लक्ष्मणके द्वारा हेमन्त ऋतुका वर्णन और भरतकी प्रशंसा तथा श्रीरामका उन दोनोंके साथ गोदावरी नदीमें स्नान
॥ ३ · १६ · ४१–४२ ॥
हेमन्तप्रत्यूषे नीहारावृते गोदावरीतीरे स्नात्वा नीलवर्णो रामः उद्यन्तम् अरुणसूर्यम् अभिमुखो जलाञ्जलिम् उन्नमय्य अर्घ्यं ददाति, आर्द्रवल्कलः सजलजटश्च; पृष्ठे कलशधरो नतशिरा लक्ष्मणः पार्श्वे बद्धाञ्जलिः सीता च सूर्यम् उपतिष्ठन्ते; सरोवरतीरे सारसाः क्वणन्ति।
हेमन्त के कुहासे-भरे प्रातःकाल में गोदावरी के तट पर स्नान करके नीले वर्ण के श्रीराम उदित होते अरुण सूर्य के सम्मुख अञ्जलि में जल लेकर अर्घ्य दे रहे हैं, उनकी जटा जल से भीगी और वल्कल आर्द्र है; पीछे कलश लिये नतमस्तक लक्ष्मण और पार्श्व में हाथ जोड़े सीता भी सूर्यदेव की उपासना कर रहे हैं; सरोवर-तट पर सारस कूज रहे हैं।
Fresh from their bath at the Godavari on a misty early-winter dawn, the blue Ram, his matted hair beaded with water and bark-cloth still wet, faces the rising sun and pours an arghya of water from his cupped hands; behind him Lakshman stands head bowed holding a brass water-pot, and Sita a little apart with folded hands, all in worship of the sun, while cranes call along the banks.
vasatastasya tu sukhaṁ rāghavasya mahātmanaḥ।
śaradvyapāye hemantaṛturiṣṭaḥ pravartata॥
महात्मा श्रीराम को उस आश्रम में रहते हुए शरद् ऋतु बीत गयी और प्रिय हेमन्त का आरम्भ हुआ
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sa kadācit prabhātāyāṁ śarvaryāṁ raghunandanaḥ।
prayayāvabhiṣekārthaṁ ramyāṁ godāvarīṁ nadīm॥
एक दिन प्रातःकाल रघुकुलनन्दन श्रीराम स्नान करने के लिये परम रमणीय गोदावरी नदी के तट पर गये
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prahvaḥ kalaśahastastu sītayā saha vīryavān।
pṛṣṭhato'nuvrajan bhrātā saumitriridamabravīt॥
उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी, जो बड़े ही विनीत और पराक्रमी थे, सीता के साथ-साथ हाथ में घड़ा लिये उनके पीछे-पीछे गये। जाते-जाते वे श्रीरामचन्द्रजी से इस प्रकार बोले—
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ayaṁ sa kālaḥ samprāptaḥ priyo yaste priyaṁvada।
alaṁkṛta ivābhāti yena saṁvatsaraḥ śubhaḥ॥
प्रिय वचन बोलनेवाले भैया श्रीराम! यह वही हेमन्तकाल आ पहुँचा है, जो आपको अधिक प्रिय है और जिससे यह शुभ संवत्सर अलंकृत-सा प्रतीत होता है
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nīhāraparuṣo lokaḥ pṛthivī sasyamālinī।
jalānyanupabhogyāni subhago havyavāhanaḥ॥
‘इस ऋतु में अधिक ठण्डक या पाले के कारण लोगों का शरीर रूखा हो जाता है। पृथ्वी पर रबी की खेती लहलहाने लगती है। जल अधिक शीतल होने के कारण पीने के योग्य नहीं रहता और आग बड़ी प्रिय लगती है
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navāgrayaṇapūjābhirabhyarcya pitṛdevatāḥ।
kṛtāgrayaṇakāḥ kāle santo vigatakalmaṣāḥ॥
‘नवसस्येष्टि’ कर्म के अनुष्ठान की इस वेला में नूतन अन्न ग्रहण करने के लिये की गयी आग्रयणकर्मरूप पूजाओंद्वारा देवताओं तथा पितरों को संतुष्ट करके उक्त आग्रयणकर्म का सम्पादन करनेवाले सत्पुरुष निष्पाप हो गये हैं
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prājyakāmā janapadāḥ sampannataragorasāḥ।
vicaranti mahīpālā yātrārthaṁ vijigīṣavaḥ॥
‘इस ऋतु में प्रायः सभी जनपदों के निवासियों की अन्नप्राप्तिविषयक कामनाएँ प्रचुररूप से पूर्ण हो जाती हैं। गोरस की भी बहुतायत होती है तथा विजय की इच्छा रखनेवाले भूपालगण युद्ध-यात्रा के लिये विचरते रहते हैं
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sevamāne dṛḍhaṁ sūrye diśamantakasevitām।
vihīnatilakeva strī nottarā dik prakāśate॥
‘सूर्यदेव इन दिनों यमसेवित दक्षिणदिशा का दृढतापूर्वक सेवन करने लगे हैं। इसलिये उत्तरदिशा सिंदूरविन्दु से वञ्चित हुई नारी की भाँति सुशोभित या प्रकाशित नहीं हो रही है
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prakṛtyā himakośāḍhyo dūrasūryaśca sāmpratam।
yathārthanāmā suvyaktaṁ himavān himavān giriḥ॥
‘हिमालयपर्वत तो स्वभाव से ही घनीभूत हिम के खजाने से भरा-पूरा होता है, परंतु इस समय सूर्यदेव भी दक्षिणायन में चले जाने के कारण उससे दूर हो गये हैं; अतः अब अधिक हिम के संचय से सम्पन्न होकर हिमवान् गिरि स्पष्ट ही अपने नाम को सार्थक कर रहा है
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atyantasukhasaṁcārā madhyāhne sparśataḥ sukhāḥ।
divasāḥ subhagādityāśchāyāsaliladurbhagāḥ॥
‘मध्याह्नकाल में धूप का स्पर्श होने से हेमन्त के सुखमय दिन अत्यन्त सुख से इधर-उधर विचरने के योग्य होते हैं। इन दिनों सुसेव्य होने के कारण सूर्यदेव सौभाग्यशाली जान पड़ते हैं और सेवन के योग्य न होने के कारण छाँह तथा जल अभागे प्रतीत होते हैं
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mṛdusūryāḥ sunīhārāḥ paṭuśītāḥ samārutāḥ।
śūnyāraṇyā himadhvastā divasā bhānti sāmpratam॥
‘आजकल के दिन ऐसे हैं कि सूर्य की किरणों का स्पर्श कोमल (प्रिय) जान पड़ता है। कुहासे अधिक पड़ते हैं। सरदी सबल होती है, कड़ाके का जाड़ा पड़ने लगता है। साथ ही ठण्डी हवा चलती रहती है। पाला पड़ने से पत्तों के झड़ जाने के कारण जंगल सूने दिखायी देते हैं और हिम के स्पर्श से कमल गल जाते हैं
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nivṛttākāśaśayanāḥ puṣyanītā himāruṇāḥ।
śītavṛddhatarāyāmāstriyāmā yānti sāmpratam॥
‘इस हेमन्तकाल में रातें बड़ी होने लगती हैं। इनमें सरदी बहुत बढ़ जाती है। खुले आकाश में कोई नहीं सोते हैं। पौषमास की ये रातें हिमपात के कारण धूसर प्रतीत होती हैं
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ravisaṁkrāntasaubhāgyastuṣārāruṇamaṇḍalaḥ।
niḥśvāsāndha ivādarśaścandramā na prakāśate॥
‘हेमन्तकाल में चन्द्रमा का सौभाग्य सूर्यदेव में चला गया है (चन्द्रमा सरदी के कारण असेव्य और सूर्य मन्दरश्मि होने के कारण सेव्य हो गये हैं)। चन्द्रमण्डल हिमकणों से आच्छन्न होकर धूमिल जान पड़ता है; अतः चन्द्रदेव निःश्वासवायु से मलिन हुए दर्पण की भाँति प्रकाशित नहीं हो रहे हैं
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jyotsnā tuṣāramalinā paurṇamāsyāṁ na rājate।
sīteva cātapaśyāmā lakṣyate na ca śobhate॥
‘इन दिनों पूर्णिमा की चाँदनी रात भी तुहिन-बिन्दुओं से मलिन दिखायी देती है—प्रकाशित नहीं होती है। ठीक उसी तरह, जैसे सीता अधिक धूप लगने से साँवली-सी दीखती है—पूर्ववत् शोभा नहीं पाती
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prakṛtyā śītalasparśo himaviddhaśca sāmpratam।
pravāti paścimo vāyuḥ kāle dviguṇaśītalaḥ॥
‘स्वभाव से ही जिसका स्पर्श शीतल है, वह पछुआ हवा इस समय हिमकणों से व्याप्त हो जाने के कारण दूनी सरदी लेकर बड़े वेग से बह रही है
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bāṣpacchannānyaraṇyāni yavagodhūmavanti ca।
śobhante'bhyudite sūrye nadadbhiḥ krauñcasārasaiḥ॥
‘जौ और गेहूँ के खेतों से युक्त ये बहुसंख्यक वन भाप से ढंके हुए हैं तथा क्रौञ्च और सारस इनमें कलरव कर रहे हैं। सूर्योदयकाल में इन वनों की बड़ी शोभा हो रही है
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kharjūrapuṣpākṛtibhiḥ śirobhiḥ pūrṇataṇḍulaiḥ।
śobhante kiṁcidālambāḥ śālayaḥ kanakaprabhāḥ॥
‘ये सुनहरे रंग के जड़हन धान खजूर के फूल के-से आकारवाली बालों से, जिनमें चावल भरे हुए हैं, कुछ लटक गये हैं। इन बालों के कारण इनकी बड़ी शोभा होती है
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mayūkhairupasarpadbhirhimanīhārasaṁvṛtaiḥ।
dūramabhyuditaḥ sūryaḥ śaśāṅka iva lakṣyate॥
‘कुहासे से ढकी और फैलती हुई किरणों से उपलक्षित होनेवाले दूरोदित सूर्य चन्द्रमा के समान दिखायी देते हैं
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āgrāhyavīryaḥ pūrvāhṇe madhyāhne sparśataḥ sukhaḥ।
saṁraktaḥ kiṁcidāpāṇḍurātapaḥ śobhate kṣitau॥
‘इस समय अधिक लाल और कुछ-कुछ श्वेत, पीत वर्ण की धूप पृथ्वी पर फैलकर शोभा पा रही है। पूर्वाह्णकाल में तो कुछ इसका बल जान ही नहीं पड़ता है, परंतु मध्याह्नकाल में इसके स्पर्श से सुख का अनुभव होता है
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avaśyāyanipātena kiṁcitpraklinnaśādvalā।
vanānāṁ śobhate bhūmirniviṣṭataruṇātapā॥
‘ओस की बूँदें पड़ने से जहाँ की घासें कुछ-कुछ भीगी हुई जान पड़ती हैं, वह वनभूमि नवोदित सूर्य की धूप का प्रवेश होने से अद्भुत शोभा पा रही है
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spṛśan suvipulaṁ śītamudakaṁ dviradaḥ sukham।
atyantatṛṣito vanyaḥ pratisaṁharate karam॥
‘यह जंगली हाथी बहुत प्यासा हुआ है। यह सुखपूर्वक प्यास बुझाने के लिये अत्यन्त शीतल जल का स्पर्श तो करता है, किंतु उसकी ठंडक असह्य होने के कारण अपनी सूँड़ को तुरंत ही सिकोड़ लेता है
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ete hi samupāsīnā vihagā jalacāriṇaḥ।
nāvagāhanti salilamapragalbhā ivāhavam॥
‘ये जलचर पक्षी जल के पास ही बैठे हैं; परंतु जैसे डरपोक मनुष्य युद्धभूमि में प्रवेश नहीं करते हैं, उसी प्रकार ये पानी में नहीं उतर रहे हैं
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avaśyāyatamonaddhā nīhāratamasāvṛtāḥ।
prasuptā iva lakṣyante vipuṣpā vanarājayaḥ॥
‘रात में ओसविन्दुओं और अन्धकार से आच्छादित तथा प्रातःकाल कुहासे के अँधेरे से ढकी हुई ये पुष्पहीन वनश्रेणियाँ सोयी हुई-सी दिखायी देती हैं
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bāṣpasaṁchannasalilā rutavijñeyasārasāḥ।
himārdravālukaistīraiḥ sarito bhānti sāmpratam॥
‘इस समय नदियों के जल भाप से ढके हुए हैं। इनमें विचरनेवाले सारस केवल अपने कलरवों से पहचाने जाते हैं तथा ये सरिताएँ भी ओस से भीगी हुई बालूवाले अपने तटों से ही प्रकाश में आती हैं (जल से नहीं)
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tuṣārapatanāccaiva mṛdutvād bhāskarasya ca।
śaityādagāgrasthamapi prāyeṇa rasavajjalam॥
‘बर्फ पड़ने से और सूर्य की किरणों के मन्द होने से अधिक सर्दी के कारण इन दिनों पर्वत के शिखर पर पड़ा हुआ जल भी प्रायः स्वादिष्ट प्रतीत होता है
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jarājarjaritaiḥ patraiḥ śīrṇakesarakarṇikaiḥ।
nālaśeṣā himadhvastā na bhānti kamalākarāḥ॥
‘जो पुराने पड़ जाने के कारण जर्जर हो गये हैं, जिनकी कर्णिका और केसर जीर्ण-शीर्ण हो गये हैं, ऐसे दलों से उपलक्षित होनेवाले कमलों के समूह पाला पड़ने से गल गये हैं। उनमें डंठलमात्र शेष रह गये हैं। इसीलिये उनकी शोभा नष्ट हो गयी है
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asmiṁstu puruṣavyāghra kāle duḥkhasamanvitaḥ।
tapaścarati dharmātmā tvadbhaktyā bharataḥ pure॥
‘पुरुषसिंह श्रीराम! इस समय धर्मात्मा भरत आपके लिये बहुत दुःखी हैं और आपमें भक्ति रखते हुए नगर में ही तपस्या कर रहे हैं
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tyaktvā rājyaṁ ca mānaṁ ca bhogāṁśca vividhān bahūn।
tapasvī niyatāhāraḥ śete śīte mahītale॥
‘वे राज्य, मान तथा नाना प्रकार के बहुसंख्यक भोगों का परित्याग करके तपस्या में संलग्न हैं एवं नियमित आहार करते हुए इस शीतल महीतल पर बिना विस्तर के ही शयन करते हैं
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so'pi velāmimāṁ nūnamabhiṣekārthamudyataḥ।
vṛtaḥ prakṛtibhirnityaṁ prayāti sarayūṁ nadīm॥
‘निश्चय ही भरत भी इसी बेला में स्नान के लिये उद्यत हो मन्त्री एवं प्रजाजनों के साथ प्रतिदिन सरयू नदी के तट पर जाते होंगे
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atyantasukhasaṁvṛddhaḥ sukumāro himārditaḥ।
kathaṁ tvapararātreṣu sarayūmavagāhate॥
‘अत्यन्त सुख में पले हुए सुकुमार भरत जाड़े का कष्ट सहते हुए रात के पिछले पहर में कैसे सरयूजी के जल में डुबकी लगाते होंगे
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padmapatrekṣaṇaḥ śyāmaḥ śrīmān nirudaro mahān।
dharmajñaḥ satyavādī ca hrīniṣevī jitendriyaḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
priyābhibhāṣī madhuro dīrghabāhurariṁdamaḥ।
saṁtyajya vividhān saukhyānyāryaṁ sarvātmanāśritaḥ॥
‘जिनके नेत्र कमलदल के समान शोभा पाते हैं, जिनकी अङ्गकान्ति श्याम है और जिनके उदर का कुछ पता ही नहीं लगता है, ऐसे महान् धर्मज्ञ, सत्यवादी, लज्जाशील, जितेन्द्रिय, प्रिय वचन बोलनेवाले, मृदुल स्वभाववाले महाबाहु शत्रुदमन श्रीमान् भरत ने नाना प्रकार के सुखों को त्यागकर सर्वथा आपका ही आश्रय ग्रहण किया है
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jitaḥ svargastava bhrātrā bharatena mahātmanā।
vanasthamapi tāpasye yastvāmanuvidhīyate॥
‘आपके भाई महात्मा भरत ने निश्चय ही स्वर्ग-लोक पर विजय प्राप्त कर ली है; क्योंकि वे भी तपस्या में स्थित होकर आपके वनवासी जीवन का अनुसरण कर रहे हैं
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na pitryamanuvartante mātṛkaṁ dvipadā iti।
khyāto lokapravādo'yaṁ bharatenānyathā kṛtaḥ॥
‘मनुष्य प्रायः माता के गुणों का ही अनुवर्तन करते हैं पिता के नहीं; इस लौकिक उक्ति को भरत ने अपने बर्ताव से मिथ्या प्रमाणित कर दिया है
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bhartā daśaratho yasyāḥ sādhuśca bharataḥ sutaḥ।
kathaṁ nu sāmbā kaikeyī tādṛśī krūradarśinī॥
‘महाराज दशरथ जिसके पति हैं और भरत-जैसा साधु जिसका पुत्र है, वह माता कैकेयी वैसी क्रूरतापूर्ण दृष्टिवाली कैसे हो गयी?’
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ityevaṁ lakṣmaṇe vākyaṁ snehād vadati dhārmike।
parivādaṁ jananyāstamasahan rāghavo'bravīt॥
धर्मपरायण लक्ष्मण जब स्नेहवश इस प्रकार कह रहे थे, उस समय श्रीरामचन्द्रजी से माता कैकेयी की निन्दा नहीं सही गयी। उन्होंने लक्ष्मण से कहा—
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na te'mbā madhyamā tāta garhitavyā kadācana।
tāmevekṣvākunāthasya bharatasya kathāṁ kuru॥
‘तात! तुम्हें मझली माता कैकेयी की कभी निन्दा नहीं करनी चाहिये। (यदि कुछ कहना हो तो) पहले की भाँति इक्ष्वाकुवंश के स्वामी भरत की ही चर्चा करो
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niścitaiva hi me buddhirvanavāse dṛḍhavratā।
bharatasnehasaṁtaptā bāliśīkriyate punaḥ॥
‘यद्यपि मेरी बुद्धि दृढतापूर्वक व्रत का पालन करते हुए वन में रहने का अटल निश्चय कर चुकी है, तथापि भरत के स्नेह से संतप्त होकर पुनः चञ्चल हो उठती है
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saṁsmarāmyasya vākyāni priyāṇi madhurāṇi ca।
hṛdyānyamṛtakalpāni manaḥprahlādanāni ca॥
‘मुझे भरत की वे परम प्रिय, मधुर, मन को भानेवाली और अमृत के समान हृदय को आह्लाद प्रदान करनेवाली बातें याद आ रही हैं
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kadā hyahaṁ sameṣyāmi bharatena mahātmanā।
śatrughnena ca vīreṇa tvayā ca raghunandana॥
‘रघुकुलनन्दन लक्ष्मण! कब वह दिन आयेगा, जब मैं तुम्हारे साथ चलकर महात्मा भरत और वीरवर शत्रुघ्न से मिलूँगा’
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ityevaṁ vilapaṁstatra prāpya godāvarīṁ nadīm।
cakre'bhiṣekaṁ kākutsthaḥ sānujaḥ saha sītayā॥
इस प्रकार विलाप करते हुए ककुत्स्थकुलभूषण भगवान् श्रीराम ने लक्ष्मण और सीता के साथ गोदावरी नदी के तट पर जाकर स्नान किया
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tarpayitvātha salilaistaiḥ pitṝn daivatānapi।
stuvanti smoditaṁ sūryaṁ devatāśca tathānaghāḥ॥
वहाँ स्नान करके उन्होंने गोदावरी के जल से देवताओं और पितरों का तर्पण किया। तदनन्तर जब सूर्योदय हुआ, तब वे तीनों निष्पाप व्यक्ति भगवान् सूर्य का उपस्थान करके अन्य देवताओं की भी स्तुति करने लगे
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kṛtābhiṣekaḥ sa rarāja rāmaḥ sītādvitīyaḥ saha lakṣmaṇena।
kṛtābhiṣekastvagarājaputryā rudraḥ sanandirbhagavāniveśaḥ॥
सीता और लक्ष्मण के साथ स्नान करके भगवान् श्रीराम उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे पर्वतराजपुत्री उमा और नन्दी के साथ गङ्गाजी में अवगाहन करके भगवान् रुद्र सुशोभित होते हैं
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १६ ॥