वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ९० · २४ श्लोकाःSarga 90 · 24 ślokas

भरत और भरद्वाज मुनिकी भेंट एवं बातचीत तथा मुनिका अपने आश्रमपर ही ठहरनेका आदेश देना

भरत-भरद्वाज भेंट

“भरत-भरद्वाज भेंट”
॥ २ · ९० · ४–५ ॥

प्रयागे भरद्वाजाश्रमद्वारि श्वेतशोकवस्त्रधरो निराभरणो भरतो जानुनी न्यस्य कृताञ्जलिः प्रणमति; वृद्धो जटाजूटधरो दीर्घश्मश्रुस्तिलकरुद्राक्षमालाभूषितो मृगचर्मगैरिकवसनो महातपा भरद्वाजो दण्डकमण्डलुधरः करमुद्यम्य प्रसन्नमाशीर्वदति।

प्रयागके भरद्वाज-आश्रमके द्वारपर शोकसे मलिन भरत केवल बिना रँगे श्वेत वस्त्र धारण किये, आभूषणहीन, घुटनोंके बल झुककर हाथ जोड़े मस्तक नवाये हैं; सामने खड़े ऊँची श्वेत जटा, लंबी दाढ़ी, ललाट-तिलक और रुद्राक्ष-मालाओंसे सुशोभित, मृगचर्म एवं गेरुए वस्त्रधारी महातपस्वी भरद्वाज एक हाथमें दण्ड और पीतल-कमण्डलु लिये दूसरा हाथ आशीर्वादमें उठाये शान्त स्नेहसे उनका स्वागत करते हैं — तत्क्षण पहचान लेते हैं कि यह दशरथ-पुत्र है। पीछे पर्णकुटियाँ, यज्ञ-अग्निका उठता धूम और सघन वृक्षोंकी छाया-भरी शान्त वनभूमि।

At the threshold of Bharadvaj's forest hermitage by Prayaga, the grief-worn prince Bharat — stripped of ornaments, clad only in undyed white mourner's cloth — kneels and bows low with reverently folded hands; towering before him, the aged ascetic Bharadvaj, his high white matted topknot, long beard, forehead-tilaka and rudraksha rosaries marking the great sage, a deerskin thrown over ochre robes, grips a staff hung with a brass water-pot in one hand while the other lifts in serene blessing — recognizing at once the son of Dasharath. Around them a tranquil ashrama of thatched huts, rising sacrificial smoke and tall dappled trees.

॥ २ · ९० · १ ॥
भरद्वाजाश्रमं गत्वा क्रोशादेव नरर्षभः। जनं सर्वमवस्थाप्य जगाम सह मन्त्रिभिः

bharadvājāśramaṁ gatvā krośādeva nararṣabhaḥ।
janaṁ sarvamavasthāpya jagāma saha mantribhiḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९० · २ ॥
पद्भ्यामेव तु धर्मज्ञो न्यस्तशस्त्रपरिच्छदः। वसानो वाससी क्षौमे पुरोधाय पुरोहितम्

padbhyāmeva tu dharmajño nyastaśastraparicchadaḥ।
vasāno vāsasī kṣaume purodhāya purohitam ॥

॥ १–२ ॥

धर्म के ज्ञाता नरश्रेष्ठ भरत ने भरद्वाज-आश्रम के पास पहुँचकर अपने साथ के सब लोगों को आश्रम से एक कोस इधर ही ठहरा दिया था और अपने भी अस्त्र-शस्त्र तथा राजोचित वस्त्र उतारकर वहीं रख दिये थे। केवल दो रेशमी वस्त्र धारण करके पुरोहित को आगे किये वे मन्त्रियों के साथ पैदल ही वहाँ गये

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॥ २ · ९० · ३ ॥
ततः संदर्शने तस्य भरद्वाजस्य राघवः। मन्त्रिणस्तानवस्थाप्य जगामानुपुरोहितम्

tataḥ saṁdarśane tasya bharadvājasya rāghavaḥ।
mantriṇastānavasthāpya jagāmānupurohitam ॥

आश्रम में प्रवेश करके जहाँ दूर से ही मुनिवर भरद्वाज का दर्शन होने लगा। वहीं उन्होंने उन मन्त्रियों को खड़ा कर दिया और पुरोहित वसिष्ठजी को आगे करके वे पीछे-पीछे ऋषि के पास गये

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॥ २ · ९० · ४ ॥
वसिष्ठमथ दृष्ट्वैव भरद्वाजो महातपाः। संचचालासनात् तूर्णं शिष्यानर्घ्यमिति ब्रुवन्

vasiṣṭhamatha dṛṣṭvaiva bharadvājo mahātapāḥ।
saṁcacālāsanāt tūrṇaṁ śiṣyānarghyamiti bruvan ॥

महर्षि वसिष्ठ को देखते ही महातपस्वी भरद्वाज आसन से उठ खड़े हुए और शिष्यों से शीघ्रतापूर्वक अर्घ्य ले आने को कहा

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॥ २ · ९० · ५ ॥
समागम्य वसिष्ठेन भरतेनाभिवादितः। अबुध्यत महातेजाः सुतं दशरथस्य तम्

samāgamya vasiṣṭhena bharatenābhivāditaḥ।
abudhyata mahātejāḥ sutaṁ daśarathasya tam ॥

फिर वे वसिष्ठ से मिले। तत्पश्चात् भरत ने उनके चरणों में प्रणाम किया। महातेजस्वी भरद्वाज समझ गये कि ये राजा दशरथ के पुत्र हैं

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॥ २ · ९० · ६ ॥
ताभ्यामर्घ्यं पाद्यं दत्त्वा पश्चात् फलानि च। आनुपूर्व्याच्च धर्मज्ञः पप्रच्छ कुशलं कुले

tābhyāmarghyaṁ ca pādyaṁ ca dattvā paścāt phalāni ca।
ānupūrvyācca dharmajñaḥ papraccha kuśalaṁ kule ॥

धर्मज्ञ ऋषि ने क्रमशः वसिष्ठ और भरत को अर्घ्य, पाद्य तथा फल आदि निवेदन करके उन दोनों के कुल का कुशल-समाचार पूछा

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॥ २ · ९० · ७ ॥
अयोध्यायां बले कोशे मित्रेष्वपि मन्त्रिषु। जानन् दशरथं वृत्तं राजानमुदाहरत्

ayodhyāyāṁ bale kośe mitreṣvapi ca mantriṣu।
jānan daśarathaṁ vṛttaṁ na rājānamudāharat ॥

इसके बाद अयोध्या, सेना, खजाना, मित्रवर्ग तथा मन्त्रिमण्डल का हाल पूछा। राजा दशरथ की मृत्यु का वृत्तान्त वे जानते थे; इसलिये उनके विषय में उन्होंने कुछ नहीं पूछा

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॥ २ · ९० · ८ ॥
वसिष्ठो भरतश्चैनं पप्रच्छतुरनामयम्। शरीरेऽग्निषु शिष्येषु वृक्षेषु मृगपक्षिषु

vasiṣṭho bharataścainaṁ papracchaturanāmayam।
śarīre'gniṣu śiṣyeṣu vṛkṣeṣu mṛgapakṣiṣu ॥

वसिष्ठ और भरत ने भी महर्षि के शरीर, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग, पेड़-पत्ते तथा मृग-पक्षी आदि का कुशल समाचार पूछा

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॥ २ · ९० · ९ ॥
तथेति तु प्रतिज्ञाय भरद्वाजो महायशाः। भरतं प्रत्युवाचेदं राघवस्नेहबन्धनात्

tatheti tu pratijñāya bharadvājo mahāyaśāḥ।
bharataṁ pratyuvācedaṁ rāghavasnehabandhanāt ॥

महायशस्वी भरद्वाज ‘सब ठीक है’ ऐसा कहकर श्रीराम के प्रति स्नेह होने के कारण भरत से इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ९० · १० ॥
किमिहागमने कार्यं तव राज्यं प्रशासतः। एतदाचक्ष्व सर्वं मे हि मे शुध्यते मनः

kimihāgamane kāryaṁ tava rājyaṁ praśāsataḥ।
etadācakṣva sarvaṁ me na hi me śudhyate manaḥ ॥

‘तुम तो राज्य कर रहे हो न? तुम्हें यहाँ आने की क्या आवश्यकता पड़ गयी? यह सब मुझे बताओ, क्योंकि मेरा मन तुम्हारी ओर से शुद्ध नहीं हो रहा है—मेरा विश्वास तुमपर नहीं जमता है

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॥ २ · ९० · ११ ॥
सुषुवे यममित्रघ्नं कौसल्याऽऽनन्दवर्धनम्। भ्रात्रा सह सभार्यो यश्चिरं प्रव्राजितो वनम्

suṣuve yamamitraghnaṁ kausalyā''nandavardhanam।
bhrātrā saha sabhāryo yaściraṁ pravrājito vanam ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९० · १२ ॥
नियुक्तः स्त्रीनिमित्तेन पित्रा योऽसौ महायशाः। वनवासी भवेतीह समाः किल चतुर्दश

niyuktaḥ strīnimittena pitrā yo'sau mahāyaśāḥ।
vanavāsī bhavetīha samāḥ kila caturdaśa ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९० · १३ ॥
कच्चिन्न तस्यापापस्य पापं कर्तुमिहेच्छसि। अकण्टकं भोक्तुमना राज्यं तस्यानुजस्य

kaccinna tasyāpāpasya pāpaṁ kartumihecchasi।
akaṇṭakaṁ bhoktumanā rājyaṁ tasyānujasya ca ॥

॥ ११–१३ ॥

‘जो शत्रुओं का नाश करनेवाला है, जिस आनन्दवर्धक पुत्र को कौसल्या ने जन्म दिया है तथा तुम्हारे पिता ने स्त्री के कारण जिस महायशस्वी पुत्र को चौदह वर्षोंतक वन में रहने की आज्ञा देकर उसे भाई और पत्नी के साथ दीर्घकाल के लिये वन में भेज दिया है, उस निरपराध श्रीराम और उसके छोटे भाई लक्ष्मण का तुम अकण्टक राज्य भोगने की इच्छा से कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहते हो?’

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॥ २ · ९० · १४ ॥
एवमुक्तो भरद्वाजं भरतः प्रत्युवाच ह। पर्यश्रुनयनो दुःखाद् वाचा संसज्जमानया

evamukto bharadvājaṁ bharataḥ pratyuvāca ha।
paryaśrunayano duḥkhād vācā saṁsajjamānayā ॥

भरद्वाजजी के ऐसा कहने पर दुःख के कारण भरत की आँखें डबडबा आयीं। वे लड़खड़ाती हुई वाणी में उनसे इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ९० · १५ ॥
हतोऽस्मि यदि मामेवं भगवानपि मन्यते। मत्तो दोषमाशङ्के मैवं मामनुशाधि हि

hato'smi yadi māmevaṁ bhagavānapi manyate।
matto na doṣamāśaṅke maivaṁ māmanuśādhi hi ॥

‘भगवन्! यदि आप पूज्यपाद महर्षि भी मुझे ऐसा समझते हैं, तब तो मैं हर तरह से मारा गया। यह मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि श्रीराम के वनवास में मेरी ओर से कोई अपराध नहीं हुआ है, अतः आप मुझसे ऐसी कठोर बात न कहें

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॥ २ · ९० · १६ ॥
चैतदिष्टं माता मे यदवोचन्मदन्तरे। नाहमेतेन तुष्टश्च तद्वचनमाददे

na caitadiṣṭaṁ mātā me yadavocanmadantare।
nāhametena tuṣṭaśca na tadvacanamādade ॥

‘मेरी आड़ लेकर मेरी माता ने जो कुछ कहा या किया है, यह मुझे अभीष्ट नहीं है। मैं इससे संतुष्ट नहीं हूँ और न माता की उस बात को स्वीकार ही करता हूँ

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॥ २ · ९० · १७ ॥
अहं तु तं नरव्याघ्रमुपयातः प्रसादकः। प्रतिनेतुमयोध्यायां पादौ चास्याभिवन्दितुम्

ahaṁ tu taṁ naravyāghramupayātaḥ prasādakaḥ।
pratinetumayodhyāyāṁ pādau cāsyābhivanditum ॥

‘मैं तो उन पुरुषसिंह श्रीराम को प्रसन्न करके अयोध्या में लौटा लाने और उनके चरणों की वन्दना करने के लिये जा रहा हूँ

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॥ २ · ९० · १८ ॥
तं मामेवंगतं मत्वा प्रसादं कर्तुमर्हसि। शंस मे भगवन् रामः क्व सम्प्रति महीपतिः

taṁ māmevaṁgataṁ matvā prasādaṁ kartumarhasi।
śaṁsa me bhagavan rāmaḥ kva samprati mahīpatiḥ ॥

‘इसी उद्देश्य से मैं यहाँ आया हूँ। ऐसा समझकर आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये। भगवन्! आप मुझे बताइये कि इस समय महाराज श्रीराम कहाँ हैं ?’

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॥ २ · ९० · १९ ॥
वसिष्ठादिभिरृत्विग्भिर्याचितो भगवांस्ततः। उवाच तं भरद्वाजः प्रसादाद् भरतं वचः

vasiṣṭhādibhirṛtvigbhiryācito bhagavāṁstataḥ।
uvāca taṁ bharadvājaḥ prasādād bharataṁ vacaḥ ॥

इसके बाद वसिष्ठ आदि ऋत्विजों ने भी यह प्रार्थना की कि भरत का कोई अपराध नहीं है। आप इनपर प्रसन्न हों। तब भगवान् भरद्वाज ने प्रसन्न होकर भरत से कहा—

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॥ २ · ९० · २० ॥
त्वय्येतत् पुरुषव्याघ्र युक्तं राघववंशजे। गुरुवृत्तिर्दमश्चैव साधूनां चानुयायिता

tvayyetat puruṣavyāghra yuktaṁ rāghavavaṁśaje।
guruvṛttirdamaścaiva sādhūnāṁ cānuyāyitā ॥

‘पुरुषसिंह! तुम रघुकुल में उत्पन्न हुए हो। तुममें गुरुजनों की सेवा, इन्द्रियसंयम तथा श्रेष्ठ पुरुषों के अनुसरण का भाव होना उचित ही है

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॥ २ · ९० · २१ ॥
जाने चैतन्मनःस्थं ते दृढीकरणमस्त्विति। अपृच्छं त्वां तवात्यर्थं कीर्तिं समभिवर्धयन्

jāne caitanmanaḥsthaṁ te dṛḍhīkaraṇamastviti।
apṛcchaṁ tvāṁ tavātyarthaṁ kīrtiṁ samabhivardhayan ॥

‘तुम्हारे मन में जो बात है, उसे मैं जानता हूँ; तथापि मैंने इसलिये पूछा है कि तुम्हारा यह भाव और भी दृढ़ हो जाय तथा तुम्हारी कीर्ति का अधिकाधिक विस्तार हो

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॥ २ · ९० · २२ ॥
जाने रामं धर्मज्ञं ससीतं सहलक्ष्मणम्। अयं वसति ते भ्राता चित्रकूटे महागिरौ

jāne ca rāmaṁ dharmajñaṁ sasītaṁ sahalakṣmaṇam।
ayaṁ vasati te bhrātā citrakūṭe mahāgirau ॥

‘मैं सीता और लक्ष्मणसहित धर्मज्ञ श्रीराम का पता जानता हूँ। ये तुम्हारे भ्राता श्रीरामचन्द्र महापर्वत चित्रकूट पर निवास करते हैं

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॥ २ · ९० · २३ ॥
श्वस्तु गन्तासि तं देशं वसाद्य सह मन्त्रिभिः। एतं मे कुरु सुप्राज्ञ कामं कामार्थकोविद्

śvastu gantāsi taṁ deśaṁ vasādya saha mantribhiḥ।
etaṁ me kuru suprājña kāmaṁ kāmārthakovid ॥

‘अब कल तुम उस स्थान की यात्रा करना। आज अपने मन्त्रियों के साथ इस आश्रम में ही रहो। महाबुद्धिमान् भरत! तुम मेरी इस अभीष्ट वस्तु को देने में समर्थ हो, अतः मेरी यह अभिलाषा पूर्ण करो’

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॥ २ · ९० · २४ ॥
ततस्तथेत्येवमुदारदर्शनः प्रतीतरूपो भरतोऽब्रवीद् वचः। चकार बुद्धिं तदाश्रमे तदा निशानिवासाय नराधिपात्मजः

tatastathetyevamudāradarśanaḥ
pratītarūpo bharato'bravīd vacaḥ।
cakāra buddhiṁ ca tadāśrame tadā
niśānivāsāya narādhipātmajaḥ ॥

तब जिनके स्वरूप एवं स्वभाव का परिचय मिल गया था, उन उदार दृष्टिवाले भरत ने ‘तथास्तु’ कहकर मुनि की आज्ञा शिरोधार्य की तथा उन राजकुमार ने उस समय रात को उस आश्रम में ही निवास करने का विचार किया

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवतितमः सर्गः ॥ ९० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें नब्बेवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९० ॥