वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः १३ · २५ श्लोकाःSarga 13 · 25 ślokas

महर्षि अगस्त्यका श्रीरामके प्रति अपनी प्रसन्नता प्रकट करके सीताकी प्रशंसा करना, श्रीरामके पूछनेपर उन्हें पञ्चवटीमें आश्रम बनाकर रहनेका आदेश देना तथा श्रीराम आदिका प्रस्थान

अरण्यकाण्डम् · सर्गः १३ — painting

॥ ३ · १३ · १३–२१ ॥

पर्णकुटीराश्रमस्य पुरतः श्वेतजटाजूटश्मश्रुर्मुनिरगस्त्यः एकेन करेण आशिषं वितरन् अपरेण वृक्षान्तराद् दूरस्थां नदीपर्वतशोभितां पञ्चवटीं निर्दिशति; पृष्ठासक्तधनुर्नीलवर्णो रामो बद्धाञ्जलिः प्रसन्नवदनो गुरोरुपदेशं गृह्णाति, समीपे लक्ष्मणो दूरे विनीता सीता च तिष्ठतः।

पर्णकुटी-आश्रम के सामने श्वेत जटा और श्मश्रुधारी महर्षि अगस्त्य एक हाथ से आशीर्वाद देते हुए दूसरे हाथ से वृक्षों के बीच से दूर बसी, नदी और पर्वत से सुशोभित पञ्चवटी की ओर संकेत कर रहे हैं; पीठ पर धनुष बाँधे नीले वर्ण के श्रीराम दोनों हाथ जोड़े प्रसन्न मुख से गुरु का उपदेश ग्रहण कर रहे हैं, पास ही लक्ष्मण और कुछ दूरी पर विनीत सीता खड़ी हैं।

Before his leaf-hut hermitage the white-haired sage Agastya, one hand raised in blessing, points with the other through the trees toward the distant, river-and-hill-graced land of Panchavati; the blue Ram, his great bow slung across his back and both hands folded in anjali, receives his guru's counsel with a serene face, while Lakshman stands close and Sita waits a little apart.

॥ ३ · १३ · १ ॥
राम प्रीतोऽस्मि भद्रं ते परितुष्टोऽस्मि लक्ष्मण। अभिवादयितुं यन्मां प्राप्तौ स्थः सह सीतया॥

rāma prīto'smi bhadraṁ te parituṣṭo'smi lakṣmaṇa।
abhivādayituṁ yanmāṁ prāptau sthaḥ saha sītayā॥

‘श्रीराम! आपका कल्याण हो। मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ। लक्ष्मण! मैं तुमपर भी बहुत संतुष्ट हूँ। आप दोनों भाई मुझे प्रणाम करने के लिये जो सीता के साथ यहाँतक आये, इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है।

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॥ ३ · १३ · २ ॥
अध्वश्रमेण वां खेदो बाधते प्रचुरश्रमः। व्यक्तमुत्कण्ठते वापि मैथिली जनकात्मजा॥

adhvaśrameṇa vāṁ khedo bādhate pracuraśramaḥ।
vyaktamutkaṇṭhate vāpi maithilī janakātmajā॥

‘रास्ता चलने के परिश्रम से आपलोगों को बहुत थकावट हुई है। इसके कारण जो कष्ट हुआ है, वह आप दोनों को पीड़ा दे रहा होगा। मिथिलेशकुमारी जानकी भी अपनी थकावट दूर करने के लिये अधिक उत्कण्ठित है, यह बात स्पष्ट ही जान पड़ती है।

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॥ ३ · १३ · ३ ॥
एषा सुकुमारी खेदैश्च विमानिता। प्राज्यदोषं वनं प्राप्ता भर्तृस्नेहप्रचोदिता॥

eṣā ca sukumārī ca khedaiśca na vimānitā।
prājyadoṣaṁ vanaṁ prāptā bhartṛsnehapracoditā॥

‘यह सुकुमारी है और इससे पहले इसे ऐसे दुःखों का सामना नहीं करना पड़ा है। वन में अनेक प्रकार के कष्ट होते हैं, फिर भी यह पतिप्रेम से प्रेरित होकर यहाँ आयी है।

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॥ ३ · १३ · ४ ॥
यथैषा रमते राम इह सीता तथा कुरु। दुष्करं कृतवत्येषा वने त्वामभिगच्छती॥

yathaiṣā ramate rāma iha sītā tathā kuru।
duṣkaraṁ kṛtavatyeṣā vane tvāmabhigacchatī॥

‘श्रीराम! जिस प्रकार सीता का यहाँ मन लगे— जैसे भी यह प्रसन्न रहे, वही कार्य आप करें। वन में आपके साथ आकर इसने दुष्कर कार्य किया है।

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॥ ३ · १३ · ५ ॥
एषा हि प्रकृतिः स्त्रीणामासृष्टे रघुनन्दन। समस्थमनुरज्यन्ते विषमस्थं त्यजन्ति च॥

eṣā hi prakṛtiḥ strīṇāmāsṛṣṭe raghunandana।
samasthamanurajyante viṣamasthaṁ tyajanti ca॥

‘रघुनन्दन! सृष्टिकाल से लेकर अबतक स्त्रियों का प्रायः यही स्वभाव रहता आया है कि यदि पति सम अवस्था में है अर्थात् धनधान्य से सम्पन्न, स्वस्थ एवं सुखी है, तब तो वे उसमें अनुराग रखती हैं, परंतु यदि वह विषम अवस्था में पड़ जाता है—दरिद्र एवं रोगी हो जाता है, तब उसे त्याग देती हैं।

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॥ ३ · १३ · ६ ॥
शतह्रदानां लोलत्वं शस्त्राणां तीक्ष्णतां तथा। गरुडानिलयोः शैघ्र्यमनुगच्छन्ति योषितः॥

śatahradānāṁ lolatvaṁ śastrāṇāṁ tīkṣṇatāṁ tathā।
garuḍānilayoḥ śaighryamanugacchanti yoṣitaḥ॥

‘स्त्रियाँ विद्युत् की चपलता, शस्त्रों की तीक्ष्णता तथा गरुड एवं वायु की तीव्र गति का अनुसरण करती हैं।

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॥ ३ · १३ · ७ ॥
इयं तु भवतो भार्या दोषैरेतैर्विवर्जिता। श्लाघ्या व्यपदेश्या यथा देवीष्वरुन्धती॥

iyaṁ tu bhavato bhāryā doṣairetairvivarjitā।
ślāghyā ca vyapadeśyā ca yathā devīṣvarundhatī॥

‘आपकी यह धर्मपत्नी सीता इन सब दोषों से रहित है। स्पृहणीय एवं पतिव्रताओं में उसी तरह अग्रगण्य है, जैसे देवियों में अरुन्धती।

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॥ ३ · १३ · ८ ॥
अलंकृतोऽयं देशश्च यत्र सौमित्रिणा सह। वैदेह्या चानया राम वत्स्यसि त्वमरिंदम॥

alaṁkṛto'yaṁ deśaśca yatra saumitriṇā saha।
vaidehyā cānayā rāma vatsyasi tvamariṁdama॥

‘शत्रुदमन श्रीराम! आज से इस देश की शोभा बढ़ गयी, जहाँ सुमित्राकुमार लक्ष्मण और विदेहनन्दिनी सीता के साथ आप निवास करेंगे’।

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॥ ३ · १३ · ९ ॥
एवमुक्तस्तु मुनिना राघवः संयताञ्जलिः। उवाच प्रश्रितं वाक्यमृषिं दीप्तमिवानलम्॥

evamuktastu muninā rāghavaḥ saṁyatāñjaliḥ।
uvāca praśritaṁ vākyamṛṣiṁ dīptamivānalam॥

मुनि के ऐसा कहने पर श्रीरामचन्द्रजी ने प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी उन महर्षि से दोनों हाथ जोड़कर यह विनययुक्त बात कही—

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॥ ३ · १३ · १० ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुंगवः। गुणैः सभ्रातृभार्यस्य गुरुर्नः परितुष्यति॥

dhanyo'smyanugṛhīto'smi yasya me munipuṁgavaḥ।
guṇaiḥ sabhrātṛbhāryasya gururnaḥ parituṣyati॥

‘भाई और पत्नीसहित जिसके अर्थात् मेरे गुणों से हमारे गुरुदेव मुनिवर अगस्त्यजी यदि संतुष्ट हो रहे हैं, तब तो मैं धन्य हूँ, मुझपर मुनीश्वर का महान् अनुग्रह है।

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॥ ३ · १३ · ११ ॥
किं तु व्यादिश मे देशं सोदकं बहुकाननम्। यत्राश्रमपदं कृत्वा वसेयं निरतः सुखम्॥

kiṁ tu vyādiśa me deśaṁ sodakaṁ bahukānanam।
yatrāśramapadaṁ kṛtvā vaseyaṁ nirataḥ sukham॥

‘परंतु मुने! अब आप मुझे ऐसा कोई स्थान बताइये जहाँ बहुत-से वन हों, जल की भी सुविधा हो तथा जहाँ आश्रम बनाकर मैं सुखपूर्वक सानन्द निवास कर सकूँ’।

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॥ ३ · १३ · १२ ॥
ततोऽब्रवीन्मुनिश्रेष्ठः श्रुत्वा रामस्य भाषितम्। ध्यात्वा मुहूर्तं धर्मात्मा ततोवाच वचः शुभम्॥

tato'bravīnmuniśreṣṭhaḥ śrutvā rāmasya bhāṣitam।
dhyātvā muhūrtaṁ dharmātmā tatovāca vacaḥ śubham॥

श्रीराम का यह कथन सुनकर मुनिश्रेष्ठ धर्मात्मा अगस्त्य ने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार किया। तदनन्तर वे यह शुभ वचन बोले—

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॥ ३ · १३ · १३ ॥
इतो द्वियोजने तात बहुमूलफलोदकः। देशो बहुमृगः श्रीमान् पञ्चवट्यभिविश्रुतः॥

ito dviyojane tāta bahumūlaphalodakaḥ।
deśo bahumṛgaḥ śrīmān pañcavaṭyabhiviśrutaḥ॥

‘तात! यहाँ से दो योजन की दूरी पर पञ्चवटी नाम से विख्यात एक बहुत ही सुन्दर स्थान है, जहाँ बहुत-से मृग रहते हैं तथा फल-मूल और जल की अधिक सुविधा है।

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॥ ३ · १३ · १४ ॥
तत्र गत्वाऽऽश्रमपदं कृत्वा सौमित्रिणा सह। रमस्व त्वं पितुर्वाक्यं यथोक्तमनुपालयन्॥

tatra gatvā''śramapadaṁ kṛtvā saumitriṇā saha।
ramasva tvaṁ piturvākyaṁ yathoktamanupālayan॥

‘वहीं जाकर लक्ष्मण के साथ आप आश्रम बनाइये और पिता की यथोक्त आज्ञा का पालन करते हुए वहाँ सुखपूर्वक निवास कीजिये।

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॥ ३ · १३ · १५ ॥
विदितो ह्येष वृत्तान्तो मम सर्वस्तवानघ। तपसश्च प्रभावेण स्नेहाद् दशरथस्य च॥

vidito hyeṣa vṛttānto mama sarvastavānagha।
tapasaśca prabhāveṇa snehād daśarathasya ca॥

‘अनघ! आपका और राजा दशरथ का यह सारा वृत्तान्त मुझे अपनी तपस्या के प्रभाव से तथा आपके प्रति स्नेह होने के कारण अच्छी तरह विदित है।

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॥ ३ · १३ · १६ ॥
हृदयस्थं ते च्छन्दो विज्ञातं तपसा मया। इह वासं प्रतिज्ञाय मया सह तपोवने॥

hṛdayasthaṁ ca te cchando vijñātaṁ tapasā mayā।
iha vāsaṁ pratijñāya mayā saha tapovane॥

‘आपने तपोवन में मेरे साथ रहने की और वनवास का शेष समय यहीं बिताने की अभिलाषा प्रकट करके भी जो यहाँ से अन्यत्र रहने योग्य स्थान के विषय में मुझसे पूछा है, इसमें आपका हार्दिक अभिप्राय क्या है? यह मैंने अपने तपोबल से जान लिया है (आपने ऋषियों की रक्षा के लिये राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा की है। इस प्रतिज्ञा का निर्वाह अन्यत्र रहने से ही हो सकता है; क्योंकि यहाँ राक्षसों का आना-जाना नहीं होता)।

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॥ ३ · १३ · १७ ॥
अतश्च त्वामहं ब्रूमि गच्छ पञ्चवटीमिति। हि रम्यो वनोद्देशो मैथिली तत्र रंस्यते॥

ataśca tvāmahaṁ brūmi gaccha pañcavaṭīmiti।
sa hi ramyo vanoddeśo maithilī tatra raṁsyate॥

‘इसीलिये मैं आपसे कहता हूँ कि पञ्चवटी में जाइये। वहाँ की वनस्थली बड़ी ही रमणीय है। वहाँ मिथिलेशकुमारी सीता आनन्दपूर्वक सब ओर विचरेंगी।

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॥ ३ · १३ · १८ ॥
देशः श्लाघनीयश्च नातिदूरे राघव। गोदावर्याः समीपे मैथिली तत्र रंस्यते॥

sa deśaḥ ślāghanīyaśca nātidūre ca rāghava।
godāvaryāḥ samīpe ca maithilī tatra raṁsyate॥

‘रघुनन्दन! वह स्पृहणीय स्थान यहाँ से अधिक दूर नहीं है। गोदावरी के पास (उसीके तट पर) है, अतः मैथिली का मन वहाँ खूब लगेगा।

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॥ ३ · १३ · १९ ॥
प्राज्यमूलफलैश्चैव नानाद्विजगणैर्युतः। विविक्तश्च महाबाहो पुण्यो रम्यस्तथैव च॥

prājyamūlaphalaiścaiva nānādvijagaṇairyutaḥ।
viviktaśca mahābāho puṇyo ramyastathaiva ca॥

‘महाबाहो! वह स्थान प्रचुर फल-मूलों से सम्पन्न, भाँति-भाँति के विहङ्गमों से सेवित, एकान्त, पवित्र और रमणीय है।

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॥ ३ · १३ · २० ॥
भवानपि सदाचारः शक्तश्च परिरक्षणे। अपि चात्र वसन् राम तापसान् पालयिष्यसि॥

bhavānapi sadācāraḥ śaktaśca parirakṣaṇe।
api cātra vasan rāma tāpasān pālayiṣyasi॥

‘श्रीराम! आप भी सदाचारी और ऋषियों की रक्षा करने में समर्थ हैं। अतः वहाँ रहकर तपस्वी मुनियों का पालन कीजियेगा।

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॥ ३ · १३ · २१ ॥
एतदालक्ष्यते वीर मधूकानां महावनम्। उत्तरेणास्य गन्तव्यं न्यग्रोधमपि गच्छता॥

etadālakṣyate vīra madhūkānāṁ mahāvanam।
uttareṇāsya gantavyaṁ nyagrodhamapi gacchatā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · १३ · २२ ॥
ततः स्थलमुपारुह्य पर्वतस्याविदूरतः। ख्यातः पञ्चवटीत्येव नित्यपुष्पितकाननः॥

tataḥ sthalamupāruhya parvatasyāvidūrataḥ।
khyātaḥ pañcavaṭītyeva nityapuṣpitakānanaḥ॥

॥ २१–२२ ॥

‘वीर! यह जो महुओं का विशाल वन दिखायी देता है, इसके उत्तर से होकर जाना चाहिये। उस मार्ग से जाते हुए आपको आगे एक बरगद का वृक्ष मिलेगा। उससे आगे कुछ दूरतक ऊँचा मैदान है, उसे पार करने के बाद एक पर्वत दिखायी देगा। उस पर्वत से थोड़ी ही दूर पर पञ्चवटी नाम से प्रसिद्ध सुन्दर वन है, जो सदा फूलों से सुशोभित रहता है’।

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॥ ३ · १३ · २३ ॥
अगस्त्येनैवमुक्तस्तु रामः सौमित्रिणा सह। सत्कृत्यामन्त्रयामास तमृषिं सत्यवादिनम्॥

agastyenaivamuktastu rāmaḥ saumitriṇā saha।
satkṛtyāmantrayāmāsa tamṛṣiṁ satyavādinam॥

महर्षि अगस्त्य के ऐसा कहने पर लक्ष्मणसहित श्रीराम ने उनका सत्कार करके उन सत्यवादी महर्षि से वहाँ जाने की आज्ञा माँगी।

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॥ ३ · १३ · २४ ॥
तौ तु तेनाभ्यनुज्ञातौ कृतपादाभिवन्दनौ। तमाश्रमं पञ्चवटीं जग्मतुः सह सीतया॥

tau tu tenābhyanujñātau kṛtapādābhivandanau।
tamāśramaṁ pañcavaṭīṁ jagmatuḥ saha sītayā॥

उनकी आज्ञा पाकर उन दोनों भाइयों ने उनके चरणों की वन्दना की और सीता के साथ वे पञ्चवटी नामक आश्रम की ओर चले।

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॥ ३ · १३ · २५ ॥
गृहीतचापौ तु नराधिपात्मजौ विषक्ततूणी समरेष्वकातरौ। यथोपदिष्टेन पथा महर्षिणा प्रजग्मतुः पञ्चवटीं समाहितौ॥

gṛhītacāpau tu narādhipātmajau viṣaktatūṇī samareṣvakātarau।
yathopadiṣṭena pathā maharṣiṇā prajagmatuḥ pañcavaṭīṁ samāhitau॥

राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण ने पीठ पर तरकस बाँध हाथ में धनुष ले लिये। वे दोनों भाई समराङ्गणों में कातरता दिखानेवाले नहीं थे। वे दोनों बन्धु महर्षि के बताये हुए मार्ग से बड़ी सावधानी के साथ पञ्चवटी की ओर प्रस्थित हुए।

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १३ ॥