वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ८८ · ३० श्लोकाःSarga 88 · 30 ślokas

श्रीरामकी कुश-शय्या देखकर भरतका शोकपूर्ण उद्गार तथा स्वयं भी वल्कल और जटाधारण करके वनमें रहनेका विचार प्रकट करना

कुश-शय्या-शोक

“कुश-शय्या-शोक”
॥ २ · ८८ · १३ ॥

गङ्गातटे इङ्गुदीवृक्षमूले शुभ्रवस्त्रो निराभरणो भरतो जानुनी निधाय सजलनयनः, अग्रजस्य गात्रैर्विमृदितां कुशशय्यां पाणिना स्पृशन् शोकमग्नस्तां रिक्तां शय्यां निरीक्षते।

गङ्गाके तटपर विशाल इंगुदी-वृक्षकी छायामें श्वेत शोकवस्त्र धारण किये, आभूषणहीन युवराज भरत घुटनोंके बल झुके हुए हैं; नेत्रोंसे अश्रुधारा बह रही है, एक हाथ हृदयपर दबा है और दूसरा उस कुश-शय्याको छू रहा है जिसपर अग्रज श्रीरामने शयन किया था और जिसके तृण उनके अङ्गोंसे अब भी कुचले पड़े हैं — 'यही मेरे भाईकी शय्या है' — ऐसा कहते हुए वे शोकमें डूबे उस सूनी घास-सेजको निहार रहे हैं।

On the bank of the Ganga, beneath a great ingudi tree, the young prince Bharat kneels in plain undyed white — his ornaments cast off in mourning — tears streaking his face; one hand pressed to his heart, the other reaching down to touch the bed of kusha-grass where his elder brother Ram had slept, its dry blades still flattened by his body. Gazing at the empty bed in sacred sorrow, he grieves that one born to every royal luxury must now lie upon the bare earth.

॥ २ · ८८ · १ ॥
तच्छुत्वा निपुणं सर्वं भरतः सह मन्त्रिभिः। इङ्गुदीमूलमागम्य रामशय्यामवैक्षत॥

tacchutvā nipuṇaṁ sarvaṁ bharataḥ saha mantribhiḥ।
iṅgudīmūlamāgamya rāmaśayyāmavaikṣata॥

निषादराज की सारी बातें ध्यान से सुनकर मन्त्रियोंसहित भरत ने इंगुदी-वृक्ष की जड़ के पास आकर श्रीरामचन्द्रजी की शय्या का निरीक्षण किया

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॥ २ · ८८ · २ ॥
अब्रवीज्जननीः सर्वा इह तस्य महात्मनः। शर्वरी शयिता भूमाविदमस्य विमर्दितम्॥

abravījjananīḥ sarvā iha tasya mahātmanaḥ।
śarvarī śayitā bhūmāvidamasya vimarditam॥

फिर उन्होंने समस्त माताओं से कहा—‘यहीं महात्मा श्रीराम ने भूमि पर शयन करके रात्रि व्यतीत की थी। यही वह कुशसमूह है, जो उनके अङ्गों से विमर्दित हुआ था

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॥ २ · ८८ · ३ ॥
महाराजकुलीनेन महाभागेन धीमता। जातो दशरथेनोर्व्यां रामः स्वप्तुमर्हति॥

mahārājakulīnena mahābhāgena dhīmatā।
jāto daśarathenorvyāṁ na rāmaḥ svaptumarhati॥

‘महाराजों के कुल में उत्पन्न हुए परम बुद्धिमान् महाभाग राजा दशरथ ने जिन्हें जन्म दिया है, वे श्रीराम इस तरह भूमि पर शयन करने के योग्य नहीं हैं

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॥ २ · ८८ · ४ ॥
अजिनोत्तरसंस्तीर्णे वरास्तरणसंचये। शयित्वा पुरुषव्याघ्रः कथं शेते महीतले॥

ajinottarasaṁstīrṇe varāstaraṇasaṁcaye।
śayitvā puruṣavyāghraḥ kathaṁ śete mahītale॥

‘जो पुरुषसिंह श्रीराम मुलायम मृगचर्म की विशेष चादर से ढके हुए तथा अच्छे-अच्छे बिछौनों के समूह से सजे हुए पलंग पर सदा सोते आये हैं, वे इस समय पृथ्वी पर कैसे शयन करते होंगे?

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॥ २ · ८८ · ५ ॥
प्रासादाग्रविमानेषु वलभीषु सर्वदा। हैमराजतभौमेषु वरास्तरणशालिषु॥

prāsādāgravimāneṣu valabhīṣu ca sarvadā।
haimarājatabhaumeṣu varāstaraṇaśāliṣu॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ८८ · ६ ॥
पुष्पसंचयचित्रेषु चन्दनागुरुगन्धिषु। पाण्डुराभ्रप्रकाशेषु शुकसंघरुतेषु च॥

puṣpasaṁcayacitreṣu candanāgurugandhiṣu।
pāṇḍurābhraprakāśeṣu śukasaṁgharuteṣu ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ८८ · ७ ॥
प्रासादवरवर्येषु शीतवत्सु सुगन्धिषु। उषित्वा मेरुकल्पेषु कृतकाञ्चनभित्तिषु॥

prāsādavaravaryeṣu śītavatsu sugandhiṣu।
uṣitvā merukalpeṣu kṛtakāñcanabhittiṣu॥

॥ ५–७ ॥

‘जो सदा विमानाकार प्रासादों के श्रेष्ठ भवनों और अट्टालिकाओं में सोते आये हैं तथा जिनकी फर्श सोने और चाँदी की बनी हुई है, जो अच्छे बिछौनों से सुशोभित हैं, पुष्पराशि से विभूषित होने के कारण जिनकी विचित्र शोभा होती है, जिनमें चन्दन और अगुरु की सुगन्ध फैली रहती है, जो श्वेत बादलों के समान उज्ज्वल कान्ति धारण करते हैं, जिनमें शुकसमूहों का कलरव होता रहता है, जो शीतल हैं एवं कपूर आदि की सुगन्ध से व्याप्त होते हैं, जिनकी दीवारों पर सुवर्ण का काम किया गया है तथा जो ऊँचाई में मेरु पर्वत के समान जान पड़ते हैं, ऐसे सर्वोत्तम राजमहलों में जो निवास कर चुके हैं, वे श्रीराम वन में पृथ्वी पर कैसे सोते होंगे?

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॥ २ · ८८ · ८ ॥
गीतवादित्रनिर्घोषैर्वराभरणनिःस्वनैः। मृदङ्गवरशब्दैश्च सततं प्रतिबोधितः॥

gītavāditranirghoṣairvarābharaṇaniḥsvanaiḥ।
mṛdaṅgavaraśabdaiśca satataṁ pratibodhitaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ८८ · ९ ॥
वन्दिभिर्वन्दितः काले बहुभिः सूतमागधैः। गाथाभिरनुरूपाभिः स्तुतिभिश्च परंतपः॥

vandibhirvanditaḥ kāle bahubhiḥ sūtamāgadhaiḥ।
gāthābhiranurūpābhiḥ stutibhiśca paraṁtapaḥ॥

॥ ८–९ ॥

‘जो गीतों और वाद्यों की ध्वनियों से, श्रेष्ठ आभूषणों की झनकारों से तथा मृदङ्गों के उत्तम शब्दों से सदा जगाये जाते थे, बहुत-से वन्दीगण समय-समय पर जिनकी वन्दना करते थे, सूत और मागध अनुरूप गाथाओं और स्तुतियों से जिनको जगाते थे, वे शत्रुसंतापी श्रीराम अब भूमि पर कैसे शयन करते होंगे?

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॥ २ · ८८ · १० ॥
अश्रद्धेयमिदं लोके सत्यं प्रतिभाति मा। मुह्यते खलु मे भावः स्वप्नोऽयमिति मे मतिः॥

aśraddheyamidaṁ loke na satyaṁ pratibhāti mā।
muhyate khalu me bhāvaḥ svapno'yamiti me matiḥ॥

‘यह बात जगत् में विश्वास के योग्य नहीं है। मुझे यह सत्य नहीं प्रतीत होती। मेरा अन्तःकरण अवश्य ही मोहित हो रहा है। मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यह कोई स्वप्न है

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॥ २ · ८८ · ११ ॥
नूनं दैवतं किंचित् कालेन बलवत्तरम्। यत्र दाशरथी रामो भूमावेवमशेत सः॥

na nūnaṁ daivataṁ kiṁcit kālena balavattaram।
yatra dāśarathī rāmo bhūmāvevamaśeta saḥ॥

‘निश्चय ही काल के समान प्रबल कोई दूसरा देवता नहीं है, जिसके प्रभाव से दशरथनन्दन श्रीराम को भी इस प्रकार भूमि पर सोना पड़ा

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॥ २ · ८८ · १२ ॥
यस्मिन् विदेहराजस्य सुता प्रियदर्शना। दयिता शयिता भूमौ स्नुषा दशरथस्य च॥

yasmin videharājasya sutā ca priyadarśanā।
dayitā śayitā bhūmau snuṣā daśarathasya ca॥

‘उस काल के ही प्रभाव से विदेहराज की परम सुन्दरी पुत्री और महाराज दशरथ की प्यारी पुत्रवधू सीता भी पृथ्वी पर शयन करती हैं

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॥ २ · ८८ · १३ ॥
इयं शय्या मम भ्रातुरिदमावर्तितं शुभम्। स्थण्डिले कठिने सर्वं गात्रैर्विमृदितं तृणम्॥

iyaṁ śayyā mama bhrāturidamāvartitaṁ śubham।
sthaṇḍile kaṭhine sarvaṁ gātrairvimṛditaṁ tṛṇam॥

‘यही मेरे बड़े भाई की शय्या है। यहीं उन्होंने करवटें बदली थीं। इस कठोर वेदी पर उनका शुभ शयन हुआ था, जहाँ उनके अङ्गों से कुचला गया सारा तृण अभीतक पड़ा है

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॥ २ · ८८ · १४ ॥
मन्ये साभरणा सुप्ता सीतास्मिन्शयने शुभा। तत्र तत्र हि दृश्यन्ते सक्ताः कनकबिन्दवः॥

manye sābharaṇā suptā sītāsminśayane śubhā।
tatra tatra hi dṛśyante saktāḥ kanakabindavaḥ॥

‘जान पड़ता है, शुभलक्षणा सीता शय्या पर आभूषण पहने ही सोयी थीं; क्योंकि यहाँ यत्र-तत्र सुवर्ण के कण सटे दिखायी देते हैं

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॥ २ · ८८ · १५ ॥
उत्तरीयमिहासक्तं सुव्यक्तं सीतया तदा। तथा ह्येते प्रकाशन्ते सक्ताः कौशेयतन्तवः॥

uttarīyamihāsaktaṁ suvyaktaṁ sītayā tadā।
tathā hyete prakāśante saktāḥ kauśeyatantavaḥ॥

‘यहाँ उस समय सीता की चादर उलझ गयी थी, यह साफ दिखायी दे रहा है; क्योंकि यहाँ सटे हुए ये रेशम के तागे चमक रहे हैं

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॥ २ · ८८ · १६ ॥
मन्ये भर्तुः सुखा शय्या येन बाला तपस्विनी। सुकुमारी सती दुःखं विजानाति मैथिली॥

manye bhartuḥ sukhā śayyā yena bālā tapasvinī।
sukumārī satī duḥkhaṁ na vijānāti maithilī॥

‘मैं समझता हूँ कि पति की शय्या कोमल हो या कठोर, साध्वी स्त्रियों के लिये वही सुखदायिनी होती है, तभी तो वह तपस्विनी एवं सुकुमारी बाला सती-साध्वी मिथिलेशकुमारी सीता यहाँ दुःख का अनुभव नहीं कर रही हैं

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॥ २ · ८८ · १७ ॥
हा हतोऽस्मि नृशंसोऽस्मि यत्सभार्यः कृते मम। ईदृशीं राघवः शय्यामधिशेते ह्यनाथवत्॥

hā hato'smi nṛśaṁso'smi yatsabhāryaḥ kṛte mama।
īdṛśīṁ rāghavaḥ śayyāmadhiśete hyanāthavat॥

‘हाय! मैं मर गया—मेरा जीवन व्यर्थ है। मैं बड़ा क्रूर हूँ, जिसके कारण सीतासहित श्रीराम को अनाथ की भाँति ऐसी शय्या पर सोना पड़ता है

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॥ २ · ८८ · १८ ॥
सार्वभौमकुले जातः सर्वलोकसुखावहः। सर्वप्रियकरस्त्यक्त्वा राज्यं प्रियमनुत्तमम्॥

sārvabhaumakule jātaḥ sarvalokasukhāvahaḥ।
sarvapriyakarastyaktvā rājyaṁ priyamanuttamam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ८८ · १९ ॥
कथमिन्दीवरश्यामो रक्ताक्षः प्रियदर्शनः। सुखभागी दुःखार्हः शयितो भुवि राघवः॥

kathamindīvaraśyāmo raktākṣaḥ priyadarśanaḥ।
sukhabhāgī na duḥkhārhaḥ śayito bhuvi rāghavaḥ॥

॥ १८–१९ ॥

‘जो चक्रवर्ती सम्राट् के कुल में उत्पन्न हुए हैं, समस्त लोकों को सुख देनेवाले हैं तथा सबका प्रिय करने में तत्पर रहते हैं, जिनका शरीर नीले कमल के समान श्याम, आँखें लाल और दर्शन सबको प्रिय लगनेवाला है तथा जो सुख भोगने के ही योग्य हैं, दुःख भोगने के कदापि योग्य नहीं हैं, वे ही श्रीरघुनाथजी परम उत्तम प्रिय राज्य का परित्याग करके इस समय पृथ्वी पर शयन करते हैं

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॥ २ · ८८ · २० ॥
धन्यः खलु महाभागो लक्ष्मणः शुभलक्षणः। भ्रातरं विषमे काले यो राममनुवर्तते॥

dhanyaḥ khalu mahābhāgo lakṣmaṇaḥ śubhalakṣaṇaḥ।
bhrātaraṁ viṣame kāle yo rāmamanuvartate॥

‘उत्तम लक्षणोंवाले लक्ष्मण ही धन्य एवं बड़भागी हैं, जो संकट के समय बड़े भाई श्रीराम के साथ रहकर उनकी सेवा करते हैं

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॥ २ · ८८ · २१ ॥
सिद्धार्था खलु वैदेही पतिं यानुगता वनम्। वयं संशयिताः सर्वे हीनास्तेन महात्मना॥

siddhārthā khalu vaidehī patiṁ yānugatā vanam।
vayaṁ saṁśayitāḥ sarve hīnāstena mahātmanā॥

‘निश्चय ही विदेहनन्दिनी सीता भी कृतार्थ हो गयीं, जिन्होंने पति के साथ वन का अनुसरण किया है। हम सब लोग उन महात्मा श्रीराम से बिछुड़कर संशय में पड़ गये हैं (हमें यह संदेह होने लगा है कि श्रीराम हमारी सेवा स्वीकार करेंगे या नहीं)

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॥ २ · ८८ · २२ ॥
अकर्णधारा पृथिवी शून्येव प्रतिभाति मे। गते दशरथे स्वर्गं रामे चारण्यमाश्रिते॥

akarṇadhārā pṛthivī śūnyeva pratibhāti me।
gate daśarathe svargaṁ rāme cāraṇyamāśrite॥

‘महाराज दशरथ स्वर्गलोक को गये और श्रीराम वनवासी हो गये, ऐसी दशा में यह पृथ्वी बिना नाविक की नौका के समान मुझे सूनी-सी प्रतीत हो रही है

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॥ २ · ८८ · २३ ॥
प्रार्थयते कश्चिन्मनसापि वसुंधराम्। वने निवसतस्तस्य बाहुवीर्याभिरक्षिताम्॥

na ca prārthayate kaścinmanasāpi vasuṁdharām।
vane nivasatastasya bāhuvīryābhirakṣitām॥

‘वन में निवास करने पर भी उन्हीं श्रीराम के बाहुबल से सुरक्षित हुई इस वसुन्धरा को कोई शत्रु मन से भी नहीं लेना चाहता है

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॥ २ · ८८ · २४ ॥
शून्यसंवरणारक्षामयन्त्रितहयद्विपाम्। अनावृतपुरद्वारां राजधानीमरक्षिताम्॥

śūnyasaṁvaraṇārakṣāmayantritahayadvipām।
anāvṛtapuradvārāṁ rājadhānīmarakṣitām॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ८८ · २५ ॥
अप्रहृष्टबलां शून्यां विषमस्थामनावृताम्। शत्रवो नाभिमन्यन्ते भक्ष्यान् विषकृतानिव॥

aprahṛṣṭabalāṁ śūnyāṁ viṣamasthāmanāvṛtām।
śatravo nābhimanyante bhakṣyān viṣakṛtāniva॥

॥ २४–२५ ॥

‘इस समय अयोध्या की चहारदीवारी की सब ओर से रक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं है, हाथी और घोड़े बँधे नहीं रहते हैं—खुले विचरते हैं, नगरद्वार का फाटक खुला ही रहता है, सारी राजधानी अरक्षित है, सेना में हर्ष और उत्साह का अभाव है, समस्त नगरी रक्षकों से सूनी-सी जान पड़ती है, सङ्कट में पड़ी हुई है, रक्षकों के अभाव से आवरणरहित हो गयी है, तो भी शत्रु विषमिश्रित भोजन की भाँति इसे ग्रहण करने की इच्छा नहीं करते हैं। श्रीराम के बाहुबल से ही इसकी रक्षा हो रही है

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॥ २ · ८८ · २६ ॥
अद्यप्रभृति भूमौ तु शयिष्येऽहं तृणेषु वा। फलमूलाशनो नित्यं जटाचीराणि धारयन्॥

adyaprabhṛti bhūmau tu śayiṣye'haṁ tṛṇeṣu vā।
phalamūlāśano nityaṁ jaṭācīrāṇi dhārayan॥

‘आज से मैं भी पृथ्वी पर अथवा तिनकों पर ही सोऊँगा, फल-मूल का ही भोजन करूँगा और सदा वल्कल वस्त्र तथा जटा धारण किये रहूँगा

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॥ २ · ८८ · २७ ॥
तस्याहमुत्तरं कालं निवत्स्यामि सुखं वने। तत्प्रतिश्रुतमार्यस्य नैव मिथ्या भविष्यति॥

tasyāhamuttaraṁ kālaṁ nivatsyāmi sukhaṁ vane।
tatpratiśrutamāryasya naiva mithyā bhaviṣyati॥

‘वनवास के जितने दिन बाकी हैं, उतने दिनोंतक मैं ही वहाँ सुखपूर्वक निवास करूँगा, ऐसा होने से आर्य श्रीराम की की हुई प्रतिज्ञा झूठी नहीं होगी

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॥ २ · ८८ · २८ ॥
वसन्तं भ्रातुरर्थाय शत्रुघ्नो मानुवत्स्यति। लक्ष्मणेन सहायोध्यामार्यो मे पालयिष्यति॥

vasantaṁ bhrāturarthāya śatrughno mānuvatsyati।
lakṣmaṇena sahāyodhyāmāryo me pālayiṣyati॥

‘भाई के लिये वन में निवास करते समय शत्रुघ्न मेरे साथ रहेंगे और मेरे बड़े भाई श्रीराम लक्ष्मण को साथ लेकर अयोध्या का पालन करेंगे

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॥ २ · ८८ · २९ ॥
अभिषेक्ष्यन्ति काकुत्स्थमयोध्यायां द्विजातयः। अपि मे देवताः कुर्युरिमं सत्यं मनोरथम्॥

abhiṣekṣyanti kākutsthamayodhyāyāṁ dvijātayaḥ।
api me devatāḥ kuryurimaṁ satyaṁ manoratham॥

‘अयोध्या में ब्राह्मणलोग ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम का अभिषेक करेंगे। क्या देवता मेरे इस मनोरथ को सत्य (सफल) करेंगे?

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॥ २ · ८८ · ३० ॥
प्रसाद्यमानः शिरसा मया स्वयं बहुप्रकारं यदि प्रपत्स्यते। ततोऽनुवत्स्यामि चिराय राघवं वनेचरं नार्हति मामुपेक्षितुम्॥

prasādyamānaḥ śirasā mayā svayaṁ
bahuprakāraṁ yadi na prapatsyate।
tato'nuvatsyāmi cirāya rāghavaṁ
vanecaraṁ nārhati māmupekṣitum॥

‘मैं उनके चरणों पर मस्तक रखकर उन्हें मनाने की चेष्टा करूँगा। यदि मेरे बहुत कहने पर भी वे लौटने को राजी न होंगे तो उन वनवासी श्रीराम के साथ मैं भी दीर्घकालतक वहीं निवास करूँगा। वे मेरी उपेक्षा नहीं करेंगे’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डेऽष्टाशीतितमः सर्गः॥ ८८॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें अट्ठासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८८॥