वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ९ · ६६ श्लोकाःSarga 9 · 66 ślokas

कुब्जाके कुचक्रसे कैकेयीका कोपभवनमें प्रवेश

कोपभवन-प्रवेश

“कोपभवन-प्रवेश”
॥ २ · ९ · ६०–६६ ॥

अन्धकारमये निर्जने क्रोधागारे, कुब्जावचनेन दूषितमतिः सुन्दरी कैकेयी सर्वाण्याभरणानि अवमुच्य अनास्तीर्णायां भूमौ निपतिता; विगलितताराकाशमिव तस्या मुखं शोकामर्षमलिनम्; निक्षिप्ता मुक्ताहाराः स्वर्णभूषणानि च कृष्णमर्मरे विकीर्णानि, एको दीपः।

अन्धकारपूर्ण निर्जन कोपभवनमें, कुबड़ीकी सलाहसे जिसकी बुद्धि अन्तमें दूषित हो गयी, वह सुन्दरी रानी कैकेयी समस्त आभूषण उतार फेंककर बिना बिछौनेकी नंगी भूमिपर गिर पड़ी है; तारोंके डूब जानेपर रात्रिके आकाशके समान उसका मुख शोक और रोषसे मलिन है; उतारे हुए मोतीके हार और स्वर्णाभूषण पास ही काले फर्शपर बिखरे चमक रहे हैं; एक टिमटिमाता दीपक।

In the dark, deserted chamber of wrath, her mind poisoned at last by the hunchback's counsel, the beautiful queen Kaikeyi has torn off all her ornaments and cast herself upon the bare floor, her lovely face clouded with grief and sullen anger like the night sky when its stars have drowned; her flung-off pearl necklaces and golden ornaments glint scattered on the dark marble, a single lamp guttering.

॥ २ · ९ · १ ॥
एवमुक्ता तु कैकेयी क्रोधेन ज्वलितानना। दीर्घमुष्णं विनिःश्वस्य मन्थरामिदमब्रवीत्॥

evamuktā tu kaikeyī krodhena jvalitānanā।
dīrghamuṣṇaṁ viniḥśvasya mantharāmidamabravīt॥

मन्थरा के ऐसा कहनेपर कैकेयी का मुख क्रोध से तमतमा उठा। वह लंबी और गरम साँस खींचकर उससे इस प्रकार बोली—

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · २ ॥
अद्य राममितः क्षिप्रं वनं प्रस्थापयाम्यहम्। यौवराज्येन भरतं क्षिप्रमद्याभिषेचये॥

adya rāmamitaḥ kṣipraṁ vanaṁ prasthāpayāmyaham।
yauvarājyena bharataṁ kṣipramadyābhiṣecaye॥

‘कुब्जे! मैं श्रीराम को शीघ्र ही यहाँ से वन में भेजूँगी और तुरंत ही युवराज के पद पर भरत का अभिषेक कराऊँगी

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ३ ॥
इदं त्विदानीं सम्पश्य केनोपायेन साधये। भरतः प्राप्नुयाद् राज्यं तु रामः कथंचन॥

idaṁ tvidānīṁ sampaśya kenopāyena sādhaye।
bharataḥ prāpnuyād rājyaṁ na tu rāmaḥ kathaṁcana॥

‘परंतु इस समय यह तो सोचो कि किस उपाय से अपना अभीष्ट साधन करूँ? भरत को राज्य प्राप्त हो जाय और श्रीराम उसे किसी तरह भी न पा सकें—यह काम कैसे बने?’

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ४ ॥
एवमुक्ता तु सा देव्या मन्थरा पापदर्शिनी। रामार्थमुपहिंसन्ती कैकेयीमिदमब्रवीत्॥

evamuktā tu sā devyā mantharā pāpadarśinī।
rāmārthamupahiṁsantī kaikeyīmidamabravīt॥

देवी कैकेयी के ऐसा कहनेपर पाप का मार्ग दिखानेवाली मन्थरा श्रीराम के स्वार्थ का कुठाराघात करती हुई वहाँ कैकेयी से इस प्रकार बोली—

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ५ ॥
हन्तेदानीं प्रपश्य त्वं कैकेयि श्रूयतां वचः। यथा ते भरतो राज्यं पुत्रः प्राप्स्यति केवलम्॥

hantedānīṁ prapaśya tvaṁ kaikeyi śrūyatāṁ vacaḥ।
yathā te bharato rājyaṁ putraḥ prāpsyati kevalam॥

‘केकयनन्दिनि! अच्छा, अब देखो कि मैं क्या करती हूँ? तुम मेरी बात सुनो, जिससे केवल तुम्हारे पुत्र भरत ही राज्य प्राप्त करेंगे (श्रीराम नहीं)

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ६ ॥
किं स्मरसि कैकेयि स्मरन्ती वा निगूहसे। यदुच्यमानमात्मार्थं मत्तस्त्वं श्रोतुमिच्छसि॥

kiṁ na smarasi kaikeyi smarantī vā nigūhase।
yaducyamānamātmārthaṁ mattastvaṁ śrotumicchasi॥

‘कैकेयि! क्या तुम्हें स्मरण नहीं है? या स्मरण होनेपर भी मुझसे छिपा रही हो? जिसकी तुम मुझसे अनेक बार चर्चा करती रहती हो, अपने उसी प्रयोजन को तुम मुझसे सुनना चाहती हो? इसका क्या कारण है?

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ७ ॥
मयोच्यमानं यदि ते श्रोतुं छन्दो विलासिनि। श्रूयतामभिधास्यामि श्रुत्वा चैतद् विधीयताम्॥

mayocyamānaṁ yadi te śrotuṁ chando vilāsini।
śrūyatāmabhidhāsyāmi śrutvā caitad vidhīyatām॥

‘विलासिनि! यदि मेरे ही मुँह से सुनने के लिये तुम्हारा आग्रह है तो बताती हूँ, सुनो और सुनकर इसी के अनुसार कार्य करो’

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ८ ॥
श्रुत्वैव वचनं तस्या मन्थरायास्तु कैकयी। किंचिदुत्थाय शयनात् स्वास्तीर्णादिदमब्रवीत्॥

śrutvaiva vacanaṁ tasyā mantharāyāstu kaikayī।
kiṁcidutthāya śayanāt svāstīrṇādidamabravīt॥

मन्थरा का यह वचन सुनकर कैकेयी अच्छी तरह से बिछे हुए उस पलंग से कुछ उठकर उससे यों बोली—

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ९ ॥
कथयस्व ममोपायं केनोपायेन मन्थरे। भरतः प्राप्नुयाद् राज्यं तु रामः कथंचन॥

kathayasva mamopāyaṁ kenopāyena manthare।
bharataḥ prāpnuyād rājyaṁ na tu rāmaḥ kathaṁcana॥

मन्थरे! मुझसे वह उपाय बताओ। किस उपाय से भरत को तो राज्य मिल जायगा, किंतु श्रीराम उसे किसी तरह नहीं पा सकेंगे’

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · १० ॥
एवमुक्ता तदा देव्या मन्थरा पापदर्शिनी। रामार्थमुपहिंसन्ती कैकेयीमिदमब्रवीत्॥

evamuktā tadā devyā mantharā pāpadarśinī।
rāmārthamupahiṁsantī kaikeyīmidamabravīt॥

देवी कैकेयी के ऐसा कहनेपर पाप का मार्ग दिखानेवाली मन्थरा श्रीराम के स्वार्थ पर कुठाराघात करती हुई इस प्रकार बोली—

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ११ ॥
पुरा देवासुरे युद्धे सह राजर्षिभिः पतिः। अगच्छत् त्वामुपादाय देवराज्यस्य साह्यकृत्॥

purā devāsure yuddhe saha rājarṣibhiḥ patiḥ।
agacchat tvāmupādāya devarājyasya sāhyakṛt॥

‘देवि! पूर्वकाल की बात है कि देवासुर-संग्राम के अवसर पर राजर्षियों के साथ तुम्हारे पतिदेव तुम्हें साथ लेकर देवराज की सहायता करने के लिये गये थे

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · १२ ॥
दिशमास्थाय कैकेयि दक्षिणां दण्डकान् प्रति। वैजयन्तमिति ख्यातं पुरं यत्र तिमिध्वजः॥

diśamāsthāya kaikeyi dakṣiṇāṁ daṇḍakān prati।
vaijayantamiti khyātaṁ puraṁ yatra timidhvajaḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९ · १३ ॥
शम्बर इति ख्यातः शतमायो महासुरः। ददौ शक्रस्य संग्रामं देवसङ्घैरनिर्जितः॥

sa śambara iti khyātaḥ śatamāyo mahāsuraḥ।
dadau śakrasya saṁgrāmaṁ devasaṅghairanirjitaḥ॥

॥ १२–१३ ॥

‘केकयराजकुमारी! दक्षिण दिशा में दण्डकारण्य के भीतर वैजयन्त नाम से विख्यात एक नगर है, जहाँ शम्बर नाम से प्रसिद्ध एक महान् असुर रहता था। वह अपनी ध्वजा में तिमि (ह्वेल मछली) का चिह्न धारण करता था और सैकड़ों मायाओं का जानकार था। देवताओं के समूह भी उसे पराजित नहीं कर पाते थे। एक बार उसने इन्द्र के साथ युद्ध छेड़ दिया

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · १४ ॥
तस्मिन् महति संग्रामे पुरुषान् क्षतविक्षतान्। रात्रौ प्रसुप्तान् घ्नन्ति स्म तरसापास्य राक्षसाः॥

tasmin mahati saṁgrāme puruṣān kṣatavikṣatān।
rātrau prasuptān ghnanti sma tarasāpāsya rākṣasāḥ॥

‘उस महान् संग्राम में क्षत-विक्षत हुए पुरुष जब रात में थककर सो जाते, उस समय राक्षस उन्हें जल्दी बिस्तर से खींच ले जाते और मार डालते थे

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · १५ ॥
तत्राकरोन्महायुद्धं राजा दशरथस्तदा। असुरैश्च महाबाहुः शस्त्रैश्च शकलीकृतः॥

tatrākaronmahāyuddhaṁ rājā daśarathastadā।
asuraiśca mahābāhuḥ śastraiśca śakalīkṛtaḥ॥

‘उन दिनों महाबाहु राजा दशरथ ने भी वहाँ असुरों के साथ बड़ा भारी युद्ध किया। उस युद्ध में असुरों ने अपने शस्त्र-शस्त्रों द्वारा उनके शरीर को जर्जर कर दिया

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · १६ ॥
अपवाह्य त्वया देवि संग्रामान्नष्टचेतनः। तत्रापि विक्षतः शस्त्रैः पतिस्ते रक्षितस्त्वया॥

apavāhya tvayā devi saṁgrāmānnaṣṭacetanaḥ।
tatrāpi vikṣataḥ śastraiḥ patiste rakṣitastvayā॥

‘देवि! जब राजा की चेतना लुप्त-सी हो गयी, उस समय सारथि का काम करती हुई तुमने अपने पति को रणभूमि से दूर हटाकर उनकी रक्षा की। जब वहाँ भी राक्षसों के शस्त्रों से वे घायल हो गये, तब तुमने पुनः वहाँ से अन्यत्र ले जाकर उनकी रक्षा की

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · १७ ॥
तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने। त्वयोक्तः पतिर्देवि यदेच्छेयं तदा वरम्॥

tuṣṭena tena dattau te dvau varau śubhadarśane।
sa tvayoktaḥ patirdevi yadeccheyaṁ tadā varam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९ · १८ ॥
गृह्णीयां तु तदा भर्तस्तथेत्युक्तं महात्मना। अनभिज्ञा ह्यहं देवि त्वयैव कथितं पुरा॥

gṛhṇīyāṁ tu tadā bhartastathetyuktaṁ mahātmanā।
anabhijñā hyahaṁ devi tvayaiva kathitaṁ purā॥

॥ १७–१८ ॥

‘शुभदर्शने! इससे संतुष्ट होकर महाराज ने तुम्हें दो वरदान देने को कहा—देवि! उस समय तुमने अपने पति से कहा था—‘प्राणनाथ! जब मेरी इच्छा होगी, तब मैं इन वरों को माँग लूँगी।’ उस समय उन महात्मा नरेश ने ‘तथास्तु’ कहकर तुम्हारी बात मान ली थी। देवि! मैं इस कथा को नहीं जानती थी। पूर्वकाल में तुम्हींने मुझसे यह वृत्तान्त कहा था

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · १९ ॥
कथैषा तव तु स्नेहान्मनसा धार्यते मया। रामाभिषेकसम्भारान्निगृह्य विनिवर्तय॥

kathaiṣā tava tu snehānmanasā dhāryate mayā।
rāmābhiṣekasambhārānnigṛhya vinivartaya॥

‘तब से तुम्हारे स्नेहवश मैं इस बात को मन-ही-मन सदा याद रखती आयी हूँ। तुम इन वरों के प्रभाव से स्वामी को वश में करके श्रीराम के अभिषेक के आयोजन को पलट दो

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · २० ॥
तौ याचस्व भर्तारं भरतस्याभिषेचनम्। प्रव्राजनं रामस्य वर्षाणि चतुर्दश॥

tau ca yācasva bhartāraṁ bharatasyābhiṣecanam।
pravrājanaṁ ca rāmasya varṣāṇi ca caturdaśa॥

‘तुम उन दोनों वरों को अपने स्वामी से माँगो। एक वर के द्वारा भरत का राज्याभिषेक और दूसरे के द्वारा श्रीराम का चौदह वर्ष तक का वनवास माँग लो

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · २१ ॥
चतुर्दश हि वर्षाणि रामे प्रव्राजिते वनम्। प्रजाभावगतस्नेहः स्थिरः पुत्रो भविष्यति॥

caturdaśa hi varṣāṇi rāme pravrājite vanam।
prajābhāvagatasnehaḥ sthiraḥ putro bhaviṣyati॥

‘जब श्रीराम चौदह वर्षों के लिये वन में चले जायँगे।’ तब उतने समय में तुम्हारे पुत्र भरत समस्त प्रजा के हृदय में अपने लिये स्नेह पैदा कर लेंगे और इस राज्य पर स्थिर हो जायँगे

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · २२ ॥
क्रोधागारं प्रविश्याद्य क्रुद्धेवाश्वपतेः सुते। शेष्वानन्तर्हितायां त्वं भूमौ मलिनवासिनी॥

krodhāgāraṁ praviśyādya kruddhevāśvapateḥ sute।
śeṣvānantarhitāyāṁ tvaṁ bhūmau malinavāsinī॥

‘अश्वपतिकुमारी! तुम इस समय मैले वस्त्र पहन लो और कोपभवन में प्रवेश करके कुपित-सी होकर बिना बिस्तर के ही भूमि पर लेट जाओ

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · २३ ॥
मा स्मैनं प्रत्युदीक्षेथा मा चैनमभिभाषथाः। रुदन्ती पार्थिवं दृष्ट्वा जगत्यां शोकलालसा॥

mā smainaṁ pratyudīkṣethā mā cainamabhibhāṣathāḥ।
rudantī pārthivaṁ dṛṣṭvā jagatyāṁ śokalālasā॥

‘राजा आवें तो उनकी ओर आँखें उठाकर न देखो और न उनसे कोई बात ही करो। महाराज को देखते ही रोती हुई शोकमग्न हो धरती पर लोटने लगो

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · २४ ॥
दयिता त्वं सदा भर्तुरत्र मे नास्ति संशयः। त्वत्कृते महाराजो विशेदपि हुताशनम्॥

dayitā tvaṁ sadā bharturatra me nāsti saṁśayaḥ।
tvatkṛte ca mahārājo viśedapi hutāśanam॥

‘इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि तुम अपने पति को सदा ही बड़ी प्यारी रही हो। तुम्हारे लिये महाराज आग में भी प्रवेश कर सकते हैं

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · २५ ॥
त्वां क्रोधयितुं शक्तो क्रुद्धां प्रत्युदीक्षितुम्। तव प्रियार्थं राजा तु प्राणानपि परित्यजेत्॥

na tvāṁ krodhayituṁ śakto na kruddhāṁ pratyudīkṣitum।
tava priyārthaṁ rājā tu prāṇānapi parityajet॥

‘वे न तुम्हें कुपित कर सकते हैं और न कुपित अवस्था में तुम्हें देख ही सकते हैं। राजा दशरथ तुम्हारा प्रिय करने के लिये अपने प्राणों का भी त्याग कर सकते हैं

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · २६ ॥
ह्यतिक्रमितुं शक्तस्तव वाक्यं महीपतिः। मन्दस्वभावे बुध्यस्व सौभाग्यबलमात्मनः॥

na hyatikramituṁ śaktastava vākyaṁ mahīpatiḥ।
mandasvabhāve budhyasva saubhāgyabalamātmanaḥ॥

‘महाराज तुम्हारी बात किसी तरह टाल नहीं सकते। मुग्धे! तुम अपने सौभाग्य के बल का स्मरण करो

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · २७ ॥
मणिमुक्तासुवर्णानि रत्नानि विविधानि च। दद्याद् दशरथो राजा मा स्म तेषु मनः कृथाः॥

maṇimuktāsuvarṇāni ratnāni vividhāni ca।
dadyād daśaratho rājā mā sma teṣu manaḥ kṛthāḥ॥

‘राजा दशरथ तुम्हें भुलावे में डालने के लिये मणि, मोती, सुवर्ण तथा भाँति-भाँति के रत्न देने की चेष्टा करेंगे; किंतु तुम उनकी ओर मन न चलाना

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · २८ ॥
यौ तौ देवासुरे युद्धे वरौ दशरथो ददौ। तौ स्मारय महाभागे सोऽर्थो त्वा क्रमेदति॥

yau tau devāsure yuddhe varau daśaratho dadau।
tau smāraya mahābhāge so'rtho na tvā kramedati॥

‘महाभागे! देवासुर-संग्राम के अवसर पर राजा दशरथ ने वे जो दो वर दिये थे, उनका उन्हें स्मरण दिलाना। वरदान के रूप में माँगा गया वह तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ सिद्ध हुए बिना नहीं रह सकता

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · २९ ॥
यदा तु ते वरं दद्यात् स्वयमुत्थाप्य राघवः। व्यवस्थाप्य महाराजं त्वमिमं वृणुया वरम्॥

yadā tu te varaṁ dadyāt svayamutthāpya rāghavaḥ।
vyavasthāpya mahārājaṁ tvamimaṁ vṛṇuyā varam॥

‘रघुकुलनन्दन राजा दशरथ जब स्वयं तुम्हें धरती से उठाकर वर देने को उद्यत हो जायँ, तब उन महाराज को सत्य की शपथ दिलाकर खूब पक्का करके उनसे वर माँगना

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ३० ॥
रामप्रव्राजनं दूरं नव वर्षाणि पञ्च च। भरतः क्रियतां राजा पृथिव्यां पार्थिवर्षभ॥

rāmapravrājanaṁ dūraṁ nava varṣāṇi pañca ca।
bharataḥ kriyatāṁ rājā pṛthivyāṁ pārthivarṣabha॥

‘वर माँगते समय कहना कि नृपश्रेष्ठ! आप श्रीराम को चौदह वर्षों के लिये बहुत दूर वन में भेज दीजिये और भरत को भूमण्डल का राजा बनाइये

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ३१ ॥
चतुर्दश हि वर्षाणि रामे प्रव्राजिते वनम्। रूढश्च कृतमूलश्च शेषं स्थास्यति ते सुतः॥

caturdaśa hi varṣāṇi rāme pravrājite vanam।
rūḍhaśca kṛtamūlaśca śeṣaṁ sthāsyati te sutaḥ॥

‘श्रीराम के चौदह वर्षों के लिये वन में चले जानेपर तुम्हारे पुत्र भरत का राज्य सुदृढ़ हो जायगा और प्रजा आदि को वश में कर लेने से यहाँ उनकी जड़ जम जायगी। फिर चौदह वर्षों के बाद भी वे आजीवन स्थिर बने रहेंगे

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ३२ ॥
रामप्रव्राजनं चैव देवि याचस्व तं वरम्। एवं सेत्स्यन्ति पुत्रस्य सर्वार्थास्तव कामिनि॥

rāmapravrājanaṁ caiva devi yācasva taṁ varam।
evaṁ setsyanti putrasya sarvārthāstava kāmini॥

‘देवि! तुम राजा से श्रीराम के वनवास का वर अवश्य माँगो। पुत्र के लिये राज्य की कामना करनेवाली कैकेयि! ऐसा करने से तुम्हारे पुत्र के सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँगे

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ३३ ॥
एवं प्रव्राजितश्चैव रामोऽरामो भविष्यति। भरतश्च गतामित्रस्तव राजा भविष्यति॥

evaṁ pravrājitaścaiva rāmo'rāmo bhaviṣyati।
bharataśca gatāmitrastava rājā bhaviṣyati॥

‘इस प्रकार वनवास मिल जानेपर ये राम राम नहीं रह जायँगे (इनका आज जो प्रभाव है वह भविष्य में नहीं रह सकेगा) और तुम्हारे भरत भी शत्रुहीन राजा होंगे

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ३४ ॥
येन कालेन रामश्च वनात् प्रत्यागमिष्यति। अन्तर्बहिश्च पुत्रस्ते कृतमूलो भविष्यति॥

yena kālena rāmaśca vanāt pratyāgamiṣyati।
antarbahiśca putraste kṛtamūlo bhaviṣyati॥

‘जिस समय श्रीराम वन से लौटेंगे, उस समय तक तुम्हारे पुत्र भरत भीतर और बाहर से भी दृढ़मूल हो जायँगे

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ३५ ॥
संगृहीतमनुष्यश्च सुहृद्भिः साकमात्मवान्। प्राप्तकालं नु मन्येऽहं राजानं वीतसाध्वसा॥

saṁgṛhītamanuṣyaśca suhṛdbhiḥ sākamātmavān।
prāptakālaṁ nu manye'haṁ rājānaṁ vītasādhvasā॥

‘उनके पास सैनिक-बल का भी संग्रह हो जायगा; जितेन्द्रिय तो वे हैं ही; अपने सुहृदों के साथ रहकर दृढ़मूल हो जायँगे। इस समय मेरी मान्यता के अनुसार राजा को श्रीराम के राज्याभिषेक के संकल्प से हटा देने का समय आ गया है; अतः तुम निर्भय होकर राजा को अपने वचनों में बाँध लो और उन्हें श्रीराम के अभिषेक के संकल्प से हटा दो’

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ३६ ॥
रामाभिषेकसंकल्पान्निगृह्य विनिवर्तय। अनर्थमर्थरूपेण ग्राहिता सा ततस्तया॥

rāmābhiṣekasaṁkalpānnigṛhya vinivartaya।
anarthamartharūpeṇa grāhitā sā tatastayā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९ · ३७ ॥
हृष्टा प्रतीता कैकेयी मन्थरामिदमब्रवीत्। सा हि वाक्येन कुब्जायाः किशोरीवोत्पथं गता॥

hṛṣṭā pratītā kaikeyī mantharāmidamabravīt।
sā hi vākyena kubjāyāḥ kiśorīvotpathaṁ gatā॥

॥ ३६–३७ ॥

ऐसी बातें कहकर मन्थरा ने कैकेयी की बुद्धि में अनर्थ को ही अर्थरूप में जँचा दिया। कैकेयी को उसकी बात पर विश्वास हो गया और वह मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई। यद्यपि वह बहुत समझदार थी, तो भी कुबरी के कहने से नादान बालिका की तरह कुमार्ग पर चली गयी—अनुचित काम करने को तैयार हो गयी। उसे मन्थरा की बुद्धि पर बड़ा आश्चर्य हुआ और वह उससे इस प्रकार बोली—

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ३८ ॥
कैकेयी विस्मयं प्राप्य परं परमदर्शना। प्रज्ञां ते नावजानामि श्रेष्ठे श्रेष्ठाभिधायिनि॥

kaikeyī vismayaṁ prāpya paraṁ paramadarśanā।
prajñāṁ te nāvajānāmi śreṣṭhe śreṣṭhābhidhāyini॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९ · ३९ ॥
पृथिव्यामसि कुब्जानामुत्तमा बुद्धिनिश्चये। त्वमेव तु ममार्थेषु नित्ययुक्ता हितैषिणी॥

pṛthivyāmasi kubjānāmuttamā buddhiniścaye।
tvameva tu mamārtheṣu nityayuktā hitaiṣiṇī॥

॥ ३८–३९ ॥

‘हितकी बात बताने में कुशल कुब्जे! तू एक श्रेष्ठ स्त्री है; मैं तेरी बुद्धि की अवहेलना नहीं करूँगी। बुद्धि के द्वारा किसी कार्य का निश्चय करने में तू इस पृथ्वी पर सभी कुब्जाओं में उत्तम है। केवल तू ही मेरी हितैषिणी है और सदा सावधान रहकर मेरा कार्य सिद्ध करने में लगी रहती है

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ४० ॥
नाहं समवबुद्ध्येयं कुब्जे राज्ञश्चिकीर्षितम्। सन्ति दुःसंस्थिताः कुब्जाः वक्राः परमपापिकाः॥

nāhaṁ samavabuddhyeyaṁ kubje rājñaścikīrṣitam।
santi duḥsaṁsthitāḥ kubjāḥ vakrāḥ paramapāpikāḥ॥

‘कुब्जे! यदि तू न होती तो राजा जो षड्यन्त्र रचना चाहते हैं, वह कदापि मेरी समझ में नहीं आता। तेरे सिवा जितनी कुब्जाएँ हैं, वे बेडौल शरीरवाली, टेढ़ी-मेढ़ी और बड़ी पापिनी होती हैं

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ४१ ॥
त्वं पद्मिनीव वातेन संनता प्रियदर्शना। उरस्तेऽभिनिविष्टं वै यावत् स्कन्धात् समुन्नतम्॥

tvaṁ padminīva vātena saṁnatā priyadarśanā।
uraste'bhiniviṣṭaṁ vai yāvat skandhāt samunnatam॥

‘तू तो वायु के द्वारा झुकायी हुई कमलिनी की भाँति कुछ झुकी हुई होनेपर भी देखने में प्रिय (सुन्दर) है। तेरा वक्षःस्थल कुब्जता के दोष से व्याप्त है, अतएव कंधों तक ऊँचा दिखायी देता है

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ४२ ॥
अधस्ताच्चोदरं शान्तं सुनाभिमिव लज्जितम्। प्रतिपूर्णं जघनं सुपीनौ पयोधरौ॥

adhastāccodaraṁ śāntaṁ sunābhimiva lajjitam।
pratipūrṇaṁ ca jaghanaṁ supīnau ca payodharau॥

‘वक्षःस्थल से नीचे सुन्दर नाभि से युक्त जो उदर है, वह मानो वक्षःस्थल की ऊँचाई देखकर लज्जित-सा हो गया है, इसीलिये शान्त—कृश प्रतीत होता है। तेरा जघन विस्तृत है और दोनों स्तन सुन्दर एवं स्थूल हैं

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ४३ ॥
विमलेन्दुसमं वक्त्रमहो राजसि मन्थरे। जघनं तव निर्मृष्टं रशनादामभूषितम्॥

vimalendusamaṁ vaktramaho rājasi manthare।
jaghanaṁ tava nirmṛṣṭaṁ raśanādāmabhūṣitam॥

‘मन्थरे! तेरा मुख निर्मल चन्द्रमा के समान अद्भुत शोभा पा रहा है। करधनी की लड़ियों से विभूषित तेरी कटि का अग्रभाग बहुत ही स्वच्छ—रोमादि से रहित है

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ४४ ॥
जङ्घे भृशमुपन्यस्ते पादौ व्यायतावुभौ। त्वमायताभ्यां सक्थिभ्यां मन्थरे क्षौमवासिनी॥

jaṅghe bhṛśamupanyaste pādau ca vyāyatāvubhau।
tvamāyatābhyāṁ sakthibhyāṁ manthare kṣaumavāsinī॥

‘मन्थरे! तेरी पिण्डलियाँ परस्पर अधिक सटी हुई हैं और दोनों पैर बड़े-बड़े हैं। तू विशाल ऊरुओं (जाँघों) से सुशोभित होती है। शोभने! जब तू रेशमी साड़ी पहनकर मेरे आगे-आगे चलती है, तब तेरी बड़ी शोभा होती है

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ४५ ॥
अग्रतो मम गच्छन्ती राजसेऽतीव शोभने। आसन् याः शम्बरे मायाः सहस्रमसुराधिपे॥

agrato mama gacchantī rājase'tīva śobhane।
āsan yāḥ śambare māyāḥ sahasramasurādhipe॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९ · ४६ ॥
हृदये ते निविष्टास्ता भूयश्चान्याः सहस्रशः। तदेव स्थगु यद् दीर्घं रथघोणमिवायतम्॥

hṛdaye te niviṣṭāstā bhūyaścānyāḥ sahasraśaḥ।
tadeva sthagu yad dīrghaṁ rathaghoṇamivāyatam॥

॥ ४५–४६ ॥

‘असुरराज शम्बर को जिन सहस्रों मायाओं का ज्ञान था, वे सब तेरे हृदय में स्थित हैं; इनके अलावे भी तू हजारों प्रकार की मायाएँ जानती है। इन मायाओं का समुदाय ही तेरा यह बड़ा-सा कुब्जक है, जो रथ के नकुए (अग्रभाग) के समान बड़ा है। इसी में तेरी मति, स्मृति और बुद्धि, क्षत्रविद्या (राजनीति) तथा नाना प्रकार की मायाएँ निवास करती हैं

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ४७ ॥
मतयः क्षत्रविद्याश्च मायाश्चात्र वसन्ति ते। अत्र तेऽहं प्रमोक्ष्यामि मालां कुब्जे हिरण्मयीम्॥

matayaḥ kṣatravidyāśca māyāścātra vasanti te।
atra te'haṁ pramokṣyāmi mālāṁ kubje hiraṇmayīm॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९ · ४८ ॥
अभिषिक्ते भरते राघवे वनं गते। जात्येन सुवर्णेन सुनिष्टप्तेन सुन्दरि॥

abhiṣikte ca bharate rāghave ca vanaṁ gate।
jātyena ca suvarṇena suniṣṭaptena sundari॥

॥ ४७–४८ ॥

‘सुन्दरी कुब्जे! यदि भरत का राज्याभिषेक हुआ और श्रीराम वन को चले गये तो मैं सफलमनोरथ एवं संतुष्ट होकर अच्छी जाति के खूब तपाये हुए सोने की बनी हुई सुन्दर स्वर्णमाला तेरे इस कुब्जक को पहनाऊँगी और इस पर चन्दन का लेप लगवाऊँगी

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ४९ ॥
लब्धार्था प्रतीता लेपयिष्यामि ते स्थगु। मुखे तिलकं चित्रं जातरूपमयं शुभम्॥

labdhārthā ca pratītā ca lepayiṣyāmi te sthagu।
mukhe ca tilakaṁ citraṁ jātarūpamayaṁ śubham॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९ · ५० ॥
कारयिष्यामि ते कुब्जे शुभान्याभरणानि च। परिधाय शुभे वस्त्रे देवतेव चरिष्यसि॥

kārayiṣyāmi te kubje śubhānyābharaṇāni ca।
paridhāya śubhe vastre devateva cariṣyasi॥

॥ ४९–५० ॥

‘कुब्जे! तेरे मुख (ललाट) पर सुन्दर और विचित्र सोने का टीका लगवा दूँगी और तू बहुत-से सुन्दर आभूषण एवं दो उत्तम वस्त्र (लहँगा और दुपट्टा) धारण करके देवाङ्गना के समान विचरण करेगी

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ५१ ॥
चन्द्रमाह्वयमानेन मुखेनाप्रतिमानना। गमिष्यसि गतिं मुख्यां गर्वयन्ती द्विषज्जने॥

candramāhvayamānena mukhenāpratimānanā।
gamiṣyasi gatiṁ mukhyāṁ garvayantī dviṣajjane॥

‘चन्द्रमा से होड़ लगानेवाले अपने मनोहर मुख द्वारा तू ऐसी सुन्दर लगेगी कि तेरे मुख की कहीं समता नहीं रह जायगी तथा शत्रुओं के बीच में अपने सौभाग्य पर गर्व प्रकट करती हुई तू सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लेगी

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ५२ ॥
तवापि कुब्जाः कुब्जायाः सर्वाभरणभूषिताः। पादौ परिचरिष्यन्ति यथैव त्वं सदा मम॥

tavāpi kubjāḥ kubjāyāḥ sarvābharaṇabhūṣitāḥ।
pādau paricariṣyanti yathaiva tvaṁ sadā mama॥

‘जैसे तू सदा मेरे चरणों की सेवा किया करती है, उसी प्रकार समस्त आभूषणों से विभूषित बहुत-सी कुब्जाएँ तुझ कुब्जा के भी चरणों की सदा परिचर्या किया करेंगी’

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ५३ ॥
इति प्रशस्यमाना सा कैकेयीमिदमब्रवीत्। शयानां शयने शुभ्रे वेद्यामग्निशिखामिव॥

iti praśasyamānā sā kaikeyīmidamabravīt।
śayānāṁ śayane śubhre vedyāmagniśikhāmiva॥

जब इस प्रकार कुब्जा की प्रशंसा की गयी, तब उसने वेदी पर प्रज्वलित अग्नि-शिखा के समान शुभ्र शय्या पर शयन करनेवाली कैकेयी से इस प्रकार कहा—

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ५४ ॥
गतोदके सेतुबन्धो कल्याणि विधीयते। उत्तिष्ठ कुरु कल्याणं राजानमनुदर्शय॥

gatodake setubandho na kalyāṇi vidhīyate।
uttiṣṭha kuru kalyāṇaṁ rājānamanudarśaya॥

‘कल्याणि! नदी का पानी निकल जानेपर उसके लिये बाँध नहीं बाँधा जाता, (यदि राम का अभिषेक हो गया तो तुम्हारा वर माँगना व्यर्थ होगा; अतः बातों में समय न बिताओ) जल्दी उठो और अपना कल्याण करो। कोपभवन में जाकर राजा को अपनी अवस्था का परिचय दो’

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ५५ ॥
तथा प्रोत्साहिता देवी गत्वा मन्थरया सह। क्रोधागारं विशालाक्षी सौभाग्यमदगर्विता॥

tathā protsāhitā devī gatvā mantharayā saha।
krodhāgāraṁ viśālākṣī saubhāgyamadagarvitā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९ · ५६ ॥
अनेकशतसाहस्रं मुक्ताहारं वराङ्गना। अवमुच्य वरार्हाणि शुभान्याभरणानि च॥

anekaśatasāhasraṁ muktāhāraṁ varāṅganā।
avamucya varārhāṇi śubhānyābharaṇāni ca॥

॥ ५५–५६ ॥

मन्थरा के इस प्रकार प्रोत्साहन देनेपर सौभाग्य के मद से गर्व करनेवाली विशाललोचना सुन्दरी कैकेयी देवी उसके साथ ही कोपभवन में जाकर लाखों की लागत के मोतियों के हार तथा दूसरे-दूसरे सुन्दर बहुमूल्य आभूषणों को अपने शरीर से उतार-उतारकर फेंकने लगी

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ५७ ॥
तदा हेमोपमा तत्र कुब्जावाक्यवशंगता। संविश्य भूमौ कैकेयी मन्थरामिदमब्रवीत्॥

tadā hemopamā tatra kubjāvākyavaśaṁgatā।
saṁviśya bhūmau kaikeyī mantharāmidamabravīt॥

सोने के समान सुन्दर कान्तिवाली कैकेयी कुब्जा की बातों के वशीभूत हो गयी थी, अतः वह धरती पर लेटकर मन्थरा से इस प्रकार बोली—

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ५८ ॥
इह वा मां मृतां कुब्जे नृपायावेदयिष्यसि। वनं तु राघवे प्राप्ते भरतः प्राप्स्यते क्षितिम्॥

iha vā māṁ mṛtāṁ kubje nṛpāyāvedayiṣyasi।
vanaṁ tu rāghave prāpte bharataḥ prāpsyate kṣitim॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ९ · ५९ ॥
सुवर्णेन मे ह्यर्थो रत्नैर्न भोजनैः। एष मे जीवितस्यान्तो रामो यद्यभिषिच्यते॥

suvarṇena na me hyartho na ratnairna ca bhojanaiḥ।
eṣa me jīvitasyānto rāmo yadyabhiṣicyate॥

॥ ५८–५९ ॥

‘कुब्जे! मुझे न तो सुवर्ण से, न रत्नों से और न भाँति-भाँति के भोजनों से ही कोई प्रयोजन है; यदि श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ तो यह मेरे जीवन का अन्त होगा। अब या तो श्रीराम के वन में चले जानेपर भरत को इस भूतल का राज्य प्राप्त होगा अथवा तू यहाँ महाराज को मेरी मृत्यु का समाचार सुनायेगी

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ६० ॥
ततः पुनस्तां महिषीं महीक्षितो वचोभिरत्यर्थमहापराक्रमैः। उवाच कुब्जा भरतस्य मातरं हितं वचो राममुपेत्य चाहितम्॥

tataḥ punastāṁ mahiṣīṁ mahīkṣito
vacobhiratyarthamahāparākramaiḥ।
uvāca kubjā bharatasya mātaraṁ
hitaṁ vaco rāmamupetya cāhitam॥

तदनन्तर कुब्जा महाराज दशरथ की रानी और भरत की माता कैकेयी से अत्यन्त क्रूर वचनों द्वारा पुनः ऐसी बात कहने लगी, जो लौकिक दृष्टि से भरत के लिये हितकर और श्रीराम के लिये अहितकर थी—

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ६१ ॥
प्रपत्स्यते राज्यमिदं हि राघवो यदि ध्रुवं त्वं ससुता तप्स्यसे। ततो हि कल्याणि यतस्व तत् तथा यथा सुतस्ते भरतोऽभिषेक्ष्यते॥

prapatsyate rājyamidaṁ hi rāghavo
yadi dhruvaṁ tvaṁ sasutā ca tapsyase।
tato hi kalyāṇi yatasva tat tathā
yathā sutaste bharato'bhiṣekṣyate॥

‘कल्याणि! यदि श्रीराम इस राज्य को प्राप्त कर लेंगे तो निश्चय ही अपने पुत्र भरतसहित तुम भारी संताप में पड़ जाओगी; अतः ऐसा प्रयत्न करो, जिससे तुम्हारे पुत्र भरत का राज्याभिषेक हो जाय’

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ६२ ॥
तथातिविद्धा महिषीति कुब्जया समाहता वागिषुभिर्मुहुर्मुहुः। विधाय हस्तौ हृदयेऽतिविस्मिता शशंस कुब्जां कुपिता पुनः पुनः॥

tathātividdhā mahiṣīti kubjayā
samāhatā vāgiṣubhirmuhurmuhuḥ।
vidhāya hastau hṛdaye'tivismitā
śaśaṁsa kubjāṁ kupitā punaḥ punaḥ॥

इस प्रकार कुब्जा ने अपने वचनरूपी बाणों का बारंबार प्रहार करके जब रानी कैकेयी को अत्यन्त घायल कर दिया, तब वह अत्यन्त विस्मित और कुपित हो अपने हृदय पर दोनों हाथ रखकर कुब्जा से बारंबार इस प्रकार कहने लगी—

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ६३ ॥
यमस्य वा मां विषयं गतामितो निशम्य कुब्जे प्रतिवेदयिष्यसि। वनं गते वा सुचिराय राघवे समृद्धकामो भरतो भविष्यति॥

yamasya vā māṁ viṣayaṁ gatāmito
niśamya kubje prativedayiṣyasi।
vanaṁ gate vā sucirāya rāghave
samṛddhakāmo bharato bhaviṣyati॥

‘कुब्जे! अब या तो रामचन्द्र के अधिक काल के लिये वन में चले जानेपर भरत का मनोरथ सफल होगा या तू मुझे यहाँ से यमलोक में चली गयी सुनकर महाराज से यह समाचार निवेदन करेगी

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ६४ ॥
अहं हि नैवास्तरणानि स्रजो चन्दनं नाञ्जनपानभोजनम्। किंचिदिच्छामि चेह जीवनं चेदितो गच्छति राघवो वनम्॥

ahaṁ hi naivāstaraṇāni na srajo
na candanaṁ nāñjanapānabhojanam।
na kiṁcidicchāmi na ceha jīvanaṁ
na cedito gacchati rāghavo vanam॥

‘यदि राम यहाँ से वन को नहीं गये तो मैं न तो भाँति-भाँति के बिछौने, न फूलों के हार, न चन्दन, न अञ्जन, न पान, न भोजन और न दूसरी ही कोई वस्तु लेना चाहूँगी। उस दशा में तो मैं यहाँ इस जीवन को भी नहीं रखना चाहूँगी’

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ६५ ॥
अथैवमुक्त्वा वचनं सुदारुणं निधाय सर्वाभरणानि भामिनी। असंस्कृतामास्तरणेन मेदिनीं तदाधिशिश्ये पतितेव किंनरी॥

athaivamuktvā vacanaṁ sudāruṇaṁ
nidhāya sarvābharaṇāni bhāminī।
asaṁskṛtāmāstaraṇena medinīṁ
tadādhiśiśye patiteva kiṁnarī॥

ऐसे अत्यन्त कठोर वचन कहकर कैकेयी ने सारे आभूषण उतार दिये और बिना बिस्तर के ही वह खाली जमीन पर लेट गयी। उस समय वह स्वर्ग से भूतल पर गिरी हुई किसी किन्नरी के समान जान पड़ती थी

English translation coming soon.

॥ २ · ९ · ६६ ॥
उदीर्णसंरम्भतमोवृतानना तदावमुक्तोत्तममाल्यभूषणा। नरेन्द्रपत्नी विमना बभूव सा तमोवृता द्यौरिव मग्नतारका॥

udīrṇasaṁrambhatamovṛtānanā
tadāvamuktottamamālyabhūṣaṇā।
narendrapatnī vimanā babhūva sā
tamovṛtā dyauriva magnatārakā॥

उसका मुख बढ़े हुए अमर्षरूपी अन्धकार से आच्छादित हो रहा था। उसके अङ्गों से उत्तम पुष्पहार और आभूषण उतर चुके थे। उस दशा में उदास मनवाली राजरानी कैकेयी जिसके तारे डूब गये हों, उस अन्धकाराच्छन्न आकाश के समान प्रतीत होती थी

English translation coming soon.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में नवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ९ ॥