वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ८७ · २४ श्लोकाःSarga 87 · 24 ślokas

भरतकी मूर्च्छासे गुह, शत्रुघ्न और माताओंका दुःखी होना, होशमें आनेपर भरतका गुहसे श्रीराम आदिके भोजन और शयन आदिके विषयमें पूछना और गुहका उन्हें सब बातें बताना

भरत-मूर्च्छा

“भरत-मूर्च्छा”
॥ २ · ८७ · ३–५ ॥

गुहस्य वचनम् आकर्ण्य शोकविह्वलो भरतः शिथिलगात्रो निमीलिताक्षः शिरः प्रलम्ब्य मूर्च्छितः पतति; शत्रुघ्नो निषादराजश्च तम् उभयतोऽवलम्ब्य धारयतः, पृष्ठे मन्दाकिनीतटम्।

निषादराज गुहसे यह सुनकर कि उनके प्रिय भाई श्रीराम कठोर धरतीपर सोये थे, शोकसे विह्वल भरत — श्वेत शोक-वस्त्रमें, आभूषण उतारे — नेत्र मूँदे, सिर पीछेको ढलका, घुटने शिथिल कर मूर्च्छित होकर गिर पड़े हैं; बायीं ओर गौरवर्ण शत्रुघ्न उन्हें बाँहसे थामकर सँभालते हैं, तो दायीं ओर मोरपंखी सिरबंध, मणि-मालाएँ और मृगचर्म धारण किये निषादराज गुह व्यथित मुखसे दूसरी ओरसे सहारा देते हैं; पीछे मन्दाकिनीका सन्ध्या-तट।

Hearing from the Nishad king Guha how his beloved brother Ram had slept on the bare forest earth, Bharat — in plain white mourner's cloth, his ornaments cast off — swoons: his eyes close, his head falls back and his knees give way as he sinks down. On the left his fair brother Shatrughna lunges to catch him by the arm, while on the right the rugged hunter-king Guha, crowned with a peacock-feather band and hung with beads and animal skins, steadies him — both faces taut with grief against the dusk-lit riverbank.

॥ २ · ८७ · १ ॥
गुहस्य वचनं श्रुत्वा भरतो भृशमप्रियम्‌। ध्यानं जगाम तत्रैव यत्र तच्छ्रुतमप्रियम्‌॥

guhasya vacanaṁ śrutvā bharato bhṛśamapriyam‌।
dhyānaṁ jagāma tatraiva yatra tacchrutamapriyam‌॥

गुह का श्रीराम के जटाधारण आदि से सम्बन्ध रखनेवाला अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरत चिन्तामग्न हो गये। जिन श्रीराम के विषय में उन्होंने अप्रिय बात सुनी थी, उन्हींका वे चिन्तन करने लगे (उन्हें यह चिन्ता हो गयी कि अब मेरा मनोरथ पूर्ण न हो सकेगा। श्रीराम ने जब जटा धारण कर ली, तब वे शायद ही लौटें)

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॥ २ · ८७ · २ ॥
सुकुमारो महासत्त्वः सिंहस्कन्धो महाभुजः। पुण्डरीकविशालाक्षस्तरुणः प्रियदर्शनः॥

sukumāro mahāsattvaḥ siṁhaskandho mahābhujaḥ।
puṇḍarīkaviśālākṣastaruṇaḥ priyadarśanaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ८७ · ३ ॥
प्रत्याश्वस्य मुहूर्तं तु कालं परमदुर्मनाः। ससाद सहसा तोत्रैर्हृदि विद्ध इव द्विपः॥

pratyāśvasya muhūrtaṁ tu kālaṁ paramadurmanāḥ।
sasāda sahasā totrairhṛdi viddha iva dvipaḥ॥

॥ २–३ ॥

भरत सुकुमार होने के साथ ही महान्‌ बलशाली थे, उनके कंधे सिंह के समान थे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और नेत्र विकसित कमल के सदृश सुन्दर थे। उनकी अवस्था तरुण थी और वे देखने में बड़े मनोरम थे। उन्होंने गुह की बात सुनकर दो घड़ीतक किसी प्रकार धैर्य धारण किया, फिर उनके मन में बड़ा दुःख हुआ। वे अंकुश से विद्ध हुए हाथी के समान अत्यन्त व्यथित होकर सहसा दुःख से शिथिल एवं मूर्च्छित हो गये

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॥ २ · ८७ · ४ ॥
भरतं मूर्च्छितं दृष्ट्वा विवर्णवदनो गुहः। बभूव व्यथितस्तत्र भूमिकम्पे यथा द्रुमः॥

bharataṁ mūrcchitaṁ dṛṣṭvā vivarṇavadano guhaḥ।
babhūva vyathitastatra bhūmikampe yathā drumaḥ॥

भरत को मूर्च्छित हुआ देख गुह के चेहरे का रंग उड़ गया। वह भूकम्प के समय मथित हुए वृक्ष की भाँति वहाँ व्यथित हो उठा

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॥ २ · ८७ · ५ ॥
तदवस्थं तु भरतं शत्रुघ्नोऽनन्तरस्थितः। परिष्वज्य रुरोदोच्चैर्विसंज्ञः शोककर्शितः॥

tadavasthaṁ tu bharataṁ śatrughno'nantarasthitaḥ।
pariṣvajya rurodoccairvisaṁjñaḥ śokakarśitaḥ॥

शत्रुघ्न भरत के पास ही बैठे थे। वे उनकी वैसी अवस्था देख उन्हें हृदय से लगाकर जोर-जोर से रोने लगे और शोक से पीड़ित हो अपनी सुध-बुध खो बैठे

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॥ २ · ८७ · ६ ॥
ततः सर्वाः समापेतुर्मातरो भरतस्य ताः। उपवासकृशा दीना भर्तृव्यसनकर्शिताः॥

tataḥ sarvāḥ samāpeturmātaro bharatasya tāḥ।
upavāsakṛśā dīnā bhartṛvyasanakarśitāḥ॥

तदनन्तर भरत की सभी माताएँ वहाँ आ पहुँचीं। वे पतिवियोग के दुःख से दुःखी, उपवास करने के कारण दुर्बल और दीन हो रही थीं

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॥ २ · ८७ · ७ ॥
ताश्च तं पतितं भूमौ रुदत्यः पर्यवारयन्‌। कौसल्या त्वनुसृत्यैनं दुर्मनाः परिषस्वजे॥

tāśca taṁ patitaṁ bhūmau rudatyaḥ paryavārayan‌।
kausalyā tvanusṛtyainaṁ durmanāḥ pariṣasvaje॥

भूमि पर पड़े हुए भरत को उन्होंने चारों ओर से घेर लिया और सब-की-सब रोने लगीं। कौसल्या का हृदय तो दुःख से और भी कातर हो उठा। उन्होंने भरत के पास जाकर उन्हें अपनी गोद में चिपका लिया

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॥ २ · ८७ · ८ ॥
वत्सला स्वं यथा वत्समुपगुह्य तपस्विनी। परिपप्रच्छ भरतं रुदती शोकलालसा॥

vatsalā svaṁ yathā vatsamupaguhya tapasvinī।
paripapraccha bharataṁ rudatī śokalālasā॥

जैसे वत्सला गौ अपने बछड़े को गले से लगाकर चाटती है, उसी तरह शोक से व्याकुल हुई तपस्विनी कौसल्या ने भरत को गोद में लेकर रोते-रोते पूछा—

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॥ २ · ८७ · ९ ॥
पुत्र व्याधिर्न ते कच्चिच्छरीरं प्रति बाधते। अस्य राजकुलस्याद्य त्वदधीनं हि जीवितम्‌॥

putra vyādhirna te kacciccharīraṁ prati bādhate।
asya rājakulasyādya tvadadhīnaṁ hi jīvitam‌॥

‘बेटा! तुम्हारे शरीर को कोई रोग तो कष्ट नहीं पहुँचा रहा है? अब इस राजवंश का जीवन तुम्हारे ही अधीन है

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॥ २ · ८७ · १० ॥
त्वां दृष्ट्वा पुत्र जीवामि रामे सभ्रातृके गते। वृत्ते दशरथे राज्ञि नाथ एकस्त्वमद्य नः॥

tvāṁ dṛṣṭvā putra jīvāmi rāme sabhrātṛke gate।
vṛtte daśarathe rājñi nātha ekastvamadya naḥ॥

‘वत्स! मैं तुम्हींको देखकर जी रही हूँ। श्रीराम लक्ष्मण के साथ वन में चले गये और महाराज दशरथ स्वर्गवासी हो गये; अब एकमात्र तुम्हीं हमलोगों के रक्षक हो

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॥ २ · ८७ · ११ ॥
कच्चिन्न लक्ष्मणे पुत्र श्रुतं ते किंचिदप्रियम्‌। पुत्रे वा ह्येकपुत्रायाः सहभार्ये वनं गते॥

kaccinna lakṣmaṇe putra śrutaṁ te kiṁcidapriyam‌।
putre vā hyekaputrāyāḥ sahabhārye vanaṁ gate॥

‘बेटा! सच बताओ, तुमने लक्ष्मण के सम्बन्ध में अथवा मुझ एक ही पुत्रवाली मा के बेटे वन में सीतासहित गये हुए श्रीराम के विषय में कोई अप्रिय बात तो नहीं सुनी है?’

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॥ २ · ८७ · १२ ॥
मुहूर्तं समाश्वस्य रुदन्नेव महायशाः। कौसल्यां परिसान्त्व्येदं गुहं वचनमब्रवीत्‌॥

sa muhūrtaṁ samāśvasya rudanneva mahāyaśāḥ।
kausalyāṁ parisāntvyedaṁ guhaṁ vacanamabravīt‌॥

दो ही घड़ी में जब महायशस्वी भरत का चित्त स्वस्थ हुआ, तब उन्होंने रोते-रोते ही कौसल्या को सान्त्वना दी (और कहा—‘माँ! घबराओ मत, मैंने कोई अप्रिय बात नहीं सुनी है’)। फिर निषादराज गुह से इस प्रकार पूछा—

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॥ २ · ८७ · १३ ॥
भ्राता मे क्वावसद्‌ रात्रौ क्व सीता क्व लक्ष्मणः। अस्वपच्छयने कस्मिन्‌ किं भुक्त्वा गुह शंस मे॥

bhrātā me kvāvasad‌ rātrau kva sītā kva ca lakṣmaṇaḥ।
asvapacchayane kasmin‌ kiṁ bhuktvā guha śaṁsa me॥

‘गुह! उस दिन रात में मेरे भाई श्रीराम कहाँ ठहरे थे? सीता कहाँ थीं? और लक्ष्मण कहाँ रहे? उन्होंने क्या भोजन करके कैसे बिछौने पर शयन किया था? ये सब बातें मुझे बताओ’

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॥ २ · ८७ · १४ ॥
सोऽब्रवीद्‌ भरतं हृष्टो निषादाधिपतिर्गुहः। यद्विधं प्रतिपेदे रामे प्रियहितेऽतिथौ॥

so'bravīd‌ bharataṁ hṛṣṭo niṣādādhipatirguhaḥ।
yadvidhaṁ pratipede ca rāme priyahite'tithau॥

ये प्रश्न सुनकर निषादराज गुह बहुत प्रसन्न हुआ और उसने अपने प्रिय एवं हितकारी अतिथि श्रीराम के आने पर उनके प्रति जैसा बर्ताव किया था, वह सब बताते हुए भरत से कहा—

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॥ २ · ८७ · १५ ॥
अन्नमुच्चावचं भक्ष्याः फलानि विविधानि च। रामायाभ्यवहारार्थं बहुशोऽपहृतं मया॥

annamuccāvacaṁ bhakṣyāḥ phalāni vividhāni ca।
rāmāyābhyavahārārthaṁ bahuśo'pahṛtaṁ mayā॥

‘मैंने भाँति-भाँति के अन्न, अनेक प्रकार के खाद्य-पदार्थ और कई तरह के फल श्रीरामचन्द्रजी के पास भोजन के लिये प्रचुर मात्रा में पहुँचाये

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॥ २ · ८७ · १६ ॥
तत्‌ सर्वं प्रत्यनुज्ञासीद्‌ रामः सत्यपराक्रमः। हि तत्‌ प्रत्यगृह्णात्‌ क्षत्रधर्ममनुस्मरन्‌॥

tat‌ sarvaṁ pratyanujñāsīd‌ rāmaḥ satyaparākramaḥ।
na hi tat‌ pratyagṛhṇāt‌ sa kṣatradharmamanusmaran‌॥

‘सत्यपराक्रमी श्रीराम ने मेरी दी हुई सब वस्तुएँ स्वीकार तो कीं; किंतु क्षत्रियधर्म का स्मरण करते हुए उनको ग्रहण नहीं किया—मुझे आदरपूर्वक लौटा दिया

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॥ २ · ८७ · १७ ॥
नह्यस्माभिः प्रतिग्राह्यं सखे देयं तु सर्वदा। इति तेन वयं सर्वे अनुनीता महात्मना॥

nahyasmābhiḥ pratigrāhyaṁ sakhe deyaṁ tu sarvadā।
iti tena vayaṁ sarve anunītā mahātmanā॥

‘फिर उन महात्मा ने हम सब लोगों को समझाते हुए कहा—‘सखे! हम-जैसे क्षत्रियों को किसीसे कुछ लेना नहीं चाहिये; अपितु सदा देना ही चाहिये’

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॥ २ · ८७ · १८ ॥
लक्ष्मणेन यदानीतं पीतं वारि महात्मना। औपवास्यं तदाकार्षीद्‌ राघवः सह सीतया॥

lakṣmaṇena yadānītaṁ pītaṁ vāri mahātmanā।
aupavāsyaṁ tadākārṣīd‌ rāghavaḥ saha sītayā॥

‘सीतासहित श्रीराम ने उस रात में उपवास ही किया। लक्ष्मण जो जल ले आये थे, केवल उसीको उन महात्मा ने पीया

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॥ २ · ८७ · १९ ॥
ततस्तु जलशेषेण लक्ष्मणोऽप्यकरोत्‌ तदा। वाग्यतास्ते त्रयः संध्यां समुपासन्त संहिताः॥

tatastu jalaśeṣeṇa lakṣmaṇo'pyakarot‌ tadā।
vāgyatāste trayaḥ saṁdhyāṁ samupāsanta saṁhitāḥ॥

‘उनके पीने से बचा हुआ जल लक्ष्मण ने ग्रहण किया। (जलपान के पहले) उन तीनों ने मौन एवं एकाग्रचित्त होकर संध्योपासना की थी

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॥ २ · ८७ · २० ॥
सौमित्रिस्तु ततः पश्चादकरोत्‌ स्वास्तरं शुभम्‌। स्वयमानीय बर्हीषि क्षिप्रं राघवकारणात्‌॥

saumitristu tataḥ paścādakarot‌ svāstaraṁ śubham‌।
svayamānīya barhīṣi kṣipraṁ rāghavakāraṇāt‌॥

‘तदनन्तर लक्ष्मण ने स्वयं कुश लाकर श्रीरामचन्द्रजी के लिये शीघ्र ही सुन्दर बिछौना बिछाया

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॥ २ · ८७ · २१ ॥
तस्मिन्‌ समाविशद्‌ रामः स्वास्तरे सह सीतया। प्रक्षाल्य तयोः पादौ व्यपाक्रामत्‌ लक्ष्मणः॥

tasmin‌ samāviśad‌ rāmaḥ svāstare saha sītayā।
prakṣālya ca tayoḥ pādau vyapākrāmat‌ sa lakṣmaṇaḥ॥

‘उस सुन्दर बिस्तर पर जब सीता के साथ श्रीराम विराजमान हुए, तब लक्ष्मण उन दोनों के चरण पखारकर वहाँ से दूर हट आये

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॥ २ · ८७ · २२ ॥
एतत्‌ तदिङ्गुदीमूलमिदमेव तत्‌ तृणम्‌। यस्मिन्‌ रामश्च सीता रात्रिं तां शयितावुभौ॥

etat‌ tadiṅgudīmūlamidameva ca tat‌ tṛṇam‌।
yasmin‌ rāmaśca sītā ca rātriṁ tāṁ śayitāvubhau॥

‘यही वह इङ्गुदी-वृक्ष की जड़ है और यही वह तृण है, जहाँ श्रीराम और सीता—दोनों ने रात्रि में शयन किया था

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॥ २ · ८७ · २३ ॥
नियम्य पृष्ठे तु तलाङ्गुलित्रवान्‌ शरैः सुपूर्णाविषुधी परंतपः। महद्धनुः सज्जमुपोह्य लक्ष्मणो निशामतिष्ठत्‌ परितोऽस्य केवलम्‌॥

niyamya pṛṣṭhe tu talāṅgulitravān‌ śaraiḥ supūrṇāviṣudhī paraṁtapaḥ।
mahaddhanuḥ sajjamupohya lakṣmaṇo niśāmatiṣṭhat‌ parito'sya kevalam‌॥

‘शत्रुसंतापी लक्ष्मण अपनी पीठ पर बाणों से भरे दो तरकस बाँधे, दोनों हाथों की अंगुलियों में दस्ताने पहने और महान्‌ धनुष चढ़ाये श्रीराम के चारों ओर घूमकर केवल पहरा देते हुए रातभर खड़े रहे

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॥ २ · ८७ · २४ ॥
ततस्त्वहं चोत्तमबाणचापभृत्‌ स्थितोऽभवं तत्र यत्र लक्ष्मणः। अतन्द्रितैर्ज्ञातिभिरात्तकार्मुकैर्महेन्द्रकल्पं परिपालयंस्तदा॥

tatastvahaṁ cottamabāṇacāpabhṛt‌ sthito'bhavaṁ tatra sa yatra lakṣmaṇaḥ।
atandritairjñātibhirāttakārmukairmahendrakalpaṁ paripālayaṁstadā॥

‘तदनन्तर मैं भी उत्तम बाण और धनुष लेकर वहीं आ खड़ा हुआ, जहाँ लक्ष्मण थे। उस समय अपने बन्धु-बान्धवों के साथ, जो निद्रा और आलस्य का त्याग करके धनुष-बाण लिये सदा सावधान रहे, मैं देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी श्रीराम की रक्षा करता रहा’

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्ताशीतितमः सर्गः ॥ ८७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सतासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८७ ॥