वाल्मीकि रामायणम् · अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

अयोध्याकाण्डम्Ayodhyā Kāṇḍa

सर्गः १२ · ११२ श्लोकाःSarga 12 · 112 ślokas

महाराज दशरथकी चिन्ता, विलाप, कैकेयीको फटकारना, समझाना और उससे वैसा वर न माँगनेके लिये अनुरोध करना

दशरथ-विलाप

“दशरथ-विलाप”
॥ २ · १२ · ११०–११२ ॥

अन्धकारक्रोधागारे शोकभग्नो वृद्धो दशरथः छिन्नवृक्ष इव अग्रे पतित्वा कैकेय्याः चरणौ गृह्णाति—स्खलितमुकुटः व्यथामुखः 'प्रसीद मे' इति प्रार्थयन्; सा तु तस्योपरि स्तब्धा निष्ठुरा अश्मनिश्चया तिष्ठति, विकीर्णानि भूषणानि, एको दीपः।

अन्धकारपूर्ण कोपभवनमें शोकसे टूटे वृद्ध महाराज दशरथ कटे वृक्षके समान आगे गिरकर कैकेयीके दोनों चरण पकड़ लेते हैं—मुकुट सरक गया है, मुख वेदनासे भरा है, और वे 'मुझपर प्रसन्न हो जाओ' कहकर गिड़गिड़ा रहे हैं; किंतु कैकेयी उनके ऊपर तनी हुई, निष्ठुर और पत्थरके समान अटल खड़ी है; पास ही बिखरे आभूषण और एक टिमटिमाता दीप।

In the dark anger-chamber the grief-shattered old King Dasharath has fallen forward like a felled tree to clasp Kaikeyi's feet — his crown slipped, his face a mask of anguish as he pleads 'be gracious to me' — while she stands rigid, implacable and stone-hard above him, her cast-off ornaments scattered and a single lamp guttering.

॥ २ · १२ · १ ॥
ततः श्रुत्वा महाराजः कैकेय्या दारुणं वचः। चिन्तामभिसमापेदे मुहूर्तं प्रतताप च॥

tataḥ śrutvā mahārājaḥ kaikeyyā dāruṇaṁ vacaḥ।
cintāmabhisamāpede muhūrtaṁ pratatāpa ca॥

कैकेयी का यह कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ को बड़ी चिन्ता हुई। वे एक मुहूर्ततक अत्यन्त संताप करते रहे

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॥ २ · १२ · २ ॥
किं नु मेऽद्य दिवास्वप्नश्चित्तमोहोऽपि वा मम। अनुभूतोपसर्गो वा मनसो वाप्युपद्रवः॥

kiṁ nu me'dya divāsvapnaścittamoho'pi vā mama।
anubhūtopasargo vā manaso vāpyupadravaḥ॥

उन्होंने सोचा—‘क्या दिन में ही यह मुझे स्वप्न दिखायी दे रहा है? अथवा मेरे चित्त का मोह है? या किसी भूत (ग्रह आदि) के आवेश से चित्त में विकलता आ गयी है? या आधि-व्याधि के कारण यह कोई मन का ही उपद्रव है’

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॥ २ · १२ · ३ ॥
इति संचिन्त्य तद् राजा नाध्यगच्छत् तदासुखम्। प्रतिलभ्य ततः संज्ञां कैकेय्या वाक्यताडितः॥

iti saṁcintya tad rājā nādhyagacchat tadāsukham।
pratilabhya tataḥ saṁjñāṁ kaikeyyā vākyatāḍitaḥ॥

यही सोचते हुए उन्हें अपने भ्रम के कारण का पता नहीं लगा। उस समय राजा को मूर्च्छित कर देनेवाला महान् दुःख प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् होश में आने पर कैकेयी की बात को याद करके उन्हें पुनः संताप होने लगा

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॥ २ · १२ · ४ ॥
व्यथितो विक्लवश्चैव व्याघ्रीं दृष्ट्वा यथा मृगः। असंवृतायामासीनो जगत्यां दीर्घमुच्छ्वसन्॥

vyathito viklavaścaiva vyāghrīṁ dṛṣṭvā yathā mṛgaḥ।
asaṁvṛtāyāmāsīno jagatyāṁ dīrghamucchvasan॥

जैसे किसी बाघिन को देखकर मृग व्यथित हो जाता है, उसी प्रकार वे नरेश कैकेयी को देखकर पीड़ित एवं व्याकुल हो उठे। बिस्तररहित खाली भूमि पर बैठे हुए राजा लंबी साँस खींचने लगे, मानो कोई महा विषैला सर्प किसी मण्डल में मन्त्रोंद्वारा अवरुद्ध हो गया हो

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॥ २ · १२ · ५ ॥
मण्डले पन्नगो रुद्धो मन्त्रैरिव महाविषः। अहो धिगिति सामर्षो वाचमुक्त्वा नराधिपः॥

maṇḍale pannago ruddho mantrairiva mahāviṣaḥ।
aho dhigiti sāmarṣo vācamuktvā narādhipaḥ॥

‘अहो! धिक्कार है’ यह कहकर राजा दशरथ रोष में भरकर पुनः मूर्च्छित हो गये। शोक के कारण उनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी

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॥ २ · १२ · ६ ॥
मोहमापेदिवान् भूयः शोकोपहतचेतनः। चिरेण तु नृपः संज्ञां प्रतिलभ्य सुदुःखितः॥

mohamāpedivān bhūyaḥ śokopahatacetanaḥ।
cireṇa tu nṛpaḥ saṁjñāṁ pratilabhya suduḥkhitaḥ॥

बहुत देर के बाद जब उन्हें फिर चेत हुआ, तब वे नरेश अत्यन्त दुःखी होकर कैकेयी को अपने तेज से दग्ध-सी करते हुए क्रोधपूर्वक उससे बोले—

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॥ २ · १२ · ७ ॥
कैकेयीमब्रवीत् क्रुद्धो निर्दहन्निव तेजसा। नृशंसे दुष्टचारित्रे कुलस्यास्य विनाशिनि॥

kaikeyīmabravīt kruddho nirdahanniva tejasā।
nṛśaṁse duṣṭacāritre kulasyāsya vināśini॥

‘दयाहीन दुराचारिणी कैकेयि! तू इस कुल का विनाश करनेवाली डाइन है। पापिनि! बता, मैंने अथवा श्रीराम ने तेरा क्या बिगाड़ा है?

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॥ २ · १२ · ८ ॥
किं कृतं तव रामेण पापे पापं मयापि वा। सदा ते जननीतुल्यां वृत्तिं वहति राघवः॥

kiṁ kṛtaṁ tava rāmeṇa pāpe pāpaṁ mayāpi vā।
sadā te jananītulyāṁ vṛttiṁ vahati rāghavaḥ॥

श्रीरामचन्द्र तो तेरे साथ सदा सगी माता का-सा बर्ताव करते आये हैं; फिर तू किसलिये उनका इस तरह अनिष्ट करने पर उतारू हो गयी है

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॥ २ · १२ · ९ ॥
तस्यैवं त्वमनर्थाय किंनिमित्तमिहोद्यता। त्वं मयाऽऽत्मविनाशाय भवनं स्वं निवेशिता॥

tasyaivaṁ tvamanarthāya kiṁnimittamihodyatā।
tvaṁ mayā''tmavināśāya bhavanaṁ svaṁ niveśitā॥

‘जब श्रीराम तेरा अनिष्ट करने का कोई कारण नहीं है, तब तू किसलिये उनके अनर्थ के लिये उतारू हो गयी है? मैंने अपने विनाश के लिये ही तुझे अपने घर में लाकर रखा था। मैं नहीं जानता था कि तू राजकन्या के रूप में तीखे विषवाली नागिन है

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॥ २ · १२ · १० ॥
अविज्ञानान्नृपसुता व्याला तीक्ष्णविषा यथा। जीवलोको यदा सर्वो रामस्याह गुणस्तवम्॥

avijñānānnṛpasutā vyālā tīkṣṇaviṣā yathā।
jīvaloko yadā sarvo rāmasyāha guṇastavam॥

‘जब सारा जीव-जगत् श्रीराम के गुणों की प्रशंसा करता है, तब मैं किस अपराध के कारण अपने उस प्यारे पुत्र को त्याग दूँ?

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॥ २ · १२ · ११ ॥
अपराधं कमुद्दिश्य त्यक्ष्यामीष्टमहं सुतम्। कौसल्यां वा सुमित्रां वा त्यजेयमपि वा श्रियम्॥

aparādhaṁ kamuddiśya tyakṣyāmīṣṭamahaṁ sutam।
kausalyāṁ vā sumitrāṁ vā tyajeyamapi vā śriyam॥

‘मैं कौसल्या और सुमित्रा को भी छोड़ सकता हूँ, राजलक्ष्मी को भी परित्याग कर सकता हूँ, परंतु अपने प्राणस्वरूप पितृभक्त श्रीराम को नहीं छोड़ सकता

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॥ २ · १२ · १२ ॥
जीवितं चात्मनो रामं त्वेव पितृवत्सलम्। परा भवति मे प्रीतिर्दृष्ट्वा तनयमग्रजम्॥

jīvitaṁ cātmano rāmaṁ na tveva pitṛvatsalam।
parā bhavati me prītirdṛṣṭvā tanayamagrajam॥

‘अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम को देखते ही मेरे हृदय में परमप्रेम उमड़ आता है; परंतु जब मैं श्रीराम को नहीं देखता हूँ, तब मेरी चेतना नष्ट होने लगती है

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॥ २ · १२ · १३ ॥
अपश्यतस्तु मे रामं नष्टं भवति चेतनम्। तिष्ठेल्लोको विना सूर्यं सस्यं वा सलिलं विना॥

apaśyatastu me rāmaṁ naṣṭaṁ bhavati cetanam।
tiṣṭhelloko vinā sūryaṁ sasyaṁ vā salilaṁ vinā॥

‘सम्भव है सूर्य के बिना यह संसार टिक सके अथवा पानी के बिना खेती उपज सके, परंतु श्रीराम के बिना मेरे शरीर में प्राण नहीं रह सकते

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॥ २ · १२ · १४ ॥
तु रामं विना देहे तिष्ठेत्तु मम जीवितम्। तदलं त्यज्यतामेष निश्चयः पापनिश्चये॥

na tu rāmaṁ vinā dehe tiṣṭhettu mama jīvitam।
tadalaṁ tyajyatāmeṣa niścayaḥ pāpaniścaye॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १२ · १५ ॥
अपि ते चरणौ मूर्ध्ना स्पृशाम्येष प्रसीद मे। किमर्थं चिन्तितं पापे त्वया परमदारुणम्॥

api te caraṇau mūrdhnā spṛśāmyeṣa prasīda me।
kimarthaṁ cintitaṁ pāpe tvayā paramadāruṇam॥

॥ १४–१५ ॥

‘अतः ऐसा वर माँगने से कोई लाभ नहीं। पापपूर्ण निश्चयवाली कैकेयि! तू इस निश्चय अथवा दुराग्रह को त्याग दे। यह लो, मैं तेरे पैरों पर अपना मस्तक रखता हूँ, मुझ पर प्रसन्न हो जा। पापिनि! तूने ऐसी परम क्रूरतापूर्ण बात किस लिये सोची है?

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॥ २ · १२ · १६ ॥
अथ जिज्ञाससे मां त्वं भरतस्य प्रियाप्रिये। अस्तु यत्तत्त्वया पूर्वं व्याहृतं राघवं प्रति॥

atha jijñāsase māṁ tvaṁ bharatasya priyāpriye।
astu yattattvayā pūrvaṁ vyāhṛtaṁ rāghavaṁ prati॥

‘यदि यह जानना चाहती है कि भरत मुझे प्रिय हैं या अप्रिय तो रघुनन्दन भरत के सम्बन्ध में तू पहले जो कुछ कह चुकी है, वह पूर्ण हो अर्थात् तेरे वचन के अनुसार मैं भरत का राज्याभिषेक स्वीकार करता हूँ

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॥ २ · १२ · १७ ॥
मे ज्येष्ठसुतः श्रीमान् धर्मज्येष्ठ इतीव मे। तत्त्वया प्रियवादिन्या सेवार्थं कथितं भवेत्॥

sa me jyeṣṭhasutaḥ śrīmān dharmajyeṣṭha itīva me।
tattvayā priyavādinyā sevārthaṁ kathitaṁ bhavet॥

‘तू पहले कहा करती थी कि ‘श्रीराम मेरे बड़े बेटे हैं, वे धर्माचरण में भी सबसे बड़े हैं।’ परंतु अब मालूम हुआ कि तू ऊपर-ऊपर से चिकनी-चुपड़ी बातें किया करती थी और वह बात तूने श्रीराम से अपनी सेवा कराने के लिये ही कही होगी

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॥ २ · १२ · १८ ॥
तच्छ्रुत्वा शोकसंतप्ता संतापयसि मां भृशम्। आविष्टासि गृहे शून्ये सा त्वं परवशं गता॥

tacchrutvā śokasaṁtaptā saṁtāpayasi māṁ bhṛśam।
āviṣṭāsi gṛhe śūnye sā tvaṁ paravaśaṁ gatā॥

‘आज श्रीराम के अभिषेक की बात सुनकर तू शोक से संतप्त हो उठी है और मुझे भी बहुत संताप दे रही है; इससे जान पड़ता है कि इस सूने घर में तुझ पर भूत आदि का आवेश हो गया है, अतः तू परवश होकर ऐसी बातें कह रही है

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॥ २ · १२ · १९ ॥
इक्ष्वाकूणां कुले देवि सम्प्राप्तः सुमहानयम्। अनयो नयसम्पन्ने यत्र ते विकृता मतिः॥

ikṣvākūṇāṁ kule devi samprāptaḥ sumahānayam।
anayo nayasampanne yatra te vikṛtā matiḥ॥

‘देवि! न्यायशील इक्ष्वाकुवंश में यह बड़ा भारी अन्याय आकर उपस्थित हुआ है, जहाँ तेरी बुद्धि इस प्रकार विकृत हो गयी है

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॥ २ · १२ · २० ॥
नहि किंचिदयुक्तं वा विप्रियं वा पुरा मम। अकरोस्त्वं विशालाक्षि तेन श्रद्दधामि ते॥

nahi kiṁcidayuktaṁ vā vipriyaṁ vā purā mama।
akarostvaṁ viśālākṣi tena na śraddadhāmi te॥

‘विशाललोचने! आज से पहले तूने कभी कोई ऐसा आचरण नहीं किया है, जो अनुचित अथवा मेरे लिये अप्रिय हो; इसीलिये तेरी आज की बात पर भी मुझे विश्वास नहीं होता है

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॥ २ · १२ · २१ ॥
ननु ते राघवस्तुल्यो भरतेन महात्मना। बहुशोऽपि हि स्म बाले त्वं कथाः कथयसे मम॥

nanu te rāghavastulyo bharatena mahātmanā।
bahuśo'pi hi sma bāle tvaṁ kathāḥ kathayase mama॥

‘तेरे लिये तो श्रीराम भी महात्मा भरत के ही तुल्य हैं। बाले! तू बहुत बार बातचीत के प्रसंग में स्वयं ही यह बात मुझसे कहती रही है

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॥ २ · १२ · २२ ॥
तस्य धर्मात्मनो देवि वने वासं यशस्विनः। कथं रोचयसे भीरु नव वर्षाणि पञ्च च॥

tasya dharmātmano devi vane vāsaṁ yaśasvinaḥ।
kathaṁ rocayase bhīru nava varṣāṇi pañca ca॥

‘भीरु स्वभाववाली देवि! उन्हीं धर्मात्मा और यशस्वी श्रीराम का चौदह वर्ष के लिये वनवास तुझे कैसे अच्छा लगता है?

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॥ २ · १२ · २३ ॥
अत्यन्तसुकुमारस्य तस्य धर्मे कृतात्मनः। कथं रोचयसे वासमरण्ये भृशदारुणे॥

atyantasukumārasya tasya dharme kṛtātmanaḥ।
kathaṁ rocayase vāsamaraṇye bhṛśadāruṇe॥

‘जो अत्यन्त सुकुमार और धर्म में दृढ़तापूर्वक मन लगाये रखनेवाले हैं, उन्हीं श्रीराम को वनवास देना तुझे कैसे रुचिकर जान पड़ता है? अहो! तेरा हृदय बड़ा कठोर है

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॥ २ · १२ · २४ ॥
रोचयस्यभिरामस्य रामस्य शुभलोचने। तव शुश्रूषमाणस्य किमर्थं विप्रवासनम्॥

rocayasyabhirāmasya rāmasya śubhalocane।
tava śuśrūṣamāṇasya kimarthaṁ vipravāsanam॥

‘सुन्दर नेत्रोंवाली कैकेयि! जो सदा तेरी सेवा-शुश्रूषा में लगे रहते हैं, उन नयनाभिराम श्रीराम को देशनिकाला दे देने की इच्छा तुझे किसलिये हो रही है?

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॥ २ · १२ · २५ ॥
रामो हि भरताद् भूयस्तव शुश्रूषते सदा। विशेषं त्वयि तस्मात् तु भरतस्य लक्षये॥

rāmo hi bharatād bhūyastava śuśrūṣate sadā।
viśeṣaṁ tvayi tasmāt tu bharatasya na lakṣaye॥

‘मैं देखता हूँ, भरत से अधिक श्रीराम ही सदा तेरी सेवा करते हैं। भरत उनसे अधिक तेरी सेवा में रहते हों, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा है

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॥ २ · १२ · २६ ॥
शुश्रूषां गौरवं चैव प्रमाणं वचनक्रियाम्। कस्तु भूयस्तरं कुर्यादन्यत्र पुरुषर्षभात्॥

śuśrūṣāṁ gauravaṁ caiva pramāṇaṁ vacanakriyām।
kastu bhūyastaraṁ kuryādanyatra puruṣarṣabhāt॥

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम से बढ़कर दूसरा कौन है, जो गुरुजनों की सेवा करने, उन्हें गौरव देने, उनकी बातों को मान्यता देने और उनकी आज्ञा का तुरंत पालन करने में अधिक तत्परता दिखाता हो?

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॥ २ · १२ · २७ ॥
बहूनां स्त्रीसहस्राणां बहूनां चोपजीविनाम्। परिवादोऽपवादो वा राघवे नोपपद्यते॥

bahūnāṁ strīsahasrāṇāṁ bahūnāṁ copajīvinām।
parivādo'pavādo vā rāghave nopapadyate॥

‘मेरे यहाँ कई सहस्र स्त्रियाँ हैं और बहुत-से उपजीवी भृत्यजन हैं, परंतु किसीके मुँह से श्रीराम के सम्बन्ध में सच्ची या झूठी किसी प्रकार की शिकायत नहीं सुनी जाती है

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॥ २ · १२ · २८ ॥
सान्त्वयन् सर्वभूतानि रामः शुद्धेन चेतसा। गृह्णाति मनुजव्याघ्रः प्रियैर्विषयवासिनः॥

sāntvayan sarvabhūtāni rāmaḥ śuddhena cetasā।
gṛhṇāti manujavyāghraḥ priyairviṣayavāsinaḥ॥

‘पुरुषसिंह श्रीराम समस्त प्राणियों को शुद्ध हृदय से सान्त्वना देते हुए प्रिय आचरणोंद्वारा राज्य की समस्त प्रजाओं को अपने वश में किये रहते हैं

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॥ २ · १२ · २९ ॥
सत्येन लोकाञ्जयति द्विजान् दानेन राघवः। गुरूञ्छुश्रूषया वीरो धनुषा युधि शात्रवान्॥

satyena lokāñjayati dvijān dānena rāghavaḥ।
gurūñchuśrūṣayā vīro dhanuṣā yudhi śātravān॥

‘वीर श्रीरामचन्द्र अपने सात्त्विक भाव से समस्त लोकों को; दान के द्वारा द्विजों को, सेवा से गुरुजनों को और धनुष-बाणद्वारा युद्धस्थल में शत्रु-सैनिकों को जीतकर अपने अधीन कर लेते हैं

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॥ २ · १२ · ३० ॥
सत्यं दानं तपस्त्यागो मित्रता शौचमार्जवम्। विद्या गुरुशुश्रूषा ध्रुवाण्येतानि राघवे॥

satyaṁ dānaṁ tapastyāgo mitratā śaucamārjavam।
vidyā ca guruśuśrūṣā dhruvāṇyetāni rāghave॥

‘सत्य, दान, तप, त्याग, मित्रता, पवित्रता, सरलता, विद्या और गुरु-शुश्रूषा—ये सभी सद्गुण श्रीराम में स्थिररूप से रहते हैं

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॥ २ · १२ · ३१ ॥
तस्मिन्नार्जवसम्पन्ने देवि देवोपमे कथम्। पापमाशंससे रामे महर्षिसमतेजसि॥

tasminnārjavasampanne devi devopame katham।
pāpamāśaṁsase rāme maharṣisamatejasi॥

‘देवि! महर्षियों के समान तेजस्वी उन सीधे-सादे देवतुल्य श्रीराम का तू क्यों अनिष्ट करना चाहती है?

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॥ २ · १२ · ३२ ॥
स्मराम्यप्रियं वाक्यं लोकस्य प्रियवादिनः। कथं त्वत्कृते रामं वक्ष्यामि प्रियमप्रियम्॥

na smarāmyapriyaṁ vākyaṁ lokasya priyavādinaḥ।
sa kathaṁ tvatkṛte rāmaṁ vakṣyāmi priyamapriyam॥

‘श्रीराम सब लोगों से प्रिय बोलते हैं। उन्होंने कभी किसीको अप्रिय वचन कहा हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता। ऐसे सर्वप्रिय राम से मैं तेरे लिये अप्रिय बात कैसे कहूँगा?

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॥ २ · १२ · ३३ ॥
क्षमा यस्मिंस्तपस्त्यागः सत्यं धर्मः कृतज्ञता। अप्यहिंसा भूतानां तमृते का गतिर्मम॥

kṣamā yasmiṁstapastyāgaḥ satyaṁ dharmaḥ kṛtajñatā।
apyahiṁsā ca bhūtānāṁ tamṛte kā gatirmama॥

‘जिनमें क्षमा, तप, त्याग, सत्य, धर्म, कृतज्ञता और समस्त जीवों के प्रति दया भरी हुई है, उन श्रीराम के बिना मेरी क्या गति होगी?

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॥ २ · १२ · ३४ ॥
मम वृद्धस्य कैकेयि गतान्तस्य तपस्विनः। दीनं लालप्यमानस्य कारुण्यं कर्तुमर्हसि॥

mama vṛddhasya kaikeyi gatāntasya tapasvinaḥ।
dīnaṁ lālapyamānasya kāruṇyaṁ kartumarhasi॥

‘कैकेयि! मैं बूढ़ा हूँ। मौत के किनारे आ पहुँचा हूँ। मेरी अवस्था शोचनीय हो रही है और मैं दीनभाव से तेरे सामने गिड़गिड़ा रहा हूँ। तुझे मुझ पर दया करनी चाहिये

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॥ २ · १२ · ३५ ॥
पृथिव्यां सागरान्तायां यत् किंचिदधिगम्यते। तत् सर्वं तव दास्यामि मा त्वं मन्युमाविश॥

pṛthivyāṁ sāgarāntāyāṁ yat kiṁcidadhigamyate।
tat sarvaṁ tava dāsyāmi mā ca tvaṁ manyumāviśa॥

‘समुद्रपर्यन्त पृथ्वी पर जो कुछ मिल सकता है, वह सब मैं तुझे दे दूँगा, परंतु तू ऐसे दुराग्रह में न पड़, जो मुझे मौत के मुँह में ढकेलनेवाला है

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॥ २ · १२ · ३६ ॥
अञ्जलिं कुर्मि कैकेयि पादौ चापि स्पृशामि ते। शरणं भव रामस्य माधर्मो मामिह स्पृशेत्॥

añjaliṁ kurmi kaikeyi pādau cāpi spṛśāmi te।
śaraṇaṁ bhava rāmasya mādharmo māmiha spṛśet॥

‘कैकयनन्दिनि! मैं हाथ जोड़ता हूँ और तेरे पैरों पड़ता हूँ। तू श्रीराम को शरण दे, जिससे यहाँ मुझे पाप न लगे’

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॥ २ · १२ · ३७ ॥
इति दुःखाभिसंतप्तं विलपन्तमचेतनम्। घूर्णमानं महाराजं शोकेन समभिप्लुतम्॥

iti duḥkhābhisaṁtaptaṁ vilapantamacetanam।
ghūrṇamānaṁ mahārājaṁ śokena samabhiplutam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १२ · ३८ ॥
पारं शोकार्णवस्याशु प्रार्थयन्तं पुनः पुनः। प्रत्युवाचाथ कैकेयी रौद्रा रौद्रतरं वचः॥

pāraṁ śokārṇavasyāśu prārthayantaṁ punaḥ punaḥ।
pratyuvācātha kaikeyī raudrā raudrataraṁ vacaḥ॥

॥ ३७–३८ ॥

महाराज दशरथ इस प्रकार दुःख से संतप्त होकर विलाप कर रहे थे। उनकी चेतना बार-बार लुप्त हो जाती थी। उनके मस्तिष्क में चक्कर आ रहा था और वे शोकमग्न हो उस शोकसागर से शीघ्र पार होने के लिये बारंबार अनुनय-विनय कर रहे थे। तो भी कैकेयी का हृदय नहीं पिघला। वह और भी भीषण रूप धारण करके अत्यन्त कठोर वाणी में उन्हें इस प्रकार उत्तर देने लगी—

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॥ २ · १२ · ३९ ॥
यदि दत्त्वा वरौ राजन् पुनः प्रत्यनुतप्यसे। धार्मिकत्वं कथं वीर पृथिव्यां कथयिष्यसि॥

yadi dattvā varau rājan punaḥ pratyanutapyase।
dhārmikatvaṁ kathaṁ vīra pṛthivyāṁ kathayiṣyasi॥

‘राजन्! यदि दो वरदान देकर आप फिर उनके लिये पश्चात्ताप करते हैं तो वीर नरेश्वर! इस भूमण्डल में आप अपनी धार्मिकता का ढिंढोरा कैसे पीट सकेंगे?

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॥ २ · १२ · ४० ॥
यदा समेता बहवस्त्वया राजर्षयः सह। कथयिष्यन्ति धर्मज्ञ तत्र किं प्रतिवक्ष्यसि॥

yadā sametā bahavastvayā rājarṣayaḥ saha।
kathayiṣyanti dharmajña tatra kiṁ prativakṣyasi॥

‘धर्म के ज्ञाता महाराज! जब बहुत-से राजर्षि एकत्र होकर आपके साथ मुझे दिये हुए वरदान के विषय में बातचीत करेंगे, उस समय वहाँ आप उन्हें क्या उत्तर देंगे?

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॥ २ · १२ · ४१ ॥
यस्याः प्रसादे जीवामि या मामभ्यपालयत्। तस्याः कृता मया मिथ्या कैकेय्या इति वक्ष्यसि॥

yasyāḥ prasāde jīvāmi yā ca māmabhyapālayat।
tasyāḥ kṛtā mayā mithyā kaikeyyā iti vakṣyasi॥

‘यही कहेंगे न, कि जिसके प्रसाद से मैं जीवित हूँ, जिसने (बहुत बड़े संकट से) मेरी रक्षा की, उसी कैकेयी को वर देने के लिये की हुई प्रतिज्ञा मैंने झूठी कर दी

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॥ २ · १२ · ४२ ॥
किल्बिषं त्वं नरेन्द्राणां करिष्यसि नराधिप। यो दत्त्वा वरमद्यैव पुनरन्यानि भाषसे॥

kilbiṣaṁ tvaṁ narendrāṇāṁ kariṣyasi narādhipa।
yo dattvā varamadyaiva punaranyāni bhāṣase॥

‘महाराज! आज ही वरदान देकर यदि आप फिर उससे विपरीत बात कहेंगे तो अपने कुल के राजाओं के माथे कलंक का टीका लगायेंगे

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॥ २ · १२ · ४३ ॥
शैब्यः श्येनकपोतीये स्वमांसं पक्षिणे ददौ। अलर्कश्चक्षुषी दत्त्वा जगाम गतिमुत्तमाम्॥

śaibyaḥ śyenakapotīye svamāṁsaṁ pakṣiṇe dadau।
alarkaścakṣuṣī dattvā jagāma gatimuttamām॥

‘राजा शैब्य ने बाज और कबूतर के झगड़े में कबूतर के प्राण बचाने की प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिये बाज नामक पक्षी को अपने शरीर का मांस काटकर दे दिया था। इसी तरह राजा अलर्क ने (एक अंधे ब्राह्मण को) अपने दोनों नेत्रों का दान करके परम उत्तम गति प्राप्त की थी

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॥ २ · १२ · ४४ ॥
सागरः समयं कृत्वा वेलामतिवर्तते। समयं मानृतं कार्षीः पूर्ववृत्तमनुस्मरन्॥

sāgaraḥ samayaṁ kṛtvā na velāmativartate।
samayaṁ mānṛtaṁ kārṣīḥ pūrvavṛttamanusmaran॥

‘समुद्र ने (देवताओं के समक्ष) अपनी नियत सीमा को न लाँघने की प्रतिज्ञा की थी, सो अबतक वह उसका उल्लङ्घन नहीं करता। आप भी पूर्ववर्ती महापुरुषों के बर्ताव को सदा ध्यान में रखकर अपनी प्रतिज्ञा झूठी न करें

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॥ २ · १२ · ४५ ॥
त्वं धर्मं परित्यज्य रामं राज्येऽभिषिच्य च। सह कौसल्यया नित्यं रन्तुमिच्छसि दुर्मते॥

sa tvaṁ dharmaṁ parityajya rāmaṁ rājye'bhiṣicya ca।
saha kausalyayā nityaṁ rantumicchasi durmate॥

‘(परंतु आप मेरी बात क्यों सुनेंगे?) दुर्बुद्धि नरेश! आप तो धर्म को तिलाञ्जलि देकर श्रीराम को राज्य पर अभिषिक्त करके रानी कौसल्या के साथ सदा मौज उड़ाना चाहते हैं

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॥ २ · १२ · ४६ ॥
भवत्वधर्मो धर्मो वा सत्यं वा यदि वानृतम्। यत्त्वया संश्रुतं मह्यं तस्य नास्ति व्यतिक्रमः॥

bhavatvadharmo dharmo vā satyaṁ vā yadi vānṛtam।
yattvayā saṁśrutaṁ mahyaṁ tasya nāsti vyatikramaḥ॥

‘अब धर्म हो या अधर्म, झूठ हो या सच, जिस बात के लिये आपने मुझसे प्रतिज्ञा कर ली है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता

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॥ २ · १२ · ४७ ॥
अहं हि विषमद्यैव पीत्वा बहु तवाग्रतः। पश्यतस्ते मरिष्यामि रामो यद्यभिषिच्यते॥

ahaṁ hi viṣamadyaiva pītvā bahu tavāgrataḥ।
paśyataste mariṣyāmi rāmo yadyabhiṣicyate॥

‘यदि श्रीराम का राज्याभिषेक होगा तो मैं आपके सामने आपके देखते-देखते आज ही बहुत-सा विष पीकर मर जाऊँगी

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॥ २ · १२ · ४८ ॥
एकाहमपि पश्येयं यद्यहं राममातरम्। अञ्जलिं प्रतिगृह्णन्तीं श्रेयो ननु मृतिर्मम॥

ekāhamapi paśyeyaṁ yadyahaṁ rāmamātaram।
añjaliṁ pratigṛhṇantīṁ śreyo nanu mṛtirmama॥

‘यदि मैं एक दिन भी राममाता कौसल्या को राजमाता होने के नाते लोगों से अपने को हाथ जोड़वाती देख लूँगी तो उस समय अपने लिये मर जाना ही अच्छा समझूँगी

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॥ २ · १२ · ४९ ॥
भरतेनात्मना चाहं शपे ते मनुजाधिप। यथा नान्येन तुष्येयमृते रामविवासनात्॥

bharatenātmanā cāhaṁ śape te manujādhipa।
yathā nānyena tuṣyeyamṛte rāmavivāsanāt॥

‘नरेश्वर! मैं आपके सामने अपनी और भरत की शपथ खाकर कहती हूँ कि श्रीराम को इस देश से निकाल देने के सिवा दूसरे किसी वर से मुझे संतोष नहीं होगा’

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॥ २ · १२ · ५० ॥
एतावदुक्त्वा वचनं कैकेयी विरराम ह। विलपन्तं राजानं प्रतिव्याजहार सा॥

etāvaduktvā vacanaṁ kaikeyī virarāma ha।
vilapantaṁ ca rājānaṁ na prativyājahāra sā॥

इतना कहकर कैकेयी चुप हो गयी। राजा बहुत रोये-गिड़गिड़ाये; किंतु उसने उनकी किसी बात का जवाब नहीं दिया

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॥ २ · १२ · ५१ ॥
श्रुत्वा तु राजा कैकेय्या वाक्यं परमाशोभनम्। रामस्य वने वासमैश्वर्यं भरतस्य च॥

śrutvā tu rājā kaikeyyā vākyaṁ paramāśobhanam।
rāmasya ca vane vāsamaiśvaryaṁ bharatasya ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १२ · ५२ ॥
नाभ्यभाषत कैकेयीं मुहूर्तं व्याकुलेन्द्रियः। प्रैक्षतानिमिषो देवीं प्रियामप्रियवादिनीम्॥

nābhyabhāṣata kaikeyīṁ muhūrtaṁ vyākulendriyaḥ।
praikṣatānimiṣo devīṁ priyāmapriyavādinīm॥

॥ ५१–५२ ॥

श्रीराम का वनवास हो और राममाता कौसल्या के पुत्र भरत का राज्याभिषेक—कैकेयी के मुख से यह परम अमङ्गलकारी वचन सुनकर राजा की सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठीं। वे एक मुहूर्ततक कैकेयी से कुछ न बोले। उस अप्रिय वचन बोलनेवाली प्यारी रानी की ओर केवल एकटक दृष्टि से देखते रहे

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॥ २ · १२ · ५३ ॥
तां हि वज्रसमां वाचमाकर्ण्य हृदयाप्रियाम्। दुःखशोकमयीं श्रुत्वा राजा सुखितोऽभवत्॥

tāṁ hi vajrasamāṁ vācamākarṇya hṛdayāpriyām।
duḥkhaśokamayīṁ śrutvā rājā na sukhito'bhavat॥

मन को अप्रिय लगनेवाली कैकेयी की वह वज्र के समान कठोर तथा दुःख-शोकमयी वाणी सुनकर राजा को बड़ा दुःख हुआ। उनकी सुख-शान्ति छिन्न गयी

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॥ २ · १२ · ५४ ॥
देव्या व्यवसायं घोरं शपथं कृतम्। ध्यात्वा रामेति निःश्वस्य छिन्नस्तरुरिवापतत्॥

sa devyā vyavasāyaṁ ca ghoraṁ ca śapathaṁ kṛtam।
dhyātvā rāmeti niḥśvasya chinnastarurivāpatat॥

देवी कैकेयी के उस घोर निश्चय और किये हुए शपथ की ओर ध्यान जाते हुए वे ‘हा राम!’ कहकर लंबी साँस खींचते हुए कटे वृक्ष की भाँति गिर पड़े

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॥ २ · १२ · ५५ ॥
नष्टचित्तो यथोन्मत्तो विपरीतो यथातुरः। हृततेजा यथा सर्पो बभूव जगतीपतिः॥

naṣṭacitto yathonmatto viparīto yathāturaḥ।
hṛtatejā yathā sarpo babhūva jagatīpatiḥ॥

उनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी। वे उन्मादग्रस्त-से प्रतीत होने लगे। उनकी प्रकृति विपरीत-सी हो गयी। वे रोगी-से जान पड़ते थे। इस प्रकार भूपाल दशरथ मन्त्र से जिसका तेज हर लिया गया हो उस सर्प के समान निश्चेष्ट हो गये

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॥ २ · १२ · ५६ ॥
दीनयाऽऽतुरया वाचा इति होवाच कैकयीम्। अनर्थमिममर्थाभं केन त्वमुपदेशिता॥

dīnayā''turayā vācā iti hovāca kaikayīm।
anarthamimamarthābhaṁ kena tvamupadeśitā॥

तदनन्तर उन्होंने दीन और आतुर वाणी में कैकेयी से इस प्रकार कहा—‘अरी! तुझे अनर्थ ही अर्थ-सा प्रतीत हो रहा है, किसने तुझे इसका उपदेश दिया है?

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॥ २ · १२ · ५७ ॥
भूतोपहतचित्तेव ब्रुवन्ती मां लज्जसे। शीलव्यसनमेतत् ते नाभिजानाम्यहं पुरा॥

bhūtopahatacitteva bruvantī māṁ na lajjase।
śīlavyasanametat te nābhijānāmyahaṁ purā॥

‘जान पड़ता है, तेरा चित्त किसी भूत के आवेश से दूषित हो गया है। पिशाचग्रस्त नारी की भाँति मेरे सामने ऐसी बातें कहती हुई तू लज्जित क्यों नहीं होती? मुझे पहले इस बात का पता नहीं था कि तेरा यह कुलाङ्गनोचित शील इस तरह नष्ट हो गया है

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॥ २ · १२ · ५८ ॥
बालायास्तत् त्विदानीं ते लक्षये विपरीतवत्। कुतो वा ते भयं जातं या त्वमेवंविधं वरम्॥

bālāyāstat tvidānīṁ te lakṣaye viparītavat।
kuto vā te bhayaṁ jātaṁ yā tvamevaṁvidhaṁ varam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १२ · ५९ ॥
राष्ट्रे भरतमासीनं वृणीषे राघवं वने। विरमैतेन भावेन त्वमेतेनानृतेन च॥

rāṣṭre bharatamāsīnaṁ vṛṇīṣe rāghavaṁ vane।
viramaitena bhāvena tvametenānṛtena ca॥

॥ ५८–५९ ॥

‘बालावस्था में जो तेरा शील था, उसे इस समय मैं विपरीत-सा देख रहा हूँ। तुझे किस बात का भय हो गया है जो इस तरह का वर माँगती है? भरत राज्य-सिंहासन पर बैठें और श्रीराम वन में रहें—यही तू माँग रही है। यह बड़ा असत्य तथा ओछा विचार है। तू अब भी इससे विरत हो जा

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॥ २ · १२ · ६० ॥
यदि भर्तुः प्रियं कार्यं लोकस्य भरतस्य च। नृशंसे पापसंकल्पे क्षुद्रे दुष्कृतकारिणि॥

yadi bhartuḥ priyaṁ kāryaṁ lokasya bharatasya ca।
nṛśaṁse pāpasaṁkalpe kṣudre duṣkṛtakāriṇi॥

‘क्रूर स्वभाव और पापपूर्ण विचारवाली नीच दुराचारिणि! यदि अपने पति का, सारे जगत् का और भरत का भी प्रिय करना चाहती है तो इस दूषित संकल्प को त्याग दे

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॥ २ · १२ · ६१ ॥
किं नु दुःखमलीकं वा मयि रामे पश्यसि। कथंचिदृते रामाद् भरतो राज्यमावसेत्॥

kiṁ nu duḥkhamalīkaṁ vā mayi rāme ca paśyasi।
na kathaṁcidṛte rāmād bharato rājyamāvaset॥

‘तू मुझमें या श्रीराम में कौन-सा दुःखदायक या अप्रिय बर्ताव देख रही है (कि ऐसा नीच कर्म करने पर उतारू हो गयी है); श्रीराम के बिना भरत किसी तरह राज्य लेना स्वीकार नहीं करेंगे

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॥ २ · १२ · ६२ ॥
रामादपि हि तं मन्ये धर्मतो बलवत्तरम्। कथं द्रक्ष्यामि रामस्य वनं गच्छेति भाषिते॥

rāmādapi hi taṁ manye dharmato balavattaram।
kathaṁ drakṣyāmi rāmasya vanaṁ gaccheti bhāṣite॥

‘क्योंकि मेरी समझ में धर्मपालन की दृष्टि से भरत श्रीराम से भी बढ़े-चढ़े हैं। श्रीराम से यह कह देने पर कि तुम वन को जाओ; जब उनके मुख की कान्ति राहुग्रस्त चन्द्रमा की भाँति फीकी पड़ जायगी, उस समय मैं कैसे उनके उस उदास मुख की ओर देख सकूँगा?

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॥ २ · १२ · ६३ ॥
मुखवर्णं विवर्णं तु यथैवेन्दुमुपप्लुतम्। तां तु मे सुकृतां बुद्धिं सुहृद्भिः सह निश्चिताम्॥

mukhavarṇaṁ vivarṇaṁ tu yathaivendumupaplutam।
tāṁ tu me sukṛtāṁ buddhiṁ suhṛdbhiḥ saha niścitām॥

‘मैंने श्रीराम के अभिषेक का निश्चय सुहृदों के साथ विचार करके किया है, मेरी यह बुद्धि शुभ कर्म में प्रवृत्त हुई है; अब मैं इसे शत्रुओंद्वारा पराजित हुई सेना की भाँति पलटी हुई कैसे देखूँगा?

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॥ २ · १२ · ६४ ॥
कथं द्रक्ष्याम्यपावृत्तां परैरिव हतां चमूम्। किं मां वक्ष्यन्ति राजानो नानादिग्भ्यः समागताः॥

kathaṁ drakṣyāmyapāvṛttāṁ parairiva hatāṁ camūm।
kiṁ māṁ vakṣyanti rājāno nānādigbhyaḥ samāgatāḥ॥

‘नाना दिशाओं से आये हुए राजालोग मुझे लक्ष्य करके खेदपूर्वक कहेंगे कि इस मूढ़ इक्ष्वाकुवंशी राजा ने कैसे इतने दीर्घकालतक इस राज्य का पालन किया है?

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॥ २ · १२ · ६५ ॥
बालो बतायमैक्ष्वाकश्चिरं राज्यमकारयत्। यदा हि बहवो वृद्धा गुणवन्तो बहुश्रुताः॥

bālo batāyamaikṣvākaściraṁ rājyamakārayat।
yadā hi bahavo vṛddhā guṇavanto bahuśrutāḥ॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १२ · ६६ ॥
परिप्रक्ष्यन्ति काकुत्स्थं वक्ष्यामीह कथं तदा। कैकेय्या क्लिश्यमानेन पुत्रः प्रव्राजितो मया॥

pariprakṣyanti kākutsthaṁ vakṣyāmīha kathaṁ tadā।
kaikeyyā kliśyamānena putraḥ pravrājito mayā॥

॥ ६५–६६ ॥

‘जब बहुत-से बहुश्रुत गुणवान् एवं वृद्ध पुरुष आकर मुझसे पूछेंगे कि श्रीराम कहाँ हैं? तब मैं उनसे कैसे यह कहूँगा कि कैकेयी के दबाव देने से मैंने अपने बेटे को घर से निकाल दिया

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॥ २ · १२ · ६७ ॥
यदि सत्यं ब्रवीम्येतत् तदसत्यं भविष्यति। किं मां वक्ष्यति कौसल्या राघवे वनमाश्रिते॥

yadi satyaṁ bravīmyetat tadasatyaṁ bhaviṣyati।
kiṁ māṁ vakṣyati kausalyā rāghave vanamāśrite॥

‘यदि कहूँ कि श्रीराम को वनवास देकर मैंने सत्य का पालन किया है तो इसके पहले जो उन्हें राज्य देने की बात कह चुका हूँ, वह असत्य हो जायगी। यदि राम वन को चले गये तो कौसल्या मुझे क्या कहेगी? उसका ऐसा महान् अपकार करके मैं उसे क्या उत्तर दूँगा?

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॥ २ · १२ · ६८ ॥
किं चैनां प्रतिवक्ष्यामि कृत्वा विप्रियमीदृशम्। यदा यदा कौसल्या दासीव सखीव च॥

kiṁ caināṁ prativakṣyāmi kṛtvā vipriyamīdṛśam।
yadā yadā ca kausalyā dāsīva ca sakhīva ca॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १२ · ६९ ॥
भार्यावद् भगिनीवच्च मातृवच्चोपतिष्ठति। सततं प्रियकामा मे प्रियपुत्रा प्रियंवदा॥

bhāryāvad bhaginīvacca mātṛvaccopatiṣṭhati।
satataṁ priyakāmā me priyaputrā priyaṁvadā॥

॥ ६८–६९ ॥

‘हाय! जिसका पुत्र मुझे सबसे अधिक प्रिय है, वह प्रिय वचन बोलनेवाली कौसल्या जब-जब दासी, सखी, पत्नी, बहिन और माता की भाँति मेरा प्रिय करने की इच्छा से मेरी सेवा में उपस्थित होती थी, तब-तब उस सत्कार पानेयोग्य देवी का भी मैंने तेरे ही कारण कभी सत्कार नहीं किया

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॥ २ · १२ · ७० ॥
मया सत्कृता देवी सत्कारार्हा कृते तव। इदानीं तत्तपति मां यन्मया सुकृतं त्वयि॥

na mayā satkṛtā devī satkārārhā kṛte tava।
idānīṁ tattapati māṁ yanmayā sukṛtaṁ tvayi॥

‘तेरे साथ जो मैंने इतना अच्छा बर्ताव किया, वह याद आकर इस समय मुझे उसी प्रकार संताप दे रहा है, जैसे अपथ्य (हानिकारक) व्यञ्जनों से युक्त खाया हुआ अन्न किसी रोगी को कष्ट देता है

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॥ २ · १२ · ७१ ॥
अपथ्यव्यञ्जनोपेतं भुक्तमन्नमिवातुरम्। विप्रकारं रामस्य सम्प्रयाणं वनस्य च॥

apathyavyañjanopetaṁ bhuktamannamivāturam।
viprakāraṁ ca rāmasya samprayāṇaṁ vanasya ca॥

‘श्रीराम के अभिषेक का निवारण और उनका वन की ओर प्रस्थान देखकर निश्चय ही सुमित्रा भयभीत हो जायगी, फिर वह कैसे मेरा विश्वास करेगी?

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॥ २ · १२ · ७२ ॥
सुमित्रा प्रेक्ष्य वै भीता कथं मे विश्वसिष्यति। कृपणं बत वैदेही श्रोष्यति द्वयमप्रियम्॥

sumitrā prekṣya vai bhītā kathaṁ me viśvasiṣyati।
kṛpaṇaṁ bata vaidehī śroṣyati dvayamapriyam॥

‘हाय! बेचारी सीता को एक ही साथ दो दुःखद एवं अप्रिय समाचार सुनने पड़ेंगे—श्रीराम का वनवास और मेरी मृत्यु

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॥ २ · १२ · ७३ ॥
मां पञ्चत्वमापन्नं रामं वनमाश्रितम्। वैदेही बत मे प्राणान् शोचन्ती क्षपयिष्यति॥

māṁ ca pañcatvamāpannaṁ rāmaṁ ca vanamāśritam।
vaidehī bata me prāṇān śocantī kṣapayiṣyati॥

‘जब वह श्रीराम के लिये शोक करने लगेगी, उस समय मेरे प्राणों का नाश कर डालेगी—उसका शोक देखकर मेरे प्राण इस शरीर में नहीं रह सकेंगे। उसकी दशा हिमालय के पार्श्वभाग में अपने स्वामी किन्नर से बिछुड़ी हुई किन्नरी के समान हो जायगी

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॥ २ · १२ · ७४ ॥
हीना हिमवतः पार्श्वे किन्नरेणेव किंनरी। नहि रामं दृष्ट्वाहं प्रवसन्तं महावने॥

hīnā himavataḥ pārśve kinnareṇeva kiṁnarī।
nahi rāmaṁ dṛṣṭvāhaṁ pravasantaṁ mahāvane॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १२ · ७५ ॥
चिरं जीवितुमाशंसे रुदन्तीं चापि मैथिलीम्। सा नूनं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यति॥

ciraṁ jīvitumāśaṁse rudantīṁ cāpi maithilīm।
sā nūnaṁ vidhavā rājyaṁ saputrā kārayiṣyati॥

॥ ७४–७५ ॥

‘मैं श्रीराम को विशाल वन में निवास करते और मिथिलेशकुमारी सीता को रोती देख अधिक कालतक जीवित रहना नहीं चाहता। ऐसी दशा में तू निश्चय ही विधवा होकर बेटे के साथ अयोध्या का राज्य करना

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॥ २ · १२ · ७६ ॥
सतीं त्वामहमत्यन्तं व्यवस्याम्यसतीं सतीम्। रूपिणीं विषसंयुक्तां पीत्वेव मदिरां नरः॥

satīṁ tvāmahamatyantaṁ vyavasyāmyasatīṁ satīm।
rūpiṇīṁ viṣasaṁyuktāṁ pītveva madirāṁ naraḥ॥

‘ओह! मैं तुझे अत्यन्त सती-साध्वी समझता था, परंतु तू बड़ी दुष्टा निकली; ठीक उसी तरह जैसे कोई मनुष्य देखने में सुन्दर मदिरा को पीकर पीछे उसके द्वारा किये गये विकार से यह समझ पाता है कि इसमें विष मिला हुआ था

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॥ २ · १२ · ७७ ॥
अनृतैर्बत मां सान्त्वैः सान्त्वयन्ती स्म भाषसे। गीतशब्देन संरुध्य लुब्धो मृगमिवावधीः॥

anṛtairbata māṁ sāntvaiḥ sāntvayantī sma bhāṣase।
gītaśabdena saṁrudhya lubdho mṛgamivāvadhīḥ॥

‘अबतक जो तू सान्त्वनापूर्ण मीठे वचन बोलकर मुझे आश्वासन देती हुई बातें किया करती थी, वे तेरी कही हुई सारी बातें झूठी थीं। जैसे कोई व्याध हरिण को मधुर संगीत से आकृष्ट करके उसे मार डालता है, उसी प्रकार तू भी पहले मुझे लुभाकर अब मेरे प्राण ले रही है

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॥ २ · १२ · ७८ ॥
अनार्य इति मामार्याः पुत्रविक्रायकं ध्रुवम्। विकरिष्यन्ति रथ्यासु सुरापं ब्राह्मणं यथा॥

anārya iti māmāryāḥ putravikrāyakaṁ dhruvam।
vikariṣyanti rathyāsu surāpaṁ brāhmaṇaṁ yathā॥

‘श्रेष्ठ पुरुष निश्चय ही मुझे नीच और एक नारी के मोह में पड़कर बेटों को बेच देनेवाला कहकर शराबी ब्राह्मण की भाँति मेरी राह-बाट और गली-कूचों में निन्दा करेंगे

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॥ २ · १२ · ७९ ॥
अहो दुःखमहो कृच्छ्रं यत्र वाचः क्षमे तव। दुःखमेवंविधं प्राप्तं पुरा कृतमिवाशुभम्॥

aho duḥkhamaho kṛcchraṁ yatra vācaḥ kṣame tava।
duḥkhamevaṁvidhaṁ prāptaṁ purā kṛtamivāśubham॥

‘अहो! कितना दुःख है! कितना कष्ट है!! जहाँ मुझे तेरी ये बातें सहन करनी पड़ती हैं। मानो यह मेरे पूर्वजन्म के किये हुए पाप का ही अशुभ फल है, जो मुझ पर ऐसा महान् दुःख आ पड़ा है

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॥ २ · १२ · ८० ॥
चिरं खलु मया पापे त्वं पापेनाभिरक्षिता। अज्ञानादुपसम्पन्नं रज्जुरुद्बन्धनी यथा॥

ciraṁ khalu mayā pāpe tvaṁ pāpenābhirakṣitā।
ajñānādupasampannaṁ rajjurudbandhanī yathā॥

‘पापिनि! मुझ पापी ने बहुत दिनों से तेरी रक्षा की और अज्ञानवश तुझे गले लगाया; किंतु तू आज मेरे गले में पड़ी हुई फाँसी की रस्सी बन गयी

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॥ २ · १२ · ८१ ॥
रममाणस्त्वया सार्धं मृत्युं त्वां नाभिलक्षये। बालो रहसि हस्तेन कृष्णसर्पमिवास्पृशम्॥

ramamāṇastvayā sārdhaṁ mṛtyuṁ tvāṁ nābhilakṣaye।
bālo rahasi hastena kṛṣṇasarpamivāspṛśam॥

‘जैसे बालक एकान्त में खेलता-खेलता काले नाग को हाथ में पकड़ ले, उसी प्रकार मैंने एकान्त में तेरे साथ क्रीडा करते हुए तेरा आलिङ्गन किया है; परंतु उस समय मुझे यह न सूझा कि तू ही एक दिन मेरी मृत्यु का कारण बनेगी

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॥ २ · १२ · ८२ ॥
तं तु मां जीवलोकोऽयं नूनमाक्रोष्टुमर्हति। मया ह्यापितृकः पुत्रः महात्मा दुरात्मना॥

taṁ tu māṁ jīvaloko'yaṁ nūnamākroṣṭumarhati।
mayā hyāpitṛkaḥ putraḥ sa mahātmā durātmanā॥

‘हाय! मुझ दुरात्मा ने जीते-जी ही अपने महात्मा पुत्र को पितृहीन बना दिया। मुझे तो सारा संसार निश्चय ही धिक्कारेगा—गालियाँ देगा, जो उचित ही होगा

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॥ २ · १२ · ८३ ॥
बालिशो बत कामात्मा राजा दशरथो भृशम्। स्त्रीकृते यः प्रियं पुत्रं वनं प्रस्थापयिष्यति॥

bāliśo bata kāmātmā rājā daśaratho bhṛśam।
strīkṛte yaḥ priyaṁ putraṁ vanaṁ prasthāpayiṣyati॥

‘लोग मेरी निन्दा करते हुए कहेंगे कि राजा दशरथ बड़ा ही मूर्ख और कामी है, जो एक स्त्री को संतुष्ट करने के लिये अपने प्यारे पुत्र को वन में भेज रहा है

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॥ २ · १२ · ८४ ॥
वेदैश्च ब्रह्मचर्यैश्च गुरुभिश्चोपकर्शितः। भोगकाले महत्कृच्छ्रं पुनरेव प्रपत्स्यते॥

vedaiśca brahmacaryaiśca gurubhiścopakarśitaḥ।
bhogakāle mahatkṛcchraṁ punareva prapatsyate॥

‘हाय! अबतक तो श्रीराम वेदों का अध्ययन करने, ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करने तथा अनेकानेक गुरुजनों की सेवा में संलग्न रहने के कारण दुबले होते चले आये हैं। अब जब इनके लिये सुखभोग का समय आया है, तब ये वन में जाकर महान् कष्टों में पड़ेंगे

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॥ २ · १२ · ८५ ॥
नालं द्वितीयं वचनं पुत्रो मां प्रतिभाषितुम्। वनं प्रव्रजेत्युक्तो बाढमित्येव वक्ष्यति॥

nālaṁ dvitīyaṁ vacanaṁ putro māṁ pratibhāṣitum।
sa vanaṁ pravrajetyukto bāḍhamityeva vakṣyati॥

‘अपने पुत्र श्रीराम से यदि मैं कह दूँ कि तुम वन को चले जाओ तो वे तुरंत ‘बहुत अच्छा’ कहकर मेरी आज्ञा को स्वीकार कर लेंगे। मेरे लिये राम दूसरी कोई बात कहकर मुझे प्रतिकूल उत्तर नहीं दे सकते

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॥ २ · १२ · ८६ ॥
यदि मे राघवः कुर्याद् वनं गच्छेति चोदितः। प्रतिकूलं प्रियं मे स्यान्न तु वत्सः करिष्यति॥

yadi me rāghavaḥ kuryād vanaṁ gaccheti coditaḥ।
pratikūlaṁ priyaṁ me syānna tu vatsaḥ kariṣyati॥

‘यदि मेरे वन जाने की आज्ञा दे देने पर भी श्रीरामचन्द्र उसके विपरीत करते—वन में नहीं जाते तो वही मेरे लिये प्रिय कार्य होगा; किंतु मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता

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॥ २ · १२ · ८७ ॥
राघवे हि वनं प्राप्ते सर्वलोकस्य धिक्कृतम्। मृत्युरक्षमणीयं मां नयिष्यति यमक्षयम्॥

rāghave hi vanaṁ prāpte sarvalokasya dhikkṛtam।
mṛtyurakṣamaṇīyaṁ māṁ nayiṣyati yamakṣayam॥

‘यदि रघुनन्दन राम वन को चले गये तो सब लोगों के धिक्कारपात्र बने हुए मुझ अक्षम्य अपराधी को मृत्यु अवश्य यमलोक में पहुँचा देगी

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॥ २ · १२ · ८८ ॥
मृते मयि गते रामे वनं मनुजपुङ्गवे। इष्टे मम जने शेषे किं पापं प्रतिपत्स्यसे॥

mṛte mayi gate rāme vanaṁ manujapuṅgave।
iṣṭe mama jane śeṣe kiṁ pāpaṁ pratipatsyase॥

‘यदि नरश्रेष्ठ श्रीराम के वन में चले जाने पर मेरी मृत्यु हो गयी तो शेष जो मेरे प्रियजन (कौसल्या आदि) यहाँ रहेंगे, उन पर तू कौन-सा अत्याचार करेगी?

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॥ २ · १२ · ८९ ॥
कौसल्यां मां रामं पुत्रौ यदि हास्यति। दुःखान्यसहती देवी मामेवानुगमिष्यति॥

kausalyāṁ māṁ ca rāmaṁ ca putrau ca yadi hāsyati।
duḥkhānyasahatī devī māmevānugamiṣyati॥

‘देवी कौसल्या को यदि मुझसे, श्रीराम से तथा शेष दोनों पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघ्न से विच्छेद हो जायगा तो वह इतने बड़े दुःख को सहन नहीं कर सकेगी; अतः मेरे ही पीछे वह भी परलोक सिधार जायगी। (सुमित्रा का भी यही हाल होगा)

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॥ २ · १२ · ९० ॥
कौसल्यां सुमित्रां मां पुत्रैस्त्रिभिः सह। प्रक्षिप्य नरके सा त्वं कैकेयि सुखिता भव॥

kausalyāṁ ca sumitrāṁ ca māṁ ca putraistribhiḥ saha।
prakṣipya narake sā tvaṁ kaikeyi sukhitā bhava॥

‘कैकेयि! इस प्रकार कौसल्या को, सुमित्रा को और तीनों पुत्रों के साथ मुझे भी नरक-तुल्य महान् शोक में डालकर तू स्वयं सुखी होना

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॥ २ · १२ · ९१ ॥
मया रामेण त्यक्तं शाश्वतं सत्कृतं गुणैः। इक्ष्वाकुकुलमक्षोभ्यमाकुलं पालयिष्यसि॥

mayā rāmeṇa ca tyaktaṁ śāśvataṁ satkṛtaṁ guṇaiḥ।
ikṣvākukulamakṣobhyamākulaṁ pālayiṣyasi॥

‘अनेकानेक गुणों से सत्कृत, शाश्वत तथा क्षोभरहित यह इक्ष्वाकुकुल जब मुझसे और श्रीराम से परित्यक्त होकर शोक से व्याकुल हो जायगा, तब उस अवस्था में तू इसका पालन करेगी

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॥ २ · १२ · ९२ ॥
प्रियं चेद् भरतस्यैतद् रामप्रव्राजनं भवेत्। मा स्म मे भरतः कार्षीत् प्रेतकृत्यं गतायुषः॥

priyaṁ ced bharatasyaitad rāmapravrājanaṁ bhavet।
mā sma me bharataḥ kārṣīt pretakṛtyaṁ gatāyuṣaḥ॥

‘यदि भरत को भी श्रीराम का यह वन में भेजा जाना प्रिय जान पड़े तो मेरी मृत्यु के बाद वे मेरे शरीर का दाहसंस्कार न करें

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॥ २ · १२ · ९३ ॥
मृते मयि गते रामे वनं पुरुषपुङ्गवे। सेदानीं विधवा राज्यं सपुत्रा कारयिष्यसि॥

mṛte mayi gate rāme vanaṁ puruṣapuṅgave।
sedānīṁ vidhavā rājyaṁ saputrā kārayiṣyasi॥

‘पुरुषशिरोमणि श्रीराम के वन-गमन के पश्चात् मेरी मृत्यु हो जाने पर अब विधवा होकर तू बेटे के साथ अयोध्या का राज्य करेगी

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॥ २ · १२ · ९४ ॥
त्वं राजपुत्रि दैवेन न्यवसो मम वेश्मनि। अकीर्तिश्चातुला लोके ध्रुवः परिभवश्च मे। सर्वभूतेषु चावज्ञा यथा पापकृतस्तथा॥

tvaṁ rājaputri daivena nyavaso mama veśmani।
akīrtiścātulā loke dhruvaḥ paribhavaśca me।
sarvabhūteṣu cāvajñā yathā pāpakṛtastathā॥

‘राजकुमारी! तू मेरे दुर्भाग्य से मेरे घर में आकर बस गयी। तेरे कारण संसार में पापाचारी की भाँति मुझे निश्चय ही अनुपम अपयश, तिरस्कार और समस्त प्राणियों से अवहेलना प्राप्त होगी

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॥ २ · १२ · ९५ ॥
कथं रथैर्विभुर्यात्वा गजाश्वैश्च मुहुर्मुहुः। पद्भ्यां रामो महारण्ये वत्सो मे विचरिष्यति॥

kathaṁ rathairvibhuryātvā gajāśvaiśca muhurmuhuḥ।
padbhyāṁ rāmo mahāraṇye vatso me vicariṣyati॥

‘मेरे पुत्र सामर्थ्यशाली राम बारंबार रथों, हाथियों और घोड़ों से यात्रा किया करते थे। वे ही अब उस विशाल वन में पैदल कैसे चलेंगे?

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॥ २ · १२ · ९६ ॥
यस्य चाहारसमये सूदाः कुण्डलधारिणः। अहंपूर्वाः पचन्ति स्म प्रसन्नाः पानभोजनम्॥

yasya cāhārasamaye sūdāḥ kuṇḍaladhāriṇaḥ।
ahaṁpūrvāḥ pacanti sma prasannāḥ pānabhojanam॥

संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓

॥ २ · १२ · ९७ ॥
कथं नु कषायाणि तिक्तानि कटुकानि च। भक्षयन् वन्यमाहारं सुतो मे वर्तयिष्यति॥

sa kathaṁ nu kaṣāyāṇi tiktāni kaṭukāni ca।
bhakṣayan vanyamāhāraṁ suto me vartayiṣyati॥

॥ ९६–९७ ॥

‘भोजन के समय जिनके लिये कुण्डलधारी रसोइये प्रसन्न होकर ‘पहले मैं बनाऊँगा’ ऐसा कहते हुए खाने-पीने की वस्तुएँ तैयार करते थे, वे ही मेरे पुत्र रामचन्द्र वन में कसैले, तिक्त और कड़वे फलों का आहार करते हुए किस तरह निर्वाह करेंगे?

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॥ २ · १२ · ९८ ॥
महार्हवस्त्रसम्बद्धो भूत्वा चिरसुखोचितः। काषायपरिधानस्तु कथं रामो भविष्यति॥

mahārhavastrasambaddho bhūtvā cirasukhocitaḥ।
kāṣāyaparidhānastu kathaṁ rāmo bhaviṣyati॥

‘जो सदा बहुमूल्य वस्त्र पहना करते थे और जिनका चिरकाल से सुख में ही समय बीता है, वे ही श्रीराम वन में गेरुआ वस्त्र पहनकर कैसे रह सकेंगे?

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॥ २ · १२ · ९९ ॥
कस्येदं दारुणं वाक्यमेवंविधमपीरितम्। रामस्यारण्यगमनं भरतस्याभिषेचनम्॥

kasyedaṁ dāruṇaṁ vākyamevaṁvidhamapīritam।
rāmasyāraṇyagamanaṁ bharatasyābhiṣecanam॥

‘श्रीराम का वनगमन और भरत का अभिषेक—ऐसा कठोर वाक्य तूने किसकी प्रेरणा से अपने मुँह से निकाला है?

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॥ २ · १२ · १०० ॥
धिगस्तु योषितो नाम शठाः स्वार्थपरायणाः। ब्रवीमि स्त्रियः सर्वा भरतस्यैव मातरम्॥

dhigastu yoṣito nāma śaṭhāḥ svārthaparāyaṇāḥ।
na bravīmi striyaḥ sarvā bharatasyaiva mātaram॥

‘स्त्रियों को धिक्कार है; क्योंकि वे शठ और स्वार्थपरायण होती हैं; परंतु मैं सारी स्त्रियों के लिये ऐसा नहीं कह सकता, केवल भरत की माता की ही निन्दा करता हूँ

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॥ २ · १२ · १०१ ॥
अनर्थभावेऽर्थपरे नृशंसे ममानुतापाय निवेशितासि। किमप्रियं पश्यसि मन्निमित्तं हितानुकारिण्यथवापि रामे॥

anarthabhāve'rthapare nṛśaṁse
mamānutāpāya niveśitāsi।
kimapriyaṁ paśyasi mannimittaṁ
hitānukāriṇyathavāpi rāme॥

‘अनर्थ ही अर्थबुद्धि रखनेवाली क्रूर कैकेयि! तू मुझे संताप देने के लिये ही इस घर में बसायी गयी है। अरी! मेरे कारण तू अपना कौन-सा अप्रिय होता देख रही है? अथवा सबका निरन्तर हित करनेवाले श्रीराम में ही तुझे कौन-सी बुराई दिखायी देती है?

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॥ २ · १२ · १०२ ॥
परित्यजेयुः पितरोऽपि पुत्रान् भार्याः पतींश्चापि कृतानुरागाः। कृत्स्नं हि सर्वं कुपितं जगत् स्याद् दृष्ट्वैव रामं व्यसने निमग्नम्॥

parityajeyuḥ pitaro'pi putrān
bhāryāḥ patīṁścāpi kṛtānurāgāḥ।
kṛtsnaṁ hi sarvaṁ kupitaṁ jagat syād
dṛṣṭvaiva rāmaṁ vyasane nimagnam॥

‘श्रीराम को संकट के समुद्र में डूबा हुआ देखकर तो पिता अपने पुत्रों को त्याग देंगे। अनुरागिणी स्त्रियाँ भी अपने पतियों को त्याग देंगी। इस प्रकार यह सारा जगत् ही कुपित—विपरीत व्यवहार करनेवाला हो जायगा

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॥ २ · १२ · १०३ ॥
अहं पुनर्देवकुमाररूप- मलंकृतं तं सुतमाव्रजन्तम्। नन्दामि पश्यन्निव दर्शनेन भवामि दृष्ट्वैव पुनर्युवेव॥

ahaṁ punardevakumārarūpa-
malaṁkṛtaṁ taṁ sutamāvrajantam।
nandāmi paśyanniva darśanena
bhavāmi dṛṣṭvaiva punaryuveva॥

‘देवकुमार के समान कमनीय रूपवाले अपने पुत्र श्रीराम को जब वस्त्र और आभूषणों से विभूषित होकर सामने आते देखता हूँ तो नेत्रों से उनकी शोभा निहारकर निहाल हो जाता हूँ। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है मानो मैं फिर जवान हो गया

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॥ २ · १२ · १०४ ॥
विना हि सूर्येण भवेत् प्रवृत्ति- रवर्षता वज्रधरेण वापि। रामं तु गच्छन्तमितः समीक्ष्य जीवेन्न कश्चिच्चिति चेतना मे॥

vinā hi sūryeṇa bhavet pravṛtti-
ravarṣatā vajradhareṇa vāpi।
rāmaṁ tu gacchantamitaḥ samīkṣya
jīvenna kaścicciti cetanā me॥

‘कदाचित् सूर्य के बिना भी संसार का काम चल जाय, वज्रधारी इन्द्र के वर्षा न करने पर भी प्राणियों का जीवन सुरक्षित रह जाय, परंतु राम को यहाँ से वन की ओर जाते देखकर कोई भी जीवित नहीं रह सकता—मेरी ऐसी धारणा है

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॥ २ · १२ · १०५ ॥
विनाशकामामहिताममित्रा- मावासयं मृत्युमिवात्मनस्त्वाम्। चिरं बतांकेन धृतासि सर्पी महाविषा तेन हतोऽस्मि मोहात्॥

vināśakāmāmahitāmamitrā-
māvāsayaṁ mṛtyumivātmanastvām।
ciraṁ batāṁkena dhṛtāsi sarpī
mahāviṣā tena hato'smi mohāt॥

‘अरी! तू मेरा विनाश चाहनेवाली, अहित करनेवाली और शत्रुरूप है। जैसे कोई अपनी ही मृत्यु को घर में स्थान दे दे, उसी प्रकार मैंने तुझे घर में बसा लिया है। खेद की बात है कि मैंने मोहवश तुझ महाविषैली नागिन को चिरकाल से अपने अङ्क में धारण कर रखा है; इसीलिये आज मैं मारा गया

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॥ २ · १२ · १०६ ॥
मया रामेण लक्ष्मणेन प्रशास्तु हीनो भरतस्त्वया सह। पुरं राष्ट्रं निहत्य बान्धवान् ममाहितानां भवाभिहर्षिणी॥

mayā ca rāmeṇa ca lakṣmaṇena
praśāstu hīno bharatastvayā saha।
puraṁ ca rāṣṭraṁ ca nihatya bāndhavān
mamāhitānāṁ ca bhavābhiharṣiṇī॥

‘मुझसे, श्रीराम और लक्ष्मण से हीन होकर भरत समस्त बान्धवों का विनाश करके तेरे साथ इस नगर तथा राष्ट्र का शासन करें तथा तू मेरे शत्रुओं का हर्ष बढ़ानेवाली हो

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॥ २ · १२ · १०७ ॥
नृशंसवृत्ते व्यसनप्रहारिणि प्रसह्य वाक्यं यदिहाद्य भाषसे। नाम ते तेन मुखात् पतन्त्यधो विशीर्यमाणा दशनाः सहस्रधा॥

nṛśaṁsavṛtte vyasanaprahāriṇi
prasahya vākyaṁ yadihādya bhāṣase।
na nāma te tena mukhāt patantyadho
viśīryamāṇā daśanāḥ sahasradhā॥

‘क्रूरतापूर्ण बर्ताव करनेवाली कैकेयी! तू संकट में पड़े हुए पर प्रहार कर रही है। अरी! जब तू दुराग्रहपूर्वक आज ऐसी कठोर बातें मुँह से निकालती है, उस समय ये दाँतों के टुकड़े-टुकड़े होकर मुँह से नीचे क्यों नहीं गिर जाते?

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॥ २ · १२ · १०८ ॥
किंचिदाहितमप्रियं वचो वेत्ति रामः परुषाणि भाषितुम्। कथं तु रामे ह्यभिरामवादिनि ब्रवीषि दोषान् गुणनित्यसम्मते॥

na kiṁcidāhitamapriyaṁ vaco
na vetti rāmaḥ paruṣāṇi bhāṣitum।
kathaṁ tu rāme hyabhirāmavādini
bravīṣi doṣān guṇanityasammate॥

‘श्रीराम कभी किसीसे कोई अहितकारक या अप्रिय वचन नहीं करते। वे कटुवचन बोलना जानते ही नहीं हैं। उनका अपने गुणों के कारण सदा-सर्वदा सम्मान होता है। उन्हीं मनोहर वचन बोलनेवाले श्रीराम में तू दोष कैसे बता रही है? क्योंकि वनवास उसीको दिया जाता है, जिसके बहुत-से दोष सिद्ध हो चुके हों

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॥ २ · १२ · १०९ ॥
प्रताम्य वा प्रज्वल वा प्रणश्य वा सहस्रशो वा स्फुटिता महीं व्रज। ते करिष्यामि वचः सुदारुणं ममाहितं केकयराजपांसने॥

pratāmya vā prajvala vā praṇaśya vā
sahasraśo vā sphuṭitā mahīṁ vraja।
na te kariṣyāmi vacaḥ sudāruṇaṁ
mamāhitaṁ kekayarājapāṁsane॥

‘ओ केकयराज के कुल की जीती-जागती कलङ्क! तू चाहे ग्लानि में डूब जा अथवा आग में जलकर खाक हो जा या विष खाकर प्राण दे दे अथवा पृथ्वी में हजारों दरारें बनाकर उसीमें समा जा; परंतु मेरा अहित करनेवाली तेरी यह अत्यन्त कठोर बात मैं कदापि नहीं मानूँगा

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॥ २ · १२ · ११० ॥
क्षुरोपमां नित्यमसत्प्रियंवदां प्रदुष्टभावां स्वकुलोपघातिनीम्। जीवितुं त्वां विषहेऽमनोरमां दिधक्षमाणां हृदयं सबन्धनम्॥

kṣuropamāṁ nityamasatpriyaṁvadāṁ
praduṣṭabhāvāṁ svakulopaghātinīm।
na jīvituṁ tvāṁ viṣahe'manoramāṁ
didhakṣamāṇāṁ hṛdayaṁ sabandhanam॥

‘तू छुरे के समान घात करनेवाली है। बातें तो मीठी-मीठी करती है, परंतु वे सदा झूठी और सद्भावना से रहित होती हैं। तेरे हृदय का भाव अत्यन्त दूषित है तथा तू अपने कुल का भी नाश करनेवाली है। इतना ही नहीं, तू प्राणोंसहित मेरे हृदय को भी जलाकर भस्म कर डालना चाहती है; इसीलिये मेरे मन को नहीं भाती है। तुझ पापिनी का जीवित रहना मैं नहीं सह सकता

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॥ २ · १२ · १११ ॥
जीवितं मेऽस्ति कुतः पुनः सुखं विनात्मजेनात्मवतां कुतो रतिः। ममाहितं देवि कर्तुमर्हसि स्पृशामि पादावपि ते प्रसीद मे॥

na jīvitaṁ me'sti kutaḥ punaḥ sukhaṁ
vinātmajenātmavatāṁ kuto ratiḥ।
mamāhitaṁ devi na kartumarhasi
spṛśāmi pādāvapi te prasīda me॥

‘देवि! अपने बेटे श्रीराम के बिना मेरा जीवन नहीं रह सकता, फिर कहाँ से सुख मिल सकता है? आत्मज्ञ पुरुषों को भी अपने पुत्र से बिछोह हो जाने पर कैसे चैन मिल सकता है? अतः तू मेरा अहित न कर। मैं तेरे पैर छूता हूँ, तू मुझ पर प्रसन्न हो जा’

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॥ २ · १२ · ११२ ॥
भूमिपालो विलपन्ननाथवत् स्त्रिया गृहीतो हृदयेऽतिमात्रया। पपात देव्याश्चरणौ प्रसारिता- वुभावसम्प्राप्य यथाऽऽतुरस्तथा॥

sa bhūmipālo vilapannanāthavat
striyā gṛhīto hṛdaye'timātrayā।
papāta devyāścaraṇau prasāritā-
vubhāvasamprāpya yathā''turastathā॥

इस प्रकार महाराज दशरथ मर्यादा का उल्लङ्घन करनेवाली उस हठीली स्त्री के वश में पड़कर अनाथ की भाँति विलाप कर रहे थे। वे देवी कैकेयी के फैलाये हुए दोनों चरणों को छूना चाहते थे; परंतु उन्हें न पाकर बीच में ही मूर्च्छित होकर गिर पड़े। ठीक उसी तरह, जैसे कोई रोगी किसी वस्तु को छूना चाहता है; किंतु दुर्बलता के कारण वहाँतक न पहुँचकर बीच में ही अचेत होकर गिर जाता है

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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे द्वादशः सर्गः॥ १२॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२॥