे हुए भयंकर तेजवाले जनस्थान-निवासी भ्राता खर के पास गयी और जैसे आकाश से बिजली गिरती है, उसी प्रकार वह पृथ्वी पर गिर पड़ी
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tataḥ sabhāryaṁ bhayamohamūrcchitā
salakṣmaṇaṁ rāghavamāgataṁ vanam।
virūpaṇaṁ cātmani śoṇitokṣitā
śaśaṁsa sarvaṁ bhaginī kharasya sā॥
खर की वह बहन रक्त से नहा गयी थी और भय तथा मोह से अचेत-सी हो रही थी। उसने वन में सीता और लक्ष्मण के साथ श्रीरामचन्द्रजी के आने और अपने कुरूप किये जाने का सारा वृत्तान्त खर से कह सुनाया
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डेऽष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १८ ॥