श्रीरामका ऋषियोंकी रक्षाके लिये राक्षसोंके वधके निमित्त की हुई प्रतिज्ञाके पालनपर दृढ़ रहनेका विचार प्रकट करना
॥ ३ · १० · १७–१८ ॥
वनोद्देशे उन्नतो नीलवर्णो रामो महद्धनुर्गृहीत्वा तस्य ज्यायां करं निधाय गम्भीरनिश्चयमुखस्तपस्विनां रक्षार्थं राक्षसनिर्दलनस्य प्रतिज्ञां दृढयति, वल्कलवसना सीता सादरं शृणोति, पार्श्वे च वल्कली लक्ष्मणः स्वधनुषि न्यस्तहस्तः स्थिरस्तिष्ठति।
वनप्रान्त में तेजस्वी नील वर्ण के श्रीराम अपना महान् धनुष हाथ में लिये उसकी प्रत्यञ्चा पर हाथ रखे गम्भीर एवं दृढ़ मुख से मुनियों की रक्षा हेतु राक्षसों के संहार की अपनी प्रतिज्ञा दुहरा रहे हैं; वनवसना सीता समझपूर्वक स्वीकार-भाव से सुन रही हैं, और पास ही वल्कलधारी लक्ष्मण अपने धनुष पर हाथ रखे दृढ़ता से खड़े हैं।
Standing tall in a forest glade, the blue Ram grips his great bow and lays a hand upon its string, his face grave and utterly resolute as he reaffirms his vow to rid the forest of the demons who prey on the sages; Sita, in her forest sari, listens with quiet acceptance, and the bark-clad Lakshman stands firm at his side, hand on his own bow, ready to follow.
vākyametat tu vaidehyā vyāhṛtaṁ bhartṛbhaktayā।
śrutvā dharme sthito rāmaḥ pratyuvācātha jānakīm॥
अपने स्वामी के प्रति भक्ति रखनेवाली विदेहकुमारी सीता की कही हुई यह बात सुनकर सदा धर्म में स्थित रहनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ने जानकी को इस प्रकार उत्तर दिया—
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hitamuktaṁ tvayā devi snigdhayā sadṛśaṁ vacaḥ।
kulaṁ vyapadiśantyā ca dharmajñe janakātmaje॥
‘देवि! धर्म को जाननेवाली जनककिशोरी! तुम्हारा मेरे ऊपर स्नेह है, इसलिये तुमने मेरे हित की बात कही है। क्षत्रियों के कुलधर्म का उपदेश करती हुई तुमने जो कुछ कहा है, वह तुम्हारे ही योग्य है॥
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kiṁ nu vakṣyāmyahaṁ devi tvayaivoktamidaṁ vacaḥ।
kṣatriyairdhāryate cāpo nārtaśabdo bhavediti॥
‘देवि! मैं तुम्हें क्या उत्तर दूँ, तुमने ही पहले यह बात कही है कि क्षत्रियलोग इसलिये धनुष धारण करते हैं कि किसीको दुःखी होकर हाहाकार न करना पड़े (यदि कोई दुःख या संकट में पड़ा हो तो उसकी रक्षा की जाय)॥
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te cārtā daṇḍakāraṇye munayaḥ saṁśitavratāḥ।
māṁ sīte svayamāgamya śaraṇyaṁ śaraṇaṁ gatāḥ॥
‘सीते! दण्डकारण्य में रहकर कठोर व्रत का पालन करनेवाले वे मुनि बहुत दुःखी हैं, इसीलिये मुझे शरणागतवत्सल जानकर वे स्वयं मेरे पास आये और शरणागत हुए॥
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vasantaḥ kālākāleṣu vane mūlaphalāśanāḥ।
na labhante sukhaṁ bhīru rākṣasaiḥ krūrakarmabhiḥ॥
bhakṣyante rākṣasairbhīmairnaramāṁsopajīvibhiḥ।
‘भीरु! सदा ही वन में रहकर फल-मूल का आहार करनेवाले वे मुनि इन क्रूरकर्मा राक्षसों के कारण कभी सुख नहीं पाते हैं। मनुष्यों के मांस से जीवननिर्वाह करनेवाले ये भयानक राक्षस उन्हें मारकर खा जाते हैं॥
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te bhakṣyamāṇā munayo daṇḍakāraṇyavāsinaḥ॥
asmānabhyavapadyeti māmūcurdvijasattamāḥ।
‘उन राक्षसों के ग्रास बने हुए वे दण्डकारण्यवासी द्विजश्रेष्ठ मुनि हमलोगों के पास आकर मुझसे बोले— ‘प्रभो! हमपर अनुग्रह कीजिये’॥
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mayā tu vacanaṁ śrutvā teṣāmevaṁ mukhāccyutam॥
kṛtvā vacanaśuśrūṣāṁ vākyametadudāhṛtam।
‘उनके मुख से निकली हुई इस प्रकार रक्षा की पुकार सुनकर और उनकी आज्ञा-पालनरूपी सेवा का विचार मन में लेकर मैंने उनसे यह बात कही॥
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prasīdantu bhavanto me hrīreṣā tu mamātulā॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
yadīdṛśairahaṁ viprairupastheyairupasthitaḥ।
kiṁ karomīti ca mayā vyāhṛtaṁ dvijasaṁnidhau॥
‘महर्षियो! आप-जैसे ब्राह्मणों की सेवा में मुझे स्वयं ही उपस्थित होना चाहिये था, परंतु आप स्वयं ही अपनी रक्षा के लिये मेरे पास आये, यह मेरे लिये अनुपम लज्जा की बात है; अतः आप प्रसन्न हों। बताइये, मैं आपलोगों की क्या सेवा करूँ?’ यह बात मैंने उन ब्राह्मणों के सामने कही॥
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sarvaireva samāgamya vāgiyaṁ samudāhṛtā।
rākṣasairdaṇḍakāraṇye bahubhiḥ kāmarūpibhiḥ॥
arditāḥ sma bhṛśaṁ rāma bhavān nastatra rakṣatu।
‘तब उन सभी ने मिलकर अपना मनोभाव इन वचनों में प्रकट किया— ‘श्रीराम! दण्डकारण्य में इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले बहुत-से राक्षस रहते हैं। उनसे हमें बड़ा कष्ट पहुँच रहा है, अतः वहाँ उनके भय से आप हमारी रक्षा करें॥
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homakāle tu samprāpte parvakāleṣu cānagha॥
dharṣayanti sudurdharṣā rākṣasāḥ piśitāśanāḥ।
‘निष्पाप रघुनन्दन! अग्निहोत्र का समय आने पर तथा पर्व के अवसरों पर ये अत्यन्त दुर्धर्ष मांसभोजी राक्षस हमें धर दबाते हैं॥
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rākṣasairdharṣitānāṁ ca tāpasānāṁ tapasvinām॥
gatiṁ mṛgayamāṇānāṁ bhavān naḥ paramā gatiḥ।
‘राक्षसों द्वारा आक्रान्त होनेवाले हम तपस्वी तापस सदा अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़ते रहते हैं, अतः आप ही हमारे परम आश्रय हों॥
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kāmaṁ tapaḥprabhāveṇa śaktā hantuṁ niśācarān॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
cirārjitaṁ na cecchāmastapaḥ khaṇḍayituṁ vayam।
bahuvighnaṁ tapo nityaṁ duścaraṁ caiva rāghava॥
‘रघुनन्दन! यद्यपि हम तपस्या के प्रभाव से इच्छानुसार इन राक्षसों का वध करने में समर्थ हैं तथापि चिरकाल से उपार्जित किये हुए तप को खण्डित करना नहीं चाहते हैं; क्योंकि तप में सदा ही बहुत-से विघ्न आते रहते हैं तथा इसका सम्पादन बहुत ही कठिन होता है॥
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tena śāpaṁ na muñcāmo bhakṣyamāṇāśca rākṣasaiḥ।
tadardyamānān rakṣobhirdaṇḍakāraṇyavāsibhiḥ॥
rakṣa nastvaṁ saha bhrātrā tvannāthā hi vayaṁ vane।
‘यही कारण है कि राक्षसों के ग्रास बन जाने पर भी हम उन्हें शाप नहीं देते हैं, इसलिये दण्डकारण्यवासी निशाचरों से पीड़ित हुए हम तापसों की भाईसहित आप रक्षा करें; क्योंकि इस वन में अब आप ही हमारे रक्षक हैं’॥
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mayā caitadvacaḥ śrutvā kārtsnyena paripālanam॥
ṛṣīṇāṁ daṇḍakāraṇye saṁśrutaṁ janakātmaje।
‘जनकनन्दिनि! दण्डकारण्य में ऋषियों की यह बात सुनकर मैंने पूर्णरूप से उनकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा की है॥
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saṁśrutya ca na śakṣyāmi jīvamānaḥ pratiśravam॥
munīnāmanyathā kartuṁ satyamiṣṭaṁ hi me sadā।
‘मुनियों के सामने यह प्रतिज्ञा करके अब मैं जीते-जी इस प्रतिज्ञा को मिथ्या नहीं कर सकूँगा; क्योंकि सत्य का पालन मुझे सदा ही प्रिय है॥
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apyahaṁ jīvitaṁ jahyāṁ tvāṁ vā sīte salakṣmaṇām॥
na tu pratijñāṁ saṁśrutya brāhmaṇebhyo viśeṣataḥ।
‘सीते! मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूँ, तुम्हारा और लक्ष्मण का भी परित्याग कर सकता हूँ, किंतु अपनी प्रतिज्ञा को, विशेषतः ब्राह्मणों के लिये की गयी प्रतिज्ञा को मैं कदापि नहीं तोड़ सकता॥
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tadavaśyaṁ mayā kāryamṛṣīṇāṁ paripālanam॥
anuktenāpi vaidehi pratijñāya kathaṁ punaḥ।
‘इसलिये ऋषियों की रक्षा करना मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य है। विदेहनन्दिनि! ऋषियों के बिना कहे ही उनकी मुझे रक्षा करनी चाहिये थी; फिर जब उन्होंने स्वयं कहा और मैंने प्रतिज्ञा भी कर ली, तब अब उनकी रक्षा से कैसे मुँह मोड़ सकता हूँ॥
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mama snehācca sauhārdādidamuktaṁ tvayā vacaḥ॥
parituṣṭo'smyahaṁ sīte na hyaniṣṭo'nuśāsyate।
‘सीते! तुमने स्नेह और सौहार्दवश जो मुझसे ये बातें कही हैं, इससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ; क्योंकि जो अपना प्रिय न हो, उसे कोई हितकर उपदेश नहीं देता॥
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sadṛśaṁ cānurūpaṁ ca kulasya tava śobhane।
sadharmacāriṇī me tvaṁ prāṇebhyo'pi garīyasī॥
‘शोभने! तुम्हारा यह कथन तुम्हारे योग्य तो है ही, तुम्हारे कुल के भी सर्वथा अनुरूप है। तुम मेरी सहधर्मिणी हो और मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हो’॥
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ityevamuktvā vacanaṁ mahātmā sītāṁ priyāṁ maithilarājaputrīm।
rāmo dhanuṣmān saha lakṣmaṇena jagāma ramyāṇi tapovanāni॥
महात्मा श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रिया मिथिलेशकुमारी सीता से ऐसा वचन कहकर हाथ में धनुष ले लक्ष्मण के साथ रमणीय तपोवनों में विचरण करने लगे॥
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे दशमः सर्गः॥ १०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०॥