वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ९९ · ४२ श्लोकाःSarga 99 · 42 ślokas

भरतका शत्रुघ्न आदिके साथ श्रीरामके आश्रमपर जाना, उनकी पर्णशालाको देखना तथा रोते-रोते उनके चरणोंमें गिर जाना, श्रीरामका उन सबको हृदयसे लगाना और मिलना

तापस-रामदर्शन

“तापस-रामदर्शन”
॥ २ · ९९ · २५–२९ ॥

चित्रकूटपर्णशालायां दर्भास्तीर्णे स्थण्डिले शाश्वतब्रह्मेव जटामण्डलधरः कृष्णाजिनचीरवल्कलवसनः श्यामवर्णो रामो दीप्तपावकसमीपे शान्ततेजा आस्ते; तत्पार्श्वे सरलवन्यवेषा सीता वल्कलधरो लक्ष्मणश्च तूष्णीं स्थितौ, उटजशाखाभित्तौ च महान्ति कार्मुकाणि तूणीराश्च लम्बन्ते; तं तापसरूपमग्रजं दृष्ट्वा श्वेतशोकवस्त्रधरो निराभरणो भरतः शोकमोहपरिप्लुतः साश्रुवदनः प्रसारितबाहुस्तं प्रत्यभिधावति, पश्चाच्च रुदन् शत्रुघ्नोऽनुगच्छति।

चित्रकूट की पर्णशाला में, कुश बिछी वेदी पर सनातन ब्रह्मा-से विराजमान श्यामवर्ण श्रीराम — सिर पर ऊँचा जटामण्डल, अंगों पर चीर-वल्कल और कृष्णमृगचर्म, पास ही प्रज्वलित यज्ञाग्नि की दिव्य आभा — शान्त एवं तेजस्वी बैठे हैं; उनके समीप सरल वनवेश में सीता और वल्कलधारी लक्ष्मण मौन विराजमान हैं, तथा झोपड़ी की टहनी-भित्ति पर विशाल धनुष और तूणीर टँगे हैं; अपने अग्रज को इस तपस्वी रूप में देखकर श्वेत शोकवस्त्र लपेटे, आभूषणहीन भरत शोक और मोह से विह्वल हो, अश्रुपूर्ण मुख तथा फैली हुई बाँहों से उनकी ओर दौड़ पड़ते हैं, और एक पग पीछे रोते हुए शत्रुघ्न चले आते हैं।

Within the leaf-hut on Chitrakut, on a darbha-strewn altar, the blue-hued Ram sits serene and radiant like the eternal Brahma — his hair coiled in a high matted topknot, his body clad in bark-cloth and black deer-skin, the sacred fire blazing at his side; near him the gentle Sita in simple forest garb and the bark-clad Lakshman sit in silence, while great bows and quivers hang on the woven-branch walls. Beholding his elder brother thus reduced to austerity, the grief-worn Bharat — wrapped in undyed white mourner's cloth, his ornaments cast off — is overcome and rushes forward, his face wet with tears and his arms outstretched, while a step behind, weeping, comes Shatrughna.

॥ २ · ९९ · १ ॥
निविष्टायां तु सेनायामुत्सुको भरतस्ततः। जगाम भ्रातरं द्रष्टुं शत्रुघ्नमनुदर्शयन्

niviṣṭāyāṁ tu senāyāmutsuko bharatastataḥ।
jagāma bhrātaraṁ draṣṭuṁ śatrughnamanudarśayan ॥

सेना के ठहर जाने पर भाई के दर्शन के लिये उत्कण्ठित होकर भरत अपने छोटे भाई शत्रुघ्न को आश्रम के चिह्न दिखाते हुए उसकी ओर चले

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॥ २ · ९९ · २ ॥
ऋषिं वसिष्ठं संदिश्य मातॄर्मे शीघ्रमानय। इति त्वरितमग्रे जगाम गुरुवत्सलः

ṛṣiṁ vasiṣṭhaṁ saṁdiśya mātṝrme śīghramānaya।
iti tvaritamagre sa jagāma guruvatsalaḥ ॥

गुरुभक्त भरत महर्षि वसिष्ठ को यह संदेश देकर कि आप मेरी माताओं को साथ लेकर शीघ्र ही आइये, तुरंत आगे बढ़ गये

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॥ २ · ९९ · ३ ॥
सुमन्त्रस्त्वपि शत्रुघ्नमदूरादन्वपद्यत। रामदर्शनजस्तर्षो भरतस्येव तस्य

sumantrastvapi śatrughnamadūrādanvapadyata।
rāmadarśanajastarṣo bharatasyeva tasya ca ॥

सुमन्त्र भी शत्रुघ्न के समीप ही पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्हें भी भरत के समान ही श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की तीव्र अभिलाषा थी

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॥ २ · ९९ · ४ ॥
गच्छन्नेवाथ भरतस्तापसालयसंस्थिताम्। भ्रातुः पर्णकुटीं श्रीमानुटजं ददर्श

gacchannevātha bharatastāpasālayasaṁsthitām।
bhrātuḥ parṇakuṭīṁ śrīmānuṭajaṁ ca dadarśa ha ॥

चलते-चलते ही श्रीमान् भरत ने तपस्वीजनों के आश्रमों के समान प्रतिष्ठित हुई भाई की पर्णकुटी और झोपड़ी देखी

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॥ २ · ९९ · ५ ॥
शालायास्त्वग्रतस्तस्या ददर्श भरतस्तदा। काष्ठानि चावभग्नानि पुष्पाण्यपचितानि

śālāyāstvagratastasyā dadarśa bharatastadā।
kāṣṭhāni cāvabhagnāni puṣpāṇyapacitāni ca ॥

उस पर्णशाला के सामने भरत ने उस समय बहुत-से कटे हुए काष्ठ के टुकड़े देखे, जो होम के लिये संगृहीत थे। साथ ही वहाँ पूजा के लिये संचित किये हुए फूल भी दृष्टिगोचर हुए

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॥ २ · ९९ · ६ ॥
लक्ष्मणस्य रामस्य ददर्शाश्रममीयुषः। कृतं वृक्षेष्वभिज्ञानं कुशचीरैः क्वचित् क्वचित्

sa lakṣmaṇasya rāmasya dadarśāśramamīyuṣaḥ।
kṛtaṁ vṛkṣeṣvabhijñānaṁ kuśacīraiḥ kvacit kvacit ॥

आश्रम पर आने-जानेवाले श्रीराम और लक्ष्मण के द्वारा निर्मित मार्गबोधक चिह्न भी उन्हें वृक्षों में लगे दिखायी दिये, जो कुशों और चीरोंद्वारा तैयार करके कहीं-कहीं वृक्षों की शाखाओं में लटका दिये गये थे

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॥ २ · ९९ · ७ ॥
ददर्श वने तस्मिन् महतः संचयान् कृतान्। मृगाणां महिषाणां करीषैः शीतकारणात्

dadarśa ca vane tasmin mahataḥ saṁcayān kṛtān।
mṛgāṇāṁ mahiṣāṇāṁ ca karīṣaiḥ śītakāraṇāt ॥

उस वन में शीत-निवारण के लिये मृगों की लेंडी और भैंसों के सूखे हुए गोबर के ढेर एकत्र करके रखे गये थे, जिन्हें भरत ने अपनी आँखों देखा

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॥ २ · ९९ · ८ ॥
गच्छन्नेव महाबाहुर्द्युतिमान् भरतस्तदा। शत्रुघ्नं चाब्रवीद् हृष्टस्तानमात्यांश्च सर्वशः

gacchanneva mahābāhurdyutimān bharatastadā।
śatrughnaṁ cābravīd hṛṣṭastānamātyāṁśca sarvaśaḥ ॥

उस समय चलते-चलते ही परम कान्तिमान् महाबाहु भरत ने शत्रुघ्न तथा सम्पूर्ण मन्त्रियों से अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा—

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॥ २ · ९९ · ९ ॥
मन्ये प्राप्ताः स्म तं देशं भरद्वाजो यमब्रवीत्। नातिदूरे हि मन्येऽहं नदीं मन्दाकिनीमितः

manye prāptāḥ sma taṁ deśaṁ bharadvājo yamabravīt।
nātidūre hi manye'haṁ nadīṁ mandākinīmitaḥ ॥

‘जान पड़ता है कि महर्षि भरद्वाज ने जिस स्थान का पता बताया था, वहाँ हमलोग आ गये हैं। मैं समझता हूँ मन्दाकिनी नदी यहाँ से अधिक दूर नहीं है

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॥ २ · ९९ · १० ॥
उच्चैर्बद्धानि चीराणि लक्ष्मणेन भवेदयम्। अभिज्ञानकृतः पन्था विकाले गन्तुमिच्छता

uccairbaddhāni cīrāṇi lakṣmaṇena bhavedayam।
abhijñānakṛtaḥ panthā vikāle gantumicchatā ॥

‘वृक्षों में ऊँचे बँधे हुए ये चीर दिखायी दे रहे हैं। अतः समय-बेसमय जल आदि लाने के निमित्त बाहर जाने की इच्छावाले लक्ष्मण ने जिसकी पहचान के लिये यह चिह्न बनाया है, वह आश्रम को जानेवाला मार्ग यही हो सकता है

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॥ २ · ९९ · ११ ॥
इतश्चोदात्तदन्तानां कुञ्जराणां तरस्विनाम्। शैलपार्श्वे परिक्रान्तमन्योन्यमभिगर्जताम्

itaścodāttadantānāṁ kuñjarāṇāṁ tarasvinām।
śailapārśve parikrāntamanyonyamabhigarjatām ॥

‘इधर से बड़े-बड़े दाँतवाले वेगशाली हाथी निकलकर एक-दूसरे के प्रति गर्जना करते हुए इस पर्वत के पार्श्वभाग में चक्कर लगाते रहते हैं (अतः उधर जाने से रोकने के लिये लक्ष्मण ने ये चिह्न बनाये होंगे)

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॥ २ · ९९ · १२ ॥
यमेवाधातुमिच्छन्ति तापसाः सततं वने। तस्यासौ दृश्यते धूमः संकुलः कृष्णवर्त्मनः

yamevādhātumicchanti tāpasāḥ satataṁ vane।
tasyāsau dṛśyate dhūmaḥ saṁkulaḥ kṛṣṇavartmanaḥ ॥

‘वन में तपस्वी मुनि सदा जिनका आधान करना चाहते हैं, उन अग्निदेव का यह अति सघन धूम दृष्टिगोचर हो रहा है

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॥ २ · ९९ · १३ ॥
अत्राहं पुरुषव्याघ्रं गुरुसत्कारकारिणम्। आर्यं द्रक्ष्यामि संहृष्टं महर्षिमिव राघवम्

atrāhaṁ puruṣavyāghraṁ gurusatkārakāriṇam।
āryaṁ drakṣyāmi saṁhṛṣṭaṁ maharṣimiva rāghavam ॥

‘यहाँ मैं गुरुजनों का सत्कार करनेवाले पुरुषसिंह आर्य रघुनन्दन का सदा आनन्दमग्न रहनेवाले महर्षि की भाँति दर्शन करूँगा’

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॥ २ · ९९ · १४ ॥
अथ गत्वा मुहूर्तं तु चित्रकूटं राघवः। मन्दाकिनीमनुप्राप्तस्तं जनं चेदमब्रवीत्

atha gatvā muhūrtaṁ tu citrakūṭaṁ sa rāghavaḥ।
mandākinīmanuprāptastaṁ janaṁ cedamabravīt ॥

तदनन्तर रघुकुलभूषण भरत दो ही घड़ी में मन्दाकिनी के तट पर विराजमान चित्रकूट के पास जा पहुँचे और अपने साथवाले लोगों से इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ९९ · १५ ॥
जगत्यां पुरुषव्याघ्र आस्ते वीरासने रतः। जनेन्द्रो निर्जनं प्राप्य धिङ्मे जन्म सजीवितम्

jagatyāṁ puruṣavyāghra āste vīrāsane rataḥ।
janendro nirjanaṁ prāpya dhiṅme janma sajīvitam ॥

‘अहो! मेरे ही कारण पुरुषसिंह महाराज श्रीरामचन्द्र इस निर्जन वन में आकर खुली पृथ्वी के ऊपर वीरासन से बैठते हैं; अतः मेरे जन्म और जीवन को धिक्कार है

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॥ २ · ९९ · १६ ॥
मत्कृते व्यसनं प्राप्तो लोकनाथो महाद्युतिः। सर्वान् कामान् परित्यज्य वने वसति राघवः

matkṛte vyasanaṁ prāpto lokanātho mahādyutiḥ।
sarvān kāmān parityajya vane vasati rāghavaḥ ॥

‘मेरे ही कारण महातेजस्वी लोकनाथ रघुनाथ भारी संकट में पड़कर समस्त कामनाओं का परित्याग करके वन में निवास करते हैं

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॥ २ · ९९ · १७ ॥
इति लोकसमाक्रुष्टः पादेष्वद्य प्रसादयन्। रामं तस्य पतिष्यामि सीताया लक्ष्मणस्य

iti lokasamākruṣṭaḥ pādeṣvadya prasādayan।
rāmaṁ tasya patiṣyāmi sītāyā lakṣmaṇasya ca ॥

‘इसलिये मैं सब लोगों के द्वारा निन्दित हूँ, अतः मेरे जन्म को धिक्कार है! आज मैं श्रीराम को प्रसन्न करने के लिये उनके चरणों में गिर जाऊँगा। सीता और लक्ष्मण के भी पैरों पडूँगा’

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॥ २ · ९९ · १८ ॥
एवं विलपंस्तस्मिन् वने दशरथात्मजः। ददर्श महतीं पुण्यां पर्णशालां मनोरमाम्

evaṁ sa vilapaṁstasmin vane daśarathātmajaḥ।
dadarśa mahatīṁ puṇyāṁ parṇaśālāṁ manoramām ॥

इस तरह विलाप करते हुए दशरथकुमार भरत ने उस वन में एक बड़ी पर्णशाला देखी, जो परम पवित्र और मनोरम थी

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॥ २ · ९९ · १९ ॥
सालतालाश्वकर्णानां पर्णैर्बहुभिरावृताम्। विशालां मृदुभिस्तीर्णां कुशैर्वेदिमिवाध्वरे

sālatālāśvakarṇānāṁ parṇairbahubhirāvṛtām।
viśālāṁ mṛdubhistīrṇāṁ kuśairvedimivādhvare ॥

वह शाल, ताल और अश्वकर्ण नामक वृक्षों के बहुत-से पत्तोंद्वारा छायी हुई थी; अतः यज्ञशाला में जिस पर कोमल कुश बिछाये गये हों, उस लंबी-चौड़ी वेदी के समान शोभा पा रही थी

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॥ २ · ९९ · २० ॥
शक्रायुधनिकाशैश्च कार्मुकैर्भारसाधनैः। रुक्मपृष्ठैर्महासारैः शोभितां शत्रुबाधकैः

śakrāyudhanikāśaiśca kārmukairbhārasādhanaiḥ।
rukmapṛṣṭhairmahāsāraiḥ śobhitāṁ śatrubādhakaiḥ ॥

वहाँ इन्द्रधनुष के समान बहुत-से धनुष रखे गये थे, जो गुरुतर कार्य-साधन में समर्थ थे। जिनके पृष्ठभाग सोने से मढ़े गये थे और जो बहुत ही प्रबल तथा शत्रुओं को पीड़ा देनेवाले थे। उनसे उस पर्णकुटी की बड़ी शोभा हो रही थी

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॥ २ · ९९ · २१ ॥
अर्करश्मिप्रतीकाशैर्घोरैस्तूणगतैः शरैः। शोभितां दीप्तवदनैः सर्पैर्भोगवतीमिव

arkaraśmipratīkāśairghoraistūṇagataiḥ śaraiḥ।
śobhitāṁ dīptavadanaiḥ sarpairbhogavatīmiva ॥

वहाँ तरकसों में बहुत-से बाण भरे थे, जो सूर्य की किरणों के समान चमकीले और भयङ्कर थे। उन बाणों से वह पर्णशाला उसी प्रकार सुशोभित होती थी, जैसे दीप्तिमान् मुखवाले सर्पों से भोगवती पुरी शोभित होती है

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॥ २ · ९९ · २२ ॥
महारजतवासोभ्यामसिभ्यां विराजिताम्। रुक्मबिन्दुविचित्राभ्यां चर्मभ्यां चापि शोभिताम्

mahārajatavāsobhyāmasibhyāṁ ca virājitām।
rukmabinduvicitrābhyāṁ carmabhyāṁ cāpi śobhitām ॥

सोने की म्यानों में रखी हुई दो तलवारें और स्वर्णमय बिन्दुओं से विभूषित दो विचित्र ढालें भी उस आश्रम की शोभा बढ़ा रही थीं

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॥ २ · ९९ · २३ ॥
गोधाङ्गुलित्रैरासक्तैश्चित्रकाञ्चनभूषितैः। अरिसंघैरनाधृष्यां मृगैः सिंहगुहामिव

godhāṅgulitrairāsaktaiścitrakāñcanabhūṣitaiḥ।
arisaṁghairanādhṛṣyāṁ mṛgaiḥ siṁhaguhāmiva ॥

वहाँ गोह के चमड़े के बने हुए बहुत-से सुवर्णजटित दस्ताने भी टँगे हुए थे। जैसे मृग सिंह की गुफा पर आक्रमण नहीं कर सकते, उसी प्रकार वह पर्णशाला शत्रुसमूहों के लिये अगम्य एवं अजेय थी

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॥ २ · ९९ · २४ ॥
प्रागुदक्प्रवणां वेदिं विशालां दीप्तपावकाम्। ददर्श भरतस्तत्र पुण्यां रामनिवेशने

prāgudakpravaṇāṁ vediṁ viśālāṁ dīptapāvakām।
dadarśa bharatastatra puṇyāṁ rāmaniveśane ॥

श्रीराम के उस निवासस्थान में भरत ने एक पवित्र एवं विशाल वेदी भी देखी, जो ईशानकोण की ओर कुछ नीची थी। उस पर अग्नि प्रज्वलित हो रही थी

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॥ २ · ९९ · २५ ॥
निरीक्ष्य मुहूर्तं तु ददर्श भरतो गुरुम्। उटजे राममासीनं जटामण्डलधारिणम्

nirīkṣya sa muhūrtaṁ tu dadarśa bharato gurum।
uṭaje rāmamāsīnaṁ jaṭāmaṇḍaladhāriṇam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९९ · २६ ॥
कृष्णाजिनधरं तं तु चीरवल्कलवाससम्। ददर्श राममासीनमभितः पावकोपमम्

kṛṣṇājinadharaṁ taṁ tu cīravalkalavāsasam।
dadarśa rāmamāsīnamabhitaḥ pāvakopamam ॥

॥ २५–२६ ॥

पर्णशाला की ओर थोड़ी देरतक देखकर भरत ने कुटिया में बैठे हुए अपने पूजनीय भ्राता श्रीराम को देखा, जो सिर पर जटामण्डल धारण किये हुए थे। उन्होंने अपने अङ्गों में कृष्णमृगचर्म तथा चीर एवं वल्कल वस्त्र धारण कर रखे थे। भरत को दिखायी दिया कि श्रीराम पास ही बैठे हैं और प्रज्वलित अग्नि के समान अपनी दिव्य प्रभा फैला रहे हैं

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॥ २ · ९९ · २७ ॥
सिंहस्कन्धं महाबाहुं पुण्डरीकनिभेक्षणम्। पृथिव्याः सागरान्ताया भर्तारं धर्मचारिणम्

siṁhaskandhaṁ mahābāhuṁ puṇḍarīkanibhekṣaṇam।
pṛthivyāḥ sāgarāntāyā bhartāraṁ dharmacāriṇam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९९ · २८ ॥
उपविष्टं महाबाहुं ब्रह्माणमिव शाश्वतम्। स्थण्डिले दर्भसंस्तीर्णे सीतया लक्ष्मणेन

upaviṣṭaṁ mahābāhuṁ brahmāṇamiva śāśvatam।
sthaṇḍile darbhasaṁstīrṇe sītayā lakṣmaṇena ca ॥

॥ २७–२८ ॥

समुद्रपर्यन्त पृथ्वी के स्वामी, धर्मात्मा, महाबाहु श्रीराम सनातन ब्रह्मा की भाँति कुश बिछी हुई वेदी पर बैठे थे। उनके कंधे सिंह के समान, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र प्रफुल्ल कमल के समान थे। उस वेदी पर वे सीता और लक्ष्मण के साथ विराजमान थे

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॥ २ · ९९ · २९ ॥
तं दृष्ट्वा भरतः श्रीमान् शोकमोहपरिप्लुतः। अभ्यधावत धर्मात्मा भरतः केकयीसुतः

taṁ dṛṣṭvā bharataḥ śrīmān śokamohapariplutaḥ।
abhyadhāvata dharmātmā bharataḥ kekayīsutaḥ ॥

उन्हें इस अवस्था में देख धर्मात्मा श्रीमान् कैकेयीकुमार भरत शोक और मोह में डूब गये तथा बड़े वेग से उनकी ओर दौड़े

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॥ २ · ९९ · ३० ॥
दृष्ट्वैव विललापार्तो बाष्पसंदिग्धया गिरा। अशक्नुवन् वारयितुं धैर्याद् वचनमब्रुवन्

dṛṣṭvaiva vilalāpārto bāṣpasaṁdigdhayā girā।
aśaknuvan vārayituṁ dhairyād vacanamabruvan ॥

भाई की ओर दृष्टि पड़ते ही भरत आर्तभाव से विलाप करने लगे। वे अपने शोक के आवेग को धैर्य से रोक न सके और आँसू बहाते हुए गद्गद वाणी में बोले—

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॥ २ · ९९ · ३१ ॥
यः संसदि प्रकृतिभिर्भवेद् युक्त उपासितुम्। वन्यैर्मृगैरुपासीनः सोऽयमास्ते ममाग्रजः

yaḥ saṁsadi prakṛtibhirbhaved yukta upāsitum।
vanyairmṛgairupāsīnaḥ so'yamāste mamāgrajaḥ ॥

‘हाय! जो राजसभा में बैठकर प्रजा और मन्त्रिवर्ग के द्वारा सेवा तथा सम्मान पाने के योग्य हैं, वे ही ये मेरे बड़े भ्राता श्रीराम यहाँ जंगली पशुओं से घिरे हुए बैठे हैं

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॥ २ · ९९ · ३२ ॥
वासोभिर्बहुसाहस्रैर्यो महात्मा पुरोचितः। मृगाजिने सोऽयमिह प्रवस्ते धर्ममाचरन्

vāsobhirbahusāhasrairyo mahātmā purocitaḥ।
mṛgājine so'yamiha pravaste dharmamācaran ॥

‘जो महात्मा पहले कई सहस्र वस्त्रों का उपयोग करते थे, वे अब धर्माचरण करते हुए यहाँ केवल दो मृगचर्म धारण करते हैं

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॥ २ · ९९ · ३३ ॥
अधारयद् यो विविधाश्चित्राः सुमनसः सदा। सोऽयं जटाभारमिमं सहते राघवः कथम्

adhārayad yo vividhāścitrāḥ sumanasaḥ sadā।
so'yaṁ jaṭābhāramimaṁ sahate rāghavaḥ katham ॥

‘जो सदा नाना प्रकार के विचित्र फूलों को अपने सिर पर धारण करते थे, वे ही ये श्रीरघुनाथजी इस समय इस जटाभार को कैसे सहन करते हैं?

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॥ २ · ९९ · ३४ ॥
यस्य यज्ञैर्यथादिष्टैर्युक्तो धर्मस्य संचयः। शरीरक्लेशसम्भूतं धर्मं परिमार्गते

yasya yajñairyathādiṣṭairyukto dharmasya saṁcayaḥ।
śarīrakleśasambhūtaṁ sa dharmaṁ parimārgate ॥

‘जिनके लिये शास्त्रोक्त यज्ञों के अनुष्ठानद्वारा धर्म का संग्रह करना उचित है, वे इस समय शरीर को कष्ट देने से प्राप्त होनेवाले धर्म का अनुसंधान कर रहे हैं

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॥ २ · ९९ · ३५ ॥
चन्दनेन महार्हेण यस्याङ्गमुपसेवितम्। मलेन तस्याङ्गमिदं कथमार्यस्य सेव्यते

candanena mahārheṇa yasyāṅgamupasevitam।
malena tasyāṅgamidaṁ kathamāryasya sevyate ॥

‘जिनके अङ्गों की बहुमूल्य चन्दन से सेवा होती थी, उन्हीं मेरे पूज्य भ्राता का यह शरीर कैसे मल से सेवित हो रहा है

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॥ २ · ९९ · ३६ ॥
मन्निमित्तमिदं दुःखं प्राप्तो रामः सुखोचितः। धिग्जीवितं नृशंसस्य मम लोकविगर्हितम्

mannimittamidaṁ duḥkhaṁ prāpto rāmaḥ sukhocitaḥ।
dhigjīvitaṁ nṛśaṁsasya mama lokavigarhitam ॥

‘हाय! जो सर्वथा सुख भोगने के योग्य हैं, वे श्रीराम मेरे ही कारण ऐसे दुःख में पड़ गये हैं। ओह! मैं कितना क्रूर हूँ? मेरे इस लोकनिन्दित जीवन को धिक्कार है!’

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॥ २ · ९९ · ३७ ॥
इत्येवं विलपन् दीनः प्रस्विन्नमुखपङ्कजः। पादावप्राप्य रामस्य पपात भरतो रुदन्

ityevaṁ vilapan dīnaḥ prasvinnamukhapaṅkajaḥ।
pādāvaprāpya rāmasya papāta bharato rudan ॥

इस प्रकार विलाप करते-करते भरत अत्यन्त दुःखी हो गये। उनके मुखारविन्द पर पसीने की बूँदें दिखायी देने लगीं। वे श्रीरामचन्द्रजी के चरणोंतक पहुँचने के पहले ही पृथ्वी पर गिर पड़े

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॥ २ · ९९ · ३८ ॥
दुःखाभितप्तो भरतो राजपुत्रो महाबलः। उक्त्वाऽऽर्येति सकृद् दीनं पुनर्नोवाच किंचन

duḥkhābhitapto bharato rājaputro mahābalaḥ।
uktvā''ryeti sakṛd dīnaṁ punarnovāca kiṁcana ॥

अत्यन्त दुःख से संतप्त होकर महाबली राजकुमार भरत ने एक बार दीनवाणी में ‘आर्य’ कहकर पुकारा। फिर वे कुछ न बोल सके

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॥ २ · ९९ · ३९ ॥
बाष्पैः पिहितकण्ठश्च प्रेक्ष्य रामं यशस्विनम्। आर्येत्येवाभिसंक्रुश्य व्याहर्तुं नाशकत् ततः

bāṣpaiḥ pihitakaṇṭhaśca prekṣya rāmaṁ yaśasvinam।
āryetyevābhisaṁkruśya vyāhartuṁ nāśakat tataḥ ॥

आँसुओं से उनका गला रुँध गया था। यशस्वी श्रीराम की ओर देख वे ‘हा! आर्य’ कहकर चीख उठे। इससे आगे उनसे कुछ बोला न जा सका

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॥ २ · ९९ · ४० ॥
शत्रुघ्नश्चापि रामस्य ववन्दे चरणौ रुदन्। ताबुभौ समालिङ्ग्य रामोऽप्यश्रूण्यवर्तयत्

śatrughnaścāpi rāmasya vavande caraṇau rudan।
tābubhau ca samāliṅgya rāmo'pyaśrūṇyavartayat ॥

फिर शत्रुघ्न ने भी रोते-रोते श्रीराम के चरणों में प्रणाम किया। श्रीराम ने उन दोनों को उठाकर छाती से लगा लिया। फिर वे भी नेत्रों से आँसुओं की धारा बहाने लगे

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॥ २ · ९९ · ४१ ॥
ततः सुमन्त्रेण गुहेन चैव समीयतू राजसुतावरण्ये। दिवाकरश्चैव निशाकरश्च यथाम्बरे शुक्रबृहस्पतिभ्याम्

tataḥ sumantreṇa guhena caiva samīyatū rājasutāvaraṇye।
divākaraścaiva niśākaraśca yathāmbare śukrabṛhaspatibhyām ॥

तत्पश्चात् राजकुमार श्रीराम तथा लक्ष्मण उस वन में सुमन्त्र और निषादराज गुह से मिले, मानो आकाश में सूर्य और चन्द्रमा, शुक्र और बृहस्पति से मिल रहे हों

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॥ २ · ९९ · ४२ ॥
तान् पार्थिवान् वारणयूथपार्हान् समागतांस्तत्र महत्यरण्ये। वनौकसस्तेऽभिसमीक्ष्य सर्वे त्वश्रूण्यमुञ्जन् प्रविहाय हर्षम्

tān pārthivān vāraṇayūthapārhān samāgatāṁstatra mahatyaraṇye।
vanaukasaste'bhisamīkṣya sarve tvaśrūṇyamuñjan pravihāya harṣam ॥

यूथपति गजराज पर बैठकर यात्रा करनेयोग्य उन चारों राजकुमारों को उस विशाल वन में आया देख समस्त वनवासी हर्ष छोड़कर शोक के आँसू बहाने लगे

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवनवतितमः सर्गः ॥ ९९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें निन्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९९ ॥