अनसूयाकी आज्ञासे सीताका उनके दिये हुए वस्त्राभूषणोंको धारण करके श्रीरामजीके पास आना तथा श्रीराम आदिका रात्रिमें आश्रमपर रहकर प्रातःकाल अन्यत्र जानेके लिये ऋषियोंसे विदा लेना
“वन-प्रवेश”
॥ २ · ११९ · १६–२२ ॥
प्रत्यूषे अत्र्याश्रमप्रान्ते श्यामवर्णो रामो वल्कलकृष्णाजिनवसनो महाकार्मुकहस्तो गभीरं छायाच्छन्नं दण्डकवनं प्रति वनमार्गमधिरोहति, शान्तदृढमुखः; पार्श्वे च सरलवन्यवेषा सीता अनसूयादत्तदिव्यानुग्रहेण मृदु दीप्ता विश्वासेन गच्छति, वल्कलधरो लक्ष्मणश्च धनुस्तूणीरधरः पृष्ठतोऽनुगच्छति; तेषां पृष्ठत आश्रमप्रान्ते वृद्धोऽत्रिः कृशा चानसूया वल्कलधरैः केचित्तपस्विभिः सह कृताञ्जलयः स्वस्तिवाचनेनाशीर्वदन्ति, अग्रे च महद्वनं पाण्डुरहेमप्रभाते तमोमयमुत्तिष्ठति — मेघमालामिव प्रविशन्नुदितः सूर्यः — एकयात्रायाः समापनमन्यस्याश्चारम्भः।
प्रातःकाल अत्रि के आश्रम के छोर पर श्यामवर्ण श्रीराम वल्कल एवं कृष्णमृगचर्म धारण किये, हाथ में विशाल धनुष लिये, गहरे छायाच्छन्न दण्डकवन की ओर जाते वनमार्ग पर पग रखते हैं, शान्त-दृढ़ मुख से; पार्श्व में सरल वनवेश में सीता अनसूया के दिये दिव्य अनुग्रह से मृदु दीप्त, विश्वास के साथ चलती हैं, और वल्कलधारी लक्ष्मण धनुष-तूणीर लिये पीछे-पीछे चलते हैं; उनके पीछे आश्रम के छोर पर वृद्ध अत्रि और कृश अनसूया कुछ वल्कलधारी तपस्वियों के साथ हाथ जोड़े स्वस्तिवाचन से आशीर्वाद देते हैं, और आगे विशाल वन पाण्डुर स्वर्ण-प्रभात में अन्धकारमय उठता है—मानो उदित सूर्य मेघमाला में प्रवेश कर रहा हो—एक यात्रा का समापन और दूसरी का आरम्भ।
At first light on the edge of Atri's hermitage, the blue-hued Ram — clad in bark and deer-skin, his great bow in hand — steps onto the forest path leading into the deep, shadowed Dandaka woods, his face calm and resolute; at his side the gentle Sita, softly radiant with the divine grace of Anasuya's gifts, walks with quiet trust, and the bark-clad Lakshman follows bearing bow and quiver, while behind them at the hermitage edge the ancient sage Atri and his frail saintly wife Anasuya, with a few bark-clad ascetics, raise folded hands in blessing and auspicious farewell as the towering forest rises dark against a pale gold dawn, as if the risen sun were entering a mass of clouds — the close of one journey and the opening of another.
anasūyā tu dharmajñā śrutvā tāṁ mahatīṁ kathām।
paryaṣvajata bāhubhyāṁ śirasyāghrāya maithilīm ॥
धर्म को जाननेवाली अनसूया ने उस लंबी कथा को सुनकर मिथिलेशकुमारी सीता को अपनी दोनों भुजाओं से अङ्क में भर लिया और उनका मस्तक सूँघकर कहा—
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vyaktākṣarapadaṁ citraṁ bhāṣitaṁ madhuraṁ tvayā।
yathā svayaṁvaraṁ vṛttaṁ tat sarvaṁ ca śrutaṁ mayā ॥
‘बेटी! तुमने सुस्पष्ट अक्षरवाले शब्दों में यह विचित्र एवं मधुर प्रसङ्ग सुनाया। तुम्हारा स्वयंवर जिस प्रकार हुआ था, वह सब मैंने सुन लिया।
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rameyaṁ kathayā te tu dṛḍhaṁ madhurabhāṣiṇi।
ravirastaṁ gataḥ śrīmānupohya rajanīṁ śubhām ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
divasaṁ parikīrṇānāmāhārārthaṁ patattriṇām।
saṁdhyākāle nilīnānāṁ nidrārthaṁ śrūyate dhvaniḥ ॥
‘मधुरभाषिणी सीते! तुम्हारी इस कथा में मेरा मन बहुत लग रहा है; तथापि तेजस्वी सूर्यदेव रजनी की शुभ बेला को निकट पहुँचाकर अस्त हो गये। जो दिन में चारा चुगने के लिये चारों ओर छिटके हुए थे, वे पक्षी अब संध्याकाल में नींद लेने के लिये अपने घोंसलों में आकर छिप गये हैं; उनकी यह ध्वनि सुनायी दे रही है।
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ete cāpyabhiṣekārdrā munayaḥ kalaśodyatāḥ।
sahitā upavartante salilāplutavalkalāḥ ॥
‘ये जल से भीगे हुए वल्कल धारण करनेवाले मुनि, जिनके शरीर स्नान के कारण आर्द्र दिखायी देते हैं, जल से भरे कलश उठाये एक साथ आश्रम की ओर लौट रहे हैं।
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agnihotre ca ṛṣiṇā hute ca vidhipūrvakam।
kapotāṅgāruṇo dhūmo dṛśyate pavanoddhataḥ ॥
‘महर्षि (अत्रि) ने विधिपूर्वक अग्निहोत्र-सम्बन्धी होमकर्म सम्पन्न कर लिया है, अतः वायु के वेग से ऊपर को उठा हुआ यह कबूतर के कण्ठ की भाँति श्यामवर्ण का धूम दिखायी दे रहा है।
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alpavarṇā hi taravo ghanībhūtāḥ samantataḥ।
viprakṛṣṭendriye deśe na prakāśanti vai diśaḥ ॥
‘अपनी इन्द्रियों से दूर देश में चारों ओर जो वृक्ष दिखायी देते हैं, वे थोड़े पत्तेवाले होने पर भी अन्धकार से व्याप्त हो घनीभूत हो गये हैं; अतएव दिशाओं का भान नहीं हो रहा है।
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rajanīcarasattvāni pracaranti samantataḥ।
tapovanamṛgā hyete veditīrtheṣu śerate ॥
‘रात को विचरनेवाले प्राणी (उल्लू आदि) सब ओर विचरण कर रहे हैं तथा ये तपोवन के मृग पुण्यक्षेत्रस्वरूप आश्रम के वेदी आदि विभिन्न प्रदेशों में सो रहे हैं।
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sampravṛttā niśā sīte nakṣatrasamalaṁkṛtā।
jyotsnāprāvaraṇaścandro dṛśyate'bhyudito'mbare ॥
‘सीते! अब रात हो गयी, वह नक्षत्रों से सज गयी है। आकाश में चन्द्रदेव चाँदनी की चादर ओढ़े उदित दिखायी देते हैं।
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gamyatāmanujānāmi rāmasyānucarī bhava।
kathayantyā hi madhuraṁ tvayāhamapi toṣitā ॥
‘अतः अब जाओ, मैं तुम्हें जाने की आज्ञा देती हूँ। जाकर श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में लग जाओ। तुमने अपनी मीठी-मीठी बातों से मुझे भी बहुत संतुष्ट किया है।
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alaṁkuru ca tāvat tvaṁ pratyakṣaṁ mama maithili।
prītiṁ janaya me vatse divyālaṁkāraśobhinī ॥
‘बेटी! मिथिलेशकुमारी! पहले मेरी आँखों के सामने अपने-आपको अलंकृत करो। इन दिव्य वस्त्र और आभूषणों को धारण करके इनसे सुशोभित हो मुझे प्रसन्न करो’
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sā tadā samalaṁkṛtya sītā surasutopamā।
praṇamya śirasā pādau rāmaṁ tvabhimukhī yayau ॥
यह सुनकर देवकन्या के समान सुन्दरी सीता ने उस समय उन वस्त्राभूषणों से अपना शृङ्गार किया और अनसूया के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करने के अनन्तर वे श्रीराम के सम्मुख गयीं।
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tathā tu bhūṣitāṁ sītāṁ dadarśa vadatāṁ varaḥ।
rāghavaḥ prītidānena tapasvinyā jaharṣa ca ॥
श्रीराम ने जब इस प्रकार सीता को वस्त्र और आभूषणों से विभूषित देखा, तब तपस्विनी अनसूया के उस प्रेमोपहार के दर्शन से वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीरघुनाथजी को बड़ी प्रसन्नता हुई।
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nyavedayat tataḥ sarvaṁ sītā rāmāya maithilī।
prītidānaṁ tapasvinyā vasanābharaṇasrajām ॥
उस समय मिथिलेशकुमारी सीता ने तपस्विनी अनसूया के हाथ से जिस प्रकार वस्त्र, आभूषण और हार आदि का प्रेमोपहार प्राप्त हुआ था, वह सब श्रीरामचन्द्रजी से कह सुनाया।
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prahṛṣṭastvabhavad rāmo lakṣmaṇaśca mahārathaḥ।
maithilyāḥ satkriyāṁ dṛṣṭvā mānuṣeṣu sudurlabhām ॥
भगवान् श्रीराम और महारथी लक्ष्मण सीता का वह सत्कार, जो मनुष्यों के लिये सर्वथा दुर्लभ है, देखकर बहुत प्रसन्न हुए।
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tataḥ sa śarvarīṁ prītaḥ puṇyāṁ śaśinibhānanām।
arcitastāpasaiḥ sarvairuvāsa raghunandanaḥ ॥
तदनन्तर समस्त तपस्विजनों से सम्मानित हुए रघुकुलनन्दन श्रीराम ने अनसूया के दिये हुए पवित्र अलंकार आदि से अलंकृत चन्द्रमुखी सीता को देखकर बड़ी प्रसन्नता के साथ वहाँ रात्रिभर निवास किया।
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tasyāṁ rātryāṁ vyatītāyāmabhiṣicya hutāgnikān।
āpṛcchetāṁ naravyāghrau tāpasān vanagocarān ॥
वह रात बीतने पर जब सभी वनवासी तपस्वी मुनि स्नान करके अग्निहोत्र कर चुके, तब पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण ने उनसे जाने के लिये आज्ञा माँगी।
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tāvūcuste vanacarāstāpasā dharmacāriṇaḥ।
vanasya tasya saṁcāraṁ rākṣasaiḥ samabhiplutam ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
rakṣāṁsi puruṣādāni nānārūpāṇi rāghava।
vasantyasmin mahāraṇye vyālāśca rudhirāśanāḥ ॥
तब वे धर्मपरायण वनवासी तपस्वी उन दोनों भाइयों से इस प्रकार बोले—‘रघुनन्दन! इस वन का मार्ग राक्षसों से आक्रान्त है—यहाँ उनका उपद्रव होता रहता है। इस विशाल वन में नानारूपधारी नरभक्षी राक्षस तथा रक्तभोजी हिंसक पशु निवास करते हैं।
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ucchiṣṭaṁ vā pramattaṁ vā tāpasaṁ brahmacāriṇam।
adantyasmin mahāraṇye tān nivāraya rāghava ॥
‘राघवेन्द्र! जो तपस्वी और ब्रह्मचारी यहाँ अपवित्र अथवा असावधान अवस्था में मिल जाता है, उसे वे राक्षस और हिंसक जन्तु इस महान् वन में खा जाते हैं; अतः आप उन्हें रोकिये—यहाँ से मार भगाइये।
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eṣa panthā maharṣīṇāṁ phalānyāharatāṁ vane।
anena tu vanaṁ durgaṁ gantuṁ rāghava te kṣamam ॥
‘रघुकुलभूषण! यही वह मार्ग है, जिससे महर्षिलोग वन के भीतर फल-मूल लेने के लिये जाते हैं। आपको भी इसी मार्ग से इस दुर्गम वन में प्रवेश करना चाहिये’
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itīritaḥ prāñjalibhistapasvibhi-
rdvijaiḥ kṛtasvastyayanaḥ paraṁtapaḥ।
vanaṁ sabhāryaḥ praviveśa rāghavaḥ
salakṣmaṇaḥ sūrya ivābhramaṇḍalam ॥
तपस्वी ब्राह्मणों ने हाथ जोड़कर जब ऐसी बातें कहीं और उनकी मङ्गलयात्रा के लिये स्वस्तिवाचन किया, तब शत्रुओं को संताप देनेवाले भगवान् श्रीराम ने अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ उस वन में प्रवेश किया, मानो सूर्यदेव मेघों की घटा के भीतर घुस गये हों।
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥ ११९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें एक सौ उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११९ ॥