वाल्मीकि रामायणम् · अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

अरण्यकाण्डम्Araṇya Kāṇḍa

सर्गः १ · २३ श्लोकाःSarga 1 · 23 ślokas

श्रीराम, लक्ष्मण और सीताका तापसोंके आश्रममण्डलमें सत्कार

अरण्यकाण्डम् · सर्गः १ — painting

॥ ३ · १ · १६–१७ ॥

दण्डकारण्यप्रान्ते जटावल्कलधरो नीलवर्णो धनुर्धरो रामो वल्कलवसनेन लक्ष्मणेन वनवसनया सीतया च सह प्रविशति, तं वृद्धाः जटिलाः तपस्विनः प्राञ्जलयः जलं फलानि च समर्प्य आशीर्भिः स्वागतं कुर्वन्ति।

जटा और वल्कल धारण किये नील वर्ण के धनुर्धारी श्रीराम वल्कलधारी लक्ष्मण तथा सरल वनवेषा सीता के साथ दण्डकारण्य में प्रवेश कर रहे हैं; श्वेतकेश जटाधारी तपस्वी मुनिगण हाथ जोड़े आगे बढ़कर जल और फल अर्पित करते हुए आशीर्वाद देकर उनका स्वागत कर रहे हैं, कुटियों पर तपोमयी आभा है और आँगन में मृग विचरते हैं।

At the edge of the great Dandaka wood the blue, matted-haired Ram, bark-clad and bow in hand, arrives with the bark-clad Lakshman and gentle Sita in her plain forest sari; a company of white-bearded ascetics steps forward with folded hands, offering water and wild fruit and blessing them in welcome, their leaf-huts aglow with the light of austerity and tame deer at rest nearby.

॥ ३ · १ · १ ॥
प्रविश्य तु महारण्यं दण्डकारण्यमात्मवान्। रामो ददर्श दुर्धर्षस्तापसाश्रममण्डलम्॥

praviśya tu mahāraṇyaṁ daṇḍakāraṇyamātmavān।
rāmo dadarśa durdharṣastāpasāśramamaṇḍalam॥

दण्डकारण्य नामक महान् वन में प्रवेश करके मन को वश में रखनेवाले दुर्जय वीर श्रीराम ने तपस्वी मुनियों के बहुत-से आश्रम देखे

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · २ ॥
कुशचीरपरिक्षिप्तं ब्राह्म्या लक्ष्म्या समावृतम्। यथा प्रदीप्तं दुर्दर्शं गगने सूर्यमण्डलम्॥

kuśacīraparikṣiptaṁ brāhmyā lakṣmyā samāvṛtam।
yathā pradīptaṁ durdarśaṁ gagane sūryamaṇḍalam॥

वहाँ कुश और वल्कल वस्त्र फैले हुए थे। वह आश्रममण्डल ऋषियों की ब्रह्मविद्या के अभ्यास से प्रकट हुए विलक्षण तेज से व्याप्त था, इसलिये आकाश में प्रकाशित होनेवाले दुर्दर्श सूर्य-मण्डल की भाँति वह भूतल पर उद्दीप्त हो रहा था। राक्षस आदि के लिये उसकी ओर देखना भी कठिन था

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · ३ ॥
शरण्यं सर्वभूतानां सुसम्मृष्टाजिरं सदा। मृगैर्बहुभिराकीर्णं पक्षिसंघैः समावृतम्॥

śaraṇyaṁ sarvabhūtānāṁ susammṛṣṭājiraṁ sadā।
mṛgairbahubhirākīrṇaṁ pakṣisaṁghaiḥ samāvṛtam॥

वह आश्रमसमुदाय सभी प्राणियों को शरण देनेवाला था। उसका आँगन सदा झाड़ने-बुहारने से स्वच्छ बना रहता था। वहाँ बहुत-से वन्य पशु भरे रहते थे और पक्षियों के समुदाय भी उसे सब ओर से घेरे रहते थे

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · ४ ॥
पूजितं चोपनृत्तं नित्यमप्सरसां गणैः। विशालैरग्निशरणैः स्रुग्भाण्डैरजिनैः कुशैः॥

pūjitaṁ copanṛttaṁ ca nityamapsarasāṁ gaṇaiḥ।
viśālairagniśaraṇaiḥ srugbhāṇḍairajinaiḥ kuśaiḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · १ · ५ ॥
समिद्भिस्तोयकलशैः फलमूलैश्च शोभितम्। आरण्यैश्च महावृक्षैः पुण्यैः स्वादुफलैर्वृतम्॥

samidbhistoyakalaśaiḥ phalamūlaiśca śobhitam।
āraṇyaiśca mahāvṛkṣaiḥ puṇyaiḥ svāduphalairvṛtam॥

॥ ४–५ ॥

वहाँ का प्रदेश इतना मनोरम था कि वहाँ अप्सराएँ प्रतिदिन आकर नृत्य करती थीं। उस स्थान के प्रति उनके मन में बड़े आदर का भाव था। बड़ी-बड़ी अग्निशालाएँ, स्रुवा आदि यज्ञपात्र, मृगचर्म, कुश, समिधा, जलपूर्ण कलश तथा फल-मूल उसकी शोभा बढ़ाते थे। स्वादिष्ट फल देनेवाले परम पवित्र तथा बड़े-बड़े वन्य वृक्षों से वह आश्रममण्डल घिरा हुआ था

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · ६ ॥
बलिहोमार्चितं पुण्यं ब्रह्मघोषनिनादितम्। पुष्पैश्चान्यैः परिक्षिप्तं पद्मिन्या सपद्मया॥

balihomārcitaṁ puṇyaṁ brahmaghoṣanināditam।
puṣpaiścānyaiḥ parikṣiptaṁ padminyā ca sapadmayā॥

बलिवैश्वदेव और होम से पूजित वह पवित्र आश्रमसमूह वेदमन्त्रों के पाठ की ध्वनि से गूँजता रहता था। कमलपुष्पों से सुशोभित पुष्करिणी उस स्थान की शोभा बढ़ाती थी तथा वहाँ और भी बहुत-से फूल सब ओर बिखरे हुए थे

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · ७ ॥
फलमूलाशनैर्दान्तैश्चीरकृष्णाजिनाम्बरैः। सूर्यवैश्वानराभैश्च पुराणैर्मुनिभिर्युतम्॥

phalamūlāśanairdāntaiścīrakṛṣṇājināmbaraiḥ।
sūryavaiśvānarābhaiśca purāṇairmunibhiryutam॥

उन आश्रमों में चीर और काला मृगचर्म धारण करनेवाले तथा फल-मूल का आहार करके रहनेवाले, जितेन्द्रिय एवं सूर्य और अग्नि के तुल्य महातेजस्वी, पुरातन मुनि निवास करते थे

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · ८ ॥
पुण्यैश्च नियताहारैः शोभितं परमर्षिभिः। तद् ब्रह्मभवनप्रख्यं ब्रह्मघोषनिनादितम्॥

puṇyaiśca niyatāhāraiḥ śobhitaṁ paramarṣibhiḥ।
tad brahmabhavanaprakhyaṁ brahmaghoṣanināditam॥

नियमित आहार करनेवाले पवित्र महर्षियों से सुशोभित वह आश्रमसमूह ब्रह्माजी के धाम की भाँति तेजस्वी तथा वेदध्वनि से निनादित था

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · ९ ॥
ब्रह्मविद्भिर्महाभागैर्ब्राह्मणैरुपशोभितम्। तद् दृष्ट्वा राघवः श्रीमांस्तापसाश्रममण्डलम्॥ अभ्यगच्छन्महातेजा विज्यं कृत्वा महद् धनुः।

brahmavidbhirmahābhāgairbrāhmaṇairupaśobhitam।
tad dṛṣṭvā rāghavaḥ śrīmāṁstāpasāśramamaṇḍalam॥
abhyagacchanmahātejā vijyaṁ kṛtvā mahad dhanuḥ।

अनेक महाभाग ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण उन आश्रमों की शोभा बढ़ाते थे। महातेजस्वी श्रीराम ने उस आश्रममण्डल को देखकर अपने महान् धनुष की प्रत्यञ्चा उतार दी, फिर वे आश्रम के भीतर गये

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · १० ॥
दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते रामं दृष्ट्वा महर्षयः॥ अभिजग्मुस्तदा प्रीता वैदेहीं यशस्विनीम्।

divyajñānopapannāste rāmaṁ dṛṣṭvā maharṣayaḥ॥
abhijagmustadā prītā vaidehīṁ ca yaśasvinīm।

श्रीराम तथा यशस्विनी सीता को देखकर वे दिव्य ज्ञान से सम्पन्न महर्षि बड़ी प्रसन्नता के साथ उनके पास गये

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · ११ ॥
ते तु सोममिवोद्यन्तं दृष्ट्वा वै धर्मचारिणम्॥

te tu somamivodyantaṁ dṛṣṭvā vai dharmacāriṇam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · १ · १२ ॥
लक्ष्मणं चैव दृष्ट्वा तु वैदेहीं यशस्विनीम्। मङ्गलानि प्रयुञ्जानाः प्रत्यगृह्णन् दृढव्रताः॥

lakṣmaṇaṁ caiva dṛṣṭvā tu vaidehīṁ ca yaśasvinīm।
maṅgalāni prayuñjānāḥ pratyagṛhṇan dṛḍhavratāḥ॥

॥ ११–१२ ॥

दृढतापूर्वक उत्तम व्रत का पालन करनेवाले वे महर्षि उदयकाल के चन्द्रमा की भाँति मनोहर, धर्मात्मा श्रीराम को, लक्ष्मण को और यशस्विनी विदेहराजकुमारी सीता को भी देखकर उन सबके लिये मङ्गलमय आशीर्वाद देने लगे। उन्होंने उन तीनों को आदरणीय अतिथि के रूप में ग्रहण किया

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · १३ ॥
रूपसंहननं लक्ष्मीं सौकुमार्यं सुवेषताम्। ददृशुर्विस्मिताकारा रामस्य वनवासिनः॥

rūpasaṁhananaṁ lakṣmīṁ saukumāryaṁ suveṣatām।
dadṛśurvismitākārā rāmasya vanavāsinaḥ॥

श्रीराम के रूप, शरीर की गठन, कान्ति, सुकुमारता तथा सुन्दर वेष को उन वनवासी मुनियों ने आश्चर्यचकित होकर देखा

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · १४ ॥
वैदेहीं लक्ष्मणं रामं नेत्रैरनिमिषैरिव। आश्चर्यभूतान् ददृशुः सर्वे ते वनवासिनः॥

vaidehīṁ lakṣmaṇaṁ rāmaṁ netrairanimiṣairiva।
āścaryabhūtān dadṛśuḥ sarve te vanavāsinaḥ॥

वन में निवास करनेवाले वे सभी मुनि श्रीराम, लक्ष्मण और सीता—तीनों को एकटक नेत्रों से देखने लगे। उनका स्वरूप उन्हें आश्चर्यमय प्रतीत होता था

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · १५ ॥
अत्रैनं हि महाभागाः सर्वभूतहिते रताः। अतिथिं पर्णशालायां राघवं संन्यवेशयन्॥

atrainaṁ hi mahābhāgāḥ sarvabhūtahite ratāḥ।
atithiṁ parṇaśālāyāṁ rāghavaṁ saṁnyaveśayan॥

समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहनेवाले उन महाभाग महर्षियों ने वहाँ अपने प्रिय अतिथि इन भगवान् श्रीराम को पर्णशाला में ले जाकर ठहराया

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · १६ ॥
ततो रामस्य सत्कृत्य विधिना पावकोपमाः। आजह्रुस्ते महाभागाः सलिलं धर्मचारिणः॥

tato rāmasya satkṛtya vidhinā pāvakopamāḥ।
ājahruste mahābhāgāḥ salilaṁ dharmacāriṇaḥ॥

अग्नितुल्य तेजस्वी और धर्मपरायण उन महाभाग मुनियों ने श्रीराम को विधिवत् सत्कार के साथ जल समर्पित किया

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · १७ ॥
मङ्गलानि प्रयुञ्जाना मुदा परमया युताः। मूलं पुष्पं फलं सर्वमाश्रमं महात्मनः॥

maṅgalāni prayuñjānā mudā paramayā yutāḥ।
mūlaṁ puṣpaṁ phalaṁ sarvamāśramaṁ ca mahātmanaḥ॥

फिर बड़ी प्रसन्नता के साथ मङ्गलसूचक आशीर्वाद देते हुए उन महात्मा श्रीराम को उन्होंने फल-मूल और फूल आदि के साथ सारा आश्रम भी समर्पित कर दिया

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · १८ ॥
निवेदयित्वा धर्मज्ञास्ते तु प्राञ्जलयोऽब्रुवन्। धर्मपालो जनस्यास्य शरण्यश्च महायशाः॥

nivedayitvā dharmajñāste tu prāñjalayo'bruvan।
dharmapālo janasyāsya śaraṇyaśca mahāyaśāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ ३ · १ · १९ ॥
पूजनीयश्च मान्यश्च राजा दण्डधरो गुरुः। इन्द्रस्यैव चतुर्भागः प्रजा रक्षति राघव॥ राजा तस्माद् वरान् भोगान् रम्यान् भुङ्क्ते नमस्कृतः।

pūjanīyaśca mānyaśca rājā daṇḍadharo guruḥ।
indrasyaiva caturbhāgaḥ prajā rakṣati rāghava॥
rājā tasmād varān bhogān ramyān bhuṅkte namaskṛtaḥ।

॥ १८–१९ ॥

सब कुछ निवेदन करके वे धर्मज्ञ मुनि हाथ जोड़कर बोले—‘रघुनन्दन! दण्ड धारण करनेवाला राजा धर्म का पालक, महायशस्वी, इस जन-समुदाय को शरण देनेवाला माननीय, पूजनीय और सबका गुरु है। इस भूतल पर इन्द्र (आदि लोकपालों) का ही चौथा अंश होने के कारण वह प्रजा की रक्षा करता है, अतः राजा सबसे वन्दित होता तथा उत्तम एवं रमणीय भोगों का उपभोग करता है। (जब साधारण राजा की यह स्थिति है, तब आपके लिये तो क्या कहना है। आप तो साक्षात् भगवान् हैं)

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · २० ॥
ते वयं भवता रक्ष्या भवद्विषयवासिनः। नगरस्थो वनस्थो वा त्वं नो राजा जनेश्वरः॥

te vayaṁ bhavatā rakṣyā bhavadviṣayavāsinaḥ।
nagarastho vanastho vā tvaṁ no rājā janeśvaraḥ॥

‘हम आपके राज्य में निवास करते हैं, अतः आपको हमारी रक्षा करनी चाहिये। आप नगर में रहें या वन में, हमलोगों के राजा ही हैं। आप समस्त जनसमुदाय के शासक एवं पालक हैं

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · २१ ॥
न्यस्तदण्डा वयं राजञ्जितक्रोधा जितेन्द्रियाः। रक्षणीयास्त्वया शश्वद् गर्भभूतास्तपोधनाः॥

nyastadaṇḍā vayaṁ rājañjitakrodhā jitendriyāḥ।
rakṣaṇīyāstvayā śaśvad garbhabhūtāstapodhanāḥ॥

‘राजन्! हमने जीवमात्र को दण्ड देना छोड़ दिया है, क्रोध और इन्द्रियों को जीत लिया है। अब तपस्या ही हमारा धन है। जैसे माता गर्भस्थ बालक की रक्षा करती है, उसी प्रकार आपको सदा सब तरह से हमारी रक्षा करनी चाहिये’

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · २२ ॥
एवमुक्त्वा फलैर्मूलैः पुष्पैरन्यैश्च राघवम्। वन्यैश्च विविधाहारैः सलक्ष्मणमपूजयन्॥

evamuktvā phalairmūlaiḥ puṣpairanyaiśca rāghavam।
vanyaiśca vividhāhāraiḥ salakṣmaṇamapūjayan॥

ऐसा कहकर उन तपस्वी मुनियों ने वन में उत्पन्न होनेवाले फल, मूल, फूल तथा अन्य अनेक प्रकार के आहारों से लक्ष्मण (और सीता) सहित भगवान् श्रीरामचन्द्रजी का सत्कार किया

English translation coming soon.

॥ ३ · १ · २३ ॥
तथान्ये तापसाः सिद्धा रामं वैश्वानरोपमाः। न्यायवृत्ता यथान्यायं तर्पयामासुरीश्वरम्॥

tathānye tāpasāḥ siddhā rāmaṁ vaiśvānaropamāḥ।
nyāyavṛttā yathānyāyaṁ tarpayāmāsurīśvaram॥

इनके सिवा दूसरे अग्नितुल्य तेजस्वी तथा न्याययुक्त बर्ताववाले सिद्ध तापसों ने भी सर्वेश्वर भगवान् श्रीराम को यथोचित रूप से तृप्त किया

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें पहला सर्ग पूरा हुआ ॥ १ ॥