वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः ११ · २९ श्लोकाःSarga 11 · 29 ślokas

कैकेयीका राजाको प्रतिज्ञाबद्ध करके उन्हें पहलेके दिये हुए दो वरोंका स्मरण दिलाकर भरतके लिये अभिषेक और रामके लिये चौदह वर्षोंका वनवास माँगना

दो वरोंकी माँग

“दो वरोंकी माँग”
॥ २ · ११ · १८–२७ ॥

अन्धकारक्रोधागारे भूमेरुत्थिता निश्चयभीषणा कैकेयी स्वमागं वदति—भरताभिषेकं रामस्य चतुर्दशवर्षवनवासं च—त्रयस्त्रिंशद्देवान् साक्षिणः इव एकं करमुद्धृत्य; पुरतो वृद्धो दशरथः हृदये करं निधाय भयविह्वलः, व्याधजाले प्रस्खलितो मृग इव, पश्चात्पदम्।

अन्धकारपूर्ण कोपभवनमें भूमिसे उठी, निश्चयसे भयंकर बनी रानी कैकेयी मानो तेंतीस देवताओंको साक्षी बनाते हुए एक हाथ ऊपर उठाकर अपनी माँग सुना रही है—भरतके लिये राज्याभिषेक और श्रीरामके लिये चौदह वर्षका वनवास; सामने वृद्ध महाराज दशरथ हृदयपर हाथ रखे, व्याधके जालमें कूद पड़े हरिणके समान, भयसे विह्वल पीछे हटते-से दिखायी देते हैं; लम्बी छायाएँ डालता एक दीपक।

Risen from the floor of the dark anger-chamber and terrible in her resolve, Queen Kaikeyi pronounces her demand — Bharat's coronation and Ram's fourteen-year exile — one hand lifted as if calling the thirty-three gods to witness; before her the aged King Dasharath recoils in dawning horror, a hand pressed to his heart, stricken like a deer that has leapt into the hunter's snare, a single lamp throwing long shadows.

॥ २ · ११ · १ ॥
तं मन्मथशरैर्विद्धं कामवेगवशानुगम् उवाच पृथिवीपालं कैकेयी दारुणं वचः

taṁ manmathaśarairviddhaṁ kāmavegavaśānugam ।
uvāca pṛthivīpālaṁ kaikeyī dāruṇaṁ vacaḥ ॥

भूपाल दशरथ कामदेव के बाणों से पीड़ित तथा कामवेग के वशीभूत हो उसीका अनुसरण कर रहे थे। उनसे कैकेयी ने यह कठोर वचन कहा—

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॥ २ · ११ · २ ॥
नास्मि विप्रकृता देव केनचिन्नावमानिता अभिप्रायस्तु मे कश्चित्तमिच्छामि त्वया कृतम्

nāsmi viprakṛtā deva kenacinnāvamānitā ।
abhiprāyastu me kaścittamicchāmi tvayā kṛtam ॥

‘देव! न तो किसीने मेरा अपकार किया है और न किसीके द्वारा मैं अपमानित या निन्दित की हुई हूँ। मेरा कोई एक अभिप्राय (मनोरथ) है और मैं आपके द्वारा उसकी पूर्ति चाहती हूँ

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॥ २ · ११ · ३ ॥
प्रतिज्ञां प्रतिजानीष्व यदि त्वं कर्तुमिच्छसि अथ ते व्याहरिष्यामि यथाभिप्रार्थितं मया

pratijñāṁ pratijānīṣva yadi tvaṁ kartumicchasi ।
atha te vyāhariṣyāmi yathābhiprārthitaṁ mayā ॥

‘यदि आप उसे पूर्ण करना चाहते हों तो प्रतिज्ञा कीजिये। इसके बाद मैं अपना वास्तविक अभिप्राय आपसे कहूँगी’

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॥ २ · ११ · ४ ॥
तामुवाच महाराजः कैकेयीमीषदुत्स्मयः कामी हस्तेन संगृह्य मूर्ध्नजेषु भुवि स्थिताम्

tāmuvāca mahārājaḥ kaikeyīmīṣadutsmayaḥ ।
kāmī hastena saṁgṛhya mūrdhnajeṣu bhuvi sthitām ॥

महाराज दशरथ काम के अधीन हो रहे थे। वे कैकेयी की बात सुनकर किंचित् मुस्कराये और पृथ्वीपर पड़ी हुई उस देवी के केशों को हाथ से पकड़कर—उसके सिर को अपनी गोदमें रखकर उससे इस प्रकार बोले—

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॥ २ · ११ · ५ ॥
अवलिप्ते जानासि त्वत्तः प्रियतरो मम मनुजो मनुजव्याघ्राद् रामादन्यो विद्यते

avalipte na jānāsi tvattaḥ priyataro mama ।
manujo manujavyāghrād rāmādanyo na vidyate ॥

‘अपने सौभाग्यपर गर्व करनेवाली कैकेयि! क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि नरश्रेष्ठ श्रीराम के अतिरिक्त दूसरा कोई ऐसा मनुष्य नहीं है, जो मुझे तुमसे अधिक प्रिय हो

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॥ २ · ११ · ६ ॥
तेनाजय्येन मुख्येन राघवेण महात्मना शपे ते जीवनार्हेण ब्रूहि यन्मनसेप्सितम्

tenājayyena mukhyena rāghaveṇa mahātmanā ।
śape te jīvanārheṇa brūhi yanmanasepsitam ॥

‘जो प्राणों के द्वारा भी आराधनीय हैं और जिन्हें जीतना किसीके लिये भी असम्भव है, उन प्रमुख वीर महात्मा श्रीराम की शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारी कामना पूर्ण होगी; अतः तुम्हारे मन की जो इच्छा हो उसे बताओ

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॥ २ · ११ · ७ ॥
यं मुहूर्तमपश्यंस्तु जीवेयमहं ध्रुवम् तेन रामेण कैकेयि शपे ते वचनक्रियाम्

yaṁ muhūrtamapaśyaṁstu na jīveyamahaṁ dhruvam ।
tena rāmeṇa kaikeyi śape te vacanakriyām ॥

‘कैकेयि! जिन्हें दो घड़ी भी न देखनेपर निश्चय ही मैं जीवित नहीं रह सकता, उन श्रीराम की शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम जो कहोगी, उसे पूर्ण करूँगा

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॥ २ · ११ · ८ ॥
आत्मना चात्मजैश्चान्यैर्वृणे यं मनुजर्षभम् तेन रामेण कैकेयि शपे ते वचनक्रियाम्

ātmanā cātmajaiścānyairvṛṇe yaṁ manujarṣabham ।
tena rāmeṇa kaikeyi śape te vacanakriyām ॥

‘कैकेयनन्दिनि! अपने तथा अपने दूसरे पुत्रों को निछावर करके भी मैं जिन नरश्रेष्ठ श्रीराम का वरण करनेको उद्यत हूँ, उन्हींकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारी कही हुई बात पूरी करूँगा

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॥ २ · ११ · ९ ॥
भद्रे हृदयमप्येतदनुमृश्योद्धरस्व मे एतत् समीक्ष्य कैकेयि ब्रूहि यत् साधु मन्यसे

bhadre hṛdayamapyetadanumṛśyoddharasva me ।
etat samīkṣya kaikeyi brūhi yat sādhu manyase ॥

‘भद्रे! केकयराजकुमारी! मेरा यह हृदय भी तुम्हारे वचनों की पूर्तिके लिये तत्पर है। ऐसा सोचकर तुम अपनी इच्छा व्यक्त करके इस दुःख से मेरा उद्धार करो। श्रीराम सबको अधिक प्रिय हैं—इस बातपर दृष्टिपात करके तुम्हें जो अच्छा जान पड़े, वह कहो

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॥ २ · ११ · १० ॥
बलमात्मनि पश्यन्ती विशङ्कितुमर्हसि करिष्यामि तव प्रीतिं सुकृतेनापि ते शपे

balamātmani paśyantī na viśaṅkitumarhasi ।
kariṣyāmi tava prītiṁ sukṛtenāpi te śape ॥

‘अपने बल को देखते हुए भी तुम्हें मुझपर शङ्का नहीं करनी चाहिये। मैं अपने सत्कर्मों की शपथ खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य सिद्ध करूँगा’

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॥ २ · ११ · ११ ॥
सा तदर्थमना देवी तमभिप्रायमागतम् निर्माध्यस्थ्याच्च हर्षाच्च बभाषे दुर्वचं वचः

sā tadarthamanā devī tamabhiprāyamāgatam ।
nirmādhyasthyācca harṣācca babhāṣe durvacaṁ vacaḥ ॥

रानी कैकेयी का मन स्वार्थ की सिद्धिमें ही लगा हुआ था। उसके हृदयमें भरत के प्रति पक्षपात था और राजा को अपने वशमें देखकर हर्ष हो रहा था; अतः यह सोचकर कि अब मेरे लिये अपना मतलब साधनेका अवसर आ गया है, वह राजा से ऐसी बात बोली, जिसे मुँह से निकालना (शत्रु के लिये भी) कठिन है

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॥ २ · ११ · १२ ॥
तेन वाक्येन संहृष्टा तमभिप्रायमात्मनः व्याजहार महाघोरमभ्यागतमिवान्तकम्

tena vākyena saṁhṛṣṭā tamabhiprāyamātmanaḥ ।
vyājahāra mahāghoramabhyāgatamivāntakam ॥

राजा के उस शपथयुक्त वचन से उसको बड़ा हर्ष हुआ था। उसने अपने उस अभिप्राय को जो पास आये हुए यमराज के समान अत्यन्त भयंकर था, इन शब्दों में व्यक्त किया—

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॥ २ · ११ · १३ ॥
यथा क्रमेण शपसे वरं मम ददासि तच्छृण्वन्तु त्रयस्त्रिंशद् देवाः सेन्द्रपुरोगमाः

yathā krameṇa śapase varaṁ mama dadāsi ca ।
tacchṛṇvantu trayastriṁśad devāḥ sendrapurogamāḥ ॥

‘राजन्! आप जिस तरह क्रमशः शपथ खाकर मुझे वर देनेको उद्यत हुए हैं, उसे इन्द्र आदि तैंतीस देवता सुन लें

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॥ २ · ११ · १४ ॥
चन्द्रादित्यौ नभश्चैव ग्रहा रात्र्यहनी दिशः जगच्च पृथिवी चेयं सगन्धर्वाः सराक्षसाः

candrādityau nabhaścaiva grahā rātryahanī diśaḥ ।
jagacca pṛthivī ceyaṁ sagandharvāḥ sarākṣasāḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११ · १५ ॥
निशाचराणि भूतानि गृहेषु गृहदेवताः यानि चान्यानि भूतानि जानीयुर्भाषितं तव

niśācarāṇi bhūtāni gṛheṣu gṛhadevatāḥ ।
yāni cānyāni bhūtāni jānīyurbhāṣitaṁ tava ॥

॥ १४–१५ ॥

‘चन्द्रमा, सूर्य, आकाश, ग्रह, रात, दिन, दिशा, जगत्, यह पृथिवी, गन्धर्व, राक्षस, रातमें विचरनेवाले प्राणी, घरों में रहनेवाले गृहदेवता तथा इनके अतिरिक्त भी जितने प्राणी हों, वे सब आपके कथन को जान लें—आपकी बातों के साक्षी बनें

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॥ २ · ११ · १६ ॥
सत्यसंधो महातेजा धर्मज्ञः सत्यवाक्शुचिः वरं मम ददात्येष सर्वे शृण्वन्तु दैवताः

satyasaṁdho mahātejā dharmajñaḥ satyavākśuciḥ ।
varaṁ mama dadātyeṣa sarve śṛṇvantu daivatāḥ ॥

‘सब देवता सुनें! महातेजस्वी, सत्यप्रतिज्ञ, धर्म के ज्ञाता, सत्यवादी तथा शुद्ध आचार-विचारवाले ये महाराज मुझे वर दे रहे हैं’

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॥ २ · ११ · १७ ॥
इति देवी महेष्वासं परिगृह्याभिशस्य ततः परमुवाचेदं वरदं काममोहितम्

iti devī maheṣvāsaṁ parigṛhyābhiśasya ca ।
tataḥ paramuvācedaṁ varadaṁ kāmamohitam ॥

इस प्रकार काममोहित होकर वर देनेको उद्यत हुए महाधनुर्धर राजा दशरथ को अपनी मुट्ठीमें करके देवी कैकेयी ने पहले उनकी प्रशंसा की; फिर इस प्रकार कहा—

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॥ २ · ११ · १८ ॥
स्मर राजन् पुरा वृत्तं तस्मिन् देवासुरे रणे तत्र त्वां च्यावयच्छत्रुस्तव जीवितमन्तरा

smara rājan purā vṛttaṁ tasmin devāsure raṇe ।
tatra tvāṁ cyāvayacchatrustava jīvitamantarā ॥

‘राजन्! उस पुरानी बात को याद कीजिये, जब कि देवासुरसंग्राम हो रहा था। वहाँ शत्रु ने आपको घायल करके गिरा दिया था, केवल प्राण नहीं लिये थे

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॥ २ · ११ · १९ ॥
तत्र चापि मया देव यत् त्वं समभिरक्षितः जाग्रत्या यतमानायास्ततो मे प्रददौ वरौ

tatra cāpi mayā deva yat tvaṁ samabhirakṣitaḥ ।
jāgratyā yatamānāyāstato me pradadau varau ॥

‘देव! उस युद्धस्थलमें सारी रात जागकर अनेक प्रकार के प्रयत्न करके जो मैंने आपके जीवन की रक्षा की थी उससे सन्तुष्ट होकर आपने मुझे दो वर दिये थे

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॥ २ · ११ · २० ॥
तौ दत्तौ वरौ देव निक्षेपौ मृगयाम्यहम् तवैव पृथिवीपाल सकाशे रघुनन्दन

tau dattau ca varau deva nikṣepau mṛgayāmyaham ।
tavaiva pṛthivīpāla sakāśe raghunandana ॥

‘देव! पृथिवीपाल रघुनन्दन! आपके दिये हुए वे दोनों वर मैंने धरोहर के रूपमें आपके ही पास रख दिये थे। आज इस समय उन्हींको मैं खोज करती हूँ

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॥ २ · ११ · २१ ॥
तत् प्रतिश्रुत्य धर्मेण चेद् दास्यसि मे वरम् अद्यैव हि प्रहास्यामि जीवितं त्वद्विमानिता

tat pratiśrutya dharmeṇa na ced dāsyasi me varam ।
adyaiva hi prahāsyāmi jīvitaṁ tvadvimānitā ॥

‘इस प्रकार धर्मतः प्रतिज्ञा करके यदि आप मेरे उन वरों को नहीं देंगे तो मैं अपनेको आपके द्वारा अपमानित हुई समझकर आज ही प्राणों का परित्याग कर दूँगी’

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॥ २ · ११ · २२ ॥
वाङ्मात्रेण तदा राजा कैकेय्या स्ववशे कृतः प्रचस्कन्द विनाशाय पाशं मृग इवात्मनः

vāṅmātreṇa tadā rājā kaikeyyā svavaśe kṛtaḥ ।
pracaskanda vināśāya pāśaṁ mṛga ivātmanaḥ ॥

जैसे मृग बहेलिये की वाणीमात्र से अपने ही विनाश के लिये उसके जालमें फँस जाता है, उसी प्रकार कैकेयी के वशीभूत हुए राजा दशरथ उस समय पूर्वकाल के वरदान-वाक्य का स्मरण करानेमात्र से अपने ही विनाश के लिये प्रतिज्ञा के बन्धनमें बँध गये

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॥ २ · ११ · २३ ॥
ततः परमुवाचेदं वरदं काममोहितम् वरौ देयौ त्वया देव तदा दत्तौ महीपते

tataḥ paramuvācedaṁ varadaṁ kāmamohitam ।
varau deyau tvayā deva tadā dattau mahīpate ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११ · २४ ॥
तौ तावदहमद्यैव वक्ष्यामि शृणु मे वचः अभिषेकसमारम्भो राघवस्योपकल्पितः

tau tāvadahamadyaiva vakṣyāmi śṛṇu me vacaḥ ।
abhiṣekasamārambho rāghavasyopakalpitaḥ ॥

॥ २३–२४ ॥

तदनन्तर कैकेयी ने काममोहित होकर वर देनेके लिये उद्यत हुए राजा से इस प्रकार कहा—‘देव! पृथ्वीनाथ! उन दिनों आपने जो दो वर देनेकी प्रतिज्ञा की थी, उन्हें अब मुझे देना चाहिये। उन दोनों वरों को मैं अभी बताऊँगी—आप मेरी बात सुनिये—यह जो श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी की गयी है, इसी अभिषेक-सामग्रीद्वारा मेरे पुत्र भरत का अभिषेक किया जाय

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॥ २ · ११ · २५ ॥
अनेनैवाभिषेकेण भरतो मेऽभिषिच्यताम् यो द्वितीयो वरो देव दत्तः प्रीतेन मे त्वया

anenaivābhiṣekeṇa bharato me'bhiṣicyatām ।
yo dvitīyo varo deva dattaḥ prītena me tvayā ॥

‘देव! आपने उस समय देवासुरसंग्राममें प्रसन्न होकर मेरे लिये जो दूसरा वर दिया था, उसे प्राप्त करनेका यह समय भी अभी आया है

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॥ २ · ११ · २६ ॥
तदा देवासुरे युद्धे तस्य कालोऽयमागतः नव पञ्च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रितः

tadā devāsure yuddhe tasya kālo'yamāgataḥ ।
nava pañca ca varṣāṇi daṇḍakāraṇyamāśritaḥ ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · ११ · २७ ॥
चीराजिनधरो धीरो रामो भवतु तापसः भरतो भजतामद्य यौवराज्यमकण्टकम्

cīrājinadharo dhīro rāmo bhavatu tāpasaḥ ।
bharato bhajatāmadya yauvarājyamakaṇṭakam ॥

॥ २६–२७ ॥

‘धीर स्वभाववाले श्रीराम तपस्वी के वेशमें वल्कल तथा मृगचर्म धारण करके चौदह वर्षों तक दण्डकारण्यमें जाकर रहें। भरत को आज निष्कण्टक युवराजपद प्राप्त हो जाय

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॥ २ · ११ · २८ ॥
एष मे परमः कामो दत्तमेव वरं वृणे अद्य चैव हि पश्येयं प्रयान्तं राघवं वने

eṣa me paramaḥ kāmo dattameva varaṁ vṛṇe ।
adya caiva hi paśyeyaṁ prayāntaṁ rāghavaṁ vane ॥

‘यही मेरी सर्वश्रेष्ठ कामना है। मैं आपसे पहलेका दिया हुआ वर ही माँगती हूँ। आप ऐसी व्यवस्था करें, जिससे मैं आज ही श्रीराम को वन की ओर जाते देखूँ

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॥ २ · ११ · २९ ॥
राजराजो भव सत्यसंगरः कुलं शीलं हि जन्म रक्ष परत्र वासे हि वदन्त्यनुत्तमं तपोधनाः सत्यवचो हितं नृणाम्

sa rājarājo bhava satyasaṁgaraḥ
kulaṁ ca śīlaṁ ca hi janma rakṣa ca ।
paratra vāse hi vadantyanuttamaṁ
tapodhanāḥ satyavaco hitaṁ nṛṇām ॥

‘आप राजाओं के राजा हैं; अतः सत्यप्रतिज्ञ बनिये और उस सत्य के द्वारा अपने कुल, शील तथा जन्म की रक्षा कीजिये। तपस्वी पुरुष कहते हैं कि सत्य बोलना सबसे श्रेष्ठ धर्म है। वह परलोकमें निवास होनेपर मनुष्यों के लिये परम कल्याणकारी होता है

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ११ ॥