पञ्चवटीके रमणीय प्रदेशमें श्रीरामकी आज्ञासे लक्ष्मणद्वारा सुन्दर पर्णशालाका निर्माण तथा उसमें सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका निवास
॥ ३ · १५ · २६–२८ ॥
पञ्चवट्यां समभूमौ नवनिर्मिता पर्णशाला विराजते; नीलवर्णो रामो वल्कलधरं लक्ष्मणं हर्षेण कृतज्ञतया च दृढम् आलिङ्गति, स्निग्धप्रसन्नवदनो भ्रातृस्नेहं प्रकटयति; लक्ष्मणो विनम्रभक्त्या तं प्रत्यालिङ्गति, समीपे मन्दस्मिता सीता तिष्ठति; दूरे गोदावरी हंसैः पद्मसरश्च शोभेते।
पञ्चवटी की समतल भूमि पर नवनिर्मित पर्णशाला सुशोभित है; नीले वर्ण के श्रीराम वल्कलधारी लक्ष्मण को हर्ष और कृतज्ञता से हृदय से लगा रहे हैं, उनका मुख स्नेह और प्रसन्नता से भरा है; लक्ष्मण विनम्र भक्ति से आलिङ्गन का उत्तर दे रहे हैं, पास ही मन्द मुस्कान लिये सीता खड़ी हैं; दूर हंसोंसहित गोदावरी और कमल-सरोवर शोभा पा रहे हैं।
On the leveled clearing at Panchavati stands the freshly built leaf-hut; the blue Ram folds the bark-clad Lakshman into a warm, upright brotherly embrace of joy and gratitude, his face tender and glad, while Lakshman returns it in humble devotion and Sita stands close by with a soft smile; beyond, the Godavari winds past bearing swans and a lotus-pond gleams.
tataḥ pañcavaṭīṁ gatvā nānāvyālamṛgāyutām।
uvāca lakṣmaṇaṁ rāmo bhrātaraṁ dīptatejasam॥
नाना प्रकार के सर्पों, हिंसक जन्तुओं और मृगों से भरी हुई पञ्चवटी में पहुँचकर श्रीराम ने उद्दीप्त तेजवाले अपने भाई लक्ष्मण से कहा—
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āgatāḥ sma yathoddiṣṭaṁ yaṁ deśaṁ munirabravīt।
ayaṁ pañcavaṭīdeśaḥ saumya puṣpitakānanaḥ॥
‘सौम्य! मुनिवर अगस्त्य ने हमें जिस स्थान का परिचय दिया था, उनके तथाकथित स्थान में हमलोग आ पहुँचे। यही पञ्चवटी का प्रदेश है। यहाँ का वनप्रान्त पुष्पों से कैसी शोभा पा रहा है
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sarvataścāryatāṁ dṛṣṭiḥ kānane nipuṇo hyasi।
āśramaḥ katarasmin no deśe bhavati sammataḥ॥
‘लक्ष्मण! तुम इस वन में चारों ओर दृष्टि डालो; क्योंकि इस कार्य में निपुण हो। देखकर यह निश्चय करो कि किस स्थान पर आश्रम बनाना हमारे लिये अच्छा होगा
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ramate yatra vaidehī tvamahaṁ caiva lakṣmaṇa।
tādṛśo dṛśyatāṁ deśaḥ saṁnikṛṣṭajalāśayaḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
vanarāmaṇyakaṁ yatra jalarāmaṇyakaṁ tathā।
saṁnikṛṣṭaṁ ca yasmistu samitpuṣpakuśodakam॥
‘लक्ष्मण! तुम किसी ऐसे स्थान को ढूँढ़ निकालो, जहाँ से जलाशय निकट हो, जहाँ विदेहकुमारी सीता का मन लगे, जहाँ तुम और हम भी प्रसन्नतापूर्वक रह सकें, जहाँ वन और जल दोनों का रमणीय दृश्य हो तथा जिस स्थान के आस-पास ही समिधा, फूल, कुश और जल मिलने की सुविधा हो’
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evamuktastu rāmeṇa lakṣmaṇaḥ saṁyatāñjaliḥ।
sītāsamakṣaṁ kākutsthamidaṁ vacanamabravīt॥
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर सीता के सामने ही उन ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम से इस प्रकार बोले—
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paravānasmi kākutstha tvayi varṣaśataṁ sthite।
svayaṁ tu rucire deśe kriyatāmiti māṁ vada॥
‘काकुत्स्थ! आपके रहते हुए मैं सदा पराधीन ही हूँ। मैं सैकड़ों या अनन्त वर्षोंतक आपकी आज्ञा के अधीन ही रहना चाहता हूँ; अतः आप स्वयं ही देखकर जो स्थान सुन्दर जान पड़े, वहाँ आश्रम बनाने के लिये मुझे आज्ञा दें—मुझसे कहें कि तुम अमुक स्थान पर आश्रम बनाओ’
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suprītastena vākyena lakṣmaṇasya mahādyutiḥ।
vimṛśan rocayāmāsa deśaṁ sarvaguṇānvitam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
sa taṁ ruciramākramya deśamāśramakarmaṇi।
haste gṛhītvā hastena rāmaḥ saumitrimabravīt॥
लक्ष्मण के इस वचन से अत्यन्त तेजस्वी भगवान् श्रीराम को बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने स्वयं ही सोच-विचारकर एक ऐसा स्थान पसंद किया, जो सब प्रकार के उत्तम गुणों से सम्पन्न और आश्रम बनाने के योग्य था। उस सुन्दर स्थान पर आकर श्रीराम ने लक्ष्मण का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा—
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ayaṁ deśaḥ samaḥ śrīmān puṣpitaistarubhirvṛtaḥ।
ihāśramapadaṁ ramyaṁ yathāvat kartumarhasi॥
‘सुमित्रानन्दन! यह स्थान समतल और सुन्दर है तथा फूले हुए वृक्षों से घिरा है। तुम्हें इसी स्थान पर यथोचित रूप से एक रमणीय आश्रम का निर्माण करना चाहिये
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iyamādityasaṁkāśaiḥ padmaiḥ surabhigandhibhiḥ।
adūre dṛśyate ramyā padminī padmaśobhitā॥
‘यह पास ही सूर्य के समान उज्ज्वल कान्तिवाले मनोरम गन्धयुक्त कमलों से रमणीय प्रतीत होनेवाली तथा पद्मों की शोभा से सम्पन्न पुष्करिणी दिखायी देती है
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yathākhyātamagastyena muninā bhāvitātmanā।
iyaṁ godāvarī ramyā puṣpitaistarubhirvṛtā॥
‘पवित्र अन्तःकरणवाले अगस्त्य मुनि ने जिसके विषय में कहा था, वह विकसित वृक्षावलियों से घिरी हुई रमणीय गोदावरी नदी यही है
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haṁsakāraṇḍavākīrṇā cakravākopaśobhitā।
nātidūre na cāsanne mṛgayūthanipīḍitā॥
‘इसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी विचर रहे हैं। चकवे इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं तथा पानी पीने के लिये आये हुए मृगों के झुंड इसके तट पर छाये रहते हैं। यह नदी इस स्थान से न तो अधिक दूर है और न अत्यन्त निकट ही
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mayūranāditā ramyāḥ prāṁśavo bahukandarāḥ।
dṛśyante girayaḥ saumya phullaistarubhirāvṛtāḥ॥
‘सौम्य! यहाँ बहुत-सी कन्दराओं से युक्त ऊँचे-ऊँचे पर्वत दिखायी दे रहे हैं, जहाँ मयूरों की मीठी बोली गूँज रही है। ये रमणीय पर्वत खिले हुए वृक्षों से व्याप्त हैं
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sauvarṇai rājataistāmrairdeśe deśe tathā śubhaiḥ।
gavākṣitā ivābhānti gajāḥ paramabhaktibhiḥ॥
‘स्थान-स्थान पर सोने, चाँदी तथा ताँबे के समान रंगवाले सुन्दर गैरिक धातुओं से उपलक्षित ये पर्वत ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो झरोखे के आकार में की गयी नीले, पीले और सफेद आदि रंगों की उत्तम शृङ्गाररचनाओं से अलंकृत हाथी शोभा पा रहे हों
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sālaistālaistamālaiśca kharjūraiḥ panasairdrumaiḥ।
nīvāraistiniśaiścaiva punnāgaiścopaśobhitāḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
cūtairaśokaistilakaiḥ ketakairapi campakaiḥ।
puṣpagulmalatopetaistaistaistarubhirāvṛtāḥ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
syandanaiścandanairnīpaiḥ parṇāsairlakucairapi।
dhavāśvakarṇakhadiraiḥ śamīkiṁśukapāṭalaiḥ॥
पुष्पों, गुल्मों तथा लता-वल्लरियों से युक्त साल, ताल, तमाल, खजूर, कटहल, जलकदम्ब, तिनिश, पुंनाग, आम, अशोक, तिलक, केवड़ा, चम्पा, स्यन्दन, चन्दन, कदम्ब, पर्णास, लकुच, धव, अश्वकर्ण, खैर, शमी, पलाश और पाटल (पाडर) आदि वृक्षों से घिरे हुए ये पर्वत बड़ी शोभा पा रहे हैं
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idaṁ puṇyamidaṁ ramyamidaṁ bahumṛgadvijam।
iha vatsyāma saumitre sārdhametena pakṣiṇā॥
‘सुमित्रानन्दन! यह बहुत ही पवित्र और बड़ा रमणीय स्थान है। यहाँ बहुत-से पशु-पंक्षी निवास करते हैं। हमलोग भी यहीं इन पक्षिराज जटायु के साथ रहेंगे’
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evamuktastu rāmeṇa lakṣmaṇaḥ paravīrahā।
acireṇāśramaṁ bhrātuścakāra sumahābalaḥ॥
श्रीराम के ऐसा कहने पर शत्रुवीरों का संहार करनेवाले महाबली लक्ष्मण ने भाई के लिये शीघ्र ही आश्रम बनाकर तैयार किया
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parṇaśālāṁ suvipulāṁ tatra saṁghātamṛttikām।
sustambhāṁ maskarairdīrghaiḥ kṛtavaṁśāṁ suśobhanām॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
śamīśākhābhirāstīrya dṛḍhapāśāvapāśitām।
kuśakāśaśaraiḥ parṇaiḥ suparicchāditāṁ tathā॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
samīkṛtatalāṁ ramyāṁ cakāra sumahābalaḥ।
nivāsaṁ rāghavasyārthe prekṣaṇīyamanuttamam॥
वह आश्रम एक अत्यन्त विस्तृत पर्णशाला के रूप में बनाया गया था। महाबली लक्ष्मण ने पहले वहाँ मिट्टी एकत्र करके दीवार खड़ी की, फिर उसमें सुन्दर एवं सुदृढ़ खम्भे लगाये। खम्भों के ऊपर बड़े-बड़े बाँस तिरछे करके रखे। बाँसों के रख दिये जाने पर वह कुटी बड़ी सुन्दर दिखायी देने लगी। फिर उन बाँसों पर उन्होंने शमीवृक्ष की शाखाएँ फैला दीं और उन्हें मजबूत रस्सियों से कसकर बाँध दिया। इसके बाद ऊपर से कुश, कास, सरकंडे और पत्ते बिछाकर उस पर्णशाला को भलीभाँति छा दिया तथा नीचे की भूमि को बराबर करके उस कुटी को बड़ा रमणीय बना दिया। इस प्रकार लक्ष्मण ने श्रीरामचन्द्रजी के लिये परम उत्तम निवासगृह बना दिया, जो देखने ही योग्य था
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sa gatvā lakṣmaṇaḥ śrīmān nadīṁ godāvarīṁ tadā।
snātvā padmāni cādāya saphalaḥ punarāgataḥ॥
उसे तैयार करके श्रीमान् लक्ष्मण ने गोदावरी नदी के तट पर जाकर तत्काल उसमें स्नान किया और कमल के फूल तथा फल लेकर वे फिर वहीं लौट आये
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tataḥ puṣpabaliṁ kṛtvā śāntiṁ ca sa yathāvidhi।
darśayāmāsa rāmāya tadāśramapadaṁ kṛtam॥
तदनन्तर शास्त्रीय विधि के अनुसार देवताओं के लिये फूलों की बलि (उपहारसामग्री) अर्पित की तथा वास्तुशान्ति करके उन्होंने अपना बनाया हुआ आश्रम श्रीरामचन्द्रजी को दिखाया
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sa taṁ dṛṣṭvā kṛtaṁ saumyamāśramaṁ saha sītayā।
rāghavaḥ parṇaśālāyāṁ harṣamāhārayat param॥
भगवान् श्रीराम सीता के साथ उस नये बने हुए सुन्दर आश्रम को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और कुछ कालतक उसके भीतर खड़े रहे
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susaṁhṛṣṭaḥ pariṣvajya bāhubhyāṁ lakṣmaṇaṁ tadā।
atisnigdhaṁ ca gāḍhaṁ ca vacanaṁ cedamabravīt॥
तत्पश्चात् अत्यन्त हर्ष में भरकर उन्होंने दोनों भुजाओं से लक्ष्मण को कसकर हृदय से लगा लिया और बड़े स्नेह के साथ यह बात कही—
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prīto'smi te mahat karma tvayā kṛtamidaṁ prabho।
pradeyo yannimittaṁ te pariṣvaṅgo mayā kṛtaḥ॥
‘सामर्थ्यशाली लक्ष्मण! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने यह महान् कार्य किया है। उसके लिये और कोई समुचित पुरस्कार न होने से मैंने तुम्हें गाढ़ आलिङ्गन प्रदान किया है
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bhāvajñena kṛtajñena dharmajñena ca lakṣmaṇa।
tvayā putreṇa dharmātmā na saṁvṛttaḥ pitā mama॥
‘लक्ष्मण! तुम मेरे मनोभाव को तत्काल समझ लेनेवाले, कृतज्ञ और धर्मज्ञ हो। तुम-जैसे पुत्र के कारण मेरे धर्मात्मा पिता अभी मरे नहीं हैं—तुम्हारे रूप में वे अब भी जीवित ही हैं’
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evaṁ lakṣmaṇamuktvā tu rāghavo lakṣmīvardhanaḥ।
tasmin deśe bahuphale nyavasat sa sukhaṁ sukhī॥
लक्ष्मण से ऐसा कहकर अपनी शोभा का विस्तार करनेवाले सुखी श्रीरामचन्द्रजी प्रचुर फलों से सम्पन्न उस पञ्चवटी-प्रदेश में सबके साथ सुखपूर्वक रहने लगे
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kañcit kālaṁ sa dharmātmā sītayā lakṣmaṇena ca।
anvāsyamāno nyavasat svargaloke yathāmaraḥ॥
सीता और लक्ष्मण से सेवित हो धर्मात्मा श्रीराम कुछ कालतक वहाँ उसी प्रकार रहे, जैसे स्वर्गलोक में देवता निवास करते हैं
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १५ ॥