राजाका विलाप और कैकेयीसे अनुनय-विनय
“रात्रि-विलाप”
॥ २ · १३ · १–१० ॥
मन्दालोके कक्षे शोकभग्नो निद्राहीनो वृद्धो दशरथः भूमौ ईषदुत्थाय ताराकीर्णं चन्द्रयुक्तं रात्र्याकाशं प्रति दुर्बलं कम्पमानमञ्जलिं मुखं च उन्नमयति, रात्रिर्मा व्यगादिति प्रार्थयन्; ताम्राश्रुपूर्णमुखः नक्षत्रेषु निबद्धदृष्टिः।
मन्द प्रकाशवाले कक्षमें शोकसे टूटे, निद्राहीन वृद्ध महाराज दशरथ भूमिसे कुछ उठकर, तारोंसे भरे चन्द्रयुक्त खुले आकाशकी ओर दुर्बल काँपती अञ्जलि और मुख उठाकर रातसे प्रार्थना कर रहे हैं कि वह कभी समाप्त न हो—जिससे श्रीरामको वनवास देनेवाला प्रभात कभी न आये; मुकुट एक ओर रखा है, मुख ताम्रवर्ण आँसुओंसे भीगा है, दृष्टि नक्षत्रोंपर टिकी है; उनपर चन्द्र-तारोंका शीतल आलोक।
In the dimly lit chamber the grief-broken, sleepless old King Dasharath half-raises himself from the floor and lifts a weak, trembling añjali and his face toward a great window full of the star-strewn moonlit sky — begging the night never to end, lest the dawn that must exile Ram ever come — his crown set aside, his face wet with copper-bright tears, his gaze fixed on the constellations.
atadarhaṁ mahārājaṁ śayānamatathocitam।
yayātimiva puṇyānte devalokāt paricyutam॥
संयुक्त अनुवाद ↓joint translation ↓
anartharūpāsiddhārthā hyabhītā bhayadarśinī।
punarākārayāmāsa tameva varamaṅganā॥
महाराज दशरथ उस अयोग्य और अनुचित अवस्था में पृथ्वी पर पड़े थे। उस समय वे पुण्य समाप्त होनेपर देवलोक से भ्रष्ट हुए राजा ययाति के समान जान पड़ते थे। उनकी वैसी दशा देख अनर्थ की साक्षात् मूर्ति कैकेयी, जिसका प्रयोजन अभीतक सिद्ध नहीं हुआ था, जो लोकापवाद का भय छोड़ चुकी थी और श्रीराम से भरत के लिये भय देखती थी, पुनः उसी वर के लिये राजा को सम्बोधित करके कहने लगी—
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tvaṁ katthase mahārāja satyavādī dṛḍhavrataḥ।
mama cedaṁ varaṁ kasmād vidhārayitumicchasi॥
‘महाराज! आप तो डींग मारा करते थे कि मैं बड़ा सत्यवादी और दृढप्रतिज्ञ हूँ, फिर आज मेरे इस वरदान को क्यों हजम कर जाना चाहते हैं?’
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evamuktastu kaikeyyā rājā daśarathastadā।
pratyuvāca tataḥ kruddho muhūrtaṁ vihvalanniva॥
कैकेयी के ऐसा कहनेपर राजा दशरथ दो घड़ी तक व्याकुलकी-सी अवस्था में रहे। तत्पश्चात् कुपित होकर उसे इस प्रकार उत्तर देने लगे—
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mṛte mayi gate rāme vanaṁ manujapuṅgave।
hantānārye mamāmitre sakāmā sukhinī bhava॥
‘ओ नीच! तू मेरी शत्रु है। नरश्रेष्ठ श्रीराम के वन में चले जानेपर जब मेरी मृत्यु हो जायगी, उस समय तू सफलमनोरथ होकर सुख से रहना
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svarge'pi khalu rāmasya kuśalaṁ daivatairaham।
pratyādeśādabhihitaṁ dhārayiṣye kathaṁ bata॥
‘हाय! स्वर्ग में भी जब देवता मुझसे श्रीराम का कुशल समाचार पूछेंगे, उस समय मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा? यदि कहूँ, उन्हें वन में भेज दिया तो उसके बाद वे लोग जो मेरे प्रति धिक्कारपूर्ण बात कहेंगे, उसे कैसे सह सकूँगा? इसके लिये मुझे बड़ा खेद है
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kaikeyyāḥ priyakāmena rāmaḥ pravrājito vanam।
yadi satyaṁ bravīmyetat tadasatyaṁ bhaviṣyati॥
‘कैकेयी का प्रिय करनेकी इच्छा से उसके माँगे हुए वरदान के अनुसार मैंने श्रीराम को वन में भेज दिया, यदि ऐसा कहूँ और इसे सत्य बताऊँ तो मेरी वह पहली बात असत्य हो जायगी, जिसके द्वारा मैंने राम को राज्य देनेका आश्वासन दिया है
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aputreṇa mayā putraḥ śrameṇa mahatā mahān।
rāmo labdho mahātejāḥ sa kathaṁ tyajyate mayā॥
‘मैं पहले पुत्रहीन था, फिर महान् परिश्रम करके मैंने जिन महातेजस्वी महापुरुष श्रीराम को पुत्ररूप में प्राप्त किया है, उनका मेरे द्वारा त्याग कैसे किया जा सकता है?
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śūraśca kṛtavidyaśca jitakrodhaḥ kṣamāparaḥ।
kathaṁ kamalapatrākṣo mayā rāmo vivāsyate॥
‘जो शूरवीर, विद्वान्, क्रोध को जीतनेवाले और क्षमापरायण हैं, उन कमलनयन श्रीराम को मैं देशनिकाला कैसे दे सकता हूँ?
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kathamindīvaraśyāmaṁ dīrghabāhuṁ mahābalam।
abhirāmamahaṁ rāmaṁ sthāpayiṣyāmi daṇḍakān॥
‘जिनकी अङ्गकान्ति नीलकमल के समान श्याम है, भुजाएँ विशाल और बल महान् हैं, उन नयनाभिराम श्रीराम को मैं दण्डकवन में कैसे भेज सकूँगा?
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sukhānāmucitasyaiva duḥkhairanucitasya ca।
duḥkhaṁ nāmānupaśyeyaṁ kathaṁ rāmasya dhīmataḥ॥
‘जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य हैं, कदापि दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं, उन बुद्धिमान् श्रीराम को दुःख उठाते मैं कैसे देख सकता हूँ?
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yadi duḥkhamakṛtvā tu mama saṁkramaṇaṁ bhavet।
aduḥkhārhasya rāmasya tataḥ sukhamavāpnuyām॥
‘जो दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं, उन श्रीराम को यह वनवास का दुःख दिये बिना ही यदि मैं इस संसार से विदा हो जाता तो मुझे बड़ा सुख मिलता
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nṛśaṁse pāpasaṁkalpe rāmaṁ satyaparākramam।
kiṁ vipriyeṇa kaikeyi priyaṁ yojayase mama॥
‘ओ पापपूर्ण विचार रखनेवाली पाषाणहृदया कैकेयि! सत्यपराक्रमी श्रीराम मुझे बहुत प्रिय हैं, तू मुझसे उनका विछोह क्यों करा रही है? अरी! ऐसा करनेसे निश्चय ही संसार में तेरी वह अपकीर्ति फैलेगी, जिसकी कहीं तुलना नहीं है’
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akīrtiratulā loke dhruvaṁ paribhaviṣyati।
tathā vilapatastasya paribhramitacetasaḥ॥
इस प्रकार विलाप करते-करते राजा दशरथ का चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा। इतनेहीमें सूर्यदेव अस्ताचल को चले गये और प्रदोषकाल आ पहुँचा
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astamabhyāgamat sūryo rajanī cābhyavartata।
sā triyāmā tadārtasya candramaṇḍalamaṇḍitā॥
वह तीन पहरोंवाली रात यद्यपि चन्द्रमण्डल की चारुचन्द्रिका से आलोकित हो रही थी, तो भी उस समय आर्त होकर विलाप करते हुए राजा दशरथ के लिये प्रकाश या उल्लास न दे सकी
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rājño vilapamānasya na vyabhāsata śarvarī।
sadaivoṣṇaṁ viniḥśvasya vṛddho daśaratho nṛpaḥ॥
बूढ़े राजा दशरथ निरन्तर गरम उच्छ्वास लेते हुए आकाश की ओर दृष्टि लगाये आर्त की भाँति दुःखपूर्ण विलाप करने लगे—
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vilalāpārtavad duḥkhaṁ gaganāsaktalocanaḥ।
na prabhātaṁ tvayecchāmi niśe nakṣatrabhūṣite॥
‘नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत कल्याणमयी रात्रिदेवि! मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे द्वारा प्रभात-काल लाया जाय। मुझपर दया करो। मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ता हूँ
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kriyatāṁ me dayā bhadre mayāyaṁ racito'ñjaliḥ।
athavā gamyatāṁ śīghraṁ nāhamicchāmi nirghṛṇām॥
‘अथवा शीघ्र बीत जाओ; क्योंकि जिसके कारण मुझे भारी संकट प्राप्त हुआ है, उस निर्दय और क्रूर कैकेयी को अब मैं नहीं देखना चाहता’
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nṛśaṁsāṁ kekayīṁ draṣṭuṁ yatkṛte vyasanaṁ mama।
evamuktvā tato rājā kaikeyīṁ saṁyatāñjaliḥ॥
कैकेयी से ऐसा कहकर राजधर्म के ज्ञाता राजा दशरथ ने पुनः हाथ जोड़कर उसे मनाने या प्रसन्न करनेकी चेष्टा आरम्भ की—
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prasādayāmāsa punaḥ kaikeyīṁ rājadharmavit।
sādhuvṛttasya dīnasya tvadgatasya gatāyuṣaḥ॥
‘कल्याणमयी देवि! जो सदाचारी, दीन, तेरे आश्रित, गतायु (मरणासन्न) और विशेषतः राजा है—ऐसे मुझ दशरथ पर कृपा कर
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prasādaḥ kriyatāṁ bhadre devi rājño viśeṣataḥ।
śūnye na khalu suśroṇi mayedaṁ samudāhṛtam॥
‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली केकयनन्दिनि! मैंने जो यह श्रीराम को राज्य देनेकी बात कही है, वह किसी सूने घर में नहीं, भरी सभा में घोषित की है, अतः बाले! तू बड़ी सहृदय है; इसलिये मुझपर भलीभाँति कृपा कर (जिससे सभासदोंद्वारा मेरा उपहास न हो)
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kuru sādhuprasādaṁ me bāle sahṛdayā hyasi।
prasīda devi rāmo me tvaddattaṁ rājyamavyayam॥
‘देवि! प्रसन्न हो जा। कजरारे नेत्रप्रान्तवाली प्रिये! मेरे श्रीराम तेरे ही दिये हुए इस अक्षय राज्य को प्राप्त करें, इससे तुझे उत्तम यश की प्राप्ति होगी
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labhatāmasitāpāṅge yaśaḥ paramavāpsyasi।
mama rāmasya lokasya gurūṇāṁ bharatasya ca।
priyametad guruśroṇi kuru cārumukhekṣaṇe॥
‘पृथुल नितम्बवाली देवि! सुमुखि! सुलोचने! यह प्रस्ताव मुझको, श्रीराम को, समस्त प्रजावर्ग को, गुरुजनों को तथा भरत को भी प्रिय होगा, अतः इसे पूर्ण कर’
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viśuddhabhāvasya hi duṣṭabhāvā
dīnasya tāmrāśrukalasya rājñaḥ।
śrutvā vicitraṁ karuṇaṁ vilāpaṁ
bharturnṛśaṁsā na cakāra vākyam॥
राजा के हृदय का भाव अत्यन्त शुद्ध था, उनके आँसूभरे नेत्र लाल हो गये थे और वे दीनभाव से विचित्र करुणाजनक विलाप कर रहे थे, किंतु मन में दूषित विचार रखनेवाली निष्ठुर कैकेयी ने पति के उस विलाप को सुनकर भी उनकी आज्ञा का पालन नहीं किया
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tataḥ sa rājā punareva mūrcchitaḥ
priyāmatuṣṭāṁ pratikūlabhāṣiṇīm।
samīkṣya putrasya vivāsanaṁ prati
kṣitau visaṁjño nipapāta duḥkhitaḥ॥
(इतनी अनुनय-विनय के बाद भी) जब प्रिया कैकेयी किसी तरह सन्तुष्ट न हो सकी और बराबर प्रतिकूल बात ही मुँह से निकालती गयी, तब पुत्र के वनवास की बात सोचकर राजा पुनः दुःख के मारे मूर्च्छित हो गये और सुध-बुध खोकर पृथ्वी पर गिर पड़े
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itīva rājño vyathitasya sā niśā
jagāma ghoraṁ śvasato manasvinaḥ।
vibodhyamānaḥ pratibodhanaṁ tadā
nivārayāmāsa sa rājasattamaḥ॥
इस प्रकार व्यथित होकर भयंकर उच्छ्वास लेते हुए मनस्वी राजा दशरथ की वह रात धीरे-धीरे बीत गयी। प्रातःकाल राजा को जगाने के लिये मनोहर वाद्यों के साथ मङ्गलगान होने लगा, परंतु उन राज-शिरोमणि ने तत्काल मनाही भेजकर वह सब बंद करा दिया
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें तेरहवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ १३ ॥