श्रीरामका सीताको चित्रकूटकी शोभा दिखाना
“चित्रकूट-शोभा-दर्शन”
॥ २ · ९४ · २–४ ॥
उन्नतशैलप्रस्थे वल्कलवसनो धनुर्धरः श्यामवर्णो रामः प्रसारितेन बाहुना वैदेह्यै विचित्रधातुरञ्जितशिखरं सनिर्झरं पुष्पितवनं चित्रकूटं दर्शयति, शचीमिव पुरन्दरः; पार्श्वे पुष्पकरण्डकहस्ता सीता सविस्मयं तां गिरिशोभां वीक्षते; अधस्तान्मृगा दक्षिणे शिलायां मयूरश्च विहरन्ति।
पर्वतकी ऊँची चट्टानी टेकपर वल्कल पहने, धनुष धारण किये श्यामवर्ण श्रीराम अपनी दाहिनी भुजा फैलाकर सीताको चित्रकूटकी शोभा दिखा रहे हैं — दूर धातुओंसे रँगे बहुरंगी शिखर, चाँदी-सी झरती जलधाराएँ और फूलोंसे लदे वन; उनका मुख आनन्दसे प्रसन्न है, मानो देवराज इन्द्र शचीको किसी स्वर्गीय पर्वतकी छटा दिखा रहे हों। पास ही सुनहरी अनरंगी साड़ीमें, हाथमें फूलोंकी छोटी टोकरी लिये सीता मौन विस्मयसे उस दृश्यको निहार रही हैं; नीचे घाटीमें हिरन चर रहे हैं और दाहिनी ओर एक शिलापर मोर बैठा है।
High on a rocky ledge of the mountain, the blue-hued Ram — bow in hand over his ragged bark-cloth — extends his right arm to show Sita the splendours of Chitrakut: its many-coloured mineral-streaked crags, silver waterfalls threading down the far peaks, and forests heavy with blossom; his face is serene with delight, as if Indra were showing Shachi the glories of a heavenly summit. Beside him, in a warm undyed sari and cradling a small basket of flowers, Sita gazes out in quiet wonder, while deer graze in the valley below and a peacock rests on a crag to the right.
dīrghakāloṣitastasmin girau girivarapriyaḥ।
vaidehyāḥ priyamākāṁkṣan svaṁ ca cittaṁ vilobhayan ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
atha dāśarathiścitraṁ citrakūṭamadarśayat।
bhāryāmamarasaṁkāśaḥ śacīmiva puraṁdaraḥ ॥
गिरिवर चित्रकूट श्रीराम को बहुत ही प्रिय लगता था। वे उस पर्वत पर बहुत दिनों से रह रहे थे। एक दिन अमरतुल्य तेजस्वी दशरथनन्दन श्रीराम विदेहराजकुमारी सीता का प्रिय करने की इच्छा से तथा अपने मन को भी बहलाने के लिये अपनी भार्या को विचित्र चित्रकूट की शोभा का दर्शन कराने लगे, मानो देवराज इन्द्र अपनी पत्नी शची को पर्वतीय सुषमा का दर्शन करा रहे हों
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na rājyabhraṁśanaṁ bhadre na suhṛdbhirvinābhavaḥ।
mano me bādhate dṛṣṭvā ramaṇīyamimaṁ girim ॥
(वे बोले—) ‘भद्रे! यद्यपि मैं राज्य से भ्रष्ट हो गया हूँ तथा मुझे अपने हितैषी सुहृदों से विलग होकर रहना पड़ता है, तथापि जब मैं इस रमणीय पर्वत की ओर देखता हूँ, तब मेरा सारा दुःख दूर हो जाता है—राज्य का न मिलना और सुहृदों का विछोह होना भी मेरे मन को व्यथित नहीं कर पाता है
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paśyemamacalaṁ bhadre nānādvijagaṇāyutam।
śikharaiḥ khamivodviddhairdhātumadbhirvibhūṣitam ॥
‘कल्याणि! इस पर्वत पर दृष्टिपात तो करो, नाना प्रकार के असंख्य पक्षी यहाँ कलरव कर रहे हैं। नाना प्रकार के धातुओं से मण्डित इसके गगन-चुम्बी शिखर मानो आकाश को बेध रहे हैं। इन शिखरों से विभूषित हुआ यह चित्रकूट कैसी शोभा पा रहा है!
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kecid rajatasaṁkāśāḥ kecit kṣatajasaṁnibhāḥ।
pītamāñjiṣṭhavarṇāśca kecinmaṇivaraprabhāḥ ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
puṣpārkaketakābhāśca kecijjyotīrasaprabhāḥ।
virājante'calendrasya deśā dhātuvibhūṣitāḥ ॥
‘विभिन्न धातुओं से अलंकृत अचलराज चित्रकूट के प्रदेश कितने सुन्दर लगते हैं! इनमें से कोई तो चाँदी के समान चमक रहे हैं। कोई लोहू की लाल आभा का विस्तार करते हैं। किन्हीं प्रदेशों के रंग पीले और मंजिष्ठ वर्ण के हैं। कोई श्रेष्ठ मणियों के समान उद्धासित होते हैं। कोई पुखराज के समान, कोई स्फटिक के सदृश और कोई केवड़े के फूल के समान कान्तिवाले हैं तथा कुछ प्रदेश नक्षत्रों और पारे के समान प्रकाशित होते हैं
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nānāmṛgagaṇairdvīpitarakṣvṛkṣagaṇairvṛtaḥ।
aduṣṭairbhātyayaṁ śailo bahupakṣisamākulaḥ ॥
‘यह पर्वत बहुसंख्यक पक्षियों से व्याप्त है तथा नाना प्रकार के मृगों, बड़े-बड़े व्याघ्रों, चीतों और रीछों से भरा हुआ है। वे व्याघ्र आदि हिंसक जन्तु अपने दुष्टभाव का परित्याग करके यहाँ रहते हैं और इस पर्वत की शोभा बढ़ाते हैं
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āmrajambvasanailodhraiḥ priyālaiḥ panasairdhavaiḥ।
aṅkolairbhavyatiniśairbilvatindukaveṇubhiḥ ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
kāśmaryāriṣṭavaraṇairmadhūkaistilakairapi।
badaryāmalakairnīpairvetradhanvanabījakaiḥ ॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
puṣpavadbhiḥ phalopetaiśchāyāvadbhirmanoramaiḥ।
evamādibhirākīrṇaḥ śriyaṁ puṣyatyayaṁ giriḥ ॥
‘आम, जामुन, असन, लोध, प्रियाल, कटहल, धव, अंकोल, भव्य, तिनिश, बेल, तिन्दुक, बाँस, काश्मरी (मधुपर्णिका), अरिष्ट (नीम), वरण, महुआ, तिलक, बेर, आँवला, कदम्ब, बेत, धन्वन (इन्द्रजौ), बीजक (अनार) आदि घनी छायावाले वृक्षों से, जो फूलों और फलों से लदे होने के कारण मनोरम प्रतीत होते थे, व्याप्त हुआ यह पर्वत अनुपम शोभा का पोषण एवं विस्तार कर रहा है
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śailaprastheṣu ramyeṣu paśyemān kāmaharṣaṇān।
kiṁnarān dvandvaśo bhadre ramamāṇān manasvinaḥ ॥
‘इन रमणीय शैलशिखरों पर उन प्रदेशों को देखो, जो प्रेम-मिलन की भावना का उद्दीपन करके आन्तरिक हर्ष को बढ़ानेवाले हैं। वहाँ मनस्वी किन्नर दो-दो एक साथ होकर टहल रहे हैं
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śākhāvasaktān khaḍgāṁśca pravarāṇyambarāṇi ca।
paśya vidyādharastrīṇāṁ krīḍoddeśān manoramān ॥
‘इन किन्नरों के खड्ग पेड़ों की डालियों में लटक रहे हैं। इधर विद्याधरों की स्त्रियों के मनोरम क्रीड़ास्थलों तथा वृक्षों की शाखाओं पर रखे हुए उनके सुन्दर वस्त्रों की ओर भी देखो
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jalaprapātairudbhedairniṣpandaiśca kvacit kvacit।
sravadbhirbhātyayaṁ śailaḥ sravanmada iva dvipaḥ ॥
‘इसके ऊपर कहीं ऊँचे से झरने गिर रहे हैं, कहीं जमीन के भीतर से सोते निकले हैं और कहीं-कहीं छोटे-छोटे स्रोत प्रवाहित हो रहे हैं। इन सबके द्वारा यह पर्वत मद की धारा बहानेवाले हाथी के समान शोभा पाता है
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guhāsamīraṇo gandhān nānāpuṣpabhavān bahūn।
ghrāṇatarpaṇamabhyetya kaṁ naraṁ na praharṣayet ॥
‘गुफाओं से निकली हुई वायु नाना प्रकार के पुष्पों की प्रचुर गन्ध लेकर नासिका को तृप्त करती हुई किस पुरुष के पास आकर उसका हर्ष नहीं बढ़ा रही है
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yadīha śarado'nekāstvayā sārdhamanindite।
lakṣmaṇena ca vatsyāmi na māṁ śokaḥ pradharṣati ॥
‘सती-साध्वी सीते! यदि तुम्हारे और लक्ष्मण के साथ मैं यहाँ अनेक वर्षोंतक रहूँ तो भी नगरत्याग का शोक मुझे कदापि पीड़ित नहीं करेगा
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bahupuṣpaphale ramye nānādvijagaṇāyute।
vicitraśikhare hyasmin ratavānasmi bhāmini ॥
‘भामिनि! बहुतेरे फूलों और फलों से युक्त तथा नाना प्रकार के पक्षियों से सेवित इस विचित्र शिखरवाले रमणीय पर्वत पर मेरा मन बहुत लगता है
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anena vanavāsena mama prāptaṁ phaladvayam।
pituścānṛṇyatā dharme bharatasya priyaṁ tathā ॥
‘प्रिये! इस वनवास से मुझे दो फल प्राप्त हुए हैं—दो लाभ हुए हैं—एक तो धर्मानुसार पिता की आज्ञा का पालनरूप ऋण चुक गया और दूसरा भाई भरत का प्रिय हुआ
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vaidehi ramase kacciccitrakūṭe mayā saha।
paśyantī vividhān bhāvān manovākkāyasammatān ॥
‘विदेहकुमारी! क्या चित्रकूट पर्वत पर मेरे साथ मन, वाणी और शरीर को प्रिय लगनेवाले भाँति-भाँति के पदार्थों को देखकर तुम्हें आनन्द प्राप्त होता है?
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idamevāmṛtaṁ prāhū rājñi rājarṣayaḥ pare।
vanavāsaṁ bhavārthāya pretya me prapitāmahāḥ ॥
‘रानी! मेरे प्रपितामह मनु आदि उत्कृष्ट राजर्षियों ने नियमपूर्वक किये गये इन वनवास को ही अमृत बतलाया है; इससे शरीरत्याग के पश्चात् परम कल्याण की प्राप्ति होती है
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śilāḥ śailasya śobhante viśālāḥ śataśo'bhitaḥ।
bahulā bahulairvarṇairnīlapītasitāruṇaiḥ ॥
‘चारों ओर इस पर्वत की सैकड़ों विशाल शिलाएँ शोभा पा रही हैं, जो नीले, पीले, सफेद और लाल आदि विविध रंगों से अनेक प्रकार की दिखायी देती हैं
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niśi bhāntyacalendrasya hutāśanaśikhā iva।
oṣadhyaḥ svaprabhālakṣmyā bhrājamānāḥ sahasraśaḥ ॥
‘रात में इस पर्वतराज के ऊपर लगी हुई सहस्रों ओषधियाँ अपनी प्रभासम्पत्ति से प्रकाशित होती हुई अग्निशिखा के समान उद्धासित होती हैं
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kecit kṣayanibhā deśāḥ kecidudyānasaṁnibhāḥ।
kecidekaśilā bhānti parvatasyāsya bhāmini ॥
‘भामिनि! इस पर्वत के कई स्थान घर की भाँति दिखायी देते हैं (क्योंकि वे वृक्षों की घनी छाया से आच्छादित हैं) और कई स्थान चम्पा, मालती आदि फूलों की अधिकता के कारण उद्यान के समान सुशोभित होते हैं तथा कितने ही स्थान ऐसे हैं जहाँ बहुत दूरतक एक ही शिला फैली हुई है। इन सबकी बड़ी शोभा होती है
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bhittveva vasudhāṁ bhāti citrakūṭaḥ samutthitaḥ।
citrakūṭasya kūṭo'yaṁ dṛśyate sarvataḥ śubhaḥ ॥
‘ऐसा जान पड़ता है कि यह चित्रकूट पर्वत पृथ्वी को फाड़कर ऊपर उठ आया है। चित्रकूट का यह शिखर सब ओर से सुन्दर दिखायी देता है
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kuṣṭhasthagarapuṁnāgabhūrjapatrottaracchadān।
kāmināṁ svāstarān paśya kuśeśayadalāyutān ॥
‘प्रिये! देखो, ये विलासियों के बिस्तर हैं, जिनपर उत्पल, पुत्रजीवक, पुन्नाग और भोजपत्र—इनके पत्ते ही चादर का काम देते हैं तथा इनके ऊपर सब ओर से कमलों के पत्ते बिछे हुए हैं
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mṛditāścāpaviddhāśca dṛśyante kamalasrajaḥ।
kāmibhirvanite paśya phalāni vividhāni ca ॥
‘प्रियतमे! ये कमलों की मालाएँ दिखायी देती हैं, जो विलासियोंद्वारा मसलकर फेंक दी गयी हैं। उधर देखो, वृक्षों में नाना प्रकार के फल लगे हुए हैं
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vasvaukasārāṁ nalinīmatītyaivottarān kurūn।
parvataścitrakūṭo'sau bahumūlaphalodakaḥ ॥
‘बहुत-से फल, मूल और जल से सम्पन्न यह चित्रकूट पर्वत कुबेर-नगरी वस्वौकसारा (अलका), इन्द्रपुरी नलिनी (अमरावती अथवा नलिनी नाम से प्रसिद्ध कुबेर की सौगन्धिक कमलों से युक्त पुष्करिणी) तथा उत्तर कुरु को भी अपनी शोभा से तिरस्कृत कर रहा है
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imaṁ tu kālaṁ vanite vijahrivāṁ-
stvayā ca sīte saha lakṣmaṇena।
ratiṁ prapatsye kuladharmavardhinīṁ
satāṁ pathi svairniyamaiḥ paraiḥ sthitaḥ ॥
‘प्राणवल्लभे सीते! अपने उत्तम नियमों को पालन करते हुए सन्मार्ग पर स्थित रहकर यदि तुम्हारे और लक्ष्मण के साथ यह चौदह वर्षों का समय मैं सानन्द व्यतीत कर लूँगा तो मुझे वह सुख प्राप्त होगा जो कुलधर्म को बढ़ानेवाला है’
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे चतुर्नवतितमः सर्गः ॥ ९४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें चौरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९४ ॥