वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ९३ · २७ श्लोकाःSarga 93 · 27 ślokas

सेनासहित भरतकी चित्रकूट-यात्राका वर्णन

चित्रकूट-दर्शन

“चित्रकूट-दर्शन”
॥ २ · ९३ · ३–८ ॥

श्वेतांशुको भरतो हयमारूढः पाणिना भ्रुवौ छादयन् दूरे नीलमेघनिभं चित्रकूटशैलं सोत्कण्ठं निरीक्षते; पृष्ठतो गजरथध्वजशस्त्रिभिराकीर्णा चतुरङ्गसेना काननं संछादयति।

श्वेत तपस्वी-वेश में सजे राजकुमार भरत घोड़े पर सवार, हथेली से भौंहों पर छाया किए सुदूर क्षितिज पर उठते नील-मेघ-से चित्रकूट पर्वत की ओर उत्कण्ठा-भरी आशा से निहार रहे हैं — जहाँ उनके निर्वासित भ्राता राम बसते हैं; उनके पीछे स्वर्ण-अम्बारीवाले हाथी, रथ, लाल-पीली ध्वजाएँ और भालाधारी सैनिकों की विशाल चतुरंगिणी सेना वन को आच्छादित करती हुई चली आती है।

Clad in austere white and mounted on his horse, the young prince Bharat raises a hand to shade his brow, gazing with yearning hope toward the distant, cloud-blue peak of Mount Chitrakuta rising on the horizon — where his exiled brother Ram dwells; behind him a vast four-fold host of gold-canopied elephants, chariots, red-and-yellow banners and spear-bearing soldiers winds through the forest, blanketing the land.

॥ २ · ९३ · १ ॥
तया महत्या यायिन्या ध्वजिन्या वनवासिनः। अर्दिता यूथपा मत्ताः सयूथाः सम्प्रदुद्रुवुः

tayā mahatyā yāyinyā dhvajinyā vanavāsinaḥ।
arditā yūthapā mattāḥ sayūthāḥ sampradudruvuḥ ॥

यात्रा करनेवाली उस विशाल वाहिनी से पीड़ित हो वनवासी यूथपति मतवाले हाथी आदि अपने यूथों के साथ भाग चले

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॥ २ · ९३ · २ ॥
ऋक्षाः पृषतमुख्याश्च रुरवश्च समन्ततः। दृश्यन्ते वनवाटेषु गिरिष्वपि नदीषु

ṛkṣāḥ pṛṣatamukhyāśca ruravaśca samantataḥ।
dṛśyante vanavāṭeṣu giriṣvapi nadīṣu ca ॥

रीछ, चितकबरे मृग तथा रुरु नामक मृग वनप्रदेशों में, पर्वतों में और नदियों के तटों पर चारों ओर उस सेना से पीड़ित दिखायी देते थे

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॥ २ · ९३ · ३ ॥
सम्प्रतस्थे धर्मात्मा प्रीतो दशरथात्मजः। वृतो महत्या नादिन्या सेनया चतुरङ्गया

sa sampratasthe dharmātmā prīto daśarathātmajaḥ।
vṛto mahatyā nādinyā senayā caturaṅgayā ॥

महान् कोलाहल करनेवाली उस विशाल चतुरंगिणी सेना से घिरे हुए धर्मात्मा दशरथनन्दन भरत बड़ी प्रसन्नता के साथ यात्रा कर रहे थे

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॥ २ · ९३ · ४ ॥
सागरौघनिभा सेना भरतस्य महात्मनः। महीं संछादयामास प्रावृषि द्यामिवाम्बुदः

sāgaraughanibhā senā bharatasya mahātmanaḥ।
mahīṁ saṁchādayāmāsa prāvṛṣi dyāmivāmbudaḥ ॥

जैसे वर्षा-ऋतु में मेघों की घटा आकाश को ढक लेती है, उसी प्रकार महात्मा भरत की समुद्र-जैसी उस विशाल सेना ने दूरतक के भूभाग को आच्छादित कर लिया था

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॥ २ · ९३ · ५ ॥
तुरंगौघैरवतता वारणैश्च महाबलैः। अनालक्ष्या चिरं कालं तस्मिन् काले बभूव सा

turaṁgaughairavatatā vāraṇaiśca mahābalaiḥ।
anālakṣyā ciraṁ kālaṁ tasmin kāle babhūva sā ॥

घोड़ों के समूहों तथा महाबली हाथियों से भरी और दूरतक फैली हुई वह सेना उस समय बहुत देरतक दृष्टि में ही नहीं आती थी

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॥ २ · ९३ · ६ ॥
गत्वा दूरमध्वानं सम्परिश्रान्तवाहनः। उवाच वचनं श्रीमान् वसिष्ठं मन्त्रिणां वरम्

sa gatvā dūramadhvānaṁ sampariśrāntavāhanaḥ।
uvāca vacanaṁ śrīmān vasiṣṭhaṁ mantriṇāṁ varam ॥

दूरतक का रास्ता तै कर लेने पर जब भरत की सवारियाँ बहुत थक गयीं, तब श्रीमान् भरत ने मन्त्रियों में श्रेष्ठ वसिष्ठजी से कहा—

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॥ २ · ९३ · ७ ॥
यादृशं लक्ष्यते रूपं यथा चैव मया श्रुतम्। व्यक्तं प्राप्ताः स्म तं देशं भरद्वाजो यमब्रवीत्

yādṛśaṁ lakṣyate rūpaṁ yathā caiva mayā śrutam।
vyaktaṁ prāptāḥ sma taṁ deśaṁ bharadvājo yamabravīt ॥

‘ब्रह्मन्! मैंने जैसा सुन रखा था और जैसा इस देश का स्वरूप दिखायी देता है, इससे स्पष्ट जान पड़ता है कि भरद्वाजजी ने जहाँ पहुँचने का आदेश दिया था, उस देश में हमलोग आ पहुँचे हैं

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॥ २ · ९३ · ८ ॥
अयं गिरिश्चित्रकूटस्तथा मन्दाकिनी नदी। एतत् प्रकाशते दूरान्नीलमेघनिभं वनम्

ayaṁ giriścitrakūṭastathā mandākinī nadī।
etat prakāśate dūrānnīlameghanibhaṁ vanam ॥

‘जान पड़ता है यही चित्रकूट पर्वत है तथा वह मन्दाकिनी नदी बह रही है। यह पर्वत के आस-पास का वन दूर से नील मेघ के समान प्रकाशित हो रहा है

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॥ २ · ९३ · ९ ॥
गिरेः सानूनि रम्याणि चित्रकूटस्य सम्प्रति। वारणैरवमृद्यन्ते मामकैः पर्वतोपमैः

gireḥ sānūni ramyāṇi citrakūṭasya samprati।
vāraṇairavamṛdyante māmakaiḥ parvatopamaiḥ ॥

‘इस समय मेरे पर्वताकार हाथी चित्रकूट के रमणीय शिखरों का अवमर्दन कर रहे हैं

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॥ २ · ९३ · १० ॥
मुञ्चन्ति कुसुमान्येते नगाः पर्वतसानुषु। नीला इवातपापाये तोयं तोयधरा घनाः

muñcanti kusumānyete nagāḥ parvatasānuṣu।
nīlā ivātapāpāye toyaṁ toyadharā ghanāḥ ॥

‘ये वृक्ष पर्वतशिखरों पर उसी प्रकार फूलों की वर्षा कर रहे हैं, जैसे वर्षाकाल में नील जलधर मेघ उनपर जल की वृष्टि करते हैं’

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॥ २ · ९३ · ११ ॥
किंनराचरितं देशं पश्य शत्रुघ्न पर्वते। हयैः समन्तादाकीर्णं मकरैरिव सागरम्

kiṁnarācaritaṁ deśaṁ paśya śatrughna parvate।
hayaiḥ samantādākīrṇaṁ makarairiva sāgaram ॥

(इसके बाद भरत शत्रुघ्न से कहने लगे—) ‘शत्रुघ्न! देखो, इस पर्वत की उपत्यका में जो देश है, जहाँ पर किन्नर विचरा करते हैं, वही प्रदेश हमारी सेना के घोड़ों से व्याप्त होकर मगरों से भरे हुए समुद्र के समान प्रतीत होता है

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॥ २ · ९३ · १२ ॥
एते मृगगणा भान्ति शीघ्रवेगाः प्रचोदिताः। वायुप्रविद्धाः शरदि मेघजाला इवाम्बरे

ete mṛgagaṇā bhānti śīghravegāḥ pracoditāḥ।
vāyupraviddhāḥ śaradi meghajālā ivāmbare ॥

‘सैनिकों के खदेड़े हुए ये मृगों के झुंड तीव्र वेग से भागते हुए वैसी ही शोभा पा रहे हैं, जैसे शरत्-काल के आकाश में हवा से उड़ाये गये बादलों के समूह सुशोभित होते हैं

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॥ २ · ९३ · १३ ॥
कुर्वन्ति कुसुमापीडान् शिरःसु सुरभीनमी। मेघप्रकाशैः फलकैर्दाक्षिणात्या नरा यथा

kurvanti kusumāpīḍān śiraḥsu surabhīnamī।
meghaprakāśaiḥ phalakairdākṣiṇātyā narā yathā ॥

‘ये सैनिक अथवा वृक्ष मेघ के समान कान्तिवाली ढालों से उपलक्षित होनेवाले दक्षिण भारतीय मनुष्यों के समान अपने मस्तकों अथवा शाखाओं पर सुगन्धित पुष्पगुच्छमय आभूषणों को धारण करते हैं

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॥ २ · ९३ · १४ ॥
निष्कूजमिव भूत्वेदं वनं घोरप्रदर्शनम्। अयोध्येव जनाकीर्णा सम्प्रति प्रतिभाति मे

niṣkūjamiva bhūtvedaṁ vanaṁ ghorapradarśanam।
ayodhyeva janākīrṇā samprati pratibhāti me ॥

‘यह वन जो पहले जनरव-शून्य होने के कारण अत्यन्त भयंकर दिखायी देता था, वही इस समय हमारे साथ आये हुए लोगों से व्याप्त होने के कारण मुझे अयोध्यापुरी के समान प्रतीत होता है

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॥ २ · ९३ · १५ ॥
खुरैरुदीरितो रेणुर्दिवं प्रच्छाद्य तिष्ठति। तं वहत्यनिलः शीघ्रं कुर्वन्निव मम प्रियम्

khurairudīrito reṇurdivaṁ pracchādya tiṣṭhati।
taṁ vahatyanilaḥ śīghraṁ kurvanniva mama priyam ॥

‘घोड़ों की टापों से उड़ी हुई धूल आकाश को आच्छादित करके स्थित होती है, परंतु उसे हवा मेरा प्रिय करती हुई-सी शीघ्र ही अन्यत्र उड़ा ले जाती है

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॥ २ · ९३ · १६ ॥
स्यन्दनांस्तुरगोपेतान् सूतमुख्यैरधिष्ठितान्। एतान् सम्पततः शीघ्रं पश्य शत्रुघ्न कानने

syandanāṁsturagopetān sūtamukhyairadhiṣṭhitān।
etān sampatataḥ śīghraṁ paśya śatrughna kānane ॥

‘शत्रुघ्न! देखो, इस वन में घोड़ों से जुते हुए और श्रेष्ठ सारथियोंद्वारा संचालित हुए ये रथ कितनी शीघ्रता से आगे बढ़ रहे हैं

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॥ २ · ९३ · १७ ॥
एतान् वित्रासितान् पश्य बर्हिणः प्रियदर्शनान्। एवमापततः शैलमधिवासं पतत्त्रिणः

etān vitrāsitān paśya barhiṇaḥ priyadarśanān।
evamāpatataḥ śailamadhivāsaṁ patattriṇaḥ ॥

‘जो देखने में बड़े प्यारे लगते हैं उन मोरों को तो देखो। ये हमारे सैनिकों के भय से कितने डरे हुए हैं। इसी प्रकार अपने आवास-स्थान पर्वत की ओर उड़ते हुए अन्य पक्षियों पर भी दृष्टिपात करो

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॥ २ · ९३ · १८ ॥
अतिमात्रमयं देशो मनोज्ञः प्रतिभाति मे। तापसानां निवासोऽयं व्यक्तं स्वर्गपथोऽनघ

atimātramayaṁ deśo manojñaḥ pratibhāti me।
tāpasānāṁ nivāso'yaṁ vyaktaṁ svargapatho'nagha ॥

‘निष्पाप शत्रुघ्न! यह देश मुझे बड़ा ही मनोहर प्रतीत होता है। तपस्वी जनों का यह निवासस्थान वास्तव में स्वर्गीय पथ है

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॥ २ · ९३ · १९ ॥
मृगा मृगीभिः सहिता बहवः पृषता वने। मनोज्ञरूपा लक्ष्यन्ते कुसुमैरिव चित्रिताः

mṛgā mṛgībhiḥ sahitā bahavaḥ pṛṣatā vane।
manojñarūpā lakṣyante kusumairiva citritāḥ ॥

‘इस वन में मृगियों के साथ विचरनेवाले बहुत-से चितकबरे मृग ऐसे मनोहर दिखायी देते हैं, मानो इन्हें फूलों से चित्रित—सुसज्जित किया गया हो

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॥ २ · ९३ · २० ॥
साधु सैन्याः प्रतिष्ठन्तां विचिन्वन्तु काननम्। यथा तौ पुरुषव्याघ्रौ दृश्येते रामलक्ष्मणौ

sādhu sainyāḥ pratiṣṭhantāṁ vicinvantu ca kānanam।
yathā tau puruṣavyāghrau dṛśyete rāmalakṣmaṇau ॥

‘मेरे सैनिक यथोचित रूप से आगे बढ़ें और वन में सब ओर खोजें, जिससे उन दोनों पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण का पता लग जाय’

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॥ २ · ९३ · २१ ॥
भरतस्य वचः श्रुत्वा पुरुषाः शस्त्रपाणयः। विविशुस्तद्वनं शूरा धूमाग्रं ददृशुस्ततः

bharatasya vacaḥ śrutvā puruṣāḥ śastrapāṇayaḥ।
viviśustadvanaṁ śūrā dhūmāgraṁ dadṛśustataḥ ॥

भरत का यह वचन सुनकर बहुत-से शूरवीर पुरुषों ने हाथों में हथियार लेकर उस वन में प्रवेश किया। तदनन्तर आगे जाने पर उन्हें कुछ दूर पर ऊपर को धुआँ उठता दिखायी दिया

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॥ २ · ९३ · २२ ॥
ते समालोक्य धूमाग्रमूचुर्भरतमागताः। नामनुष्ये भवत्यग्निरव्यक्तमत्रैव राघवौ

te samālokya dhūmāgramūcurbharatamāgatāḥ।
nāmanuṣye bhavatyagniravyaktamatraiva rāghavau ॥

उस धूमशिखा को देखकर वे लौट आये और भरत से बोले—‘प्रभो! जहाँ कोई मनुष्य नहीं होता, वहाँ आग नहीं होती। अतः श्रीराम और लक्ष्मण अवश्य यहीं होंगे

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॥ २ · ९३ · २३ ॥
अथ नात्र नरव्याघ्रौ राजपुत्रौ परंतपौ। अन्ये रामोपमाः सन्ति व्यक्तमत्र तपस्विनः

atha nātra naravyāghrau rājaputrau paraṁtapau।
anye rāmopamāḥ santi vyaktamatra tapasvinaḥ ॥

‘यदि शत्रुओं को संताप देनेवाले पुरुषसिंह राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण यहाँ न हों तो भी श्रीराम-जैसे तेजस्वी दूसरे कोई तपस्वी तो अवश्य ही होंगे’

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॥ २ · ९३ · २४ ॥
तच्छ्रुत्वा भरतस्तेषां वचनं साधुसम्मतम्। सैन्यानुवाच सर्वांस्तानमित्रबलमर्दनः

tacchrutvā bharatasteṣāṁ vacanaṁ sādhusammatam।
sainyānuvāca sarvāṁstānamitrabalamardanaḥ ॥

उनकी बातें श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा मानने योग्य थीं, उन्हें सुनकर शत्रुसेना का मर्दन करनेवाले भरत ने उन समस्त सैनिकों से कहा—

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॥ २ · ९३ · २५ ॥
यत्ता भवन्तस्तिष्ठन्तु नेतो गन्तव्यमग्रतः। अहमेव गमिष्यामि सुमन्त्रो धृतिरेव

yattā bhavantastiṣṭhantu neto gantavyamagrataḥ।
ahameva gamiṣyāmi sumantro dhṛtireva ca ॥

‘तुम सब लोग सावधान होकर यहीं ठहरो! यहाँ से आगे न जाना। अब मैं ही वहाँ जाऊँगा। मेरे साथ सुमन्त्र और धृति भी रहेंगे’

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॥ २ · ९३ · २६ ॥
एवमुक्तास्ततः सैन्यास्तत्र तस्थुः समन्ततः। भरतो यत्र धूमाग्रं तत्र दृष्टिं समादधत्

evamuktāstataḥ sainyāstatra tasthuḥ samantataḥ।
bharato yatra dhūmāgraṁ tatra dṛṣṭiṁ samādadhat ॥

उनकी ऐसी आज्ञा पाकर समस्त सैनिक वहीं सब ओर फैलकर खड़े हो गये और भरत ने जहाँ धुआँ उठ रहा था, उस ओर अपनी दृष्टि स्थिर की

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॥ २ · ९३ · २७ ॥
व्यवस्थिता या भरतेन सा चमू- र्निरीक्षमाणापि भूमिमग्रतः। बभूव हृष्टा नचिरेण जानती प्रियस्य रामस्य समागमं तदा

vyavasthitā yā bharatena sā camū-
rnirīkṣamāṇāpi ca bhūmimagrataḥ।
babhūva hṛṣṭā nacireṇa jānatī
priyasya rāmasya samāgamaṁ tadā ॥

भरत के द्वारा वहाँ ठहरायी गयी वह सेना आगे की भूमि का निरीक्षण करती हुई भी वहाँ हर्षपूर्वक खड़ी रही; क्योंकि उस समय उसे मालूम हो गया था कि अब शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजी से मिलने का अवसर आनेवाला है

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रिनवतितमः सर्गः ॥ ९३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तिरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९३ ॥