वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः १० · ४० श्लोकाःSarga 10 · 40 ślokas

राजा दशरथका कैकेयीके भवनमें जाना, उसे कोपभवनमें स्थित देखकर दुःखी होना और उसको अनेक प्रकारसे सान्त्वना देना

दशरथ-सान्त्वना

“दशरथ-सान्त्वना”
॥ २ · १० · १०–२८ ॥

छायामये क्रोधागारे हर्षवार्तां वक्तुमिच्छन् प्रविष्टो वृद्धो दशरथः, अनास्तीर्णभूमौ पतितां शोकेन पराङ्मुखीं प्रियां कैकेयीं दृष्ट्वा सस्नेहं जानुभ्यां तस्याः पार्श्वे निषीदति उभाभ्यां पाणिभ्यां तां मृदु स्पृशति; तस्य वृद्धं वदनं स्नेहेन व्याकुलप्रेम्णा च पूर्णम्।

हर्षका समाचार सुनानेकी इच्छासे छायामय कोपभवनमें प्रविष्ट हुए वृद्ध महाराज दशरथ, बिना बिछौनेकी भूमिपर पड़ी, मुख फेरे शोकमग्न अपनी प्यारी रानी कैकेयीको देखकर स्नेहसे घुटनोंके बल उनके पास बैठ जाते हैं और दोनों हाथोंसे उन्हें कोमलतासे सहला रहे हैं; उनका वृद्ध मुख प्रेम तथा व्याकुल विस्मयसे भरा है; पास ही बिखरे आभूषण और एक दीपक।

Having entered the shadowed anger-chamber hoping to share joyful news, the aged King Dasharath, seeing his beloved young queen Kaikeyi cast down on the bare floor with her face turned away in grief, kneels tenderly beside her and caresses her with both hands, his noble old face brimming with love and anxious bewilderment, her cast-off ornaments scattered nearby.

॥ २ · १० · १ ॥
विदर्शिता यदा देवी कुब्जया पापया भृशम्। तदा शेते स्म सा भूमौ दिग्धविद्धेव किंनरी॥

vidarśitā yadā devī kubjayā pāpayā bhṛśam।
tadā śete sma sā bhūmau digdhaviddheva kiṁnarī॥

पापिनी कुब्जा ने जब देवी कैकेयी को बहुत उलटी बातें समझा दीं, तब वह विषाक्त बाण से विद्ध हुई किंनरी के समान धरती पर लोटने लगी

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॥ २ · १० · २ ॥
निश्चित्य मनसा कृत्यं सा सम्यगिति भामिनी। मन्थरायै शनैः सर्वमाचचक्षे विचक्षणा॥

niścitya manasā kṛtyaṁ sā samyagiti bhāminī।
mantharāyai śanaiḥ sarvamācacakṣe vicakṣaṇā॥

मन्थरा के बताये हुए समस्त कार्य को यह बहुत उत्तम है—ऐसा मन-ही-मन निश्चय करके बातचीतमें कुशल भामिनी कैकेयी ने मन्थरा से धीरे-धीरे अपना सारा मन्तव्य बता दिया

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॥ २ · १० · ३ ॥
सा दीना निश्चयं कृत्वा मन्थरावाक्यमोहिता। नागकन्येव निःश्वस्य दीर्घमुष्णं भामिनी॥

sā dīnā niścayaṁ kṛtvā mantharāvākyamohitā।
nāgakanyeva niḥśvasya dīrghamuṣṇaṁ ca bhāminī॥

मन्थरा के वचनों से मोहित एवं दीन हुई भामिनी कैकेयी पूर्वोक्त निश्चय करके नागकन्या की भाँति गरम और लंबी साँस खींचने लगी और दो घड़ी तक अपने लिये सुखदायक मार्ग का विचार करती रही

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॥ २ · १० · ४ ॥
मुहूर्तं चिन्तयामास मार्गमात्मसुखावहम्। सा सुहृच्चार्थकामा तं निशम्य विनिश्चयम्॥

muhūrtaṁ cintayāmāsa mārgamātmasukhāvaham।
sā suhṛccārthakāmā ca taṁ niśamya viniścayam॥

और वह मन्थरा जो कैकेयी का हित चाहनेवाली सुहृद् थी और उसीके मनोरथ को सिद्ध करने की अभिलाषा रखती थी, कैकेयी के उस निश्चय को सुनकर बहुत प्रसन्न हुई; मानो उसे कोई बहुत बड़ी सिद्धि मिल गयी हो

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॥ २ · १० · ५ ॥
बभूव परमप्रीता सिद्धिं प्राप्येव मन्थरा। अथ सा रुषिता देवी सम्यक् कृत्वा विनिश्चयम्॥

babhūva paramaprītā siddhiṁ prāpyeva mantharā।
atha sā ruṣitā devī samyak kṛtvā viniścayam॥

तदनन्तर रोष में भरी हुई देवी कैकेयी अपने कर्तव्य का भलीभाँति निश्चय कर मुखमण्डल में स्थित भौंहों को टेढ़ी करके धरती पर सो गयी। और क्या करती अबला ही तो थी

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॥ २ · १० · ६ ॥
संविवेशाबला भूमौ निवेश्य भ्रुकुटिं मुखे। ततश्चित्राणि माल्यानि दिव्यान्याभरणानि च॥

saṁviveśābalā bhūmau niveśya bhrukuṭiṁ mukhe।
tataścitrāṇi mālyāni divyānyābharaṇāni ca॥

तदनन्तर उस केकयराजकुमारी ने अपने विचित्र पुष्पहारों और दिव्य आभूषणों को उतारकर फेंक दिया। वे सारे आभूषण धरती पर यत्र-तत्र पड़े थे

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॥ २ · १० · ७ ॥
अपविद्धानि कैकेय्या तानि भूमिं प्रपेदिरे। तया तान्यपविद्धानि माल्यान्याभरणानि च॥

apaviddhāni kaikeyyā tāni bhūmiṁ prapedire।
tayā tānyapaviddhāni mālyānyābharaṇāni ca॥

जैसे छिटके हुए तारे आकाश की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार फेंके हुए वे पुष्पहार और आभूषण वहाँ भूमि की शोभा बढ़ा रहे थे

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॥ २ · १० · ८ ॥
अशोभयन्त वसुधां नक्षत्राणि यथा नभः। क्रोधागारे पतिता सा बभौ मलिनाम्बरा॥

aśobhayanta vasudhāṁ nakṣatrāṇi yathā nabhaḥ।
krodhāgāre ca patitā sā babhau malināmbarā॥

मलिन वस्त्र पहनकर और सारे केशों को दृढ़तापूर्वक एक ही वेणी में बाँधकर कोपभवन में पड़ी हुई कैकेयी बलहीन अथवा अचेत हुई किंनरी के समान जान पड़ती थी

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॥ २ · १० · ९ ॥
एकवेणीं दृढां बद्ध्वा गतसत्त्वेव किंनरी। आज्ञाप्य तु महाराजो राघवस्याभिषेचनम्॥

ekaveṇīṁ dṛḍhāṁ baddhvā gatasattveva kiṁnarī।
ājñāpya tu mahārājo rāghavasyābhiṣecanam॥

उधर महाराज दशरथ मन्त्री आदि को श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी के लिये आज्ञा दे सबको यथासमय उपस्थित होनेके लिये कहकर रनिवास में गये

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॥ २ · १० · १० ॥
उपस्थानमनुज्ञाप्य प्रविवेश निवेशनम्। अद्य रामाभिषेको वै प्रसिद्ध इति जज्ञिवान्॥

upasthānamanujñāpya praviveśa niveśanam।
adya rāmābhiṣeko vai prasiddha iti jajñivān॥

उन्होंने सोचा—आज ही श्रीराम के अभिषेक की बात प्रसिद्ध की गयी है, इसलिये यह समाचार अभी किसी रानी को नहीं मालूम हुआ होगा; ऐसा विचारकर जितेन्द्रिय राजा दशरथ ने अपनी प्यारी रानी को यह प्रिय संवाद सुनाने के लिये अन्तःपुर में प्रवेश किया

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॥ २ · १० · ११ ॥
प्रियार्हां प्रियमाख्यातुं विवेशान्तःपुरं वशी। कैकेय्या गृहं श्रेष्ठं प्रविवेश महायशाः॥

priyārhāṁ priyamākhyātuṁ viveśāntaḥpuraṁ vaśī।
sa kaikeyyā gṛhaṁ śreṣṭhaṁ praviveśa mahāyaśāḥ॥

उन महायशस्वी नरेश ने पहले कैकेयी के श्रेष्ठ भवन में प्रवेश किया, मानो श्वेत बादलों से युक्त राहुयुक्त आकाश में चन्द्रमा ने पदार्पण किया हो

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॥ २ · १० · १२ ॥
पाण्डुराभ्रमिवाकाशं राहुयुक्तं निशाकरः। शुकबर्हिंसमायुक्तं क्रौञ्चहंसरुतायुतम्॥

pāṇḍurābhramivākāśaṁ rāhuyuktaṁ niśākaraḥ।
śukabarhiṁsamāyuktaṁ krauñcahaṁsarutāyutam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १० · १३ ॥
वादित्ररवसंघुष्टं कुब्जावामनिकायुतम्। लतागृहैश्चित्रगृहैश्चम्पकाशोकशोभितैः॥

vāditraravasaṁghuṣṭaṁ kubjāvāmanikāyutam।
latāgṛhaiścitragṛhaiścampakāśokaśobhitaiḥ॥

॥ १२–१३ ॥

उस भवन में तोते, मोर, क्रौञ्च और हंस आदि पक्षी कलरव कर रहे थे, वहाँ वाद्यों का मधुर घोष गूँज रहा था, बहुत-सी कुब्जा और बौनी दासियाँ भरी हुई थीं, चम्पा और अशोक से सुशोभित बहुत-से लताभवन और चित्रमन्दिर उस महल की शोभा बढ़ा रहे थे

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॥ २ · १० · १४ ॥
दान्तराजतसौवर्णवेदिकाभिः समायुतम्। नित्यपुष्पफलैर्वृक्षैर्वापीभिरुपशोभितम्॥

dāntarājatasauvarṇavedikābhiḥ samāyutam।
nityapuṣpaphalairvṛkṣairvāpībhirupaśobhitam॥

हाथीदाँत, चाँदी और सोने की बनी हुई वेदियों से संयुक्त उस भवन में नित्य फूलने-फलनेवाले वृक्ष और बहुत-सी बावड़ियाँ सुशोभित कर रही थीं

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॥ २ · १० · १५ ॥
दान्तराजतसौवर्णैः संवृतं परमासनैः। विविधैरन्नपानैश्च भक्ष्यैश्च विविधैरपि॥

dāntarājatasauvarṇaiḥ saṁvṛtaṁ paramāsanaiḥ।
vividhairannapānaiśca bhakṣyaiśca vividhairapi॥

उसमें हाथीदाँत, चाँदी और सोने के बने हुए उत्तम सिंहासन रखे गये थे। नाना प्रकार के अन्न, पान और भाँति-भाँति के भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से वह भवन भरा-पूरा था। बहुमूल्य आभूषणों से सम्पन्न कैकेयी का वह भवन स्वर्ग के समान शोभा पा रहा था

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॥ २ · १० · १६ ॥
उपपन्नं महार्हैश्च भूषणैस्त्रिदिवोपमम्। प्रविश्य महाराजः स्वमन्तःपुरमृद्धिमत्॥

upapannaṁ mahārhaiśca bhūṣaṇaistridivopamam।
sa praviśya mahārājaḥ svamantaḥpuramṛddhimat॥

अपने उस समृद्धिशाली अन्तःपुर में प्रवेश करके महाराज राजा दशरथ ने वहाँ की उत्तम शय्या पर रानी कैकेयी को नहीं देखा

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॥ २ · १० · १७ ॥
ददर्श स्त्रियं राजा कैकेयीं शयनोत्तमे। कामबलसंयुक्तो रत्यर्थं मनुजाधिपः॥

na dadarśa striyaṁ rājā kaikeyīṁ śayanottame।
sa kāmabalasaṁyukto ratyarthaṁ manujādhipaḥ॥

कामबल से संयुक्त वे नरेश रानी की प्रसन्नता बढ़ाने के अभिलाषा से भीतर गये थे। वहाँ अपनी प्यारी पत्नी को न देखकर उनके मन में बड़ा विषाद हुआ और वे उनके विषय में पूछ-ताछ करने लगे

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॥ २ · १० · १८ ॥
अपश्यन् दयितां भार्यां पप्रच्छ विषसाद च। हि तस्य पुरा देवी तां वेलामत्यवर्तत॥

apaśyan dayitāṁ bhāryāṁ papraccha viṣasāda ca।
na hi tasya purā devī tāṁ velāmatyavartata॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १० · १९ ॥
राजा गृहं शून्यं प्रविवेश कदाचन। ततो गृहगतो राजा कैकेयीं पर्यपृच्छत॥

na ca rājā gṛhaṁ śūnyaṁ praviveśa kadācana।
tato gṛhagato rājā kaikeyīṁ paryapṛcchata॥

॥ १८–१९ ॥

इससे पहले रानी कैकेयी राजा के आगमन की उस बेला में कहीं अन्यत्र नहीं जाती थीं, राजा ने कभी सूने भवन में प्रवेश नहीं किया था, इसलिये वे घर में आकर कैकेयी के बारे में पूछने लगे। उन्हें यह मालूम नहीं था कि वह मूर्खा कोई स्वार्थ सिद्ध करना चाहती है, अतः उन्होंने पहले की ही भाँति प्रतिहारी से उसके विषय में पूछा

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॥ २ · १० · २० ॥
यथापुरमविज्ञाय स्वार्थलिप्सुमपण्डिताम्। प्रतिहारी त्वथोवाच संत्रस्ता तु कृताञ्जलिः॥

yathāpuramavijñāya svārthalipsumapaṇḍitām।
pratihārī tvathovāca saṁtrastā tu kṛtāñjaliḥ॥

प्रतिहारी बहुत डरी हुई थी। उसने हाथ जोड़कर कहा—‘देव! देवी कैकेयी अत्यन्त कुपित हो कोपभवन की ओर दौड़ी गयी हैं’

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॥ २ · १० · २१ ॥
देव देवी भृशं क्रुद्धा क्रोधागारमभिद्रुता। प्रतीहार्या वचः श्रुत्वा राजा परमदुर्मनाः॥

deva devī bhṛśaṁ kruddhā krodhāgāramabhidrutā।
pratīhāryā vacaḥ śrutvā rājā paramadurmanāḥ॥

प्रतिहारी की यह बात सुनकर राजा का मन बहुत उदास हो गया, उनकी इन्द्रियाँ चञ्चल एवं व्याकुल हो उठीं और वे पुनः अधिक विषाद करने लगे

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॥ २ · १० · २२ ॥
विषसाद पुनर्भूयो लुलितव्याकुलेन्द्रियः। तत्र तां पतितां भूमौ शयानामतथोचिताम्॥

viṣasāda punarbhūyo lulitavyākulendriyaḥ।
tatra tāṁ patitāṁ bhūmau śayānāmatathocitām॥

कोपभवन में वह भूमि पर पड़ी थी और इस तरह लेटी हुई थी, जो उसके लिये योग्य नहीं था। राजा ने दुःख के कारण संतस्त-से होकर उसे इस अवस्था में देखा

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॥ २ · १० · २३ ॥
प्रतप्त इव दुःखेन सोऽपश्यज्जगतीपतिः। वृद्धस्तरुणीं भार्यां प्राणेभ्योऽपि गरीयसीम्॥

pratapta iva duḥkhena so'paśyajjagatīpatiḥ।
sa vṛddhastaruṇīṁ bhāryāṁ prāṇebhyo'pi garīyasīm॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १० · २४ ॥
अपापः पापसंकल्पां ददर्श धरणीतले। लतामिव विनिष्कृत्तां पतितां देवतामिव॥

apāpaḥ pāpasaṁkalpāṁ dadarśa dharaṇītale।
latāmiva viniṣkṛttāṁ patitāṁ devatāmiva॥

॥ २३–२४ ॥

राजा बूढ़े थे और उनकी वह पत्नी तरुणी थी, अतः वे उसे अपने प्राणों से भी बढ़कर मानते थे। राजा के मन में कोई पाप नहीं था; परंतु कैकेयी अपने मन में पापपूर्ण संकल्प लिये हुए थी। उन्होंने उसे कटी हुई लता की भाँति पृथ्वी पर पड़ी देखा—मानो कोई देवाङ्गना स्वर्ग से भूतल में गिर पड़ी हो

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॥ २ · १० · २५ ॥
किंनरीमिव निर्धूतां च्युतामप्सरसं यथा। मायामिव परिभ्रष्टां हरिणीमिव संयताम्॥

kiṁnarīmiva nirdhūtāṁ cyutāmapsarasaṁ yathā।
māyāmiva paribhraṣṭāṁ hariṇīmiva saṁyatām॥

वह स्वर्गभ्रष्ट किंनरी, देवलोक से च्युत हुई अप्सरा, लक्ष्यभ्रष्ट माया और जाल में बँधी हुई हरिणी के समान जान पड़ती थी

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॥ २ · १० · २६ ॥
करेणुमिव दिग्धेन विद्धां मृगयुना वने। महागज इवारण्ये स्नेहात् परमदुःखिताम्॥

kareṇumiva digdhena viddhāṁ mṛgayunā vane।
mahāgaja ivāraṇye snehāt paramaduḥkhitām॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १० · २७ ॥
परिमृज्य पाणिभ्यामभिसंत्रस्तचेतनः। कामी कमलपत्राक्षीमुवाच वनितामिदम्॥

parimṛjya ca pāṇibhyāmabhisaṁtrastacetanaḥ।
kāmī kamalapatrākṣīmuvāca vanitāmidam॥

॥ २६–२७ ॥

जैसे कोई महान् गजराज वन में व्याध के द्वारा विषलिप्त बाण से विद्ध होकर गिरी हुई अत्यन्त दुःखित हथिनी को स्नेहवश स्पर्श करता है, उसी प्रकार कामी राजा दशरथ ने महान् दुःख में पड़ी हुई कमलनयनी भार्या कैकेयी का स्नेहपूर्वक दोनों हाथों से स्पर्श किया। उस समय उनके मन में सब ओर से यह भय समा गया था कि न जाने यह क्या कहेगी और क्या करेगी? वे उसके अङ्गों पर हाथ फेरते हुए उससे इस प्रकार बोले—

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॥ २ · १० · २८ ॥
तेऽहमभिजानामि क्रोधमात्मनि संश्रितम्। देवि केनाभियुक्तासि केन वासि विमानिता॥

na te'hamabhijānāmi krodhamātmani saṁśritam।
devi kenābhiyuktāsi kena vāsi vimānitā॥

‘देवि! तुम्हारा क्रोध मुझ पर है, ऐसा तो मुझे विश्वास नहीं होता। फिर किसने तुम्हारा तिरस्कार किया है? किसके द्वारा तुम्हारी निन्दा की गयी है?

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॥ २ · १० · २९ ॥
यदिदं मम दुःखाय शेषे कल्याणि पांसुषु। भूमौ शेषे किमर्थं त्वं मयि कल्याणचेतसि॥

yadidaṁ mama duḥkhāya śeṣe kalyāṇi pāṁsuṣu।
bhūmau śeṣe kimarthaṁ tvaṁ mayi kalyāṇacetasi॥

‘कल्याणि! तुम जो इस तरह मुझे दुःख देने के लिये धूल में लोट रही हो, इसका क्या कारण है? मेरे चित्त को मथ डालनेवाली सुन्दरी! मेरे मन में तो सदा तुम्हारे कल्याण की ही भावना रहती है। फिर मेरे रहते हुए तुम किस लिये धरती पर सो रही हो? जान पड़ता है तुम्हारे चित्त पर किसी पिशाच ने अधिकार कर लिया है

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॥ २ · १० · ३० ॥
भूतोपहतचित्तेव मम चित्तप्रमाथिनि। सन्ति मे कुशला वैद्यास्त्वभितुष्टाश्च सर्वशः॥

bhūtopahatacitteva mama cittapramāthini।
santi me kuśalā vaidyāstvabhituṣṭāśca sarvaśaḥ॥

‘भामिनि! तुम अपना रोग बताओ। मेरे यहाँ बहुत-से चिकित्साकुशल वैद्य हैं, जिन्हें मैंने सब प्रकार से संतुष्ट कर रखा है, वे तुम्हें सुखी कर देंगे

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॥ २ · १० · ३१ ॥
सुखितां त्वां करिष्यन्ति व्याधिमाचक्ष्व भामिनि। कस्य वापि प्रियं कार्यं केन वा विप्रियं कृतम्॥

sukhitāṁ tvāṁ kariṣyanti vyādhimācakṣva bhāmini।
kasya vāpi priyaṁ kāryaṁ kena vā vipriyaṁ kṛtam॥

‘अथवा कहो, आज किसका प्रिय करना है? या किसने तुम्हारा अप्रिय किया है? तुम्हारे किस उपकारी को आज प्रिय मनोरथ प्राप्त हो अथवा किस अपकारी को अत्यन्त अप्रिय—कठोर दण्ड दिया जाय?

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॥ २ · १० · ३२ ॥
कः प्रियं लभतामद्य को वा सुमहदप्रियम्। मा रौत्सीर्मा कार्षीस्त्वं देवि सम्परिशोषणम्॥

kaḥ priyaṁ labhatāmadya ko vā sumahadapriyam।
mā rautsīrmā ca kārṣīstvaṁ devi sampariśoṣaṇam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १० · ३३ ॥
अवध्यो वध्यतां को वा वध्यः को वा विमुच्यताम्। दरिद्रः को भवेदाढ्यो द्रव्यवान् वाप्यकिंचनः॥

avadhyo vadhyatāṁ ko vā vadhyaḥ ko vā vimucyatām।
daridraḥ ko bhavedāḍhyo dravyavān vāpyakiṁcanaḥ॥

॥ ३२–३३ ॥

‘देवि! तुम न रोओ, अपनी देह को न सुखाओ, आज तुम्हारी इच्छा के अनुसार किस अवध्य का वध किया जाय? अथवा किस प्राणदण्ड पानेयोग्य अपराधी को भी मुक्त कर दिया जाय? किस दरिद्र को धनवान् और किस धनवान् को कंगाल बना दिया जाय?

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॥ २ · १० · ३४ ॥
अहं हि मदीयाश्च सर्वे तव वशानुगाः। ते कंचिदभिप्रायं व्याहन्तुमहमुत्सहे॥

ahaṁ ca hi madīyāśca sarve tava vaśānugāḥ।
na te kaṁcidabhiprāyaṁ vyāhantumahamutsahe॥

‘मैं और मेरे सभी सेवक तुम्हारी आज्ञा के अधीन हैं। तुम्हारे किसी भी मनोरथ को मैं भंग नहीं कर सकता—उसे पूरा करके ही रहूँगा, चाहे उसके लिये मुझे अपने प्राण ही क्यों न देने पड़ें; अतः तुम्हारे मन में जो कुछ हो, उसे स्पष्ट कहो

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॥ २ · १० · ३५ ॥
आत्मनो जीवितेनापि ब्रूहि यन्मनसि स्थितम्। बलमात्मनि जानन्ती मां शङ्कितुमर्हसि॥

ātmano jīvitenāpi brūhi yanmanasi sthitam।
balamātmani jānantī na māṁ śaṅkitumarhasi॥

‘अपने बल को जानते हुए भी तुम्हें मुझ पर संदेह नहीं करना चाहिये। मैं अपने सत्कर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ जिससे तुम्हें प्रसन्नता हो, वही करूँगा

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॥ २ · १० · ३६ ॥
करिष्यामि तव प्रीतिं सुकृतेनापि ते शपे। यावदावर्तते चक्रं तावती मे वसुंधरा॥

kariṣyāmi tava prītiṁ sukṛtenāpi te śape।
yāvadāvartate cakraṁ tāvatī me vasuṁdharā॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १० · ३७ ॥
द्राविडाः सिन्धुसौवीराः सौराष्ट्रा दक्षिणापथाः। वङ्गाङ्गमगधा मत्स्याः समृद्धाः काशिकोसलाः॥

drāviḍāḥ sindhusauvīrāḥ saurāṣṭrā dakṣiṇāpathāḥ।
vaṅgāṅgamagadhā matsyāḥ samṛddhāḥ kāśikosalāḥ॥

॥ ३६–३७ ॥

‘जहाँ तक सूर्य का चक्र घूमता है, वहाँ तक सारी पृथ्वी मेरे अधिकार में है। द्रविड़, सिन्धु-सौवीर, सौराष्ट्र, दक्षिण भारत के सारे प्रदेश तथा अङ्ग, वङ्ग, मगध, मत्स्य, काशी और कोसल—इन सभी समृद्धिशाली देशों पर मेरा आधिपत्य है

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॥ २ · १० · ३८ ॥
तत्र जातं बहु द्रव्यं धनधान्यमजाविकम्। ततो वृणीष्व कैकेयि यद्यत् त्वं मनसेच्छसि॥

tatra jātaṁ bahu dravyaṁ dhanadhānyamajāvikam।
tato vṛṇīṣva kaikeyi yadyat tvaṁ manasecchasi॥

‘केकयराजनन्दिनि! उनमें पैदा होनेवाले भाँति-भाँति के द्रव्य, धन-धान्य और बकरी-भेड़ आदि जो भी तुम मन से लेना चाहती हो, वह मुझ से माँग लो

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॥ २ · १० · ३९ ॥
किमायासेन ते भीरु उत्तिष्ठोत्तिष्ठ शोभने। तत्त्वं मे ब्रूहि कैकेयि यतस्ते भयमागतम्। तत् ते व्यपनयिष्यामि नीहारमिव रश्मिवान्॥

kimāyāsena te bhīru uttiṣṭhottiṣṭha śobhane।
tattvaṁ me brūhi kaikeyi yataste bhayamāgatam।
tat te vyapanayiṣyāmi nīhāramiva raśmivān॥

‘भीरु! इतना क्लेश उठाने-प्रयास करने की क्या आवश्यकता है? शोभने! उठो, उठो। कैकेयि! ठीक-ठीक बताओ, तुम्हें किससे कौन-सा भय प्राप्त हुआ है? जैसे अंशुमाली सूर्य कुहरा दूर कर देते हैं, उसी प्रकार मैं तुम्हारे भय का सर्वथा निवारण कर दूँगा’

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॥ २ · १० · ४० ॥
तथोक्ता सा समाश्वस्ता वक्तुकामा तदप्रियम्। परिपीडयितुं भूयो भर्तारमुपचक्रमे॥

tathoktā sā samāśvastā vaktukāmā tadapriyam।
paripīḍayituṁ bhūyo bhartāramupacakrame॥

राजा के ऐसा कहने पर कैकेयी को कुछ सान्त्वना मिली। अब उसे अपने स्वामी से वह अप्रिय बात कहने की इच्छा हुई। उसने पति को और अधिक पीड़ा देने की तैयारी की

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में दसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १० ॥