वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ८९ · २३ श्लोकाःSarga 89 · 23 ślokas

भरतका सेनासहित गङ्गापार करके भरद्वाजके आश्रमपर जाना

गङ्गा-सन्तरण

“गङ्गा-सन्तरण”
॥ २ · ८९ · १२–१३ ॥

स्वस्तिकाङ्कितां पाण्डुकम्बलसंवृतां महाघण्टापताकिनीं कल्याणीं नावं निषादाधिपो गुहः स्वयं वाहयति; तत्र श्वेतशोकवस्त्रे निरलङ्करो भरतो निषण्णः पारतीरं वीक्षते, पृष्ठे गजैः सह नौशतैर्महती सेना गङ्गां संतरति।

प्रभात की सुनहरी आभा में शान्त गङ्गा पर निषादराज गुह स्वयं वह मङ्गलमयी स्वस्तिक-नौका खे रहा है, जिस पर श्वेत कालीन बिछा है और घण्टियों से लदी ध्वजा फहरा रही है; उसी नाव पर, आभूषण-रहित श्वेत शोक-वस्त्र में शोक-विह्वल राजकुमार भरत बैठे दूरस्थ वनतट की ओर टकटकी लगाये हैं। पीछे पाँच सौ नौकाओं, मल्लाहों और पंखधारी पर्वतों-से हाथियों से भरी विशाल सेना गङ्गा पार कर रही है।

In the golden light of dawn the Nishad king Guha himself steers the auspicious svastika-boat across the wide, calm Ganga — its deck spread with a white fleece, a bell-hung banner fluttering above; upon it sits the grief-worn prince Bharat, stripped of ornaments and clad in a plain white mourner's cloth, his gaze fixed on the distant wooded shore. Behind them a vast host of five hundred boats, oarsmen and elephants like winged mountains ferries across the sacred river.

॥ २ · ८९ · १ ॥
व्युष्य रात्रिं तु तत्रैव गङ्गाकूले राघवः। काल्यमुत्थाय शत्रुघ्नमिदं वचनमब्रवीत्

vyuṣya rātriṁ tu tatraiva gaṅgākūle sa rāghavaḥ।
kālyamutthāya śatrughnamidaṁ vacanamabravīt ॥

भृङ्गवेरपुर में ही गङ्गा के तट पर रात्रि बिताकर रघुकुलनन्दन भरत प्रातःकाल उठे और शत्रुघ्न से इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ८९ · २ ॥
शत्रुघ्नोत्तिष्ठ किं शेषे निषादाधिपतिं गुहम्। शीघ्रमानय भद्रं ते तारयिष्यति वाहिनीम्

śatrughnottiṣṭha kiṁ śeṣe niṣādādhipatiṁ guham।
śīghramānaya bhadraṁ te tārayiṣyati vāhinīm ॥

‘शत्रुघ्न! उठो, क्या सो रहे हो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम निषादराज गुह को शीघ्र बुला लाओ, वही हमें गङ्गा के पार उतारेगा’

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॥ २ · ८९ · ३ ॥
जागर्मि नाहं स्वपिमि तथैवार्यं विचिन्तयन्। इत्येवमब्रवीद् भ्राता शत्रुघ्नो विप्रचोदितः

jāgarmi nāhaṁ svapimi tathaivāryaṁ vicintayan।
ityevamabravīd bhrātā śatrughno vipracoditaḥ ॥

उनसे इस प्रकार प्रेरित होने पर शत्रुघ्न ने कहा—‘भैया! मैं भी आपकी ही भाँति आर्य श्रीराम का चिन्तन करता हुआ जाग रहा हूँ, सोता नहीं हूँ’

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॥ २ · ८९ · ४ ॥
इति संवदतोरेवमन्योन्यं नरसिंहयोः। आगम्य प्राञ्जलिः काले गुहो वचनमब्रवीत्

iti saṁvadatorevamanyonyaṁ narasiṁhayoḥ।
āgamya prāñjaliḥ kāle guho vacanamabravīt ॥

वे दोनों पुरुषसिंह जब इस प्रकार परस्पर बातचीत कर रहे थे, उसी समय गुह उपयुक्त वेला में आ पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला—

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॥ २ · ८९ · ५ ॥
कच्चित् सुखं नदीतीरेऽवात्सीः काकुत्स्थ शर्वरीम्। कच्चिच्च सहसैन्यस्य तव नित्यमनामयम्

kaccit sukhaṁ nadītīre'vātsīḥ kākutstha śarvarīm।
kaccicca sahasainyasya tava nityamanāmayam ॥

‘ककुत्स्थकुलभूषण भरतजी! इस नदी के तट पर आप रात में सुख से रहे हैं न? सेनासहित आपको यहाँ कोई कष्ट तो नहीं हुआ है? आप सर्वथा नीरोग हैं न?’

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॥ २ · ८९ · ६ ॥
गुहस्य तत् तु वचनं श्रुत्वा स्नेहादुदीरितम्। रामस्यानुवशो वाक्यं भरतोऽपीदमब्रवीत्

guhasya tat tu vacanaṁ śrutvā snehādudīritam।
rāmasyānuvaśo vākyaṁ bharato'pīdamabravīt ॥

गुह के स्नेहपूर्वक कहे गये इस वचन को सुनकर श्रीराम के अधीन रहनेवाले भरत ने यों कहा—

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॥ २ · ८९ · ७ ॥
सुखा नः शर्वरी धीमन् पूजिताश्चापि ते वयम्। गङ्गां तु नौभिर्बह्वीभिर्दाशाः संतारयन्तु नः

sukhā naḥ śarvarī dhīman pūjitāścāpi te vayam।
gaṅgāṁ tu naubhirbahvībhirdāśāḥ saṁtārayantu naḥ ॥

‘बुद्धिमान् निषादराज! हम सब लोगों की रात बड़े सुख से बीती है। तुमने हमारा बड़ा सत्कार किया। अब ऐसी व्यवस्था करो, जिससे तुम्हारे मल्लाह बहुत-सी नौकाओंद्वारा हमें गङ्गा के पार उतार दें’

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॥ २ · ८९ · ८ ॥
ततो गुहः संत्वरितः श्रुत्वा भरतशासनम्। प्रतिप्रविश्य नगरं तं ज्ञातिजनमब्रवीत्

tato guhaḥ saṁtvaritaḥ śrutvā bharataśāsanam।
pratipraviśya nagaraṁ taṁ jñātijanamabravīt ॥

भरत का यह आदेश सुनकर गुह तुरंत अपने नगर में गया और भाई-बन्धुओं से बोला—

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॥ २ · ८९ · ९ ॥
उत्तिष्ठत प्रबुध्यध्वं भद्रमस्तु हि वः सदा। नावः समुपकर्षध्वं तारयिष्यामि वाहिनीम्

uttiṣṭhata prabudhyadhvaṁ bhadramastu hi vaḥ sadā।
nāvaḥ samupakarṣadhvaṁ tārayiṣyāmi vāhinīm ॥

‘उठो, जागो, सदा तुम्हारा कल्याण हो। नौकाओं को खींचकर घाट पर ले आओ। भरत की सेना को गङ्गाजी के पार उतारूँगा’

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॥ २ · ८९ · १० ॥
ते तथोक्ताः समुत्थाय त्वरिता राजशासनात्। पञ्च नावां शतान्येव समानिन्युः समन्ततः

te tathoktāḥ samutthāya tvaritā rājaśāsanāt।
pañca nāvāṁ śatānyeva samāninyuḥ samantataḥ ॥

गुह के इस प्रकार कहने पर अपने राजा की आज्ञा से सभी मल्लाह शीघ्र ही उठ खड़े हुए और चारों ओर से पाँच सौ नौकाएँ एकत्र कर लाये

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॥ २ · ८९ · ११ ॥
अन्याः स्वस्तिकविज्ञेया महाघण्टाधरावराः। शोभमानाः पताकिन्यो युक्तवाहाः सुसंहताः

anyāḥ svastikavijñeyā mahāghaṇṭādharāvarāḥ।
śobhamānāḥ patākinyo yuktavāhāḥ susaṁhatāḥ ॥

इन सबके अतिरिक्त कुछ स्वस्तिक नाम से प्रसिद्ध नौकाएँ थीं; जो स्वस्ति के चिह्नों से अलंकृत होने के कारण उन्हीं चिह्नों से पहचानी जाती थीं। उनपर ऐसी पताकाएँ फहरा रही थीं, जिनमें बड़ी-बड़ी घण्टियाँ लटक रही थीं। स्वर्ण आदि के बने हुए चित्रों से उन नौकाओं की विशेष शोभा हो रही थी। उनमें नौका खेने के लिये बहुत-से डाँड़ लगे हुए थे तथा चतुर नाविक उन्हें चलाने के लिये तैयार बैठे थे। वे सभी नौकाएँ बड़ी मजबूत बनी थीं

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॥ २ · ८९ · १२ ॥
ततः स्वस्तिकविज्ञेयां पाण्डुकम्बलसंवृताम्। सनन्दिघोषां कल्याणीं गुहो नावमुपाहरत्

tataḥ svastikavijñeyāṁ pāṇḍukambalasaṁvṛtām।
sanandighoṣāṁ kalyāṇīṁ guho nāvamupāharat ॥

उन्हींमें से एक कल्याणमयी नाव गुह स्वयं लेकर आया, जिसमें श्वेत कालीन बिछे हुए थे तथा उस स्वस्तिक नामवाली नाव पर माङ्गलिक शब्द हो रहा था

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॥ २ · ८९ · १३ ॥
तामारुरोह भरतः शत्रुघ्नश्च महाबलः। कौसल्या सुमित्रा याश्चान्या राजयोषितः

tāmāruroha bharataḥ śatrughnaśca mahābalaḥ।
kausalyā ca sumitrā ca yāścānyā rājayoṣitaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ८९ · १४ ॥
पुरोहितश्च तत् पूर्वं गुरवो ब्राह्मणाश्च ये। अनन्तरं राजदारास्तथैव शकटापणाः

purohitaśca tat pūrvaṁ guravo brāhmaṇāśca ye।
anantaraṁ rājadārāstathaiva śakaṭāpaṇāḥ ॥

॥ १३–१४ ॥

उसपर सबसे पहले पुरोहित, गुरु और ब्राह्मण बैठे। तत्पश्चात् उसपर भरत, महाबली शत्रुघ्न, कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी तथा राजा दशरथ की जो अन्य रानियाँ थीं, वे सब सवार हुईं। तदनन्तर राजपरिवार की दूसरी स्त्रियाँ बैठीं। गाड़ियाँ तथा क्रय-विक्रय की सामग्रियाँ दूसरी-दूसरी नावों पर लादी गयीं

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॥ २ · ८९ · १५ ॥
आवासमादीपयतां तीर्थं चाप्यवगाहताम्। भाण्डानि चाददानानां घोषस्तु दिवमस्पृशत्

āvāsamādīpayatāṁ tīrthaṁ cāpyavagāhatām।
bhāṇḍāni cādadānānāṁ ghoṣastu divamaspṛśat ॥

कुछ सैनिक बड़ी-बड़ी मशालें जलाकर* अपने खेमों में छूटी हुई वस्तुओं को सँभालने लगे। कुछ लोग शीघ्रतापूर्वक घाट पर उतरने लगे तथा बहुत-से सैनिक अपने-अपने सामान को ‘यह मेरा है, यह मेरा है’ इस तरह पहचानकर उठाने लगे। उस समय जो महान् कोलाहल मचा, वह आकाश में गूँज उठा

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॥ २ · ८९ · १६ ॥
पताकिन्यस्तु ता नावः स्वयं दाशैरधिष्ठिताः। वहन्त्यो जनमारूढं तदा सम्पेतुराशुगाः

patākinyastu tā nāvaḥ svayaṁ dāśairadhiṣṭhitāḥ।
vahantyo janamārūḍhaṁ tadā sampeturāśugāḥ ॥

उन सभी नावों पर पताकाएँ फहरा रही थीं। सबके ऊपर खेनेवाले कई मल्लाह बैठे थे। वे सब नौकाएँ उस समय चढ़े हुए मनुष्यों को तीव्रगति से पार ले जाने लगीं

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॥ २ · ८९ · १७ ॥
नारीणामभिपूर्णास्तु काश्चित् काश्चित् तु वाजिनाम्। काश्चित् तत्र वहन्ति स्म यानयुग्यं महाधनम्

nārīṇāmabhipūrṇāstu kāścit kāścit tu vājinām।
kāścit tatra vahanti sma yānayugyaṁ mahādhanam ॥

कितनी ही नौकाएँ केवल स्त्रियों से भरी थीं, कुछ नावों पर घोड़े थे तथा कुछ नौकाएँ गाड़ियों, उनमें जोते जानेवाले घोड़े, खच्चर, बैल आदि वाहनों तथा बहुमूल्य रत्न आदि को ढो रही थीं

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॥ २ · ८९ · १८ ॥
तास्तु गत्वा परं तीरमवरोप्य तं जनम्। निवृत्ता काण्डचित्राणि क्रियन्ते दाशबन्धुभिः

tāstu gatvā paraṁ tīramavaropya ca taṁ janam।
nivṛttā kāṇḍacitrāṇi kriyante dāśabandhubhiḥ ॥

वे दूसरे तट पर पहुँचकर वहाँ लोगों को उतारकर जब लौटीं, उस समय मल्लाहबन्धु जल में उनकी विचित्र गतियों का प्रदर्शन करने लगे

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॥ २ · ८९ · १९ ॥
सवैजयन्तास्तु गजा गजारोहैः प्रचोदिताः। तरन्तः स्म प्रकाशन्ते सपक्षा इव पर्वताः

savaijayantāstu gajā gajārohaiḥ pracoditāḥ।
tarantaḥ sma prakāśante sapakṣā iva parvatāḥ ॥

वैजयन्ती पताकाओं से सुशोभित होनेवाले हाथी महावतों से प्रेरित होकर स्वयं ही नदी पार करने लगे। उस समय वे पंखधारी पर्वतों के समान प्रतीत होते थे

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॥ २ · ८९ · २० ॥
नावश्चारुरुहुस्त्वन्ये प्लवैस्तेरुस्तथापरे। अन्ये कुम्भघटैस्तेरुरन्ये तेरुश्च बाहुभिः

nāvaścāruruhustvanye plavaisterustathāpare।
anye kumbhaghaṭaisteruranye teruśca bāhubhiḥ ॥

कितने ही मनुष्य नावों पर बैठे थे और कितने ही बाँस तथा तिनकों से बने हुए बेड़ों पर सवार थे। कुछ लोग बड़े-बड़े कलशों, कुछ छोटे घड़ों और कुछ अपनी बाहुओं से ही तैरकर पार हो रहे थे

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॥ २ · ८९ · २१ ॥
सा पुण्या ध्वजिनी गङ्गां दाशैः संतारिता स्वयम्। मैत्रे मुहूर्ते प्रययौ प्रयागवनमुत्तमम्

sā puṇyā dhvajinī gaṅgāṁ dāśaiḥ saṁtāritā svayam।
maitre muhūrte prayayau prayāgavanamuttamam ॥

इस प्रकार मल्लाहों की सहायता से वह सारी पवित्र सेना गङ्गा के पार उतारी गयी। फिर वह स्वयं मैत्र† नामक मुहूर्त में उत्तम प्रयागवन की ओर प्रस्थित हो गयी

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॥ २ · ८९ · २२ ॥
आश्वासयित्वा चमूं महात्मा निवेशयित्वा यथोपजोषम्। द्रष्टुं भरद्वाजमृषिप्रवर्य- मृत्विक्सदस्यैर्भरतः प्रतस्थे

āśvāsayitvā ca camūṁ mahātmā
niveśayitvā ca yathopajoṣam।
draṣṭuṁ bharadvājamṛṣipravarya-
mṛtviksadasyairbharataḥ pratasthe ॥

वहाँ पहुँचकर महात्मा भरत सेना को सुखपूर्वक विश्राम की आज्ञा दे उसे प्रयागवन में ठहराकर स्वयं ऋत्विजों तथा राजसभा के सदस्यों के साथ ऋषिश्रेष्ठ भरद्वाज का दर्शन करने के लिये गये

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॥ २ · ८९ · २३ ॥
ब्राह्मणस्याश्रममभ्युपेत्य महात्मनो देवपुरोहितस्य। ददर्श रम्योटजवृक्षदेशं महद्वनं विप्रवरस्य रम्यम्

sa brāhmaṇasyāśramamabhyupetya
mahātmano devapurohitasya।
dadarśa ramyoṭajavṛkṣadeśaṁ
mahadvanaṁ vipravarasya ramyam ॥

देवपुरोहित महात्मा ब्राह्मण भरद्वाज मुनि के आश्रम पर पहुँचकर भरत ने उन विप्रशिरोमणि के रमणीय एवं विशाल वन को देखा, जो मनोहर पर्णशालाओं तथा वृक्षावलियों से सुशोभित था

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोननवतितमः सर्गः ॥ ८९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें नवासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८९ ॥