वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ९५ · १९ श्लोकाःSarga 95 · 19 ślokas

श्रीरामका सीताके प्रति मन्दाकिनी नदीकी शोभाका वर्णन

॥ २ · ९५ · १ ॥
अथ शैलाद् विनिष्क्रम्य मैथिलीं कोसलेश्वरः। अदर्शयच्छुभजलां रम्यां मन्दाकिनीं नदीम्

atha śailād viniṣkramya maithilīṁ kosaleśvaraḥ।
adarśayacchubhajalāṁ ramyāṁ mandākinīṁ nadīm ॥

तदनन्तर उस पर्वत से निकलकर कोसलनरेश श्रीरामचन्द्रजी ने मिथिलेशकुमारी सीता को पुण्यसलिला रमणीय मन्दाकिनी नदी का दर्शन कराया

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॥ २ · ९५ · २ ॥
अब्रवीच्च वरारोहां चन्द्रचारुनिभाननाम्। विदेहराजस्य सुतां रामो राजीवलोचनः

abravīcca varārohāṁ candracārunibhānanām।
videharājasya sutāṁ rāmo rājīvalocanaḥ ॥

और उस समय कमलनयन श्रीराम ने चन्द्रमा के समान मनोहर मुख तथा सुन्दर कटिप्रदेशवाली विदेहराजनन्दिनी सीता से इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ९५ · ३ ॥
विचित्रपुलिनां रम्यां हंससारससेविताम्। कुसुमैरुपसम्पन्नां पश्य मन्दाकिनीं नदीम्

vicitrapulināṁ ramyāṁ haṁsasārasasevitām।
kusumairupasampannāṁ paśya mandākinīṁ nadīm ॥

‘प्रिये! अब मन्दाकिनी नदी की शोभा देखो, हंस और सारसों से सेवित होने के कारण यह कितनी सुन्दर जान पड़ती है। इसका किनारा बड़ा ही विचित्र है। नाना प्रकार के पुष्प इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं

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॥ २ · ९५ · ४ ॥
नानाविधैस्तीररुहैर्वृतां पुष्पफलद्रुमैः। राजन्तीं राजराजस्य नलिनीमिव सर्वतः

nānāvidhaistīraruhairvṛtāṁ puṣpaphaladrumaiḥ।
rājantīṁ rājarājasya nalinīmiva sarvataḥ ॥

‘फल और फूलों के भार से लदे हुए नाना प्रकार के तटवर्ती वृक्षों से घिरी हुई यह मन्दाकिनी कुबेर के सौगन्धिक सरोवर की भाँति सब ओर से सुशोभित हो रही है

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॥ २ · ९५ · ५ ॥
मृगयूथनिपीतानि कलुषाम्भांसि साम्प्रतम्। तीर्थानि रमणीयानि रतिं संजनयन्ति मे

mṛgayūthanipītāni kaluṣāmbhāṁsi sāmpratam।
tīrthāni ramaṇīyāni ratiṁ saṁjanayanti me ॥

‘हरिनों के झुंड पानी पीकर इस समय यद्यपि यहाँ का जल गँदला कर गये हैं तथापि इसके रमणीय घाट मेरे मन को बड़ा आनन्द दे रहे हैं

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॥ २ · ९५ · ६ ॥
जटाजिनधराः काले वल्कलोत्तरवाससः। ऋषयस्त्ववगाहन्ते नदीं मन्दाकिनीं प्रिये

jaṭājinadharāḥ kāle valkalottaravāsasaḥ।
ṛṣayastvavagāhante nadīṁ mandākinīṁ priye ॥

‘प्रिये! वह देखो, जटा, मृगचर्म और वल्कल का उत्तरीय धारण करनेवाले महर्षि उपयुक्त समय में आकर इस मन्दाकिनी नदी में स्नान कर रहे हैं

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॥ २ · ९५ · ७ ॥
आदित्यमुपतिष्ठन्ते नियमादूर्ध्वबाहवः। एते परे विशालाक्षि मुनयः संशितव्रताः

ādityamupatiṣṭhante niyamādūrdhvabāhavaḥ।
ete pare viśālākṣi munayaḥ saṁśitavratāḥ ॥

‘विशाललोचने! ये दूसरे मुनि, जो कठोर व्रत का पालन करनेवाले हैं, नैत्यिक नियम के कारण दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्यदेव का उपस्थान कर रहे हैं

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॥ २ · ९५ · ८ ॥
मारुतोद्धूतशिखरैः प्रनृत्त इव पर्वतः। पादपैः पुष्पपत्राणि सृजद्भिरभितो नदीम्

mārutoddhūtaśikharaiḥ pranṛtta iva parvataḥ।
pādapaiḥ puṣpapatrāṇi sṛjadbhirabhito nadīm ॥

‘हवा के झोंके से जिनकी शिखाएँ झूम रही हैं, अतएव जो मन्दाकिनी नदी के उभय तटों पर फूल और पत्ते बिखेर रहे हैं, उन वृक्षों से उपलक्षित हुआ यह पर्वत मानो नृत्य-सा करने लगा है

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॥ २ · ९५ · ९ ॥
क्वचिन्मणिनिकाशोदां क्वचित् पुलिनशालिनीम्। क्वचित् सिद्धजनाकीर्णां पश्य मन्दाकिनीं नदीम्

kvacinmaṇinikāśodāṁ kvacit pulinaśālinīm।
kvacit siddhajanākīrṇāṁ paśya mandākinīṁ nadīm ॥

‘देखो! मन्दाकिनी नदी की कैसी शोभा है; कहीं तो इसमें मोतियों के समान स्वच्छ जल बहता दिखायी देता है, कहीं यह ऊँचे कगारों से ही शोभा पाती है (वहाँ का जल कगारों में छिप जाने के कारण दिखायी नहीं देता है) और कहीं सिद्धजन इसमें अवगाहन कर रहे हैं तथा यह उनसे व्याप्त दिखायी देती है

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॥ २ · ९५ · १० ॥
निर्धूतान् वायुना पश्य विततान् पुष्पसंचयान्। पोप्लूयमानानपरान् पश्य त्वं तनुमध्यमे

nirdhūtān vāyunā paśya vitatān puṣpasaṁcayān।
poplūyamānānaparān paśya tvaṁ tanumadhyame ॥

‘सूक्ष्म कटिप्रदेशवाली सुन्दरि! देखो, वायु के द्वारा उड़ाकर लाये हुए ये ढेर-के-ढेर फूल किस तरह मन्दाकिनी के दोनों तटों पर फैले हुए हैं और वे दूसरे पुष्पसमूह कैसे पानी पर तैर रहे हैं

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॥ २ · ९५ · ११ ॥
पश्यैतद्वल्गुवचसो रथाङ्गाह्वयना द्विजाः। अधिरोहन्ति कल्याणि निष्कूजन्तः शुभा गिरः

paśyaitadvalguvacaso rathāṅgāhvayanā dvijāḥ।
adhirohanti kalyāṇi niṣkūjantaḥ śubhā giraḥ ॥

‘कल्याणि! देखो तो सही, ये मीठी बोली बोलनेवाले चक्रवाक पक्षी सुन्दर कलरव करते हुए किस तरह नदी के तटों पर आरूढ़ हो रहे हैं

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॥ २ · ९५ · १२ ॥
दर्शनं चित्रकूटस्य मन्दाकिन्याश्च शोभने। अधिकं पुरवासाच्च मन्ये तव दर्शनात्

darśanaṁ citrakūṭasya mandākinyāśca śobhane।
adhikaṁ puravāsācca manye tava ca darśanāt ॥

‘शोभने! यहाँ जो प्रतिदिन चित्रकूट और मन्दाकिनी का दर्शन होता है, वह नित्य-निरन्तर तुम्हारा दर्शन होने के कारण अयोध्यानिवास की अपेक्षा भी अधिक सुखद जान पड़ता है

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॥ २ · ९५ · १३ ॥
विधूतकल्मषैः सिद्धैस्तपोदमशमान्वितैः। नित्यविक्षोभितजलां विगाहस्व मया सह

vidhūtakalmaṣaiḥ siddhaistapodamaśamānvitaiḥ।
nityavikṣobhitajalāṁ vigāhasva mayā saha ॥

‘इस नदी में प्रतिदिन तपस्या, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह से सम्पन्न निष्पाप सिद्ध महात्माओं के अवगाहन करने से इसका जल विक्षुब्ध होता रहता है। चलो, तुम भी मेरे साथ इसमें स्नान करो

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॥ २ · ९५ · १४ ॥
सखीवच्च विगाहस्व सीते मन्दाकिनीं नदीम्। कमलान्यवमज्जन्ती पुष्कराणि भामिनि

sakhīvacca vigāhasva sīte mandākinīṁ nadīm।
kamalānyavamajjantī puṣkarāṇi ca bhāmini ॥

‘भामिनि सीते! एक सखी दूसरी सखी के साथ जैसे क्रीड़ा करती है, उसी प्रकार तुम मन्दाकिनी नदी में उतरकर इसके लाल और श्वेत कमलों को जल में डुबोती हुई इसमें स्नान-क्रीड़ा करो

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॥ २ · ९५ · १५ ॥
त्वं पौरजनवद् व्यालानयोध्यामिव पर्वतम्। मन्यस्व वनिते नित्यं सरयूवदिमां नदीम्

tvaṁ paurajanavad vyālānayodhyāmiva parvatam।
manyasva vanite nityaṁ sarayūvadimāṁ nadīm ॥

‘प्रिये! तुम इस वन के निवासियों को पुरवासी मनुष्यों के समान समझो, चित्रकूट पर्वत को अयोध्या के तुल्य मानो और इस मन्दाकिनी नदी को सरयू के सदृश जानो

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॥ २ · ९५ · १६ ॥
लक्ष्मणश्चैव धर्मात्मा मन्निदेशे व्यवस्थितः। त्वं चानुकूला वैदेहि प्रीतिं जनयती मम

lakṣmaṇaścaiva dharmātmā mannideśe vyavasthitaḥ।
tvaṁ cānukūlā vaidehi prītiṁ janayatī mama ॥

‘विदेहनन्दिनि! धर्मात्मा लक्ष्मण सदा मेरी आज्ञा के अधीन रहते हैं और तुम भी मेरे मन के अनुकूल ही चलती हो; इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है

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॥ २ · ९५ · १७ ॥
उपस्पृशंस्त्रिषवणं मधुमूलफलाशनः। नायोध्यायै राज्याय स्पृहये त्वया सह

upaspṛśaṁstriṣavaṇaṁ madhumūlaphalāśanaḥ।
nāyodhyāyai na rājyāya spṛhaye ca tvayā saha ॥

‘प्रिये! तुम्हारे साथ तीनों काल स्नान करके मधुर फल-मूल का आहार करता हुआ मैं न तो अयोध्या जाने की इच्छा रखता हूँ और न राज्य पाने की ही

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॥ २ · ९५ · १८ ॥
इमां हि रम्यां गजयूथलोडितां निपीततोयां गजसिंहवानरैः। सुपुष्पितां पुष्पभरैरलंकृतां सोऽस्ति यः स्यान्न गतक्लमः सुखी

imāṁ hi ramyāṁ gajayūthaloḍitāṁ nipītatoyāṁ gajasiṁhavānaraiḥ।
supuṣpitāṁ puṣpabharairalaṁkṛtāṁ na so'sti yaḥ syānna gataklamaḥ sukhī ॥

‘जिसे हाथियों के समूह मथे डालते हैं तथा सिंह और वानर जिसका जल पिया करते हैं, जिसके तट पर सुन्दर पुष्पों से लदे वृक्ष शोभा पाते हैं तथा जो पुष्पसमूहों से अलंकृत है, ऐसी इस रमणीय मन्दाकिनी नदी में स्नान करके जो ग्लानिरहित और सुखी न हो जाय—ऐसा मनुष्य इस संसार में नहीं है’

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॥ २ · ९५ · १९ ॥
इतीव रामो बहुसंगतं वचः प्रियासहायः सरितं प्रति ब्रुवन्। चचार रम्यं नयनाञ्जनप्रभं चित्रकूटं रघुवंशवर्धनः

itīva rāmo bahusaṁgataṁ vacaḥ priyāsahāyaḥ saritaṁ prati bruvan।
cacāra ramyaṁ nayanāñjanaprabhaṁ sa citrakūṭaṁ raghuvaṁśavardhanaḥ ॥

रघुवंश की वृद्धि करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी मन्दाकिनी नदी के प्रति ऐसी अनेक प्रकार की सुसंगत बातें कहते हुए नील-कान्तिवाले रमणीय चित्रकूट पर्वत पर अपनी प्रिया पत्नी सीता के साथ विचरने लगे

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चनवतितमः सर्गः ॥ ९५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें पंचानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९५ ॥